होना तुम्हारा

बहुत खास है मेरे लिए,
होना तुम्हारा..
खिलते है जिन ख्वाबों से,
उनमें है आना तुम्हारा.
हूँ हर्षित जिस हकीकत से,
उनमें है जीना तुम्हारा..

लोग पढ़ते है जिसको जान के कविता,
उनमें है बस जिक्र तुम्हारा.
जिंदगी और इसकी कहानी,
है दोनों ही अधूरी,
गर न मिलें इनको साथ तुम्हारा…
-सन्नी कुमार

Advertisements

अपने पराए हो गए

कुछ ख्वाब हकीकत हो गए,
और कुछ हकीकत ख्वाब हो गए,
जिंदगी ने ली कुछ करवट ऐसी,
कि कुछ पराए अपने हो गए,
और कुछ अपने पराए हो गए।
-सन्नी कुमार

ख्वाबों पे बेड़ी डालूँ तो डालूँ मैं कैसे?

WP_20170730_17_29_16_Proतुम कहती हो अक्सर कि मैं कुछ न कहूं,
पर तुम ही बताओ…..
शब्दों को विराम तो मैं दे भी दूं,
पर ख्यालो को रोकूं तो रोकूं मैं कैसे?
न लिखूँ अब तुमसे जुड़ी कोई ख्वाहिश,
पर यादों को बिसराउँ तो बिसराउँ मैं कैसे?

तुम कहती हो मिलके, न तुमसे मिलूं अब
पर खुद से ही बिछड़ू तो बिछड़ू मैं कैसे?
तुमको हो ऐतराज तो आँखें बंद भी कर लूं,
पर ख्वाबों पे बेड़ी डालूँ तो डालूँ मैं कैसे?
-सन
Celebrating Love on my blog http://www.sunnymca.wordpress.com

हर सुबह जिस आंगन में..

img_3104हर सुबह जिस आंगन में,
हजारों ख्वाब खिलते है,
चाहत की हर उड़ान को,
जहाँ पर पंख मिलते है,
है वही आँगन मेरा,
जहाँ हम रोज संवरते है..

कौतूहलता की हर रात का जहाँ,
अंत होता है,
ज्ञान से प्रकाशित वह चौखट,
जहाँ हमारा भोर होता है..
-सन्नी कुमार

क्यूं मैं काफिर कहाता हूँ..

IMG_3537नहीं हूँ मैं नमाजी,
न ही गिरिजा जाता हूँ,
पर तुम्हारी ही मूरत बनाकर,
हर रोज शीश झुकाता हूँ.
फिर क्यूँ कहते है कुछ ख़ास बंदे,
कि मैं गुनाह करता हूँ?

हूँ मैं मुरख प्रेम-मत में,
जो तुम्हें मिट्टी में बसाता हूँ,
पर मैं मुरख हूँ सनातन,
तुम्हें कण-कण में पाता हूँ.
क्या यही है गुनाह मेरा,
जो मैं काफिर कहाता हूँ?

है मेरी नजरे जो कच्ची,
मुझे हर रंग लुभाता है,
कभी तुमको नीला बताता,
कभी काला मैं पाता हूँ.
कभी लगते तुम रंगों से इतर,
कभी ऊर्जा बताता हूँ..

खुदा है तू, तू है ईश,
मैं तो यही मानता हूँ,
होंगे तुम्हारे सौ और नाम,
मैं तो कृष्णा जानता हूँ.
क्या यही है गुनाह मेरा,
जो मैं काफिर कहाता हूँ?
-सन्नी कुमार

Create a free website or blog at WordPress.com.

Up ↑

%d bloggers like this: