मजदूर का जीवन

फूस के मकान में मेरा जन्म हुआ,
और फूस में ही बीता बचपन, ब्याह हुआ,
धन्य हो यह सरकार जो हाल में परधान मंत्री आवास मिला,
कहने को तो घर ही है, पर भ्रस्टाचार से बचा बस दीवार मिला।

हिस्से में जमीन, जो कुछ गज भर थी,
सो अपनों में तकरार हुआ,
थी टीस बड़ी पर न्याय सुलभ कहाँ,
है जेब भी खाली आभास हुआ,
फिर किस मुंह से जाते कोट-कचहरी,
सो लाठी-गारी से सब बात हुआ,
कुछ लोग थके कुछ हम भी थके,
फिर अपनी पेट भरने में सब भूल गया।

हर रोज सुबह एक नई मुसीबत,
पर मैं कभी हिम्मत न हारा,
हारता भी कैसे तब भूख ही मेरी प्रेरक थी,
मैं रोज रोटी जीतकर लाता था,
कभी खेतों से, कभी कारखानों से,
कभी दफ्तर से, कभी दुकानों से,
आसान नहीं था हर रोज काम पाना,
पर फिर मैं भर पेट भोजन पे भी तो खट आता था,
ज्यादा ख्वाब नहीं थे मेरे तभी चैन की नींद मैं पाता था,
मैं था कोई कवि नहीं, न इश्क़ मुझे भरमाता था,
था शायद यही कारण कि मुझे चाँद भी नहीं लुभाता था।

खैर बचपन बीता बाप भरोसे,
जवानी पसीनों के बल पर मैंने जीया,
पर आज बुढापा मार रही है,
हूँ बोझ ऐसा बता रही है,
बेटे बहू का कैसे दोष मैं दूं,
वो दूर भले पर कुछ रोटी तो भेज रहे है,
ये घर गांव आज भी उजड़ा है,
और वो मेरी तरह औरों के आशियां सजा रहे है।

आज दोपहर मुझको चिढा रही है,
हूँ बेकार बतला रही है,
कामगारों की किस्मत का,
जिंदगी रोज मखौल उड़ा रही है,
देश की नीतियों से गायब है वृद्ध,
और सरकार विकास का शोर मचा रही है।

दोष कैसे दूँ मैं औरों को,
कि जवानी में मैं क्यों मजदूर हुआ,
तब खिचड़ी नहीं थे स्कूलों में,
सो बचपन से ही कामगार हुआ,
काश तब पढ़ लेता दो-चार किताबें,
और पा लेता कोई नौकरी आम,
फिर होता पेंशन का अधिकारी,
नहीं मिलती बुढापे अकेलेपन और भूख की मार,
काश बना लेता एक आशियाँ अपना भी,
तो ये सूरज और चांद न चिढाते आज,
जो कुछ मैं आज झेल रहा हूँ,
आगे यह अब देश न झेले,
ऐसा कोई करो विधान,
हो हर वृद्ध सशक्त, मिले सम्मान।
©सन्नी कुमार

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शुक्रिया सतरह तेरा

शुक्रिया सतरह तेरा,
हर रंग के लिए,
फरवरी का प्यार,
मई की मार के लिए,
सीखाया तुमने खुद को बेचना,
जून की रोटी के लिए,
धो चुका जो कड़वी यादें,
उन आंसुओं के लिए,
शुक्रिया सतरह तेरा,
हर रंग के लिए….

है खिले कई फूल जिसमें,
उस बाग के लिए,
हो गए जो अजनबी अपने,
उन सब सपनों के लिए,
दे रहे जो साथ मेरा,
उन यारों के लिए,
शुक्रिया सतरह तेरा,
हर रंग के लिए…

थी तलब जिस भाव की,
उस एहसास के लिए,
पहुंचाया जिसने तन-मन को ठंडक,
उन सब सांसो के लिए,
शुक्रिया सतरह तेरा,
हर प्यार के लिए…

हो चुका मैं पार जिनसे,
उन सब बाधाओं के लिए,
गया सराहा जब भी मैं,
हर उस लम्हें के लिए,
हूँ खिला जिस प्यार से,
उस परिवार के लिए,
शुक्रिया सतरह तेरा,
हर उपहार के लिए….
-सन्नी कुमार

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होना तुम्हारा

Sunny&Preeti1बहुत खास है मेरे लिए,
होना तुम्हारा..
खिलते है जिन ख्वाबों से,
उनमें है आना तुम्हारा.
हूँ हर्षित जिस हकीकत से,
उनमें है जीना तुम्हारा..

लोग पढ़ते है जिसको जान के कविता,
उनमें है बस जिक्र तुम्हारा.
जिंदगी और इसकी कहानी,
है दोनों ही अधूरी,
गर न मिलें इनको साथ तुम्हारा…
-सन्नी कुमार

Bahut khaas hai mere liye,
hona tumhara..
khilte hai jin khwabon se,
unmein hai aana tumhara..
hoon harshit jis haqeeqat se,
unmein hai jeena tumhara….

Log padhte hai jisko jaan ke kavita,
unmein hai bus jikra tumhara,
jindagi aur iski kahaani,
hai dono hi adhoori,
gar na mile inko saath tumhara.
©-Sunny Kumar

[Image credit:- Google Images]
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गलती न मेरी थी, न उनकी थी
ये सर्द सुबह है धुंध भरा…
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अपने पराए हो गए

कुछ ख्वाब हकीकत हो गए,
और कुछ हकीकत ख्वाब हो गए,
जिंदगी ने ली कुछ करवट ऐसी,
कि कुछ पराए अपने हो गए,
और कुछ अपने पराए हो गए।
-सन्नी कुमार

ख्वाबों पे बेड़ी डालूँ तो डालूँ मैं कैसे?

WP_20170730_17_29_16_Proतुम कहती हो अक्सर कि मैं कुछ न कहूं,
पर तुम ही बताओ…..
शब्दों को विराम तो मैं दे भी दूं,
पर ख्यालो को रोकूं तो रोकूं मैं कैसे?
न लिखूँ अब तुमसे जुड़ी कोई ख्वाहिश,
पर यादों को बिसराउँ तो बिसराउँ मैं कैसे?

तुम कहती हो मिलके, न तुमसे मिलूं अब
पर खुद से ही बिछड़ू तो बिछड़ू मैं कैसे?
तुमको हो ऐतराज तो आँखें बंद भी कर लूं,
पर ख्वाबों पे बेड़ी डालूँ तो डालूँ मैं कैसे?
-सन
Celebrating Love on my blog http://www.sunnymca.wordpress.com

हर सुबह जिस आंगन में..

img_3104हर सुबह जिस आंगन में,
हजारों ख्वाब खिलते है,
चाहत की हर उड़ान को,
जहाँ पर पंख मिलते है,
है वही आँगन मेरा,
जहाँ हम रोज संवरते है..

कौतूहलता की हर रात का जहाँ,
अंत होता है,
ज्ञान से प्रकाशित वह चौखट,
जहाँ हमारा भोर होता है..
-सन्नी कुमार

क्यूं मैं काफिर कहाता हूँ..

IMG_3537नहीं हूँ मैं नमाजी,
न ही गिरिजा जाता हूँ,
पर तुम्हारी ही मूरत बनाकर,
हर रोज शीश झुकाता हूँ.
फिर क्यूँ कहते है कुछ ख़ास बंदे,
कि मैं गुनाह करता हूँ?

हूँ मैं मुरख प्रेम-मत में,
जो तुम्हें मिट्टी में बसाता हूँ,
पर मैं मुरख हूँ सनातन,
तुम्हें कण-कण में पाता हूँ.
क्या यही है गुनाह मेरा,
जो मैं काफिर कहाता हूँ?

है मेरी नजरे जो कच्ची,
मुझे हर रंग लुभाता है,
कभी तुमको नीला बताता,
कभी काला मैं पाता हूँ.
कभी लगते तुम रंगों से इतर,
कभी ऊर्जा बताता हूँ..

खुदा है तू, तू है ईश,
मैं तो यही मानता हूँ,
होंगे तुम्हारे सौ और नाम,
मैं तो कृष्णा जानता हूँ.
क्या यही है गुनाह मेरा,
जो मैं काफिर कहाता हूँ?
-सन्नी कुमार

जो हमसे रूठ बैठे है..

तारीफों के हकदार वो, क्यूँ हमसे दूर बैठे है,
शाम हुयी आज फिर जवां उनकी याद में,
जो हमसे रूठ बैठे है..

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कुछ पुराने दोहे..

ढूंढ लाते हम उनको गर वो खो जाते,
पर बदले लोगों को ढूंढना नही आता..

ग़म भी है और ख़ुशी भी,
पर वो साथ नहीं,
और वो हम नहीं..

कहते है किसी के चले जाने से जिंदगी ख़त्म नहीं होती,
पर क्या साँसों का चलना भर ही जिंदगी है?
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वो लोग, जो कल तक हमारे लिये दुआएं करते थे,
वही आज तुम्हें भुलाने की सलाह देते है..
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हर ख्वाब पूरा नहीं होता,
पर ख्वाब में कुछ भी अधुरा नहीं होता..
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मिले फिर वही जो कल भी मिले थे,
पर मिलें इस कदर कि वो बिलकुल नए थे..
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घुटता है दिल, कुछ कह भी नहीं पाता,
छोड़ गया मेरा कल, आज अब हंस भी नहीं पाता..
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क्या हस्ती है तुम्हारी..
मुहब्बत हम कर नहीं सकते और नफरत तुम करने नहीं देती..
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अब और नहीं तड़पाओ,
अब और न हमको सताओ,
मै दूर तुमसे चला जाऊं,
आखिरी बार तो मिलने आओ.
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-सन्नी कुमार

 

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