इन आँखों को नम होने दूं न अभी

इन आँखों को नम होने दूं न अभी,
सफर में कई मोड़ आने बाक़ी है अभी,
सजा रहा हूँ तुम्हारे यादों को दिल में,
बस जुदाई मिली है, जिन्दा हूँ मैं अभी।

तुमसे बिछड़ कर एक पेड़ बनूंगा,
रास्ता मैं तुम्हारा रोज तकूँगा,
जिस रोज भी लौटी इस राह से तूम,
है वादा तुमको मैं बेहतर ही मिलूंगा।

तुम संग जो झूमती-गाती थी शामें,
वो जो महफ़िल थी उसे मुरझाने न दूंगा
वो चांद जो हमारा इन्तेजार था करता,
उससे तुम्हारी ही मैं बातें करूँगा।

याद आये तुमको जब भी मेरी,
मुस्कुराकर भुलाना हर शरारत मेरी,
है जिंदगी के दामन में कई और भी पन्ने,
होगा निश्चय ही मिलन उनमें हमारा कहीं।

इन आँखों को नम होने दूं न अभी,
सफर में कई मोड़ आने बाक़ी है अभी,
सजा रहा हूँ तुम्हारे यादों को दिल में,
बस जुदाई मिली है, जिन्दा हूँ मैं अभी।
©सन्नी कुमार

All words are for you my dear adorable khushboo Ma’am, but feelings are of multiple people. I have penned on behalf of all of them who are kanjus with words 😜. We all will always miss you mam.

Thank You and The Supreme Krishna. Love!

बिहार दिवस की बधाई

बिहारी हूँ,
मेहनत करता हूँ, पर पंजाब में,
फैक्ट्री लगाता हूँ, पर मौरीसस में,
आईएएस, आईपीएस, नेता खूब बनता हूँ,
और जब शांति से जीना हो तो दिल्ली, बंगलौर, मुंबई शिफ्ट करता हूँ..

बिहारी हूँ,
हर साल छठ में अपने घरवालों से मिलने आता हूँ,
उनको मुंबई, गुजरात, दिल्ली की समृद्धि सुनाता हूँ,
मिलता हूँ बिछड़ो से, कोसता हूँ नेताओं को,
फिर छुट्टी ख़तम, ट्रेनों में ठूस-ठूसा कर प्रदेश लौट जाता हूँ..

बिहारी हूँ,
बुद्ध, महावीर, जानकी से लेकर
चाणक्य, मौर्य, अशोक आर्यभट तक पे इतराता हूँ..
पिछड़ गया हूँ प्रकृति पथ पर,
पर राजेन्द्र, दिनकर, जयप्रकाश की बातों से खुद को खूब लुभाता हूँ..

बिहारी हूँ,
पढ़ लिख कर बिहार छोड़ पलायन का रास्ता चुनता हूँ,
राजनीती भी समझता हूँ पर मैं परदेशी वोट गिरा नही पाता हूँ,
ठगा जा रहा हूँ वर्षों से फिर भी जाति मोह से उपर नही उठ पाता हूँ,
खुद कुछ खास कर नही पाया सो अब नेताओं को दोषी बताता हूँ…

बिहारी हूँ,
मैं इतिहास, भविष्य के मध्य वर्तमान को क्यूँ बुझ नहीं पाता हूँ?

–सन्नी कुमार

आप सब को बिहार दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। जय बिहार, जय भारत।

उनके इकरार की बातें

उनके साथ जो गुज़ारे, उस शाम की बातें,
वो निश्छल-निगोड़ी, इज़हार-ए-इश्क की बातें,
आज मौसम ने फिर बहाई है जो मिलन की बहार,
तो याद आईं हमें, उनके इकरार की बातें।

वो जो साथ थी मेरे, उनके यकीन की बातें,
वो जो उतर गई साँसों में, उस एहसास की बातें,
आज शहर में फिर मन रहा है जो इश्क का त्योहार,
तो याद आई हमें, उनके इकरार की बातें।

थी बहुत खास जो उस हंसी रात की बातें,
जलन चाँद को जिससे उस बेदाग की बातें,
आज फिर इश्क ने जो है दुनिया को संवारा,
तो याद आई हमें, उनकी कही-अनकहीं बातें।

उनके साथ जो गुज़ारे, उस शाम की बातें,
वो निश्छल-निगोड़ी, इज़हार-ए-इश्क की बातें,
आज मौसम ने फिर बहाई है जो मिलन की बहार,
तो याद आईं हमें, उनके इकरार की बातें।
-सन्नी कुमार

लोग कहते है..

लोग कहते है लिख दूं,
अब मैं भी कोई किताब,
पर मेरी कोई कविता,
उस हुस्न को सहेज नहीं पाता,
फिर कैसे कर दूं जिक्र मैं उनका,
कि भाव अब भी सुंदर शब्द नहीं बनता।

मैं कोशिश रोज करता हूँ,
पर उनसा हसीं मुक्तक नहीं मिलता,
वो जो पिलाया करती थी मुझे,
कभी अपने नजरों का जाम,
शायद हूँ अब भी उसी नशे में,
जो मुझको मुक़द्दस ग़ज़ल नहीं मिलता।

लिख तो मैं भी दूँ उनपे सौ किताब,
पर उनके नूर के काबिल कोई शेर नहीं मिलता।
©सन्नी कुमार

मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों

(१)
न गीताग्रंथ जपता हूँ,
न आयत-ए-क़ुरआन रटता हूँ,
मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों,
नेकी को सजदा करता हूँ।

है किसी को दीन की चिंता,
किसी को धर्म का है ख्याल,
मैं आशिक हूँ मेरे यारों,
दिलों की बात करता हूँ।

न जन्नत की मुझे ख्वाहिश,
न जहन्नुम का डर सताता है,
मैं ख्याली हूँ मेरे यारों,
ख्वाबों से हक़ीक़त सजाता हूँ।

कोई है ढूंढता रब को,
कोई ईश्वर से आस रखता है,
मैं मिलता हूँ जिससे भी,
उसी में रब ढूंढ लेता हूँ।

न गीताग्रंथ जपता हूँ,
न आयत-ए-क़ुरआन रटता हूँ,
मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों,
प्रकृति से प्रेम करता हूँ।

है मेरी भावनाएं जो जिंदा,
तकलीफों को जान लेता हूँ,
वो जो कुछ कह नहीं सकते,
मैं उनकी बात करता हूँ।
©सन्नी कुमार

कल मुझसे दूर चली जायेगी

वो जो अक्सर कहा करती थी
कि उसे मेरा चैप्टर नहीं बनना,
वो जिसको एक कामयाब किताब बनाने की हसरत थी मेरी,
वो हकीकत अब महज एक ख्वाब बनकर रह जायेगी।

वो जिसके जिक्र से महकता रहा हूँ मैं,
कल मुझसे दूर चली जाएगी,
मेरी किताब, मेरी हसरत, मेरा ख्वाब, मेरी हकीकत,
कल से सब अधूरी रह जायेगी,
कल तक जो मेरी थी, कल मुझसे दूर चली जायेगी।
-सन्नी कुमार

युवावों का देश, युवाओं के नारे

युवावों का देश, युवाओं के नारे,
सत्ता में गायब है फिर भी बेचारे।
पक्ष जिनको पकौड़ा तलना सीखा रहा,
और विपक्ष पत्थरबाजी जिनसे करा रहा,
नाज करे क्या उस युवादेश पर,
जो मुल्क की बर्बादी के नारे लगा रहा?

सत्ता कहती है- मरता है रोहित मरने दो,
कन्हैया-खालिद को कचड़ा करने दो,
इनको ॐ-सुंदर-सत्या से अनजान रखो,
बस इनकी लाइक-कमेंट की भूख बरकरार रखो।
ये फिर कल पकौड़ा या पत्थर चुन लेंगे,
और तब हम इनको कार्यकर्ता मुफ्त में रख लेंगे।

ये तोते है रट लगाएंगे,
पर तुम तो बस जाल फैलाओ,
जात-धर्म और ऊंच नीच में,
हर बार खुदी ये फस जाएंगे,
बड़ी जल्दी में है इनके चाहत का ट्रिगर,
ये बर्बादी तक इसे चलाएंगे।

कैसे करु मैं नाज इस युवादेश पर,
जो सियासत का बनता चारा है,
दिन रात है रहता रटता किताबें,
ले-देकर नौकरी की आस में जीता है,
सत्ता-सियासत ने जिसको बस वोट है समझा,
क्या वो क्रांति की जुर्रत रखता है?
©सन्नी कुमार

मजदूर का जीवन

फूस के मकान में मेरा जन्म हुआ,
और फूस में ही बीता बचपन, ब्याह हुआ,
धन्य हो यह सरकार जो हाल में परधान मंत्री आवास मिला,
कहने को तो घर ही है, पर भ्रस्टाचार से बचा बस दीवार मिला।

हिस्से में जमीन, जो कुछ गज भर थी,
सो अपनों में तकरार हुआ,
थी टीस बड़ी पर न्याय सुलभ कहाँ,
है जेब भी खाली आभास हुआ,
फिर किस मुंह से जाते कोट-कचहरी,
सो लाठी-गारी से सब बात हुआ,
कुछ लोग थके कुछ हम भी थके,
फिर अपनी पेट भरने में सब भूल गया।

हर रोज सुबह एक नई मुसीबत,
पर मैं कभी हिम्मत न हारा,
हारता भी कैसे तब भूख ही मेरी प्रेरक थी,
मैं रोज रोटी जीतकर लाता था,
कभी खेतों से, कभी कारखानों से,
कभी दफ्तर से, कभी दुकानों से,
आसान नहीं था हर रोज काम पाना,
पर फिर मैं भर पेट भोजन पे भी तो खट आता था,
ज्यादा ख्वाब नहीं थे मेरे तभी चैन की नींद मैं पाता था,
मैं था कोई कवि नहीं, न इश्क़ मुझे भरमाता था,
था शायद यही कारण कि मुझे चाँद भी नहीं लुभाता था।

खैर बचपन बीता बाप भरोसे,
जवानी पसीनों के बल पर मैंने जीया,
पर आज बुढापा मार रही है,
हूँ बोझ ऐसा बता रही है,
बेटे बहू का कैसे दोष मैं दूं,
वो दूर भले पर कुछ रोटी तो भेज रहे है,
ये घर गांव आज भी उजड़ा है,
और वो मेरी तरह औरों के आशियां सजा रहे है।

आज दोपहर मुझको चिढा रही है,
हूँ बेकार बतला रही है,
कामगारों की किस्मत का,
जिंदगी रोज मखौल उड़ा रही है,
देश की नीतियों से गायब है वृद्ध,
और सरकार विकास का शोर मचा रही है।

दोष कैसे दूँ मैं औरों को,
कि जवानी में मैं क्यों मजदूर हुआ,
तब खिचड़ी नहीं थे स्कूलों में,
सो बचपन से ही कामगार हुआ,
काश तब पढ़ लेता दो-चार किताबें,
और पा लेता कोई नौकरी आम,
फिर होता पेंशन का अधिकारी,
नहीं मिलती बुढापे अकेलेपन और भूख की मार,
काश बना लेता एक आशियाँ अपना भी,
तो ये सूरज और चांद न चिढाते आज,
जो कुछ मैं आज झेल रहा हूँ,
आगे यह अब देश न झेले,
ऐसा कोई करो विधान,
हो हर वृद्ध सशक्त, मिले सम्मान।
©सन्नी कुमार

गया पटना रुट में गया स्टेशन के नजदीक मालगाड़ी का चक्का उतरा, ट्रेनें लेट

कल उसे एक अत्यावश्यक काम से कहीं जाना था, साधन के रूप में उसके पास एकमात्र विकल्प भारतीय रेल था, वह तय समय से पहले स्टेशन पहुंच कर अपनी टिकट, अपना सीट सुरक्षित कर चुका था। अब गाड़ी खुलने का समय भी हो चला था पर गाड़ी खुल नहीं रही थी, ना इस देरी को लेकर कोई सूचना प्रसारित की जा रही थी। लोग आपस मे तरह तरह की बात कर रहे थे जिनमें सर्वाधिक, ट्रेन के देरी को लेकर थी तभी किसी ने सूचना दी कि एक मालगाड़ी पटरी से उतर गई है और अगले ५-६ घण्टे तक किसी भी गाड़ी के खुलने की संभावना नहीं है।
अब उसके पास दो या तीन विकल्प थे एक जो कि सर्वोत्तम था कि यातायात के अन्य साधनों पे विचारे, पर जैसा कि पहले भी लिख चुका हूं कि ट्रेन एकमात्र विकल्प था बावजूद बसें भी चलती थी पर घटिया सेवा के कारण उनको लोग गिनते नहीं, पर आज तो बसों में इतनी भीड़ थी की लग रहा था मानो उसमे आदमी नही मुर्गियां लादे जा रहे हो और वो भी दोगुने किराये पर! खैर बिहार में लोग मौकों का नाजायज़ फायदा उठाते ही है यही सोंच वह बस को नकारते हुए, अपने घर वापिस आ गया और सम्भवतः वह ट्रेन परिचालन शुरू होने पर ही सफर करेगा, वहां उसके जैसे सैकड़ों और लोग थे जिनको आज बहूत तकलीफ़ हुई होगी, पर क्या सबों की मानसिक स्थिती एक रही होगी? क्या लोग नाराज नहीं हुए होंगे? क्या वो दुखी, बेचैन, झुंझलाए न होंगे? अगर हुए होंगे तो क्या कुछ बदला होगा?
खैर इस प्रसंग का उद्देश्य आपको कहानी सुनाना, बस वाले को कोसना या ट्रेन की सूचना केन्द्र का अत्यंत धीमा होना, बताना नहीं था बल्कि दो कारण थे इसको लिखने के पहला की किसी भी स्थिति में चाहे आप एक्शन को कंट्रोल करने की स्थिति में हो या न हो, पर आप हमेशा प्रतिक्रिया(रिएक्शन) को कंट्रोल कर सकते है, और दूसरा की इंसान है तो इंसान की तरह ही सोंचे और सफर करे, ये मुर्गी और बन्दर बनते शोभा नहीं देता। 😜

(गया पटना रुट में गया स्टेशन के नजदीक मालगाड़ी का चक्का उतरा, ट्रेनें लेट)

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