एक नया भविष्य गढ़ते है

कलम के सौदागरों ने तब क्या क्या नही था बेचा,
शब्द बेचे, स्याही बेचीं, कागज़ तक था बेचा,
नजरानों के नशे में चूर लोभियों ने,
देश का इतिहास  तक था बेचा…
खैर कुछ कलम वाले तब भीे, कागज को खून से रंगते थे,
कुछ आज भी है वतनपरस्ते जो बीके शब्दों को वापिस से बुनते है.
उम्मीदें है और हम साथ भी की चलिए एक नया भविष्य गढ़ते है…. 🙂

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हिंदुस्तान में लोकतन्त्र है?

हिंदुस्तान में लोकतन्त्र है? क्या वाक़ई जनता ही अपना नेता चुनती है, अगर ऐसा है तो फिर नेताओं के नेता मतलब प्रधानमन्त्री या मुख्यमन्त्री हमपर क्यों थोप दिए जाते है?? एक वक़्त था जब कांग्रेस के अध्यक्ष नेताजी चुने गए थे पर गांधीगिरी ने उनको स्तीफा के लिए मजबूर कर दिया, पटेल के बदले नेहरू को हम पर थोप दिया, फिर नेहरू ने भी इंदिरा को थोपा, फिर आंटी ने मनमोहन को, लालू ने राबड़ी को, निटिश ने मांझी को, टीम जनता चुन भी ले ये सीयासी लोमड़ी कई बार कप्तान थोप देते है.. मनमोहन, राबड़ी और नितीश को मैंने देखा है, और मुझे लगता है भारत में लोकतन्त्र के साथ कई और तन्त्र भी लागु है, बस हमे पढ़ाया और बताया नही गया। वैसे ये बताओ ये लोकतन्त्र में  राज्यसभा सरीखी पिछला दरवाजा क्यों है? जब मनमोहन को जनता ने वोट नहीं दिया फिर उसने सरकार चलाई कैसे, ये जेटली तो हार गया था फिर क्या पेट्रोल का दाम बढ़ाने आया है चोर दरवाजे से??
बड़ा झोलझाल है अपना सम्विधान, हम सब एक है बस कुछ दलित पिछड़े विशेष है….
आम्बेडकर की ….

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