शुक्रिया सतरह तेरा

शुक्रिया सतरह तेरा,
हर रंग के लिए,
फरवरी का प्यार,
मई की मार के लिए,
सीखाया तुमने खुद को बेचना,
जून की रोटी के लिए,
धो चुका जो कड़वी यादें,
उन आंसुओं के लिए,
शुक्रिया सतरह तेरा,
हर रंग के लिए….

है खिले कई फूल जिसमें,
उस बाग के लिए,
हो गए जो अजनबी अपने,
उन सब सपनों के लिए,
दे रहे जो साथ मेरा,
उन यारों के लिए,
शुक्रिया सतरह तेरा,
हर रंग के लिए…

थी तलब जिस भाव की,
उस एहसास के लिए,
पहुंचाया जिसने तन-मन को ठंडक,
उन सब सांसो के लिए,
शुक्रिया सतरह तेरा,
हर प्यार के लिए…

हो चुका मैं पार जिनसे,
उन सब बाधाओं के लिए,
गया सराहा जब भी मैं,
हर उस लम्हें के लिए,
हूँ खिला जिस प्यार से,
उस परिवार के लिए,
शुक्रिया सतरह तेरा,
हर उपहार के लिए….
-सन्नी कुमार

You may read my other poems by searching “poems by sunny Kumar” in google

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12 thoughts on “शुक्रिया सतरह तेरा

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  1. वाह, सन्नी! गिना दिया तुमने! बहुत सुन्दर. …मुझे ‘हूँ खिला जिस प्यार से,
    उस परिवार के लिए,’ बहुत ही अच्छा लगा. बधाई. 🙂

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