दर्द

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कुछ काम सिर्फ ईश्वर ही देखे तो अच्छा है,
कुछ बातें सिर्फ दिल ही सुने तो अच्छा है,
आंसू पहले ही बहा दिए थे बहुत,
कुछ दर्द मुस्कुराहटों में ही छिपे तो अच्छा है।
-सन्नी कुमार

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असहिष्णुता

#असहिष्णुता #जवाब-दो
अब तो खेतों में सिंचाई होके ही रहेगी, किसान को फसल चाहिए, सहिष्णुता के चक्कर में मुसों से यारी नहीं।

नोट- किसान बोले तो मोदी सरकार, सिंचाई बोले तो राष्ट्रवादी सोंच और फसल बोले तो देश की उन्नति, ऐसा तो बिलकुल भी न सोंचे… हाँ मूंस जो बिल से बाहर निकल रहे उनके लिए मुसहर हम फेसबुकियों को आप समझ सकते है।

तो पानी पटाये, फसल उगाय.

कौन असहिष्णु, कौन कर रहा भीतरघात?

पूर्व सैनिक जिनकी OROP मांग को पिछले 4 दशक से अनसुना किया जा रहा था वो आज उनकी मांगे मानी जाने के बाद भी आंदोलन कर रहे है, क्यों?
पिछले 1 साल में न कश्मीर से कोई भगाया गया है, न कोकराझार, मुजफ्फरनगर या भागलपुर में दंगा हुआ है, न गुजरात, दिल्ली न पंजाब अशांत हुआ है फिर भी बुद्धिजीवी अपने मेडल लौटा रहे आखिर क्यों?
2G, कोयला, सत्यम, आदर्श जैसे हज़ारों घोटाले झेलने वाला भारत आज मोदी से मुखर क्यों हो रहा है?
विश्व पटल पर ऐतिहासिक रूप से उभरते भारत को जो एक कद्दावर नेता मिला है तो देश के ही गिदर भीतरघात में क्यों लगे है?
सलमान खुर्शीद पाकिस्तान में जाकर वहां की सेना की तारीफ और हिंदुस्तानी सरकार पे सवाल क्यों उठाता है?
कांग्रेस विरोध से राजनीती की शुरुआत करने वाला लालू, नितीश, केजरी सब उसी की गोद में बैठ जाता है, क्यों?
भाजपा साम्प्रदायिक है कहके बकचोदी करनेवाले लोगों की पृष्टभूमि देशविरोधी क्यों होती है?
देश के एक बड़े वर्ग की आस्था का मजाक बनाते हुए लोग बेशर्म पार्टी करते है और फिर देश असहिष्णु है कहके नौटँकी, आखिर क्यों?
हिंदुस्तान में अभागों की कमी कभी नही थी पर आज इतनी तेजी से मुर्ख अभागों की संख्या बढ़ रही है, आखिर क्यों??
पहले दिल्ली को भरमाया फ्री-फ्री के लालच में, अपराधमुक्त-करप्शन मुक्त समाज देना था पर ससुरे सोमनाथ और तोमर पे केस होते ही लालू से मिल गए, आलम यह है की अब शीला भी स्वीकार्य है.. दिल्ली के बाद तो बिहार ने भी साबित कर दिया की ये अभी कुछ साल और अपना इतिहास ही गिनवायेंगे चुकी वर्तमान तो इनका गर्त में है… जातीय राजनीती में डूबे इस प्रदेश ने अबकी लगभग 58% आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं को चुना है, आखिर चुनते भी क्यों न जब लालू ही सबसे बड़े चेहरा और राजद बड़ी पार्टी बनके लौटी है…
देश तो जी जीयेगा पर बेशर्मी का यह आलम मन खिंजाता है..आने वाले समय में अवार्ड वापसी, OROP, साम्प्रदायिकता, असहिष्णुता ही मुद्दे रहेंगे, करप्शन, सुरक्षा, जीडीपी, निवेश, तकनीक, निवेश, रोजगार ये सब तो फालतू की बाते है इस देश में….

खैर मोदी जी ब्रिटिशों के बिच है, गीता, बुद्ध और गांधी के सहारे दुनिया का विस्वास जितने में लगे है…और लोगों का समर्थन भी मिल रहा है..संतुस्ट हूँ की हमने सही प्रतिनिधि चुना है..बाकी आप सब भी सोंचियेगा

अपराध स्वीकारता बिहार?

 

243 में से 142 विधायकों पर अपराध के मामले दर्ज है, कईयों पे अपहरण, हत्या और बलात्कार के मामले भी दर्ज है। मेरा मानना है की जैसा समाज वैसा नेता तो क्या हमारा समाज अपराध को बढ़ाता है, ये चुनाव नतीजे तो हाँ ही कहते है। और अब अगर ऐसे नेता चुनकर हम बिहारी सूबे के विकास की कल्पना करते है तो हम बस खुद को छल रहे है।
इस बार का चुनाव परिणाम नितीश जी के डीएनए को नहीं हमारे समाज के पसन्द को बतला रहा है.. गर्व करूँ की मैं बिहारी हूँ?

वैसे ताज्जुब नहीं होना चाहिए की सजाप्राप्त लालू इस बिहार का सबसे लोकप्रिय चेहरा है और उनकी पार्टी आज सबसे बड़ी पार्टी तो ये आंकड़े सामान्य ही लगते है.. नितीश जी इन अपराधियों के साथ आप अपराधमुक्त समाज नहीं दे पाएंगे ये आप भी जानते है और लोग भी, फिर न जाने क्यों आप और हम चुनाव बाद एक दूसरे को बधाई दे रहे…?

(नोट-अपराधी पृष्ठभूमि के विधायक हर पार्टी से आये है इसलिए इस क्षेत्र में लालू का कॉपीराइट और भाजपा को गंगा समझने की भूल बिलकुल भी न करे)
धन्यवाद सबको

बिहार, आज तुमसे शर्मसार हूँ

पीढियां याद करेंगी तुमको,
जो रणवीर कहाते थे।
दिनकर को पढ़ पढ़ कर भी,
जो शुप्त नित सो जाते थे,
बुझ न पाये आज स्वार्थबन्धन को,
जो हर क्षण चाणक्य पे इतराते थे।
आज फिर है वहीं अंधेर कोठरी,
जहाँ बुद्ध, ज्ञान बाँट कर आते थे।
हताश हूँ, निराश हूँ,
हूँ इतिहास,
आज वर्तमान तुमसे शर्मसार हूँ….
-सन्नी
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असहिष्णुता

गेंहू के खेत में जब पहली सिंचाई होती है तो दिक्कत बिलों में छुपे मूंसों को होता है जो अपने बिलों में किसान का धान भी छुपाये होते है। अब मैं ये पूंछूं की क्या मुंसो से सहिष्णुता निभा के किसान खेत को बंजर छोड़ दे?
इसको अवार्ड वापसी गैंग से न जोड़े
#JawabDo #जवाब_दो

NDLM Examination Will Commense Soon

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This to is to inform all of you that The NDLM examination, which was suspended for some time, will commence soon in a phased manner with enhanced security. Under the new system, there will be stringent monitoring with advanced web camera and an invigilator will be responsible for conducting examination on centre. They could be centre manager or director & should be  present at the centre during the examination.

You have to fill your exam superintendent / Incharge details using NDLM centre login under superintendent details.

Moreover, the examinations will be conducted in a phased manner so that more and more candidates can appear for the exam. Detailed guidelines and process under the new system will be intimated soon. NIOS has also been roped in to conduct online remote proctored examination for NDLM beneficiaries.

A beneficiary can walk in any time between 08.00 A.M and 08.00 P.M from Monday to Saturday and will be given one hour time to complete the online examination.

असहिष्णु भारत और अवार्ड वापसी

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अवार्ड वापसी का जो खेल चल रहा है उनके किसी भी खिलाडी(साहित्यकार) को मैं मूढ़ पहले से नहीं जानता था पर अब खबर आयी है की सारुख खान भी इस इसमें शामिल हो रहे, अगर वो भी अपने अवार्ड लौटाते है तो वो पहले सख्स होंगे जिनको मैं जानता हूँ। वैसे आप इन लोगों में से कितनों को जानते थे?? अगर नहीं जानते थे तो अब तो जानोगे, क्यों? तो बोलो इन सुख गए स्याहियों को फिर से कुछ कागज जो मिलेंगे तो फायदा किसका??

वैसे ये सारे अवार्ड वापसी मोदी के टाइम पे क्यों? मुजफ्फरनगर दंगा तो कांग्रेस टाइम पे हुआ था न? 1947 में दंगा हुआ चलो तब ये न थे, पर उसके बाद जब इस देश में इमरजेंसी लगी तब? जब सिखों को मारा गया तब? बाबरी के वक़्त? मुम्बई 93 के वक़्त? संसद हमला? ताज पे हमला? असम का  दंगा? पुणे ब्लास्ट? हैदराबाद ब्लास्ट? भागलपुर का दंगा? तब कहाँ थे?? हिंदुस्तान के हिन्दू जिनकी आस्था श्रीराम में है उनके खिलाफ बोलने की इनकी आजादी छीन गयी क्या ये सब इसलिए है? 15 मिनट में हिन्दुओ को मार डालने वाला जो स्टेटमेंट आया तब ये कहाँ थे? इन के लिए गाली है जो कहते है की आज देश असहिष्णु हो गया, जरा ये भी बता दो देश सहिष्णु था कब? दरअसल तुम वही साहित्यकार हो जो राजनेताओं के पैर पकड़ते हो, चापलूसी लिखते हो वरना अब तक मौन न होते। अबे खुल के बोलो की तुम्हारी फटने लगी है क्योंकि मुफ़्त की मलाई बन्द है और अब भौंकने वाले कुत्तों को इंजेक्शन दिया जाने वाला है।

थोडा शांत हो के समझाता हूँ,
अगर आज माहौल बिगड़ रहा है तो आपके अवार्ड लौटा देने से क्या सब कुछ बदल जाएगा? हे, बुद्धिपिशाचों आप समाज को जोड़िये, अपने AC कमड़े से बाहर आइये और कुछ सार्थक उपाय कीजिये, नौटँकी आज का भारत बर्दाश्त नहीं करेगा। आज का भारत वही है जो नेहरू को भी शक से देखता है की क्रांति के दौर में जेल में बन्द एक नेता अपनी बेटी को चिट्ठी कैसे लिख पाता था. अगर समाज असहिष्णु हो रहा तो उस समाज और सरकार को आप सुनिए, और समझिये और कुछ सार्थक कीजिये।

मित्रों जब संकटमोचन मन्दिर पर हमला हुआ था उस वक़्त वाराणसी में तनाव का माहौल था और तब गाँधीवादी समाजसेवक डॉ सुब्बाराव जी के नेतृत्व में देश के विभिन्न हिस्सों से आये हुए युवाओं ने सामाजिक एकता के उद्देश्य से कैंप किया था, वह कैंप मेरी उस तरह की पहली कैंप थी और मैंने उसके सफल असर को बनारस में देखा था। मैं पूछता हूँ अगर आज देश का माहौल बिगड़ रहा है तो क्या अवार्ड लौटा देने से माहौल बदल जाएगा या जरूरत है की बाहर निकल कर एक दूसरे से बात करे, विश्वास जीते। ये साहित्यकार तो रचनात्मक होते है फिर इतना गलत निशाना क्यों? ये अवार्ड वापसी गिरोह कुछ रचनात्मक क्यों नही करती या इनका उद्देश्य कुछ और है?
मुझे तो यही लगता है की ये कलम से राजनीती करने वाले लोग है वरना मेरा हिंदुस्तान पहले से बेहतर हो रहा है। अब रिमोट से चलने वाला चुप प्रधानमन्त्री नही है, जिसने देश को घोटालों की गर्त में डूबा दिया। आज का हिंदुस्तान भले थोड़े गुस्से में है पर सही रास्ते पर है।
-सन्नी कुमार

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