काश दीवारों के भी जुबान होते

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Sunny Kumar

काश दीवारों के भी जुबान होते,
फिर हम उस महफ़िल में न बदनाम होते,
लोगों का दोष क्या कहे अब,
जब भीष्म मजबूरी का रोना रोते रहे,
और कौरव घिनौनी हरकतों पे हंसते रहे,
शुक्र है कि कल द्रौपदी को बचाने आये भगवान कृष्ण थे,
पर आज क्यों कृष्ण दीवारों में ही कैद रहे?
काश जिस इमारत ने देखी थी नीति और नियत मेरी,
उन दीवारों के जो जुबान होते,
फिर हम उस महफ़िल में न बदनाम होते…
-सन्नी कुमार ‘अद्विक’

मेरी अन्य कविताओं को गूगल करके पढ़ सकते आप, बस आप ‘Poems by Sunny Kumar’ लिख कर ढूंढे। अबतक लगभग 90000+ लोगों ने मेरे ब्लॉग को पढ़ा है आप पढ़े तो और अच्छा लगेगा। 🙂

Krishna Bless Us.

ये विष किसने फैलाया है

आजाद हिन्द की आवोहवा में,
ये विष किसने फैलाया है,
क्रांति के बहाने राष्ट्र में,
सत्तासुख को बस पाया है।

आजादी को हथियार बनाकर,
राष्ट्रीय अखंडता को आघात पहुंचाया है,
शिक्षा के मंदिर को किसने,
उन्मादी विषविद्यालय बनाया है?

अधिकारों का बहाना बताकर,
अश्लीलता समाज में फैलाया है,
संस्कृति का घोट गला कल,
किसने ‘किस आफ लव’ मनाया है?

सौहार्दपूर्ण माहौल था किसने,
फिर बीज फूट का डाला है,
है वो किनके नाजायज़ औलाद,
जिन्होंने राष्ट्र विरोधी नारा लगवाया है?

अपने राजनीति को चमकाने के चक्कर में,
किसने गजेन्द्र को लटकाया है,
लाज बेचकर सत्तासुख पानेवालों,
कहो कौन सी कीर्ति रचाया है?

आजाद हिन्द की आवोहवा में,
ये विष किसने फैलाया है,
गरीबी से लड़ने का ढोंग रचाकर,
गरीबों के हक को ही मारा है।

किसानों संग तस्वीर खींचाकर,
दिल्ली में उल्टे महंगाई का शोर लगाया है,
सत्ता का रास्ता खुला रहे सो,
आरक्षण को मुद्दा बनाया है।
समानता को फांस लगाकर,
किसने आत्मनिर्भरता को कुल्हाड़ी मारा है??

-सन्नी कुमार
(more to add)
sunnymca.wordpress.com

हर लब्ज में नाम तुम्हारा है..

life-iz-amazing-4सुबह की ओस में मैंने,
तेरी छुअन को पाया है,
शाम रंगीन आसमां में मैंने,
तेरी हलचल ही देखी है.
इस रात की चांदनी तुम,
तुमने ही इन्हें महकाया है,
जब भी हुयी है ये आँखें बंद,
इसने ख्वाब तेरा ही सजाया है.

तेरी नाराजगी में मैंने खुद को महफूज़ पाया है,
तेरी ख़ुशीयों में मैंने खुद को ही अब पाया है,
जब भी सुनी है हमने धुन तेरे धडकन की,
उसने भी मेरे सुर से ही अपना धुन मिलाया है.

खुशियाँ जो भी मेरी है, अब उनमें नाम तुम्हारा है,
चाहत दिल में जो भी है, अब इनपे हक तुम्हारा है,
जिंदगी कल क्या हो नही देखा है मैंने,
पर अब मेरा हर आज तुम्हारा है.

आँखों का इन्तेजार,
नींदों का ख्वाब,
हर लब्ज में नाम तुम्हारा है.

मैं सदा रहूँ तुम्हारे साथ.

advik4for my Advik.
हर पल हर मौसम,
मै रहूँ तुम्हारे पास,
कहती है ख्वाहिश मेरी,
मैं सदा रहूँ तुम्हारे साथ.

सूबह कि लाली धुप में,
हम हो धुप सेंकते साथ,
दिन भर तुम संग खेलूं मै,
थामे रहूँ तुम्हारा हाथ.
रात तुम्हें बाहों में रखकर,
तुम्हें सुलाउं अपने पास.

है सर्दी का मौसम अब जब,
बाहों में तुमहें समां लूँ,
सीत तुमको सिहरा न पाये,
ऐसे सीने से तुम्हें लगा लूँ।

जब मौसम बहारों का आये,
तुझपे फाल्गुन के रंग चढ़ाऊँ,
हूँ तुम्हारे ही रंगो में रंगा,
पूरी दुनिया को बतलाऊँ।

हर पल हर मौसम,
मै रहूँ तुम्हारे पास,
कहती है ख्वाहिश मेरी,
मैं सदा रहूँ तुम्हारे साथ.

कुछ कदमों तक साथ तो दो..

Another poem by me, written for a very special friend whom i meet over Internet in 2012. Enjoy Reading!!
मत आना साथ मंजिल तक, पर कुछ क़दमों तक साथ तो दो..
मत सजाना मेरी दुनियां तुम, पर एक मीठा याद तो दो..
मत मिलना तुम हकीकत में, पर अपने हसीं ख्वाब तो दो..
मत दो मुझे कोई गम, पर जो भी है तुम्हारे वो बाँट तो लो।

दो पल तेरे साथ चलने से चलना सीख लूँगा, यकीं है..
तेरी यादों से अपनी दुनिया रंगीन कर लूँगा, यकीं है..
ख्वाब तुम्हारे हो तो जिंदगी यूँ ही हसीं हो जायेगी, यकीं है..
तेरे गम बाँट के ही अब मै खुश रहूँगा, यकीं है।

न करो तुम कोई वादा, पर इन्तेजार का हक तो दो..
मत आओ मेरे ख्वाब में, पर उन्हें देखने का हक तो दो..
मत हंसो तुम मेरी बातों से, पर अपने आंसू बाँट तो लो..
मत उलझो मेरी बातों में, पर ये जो भी है उसे सुलझाने का मौक़ा तो दो।

तेरे इन्तेजार में भी जी लूँगा, यकीं है..
तेरे ख्वाबों से हकीकत में रंग बिखेरूँगा, यकीं है..
तेरे आंसुओं को बाँट ही खुश रहूँगा, यकीं है..
तेरी उलझनों को एक दिन सुलझा लूँगा, यकीं है।

मत बांटो तुम हमसे अपने गुजरे हुए दिन, पर खोयी मुस्कराहट का कारण तो दो..
मत सुनो तुम अपने दिल की बात, पर इस दिल में है क्या वो बता तो दो..
दुनिया आपकी दीवानी हो जायेगी, पहुँचने का उनको बस पता तो दो..
होंगी हर ख्वाहिश पूरी, अपनी हसरतों को तुम पंख तो दो।

तेरे मुस्कुरा देने भर से गुल खिल जाएगा, यकीं है..
दिल के सारे अरमान पूरे हों जायेंगे, यकीं है..
खुशियाँ भी अब आपका पता पूछेंगी, यकीं है..
तुम हंस के फिजा में फिर से रंग बिखेरोगी, यकीं है।

-सन्नी कुमार

https://sunnymca.wordpress.com/2012/11/07

ऐ हवा तू खुद में उसकी महक समेट ला..

Lonely1ऐ हवा तू  खुद में उसकी महक समेट ला,
वो निकली जो होगी संवर के, तू उसकी आहट समेट ला..
कर तू मुझपे एहसान आज, मिलके उसके पास से आ,
कि रूठी जिंदगी मुझसे है यार, कुछ साँसे उससे उधार ला..
ऐ हवा तू  खुद में उसकी महक समेट ला..

मुझे आदत सी हो गयी है उसकी,
तू उसको खुद में बसा के ला..
जो न करेगा तू इतना,
तू भी भुला दे मुझको जा..
ऐ हवा तू  खुद में उसकी महक समेट ला..

कि बिन उसके कुछ भी मंज़ूर नहीं,
कि कोई खबर तो उसकी ला,
साँसे थक गयी है मेरी,
तू उसकी छुअन तो ले के आ..
ऐ हवा तू  खुद में उसकी महक समेट ला…!!!

images (1)वो छुपी न जाने क्यूँ हमसे,
शायद मिलने भी आज न आये वो,
चलें मेरी साँसे इन्तेजार में उसके,
ऐ हवा तू उसको खुद में बसा के ला..

उससे दूरी है दिल को मंजूर नहीं,
कहीं बोझिल साँसों से धड़कन थम ना जाये,
मै मिलूँ उससे, कर पाऊं उसका इन्तेजार,
ए हवा तू खुद में उसकी छुअन तो ला..

ऐ हवा तू खुद में उसकी महक समेट ला,
वो निकली जो होगी संवर के, तू उसकी आहट समेट ला..
कर तू मुझपे एहसान आज, मिलके उसके पास से आ,
कि रूठी जिंदगी मुझसे है यार, कुछ साँसे उससे उधार ला..
ऐ हवा तू खुद में उसकी महक समेट ला….

– सन्नी कुमार