है दिल्ली से अनुरोध

है दिल्ली से अनुरोध,
करे ‘आ.आ.पा’ का विरोध..
ये पार्टी सस्ती फिल्मों से प्रभावित है,
कोई विचार नहीं अनुमोदित है,
कश्मीर है जिनको पृथक मंजूर,
नक्सलियों से न रह सके हो दूर,
चंदा जिनका हो पाक से आता,
कहो आपसे इनका कैसे संभव है नाता?

करता हूँ दुबारा अनुरोध,
दिल्ली करते रहो आप का विरोध.
इनका एक ही चेहरा, जो बड़ा विशेष है,
सूना है इस शर्दी वह धारे फिर नया भेष है,
पर मैंने तब उसको गर्मी में देखा था,
उम्मीद मैंने भी कभी उसमें देखा था,
पर दिल टूटा जब गुरु को तोड़ा,
फिर बिन पूछे उसने गद्दी भी छोड़ा..

कहो दिल्ली कैसे करोगे उम्मीद,
की वो कहकर हर बार पलट जाता है,
कभी कहे वो मैं न लडू चुनाव,
कभी कहे मैं आवास न लूँ,
कभी कहे बनारस न छोडू,
कभी कहे मैं ही हूँ ‘आम’
बस कहना है उसको और फिर पलट है जाना,
कोई उससे जो पूछे फिर शोर मचाना..

दल का नाम आम आदमी पर,
नखरे सारे ख़ास,
महत्वाकांक्षियों की भीड़ जुटाकर,
करते मिलकर सब रास.
लोगों के थाल से जहाँ दाल है गायब,
संग इनके खाने में आफत है,
झोली में रखने होते है २० हज़ार,
क्या आप ये साहस रखते है..

हे दिल्ली तुमसे अनुरोध,
ठोक बजाकर इस बार चुनना,
न किस्सों ने दलीलों में फँसना,
क्युकी आरोप लगाकर शांत था ‘आप’,
जब गद्दी मिली सब मुफ्त कराया,
और फिर गद्दी छोड़ सबको भरमाया,
अब और मत इनसे उम्मीदें पालों,
जो सर पर हो थामे झाड़ू को,
उनके मत का स्टार जानो,
हो जनता तुम फैसला को,
मुझसे पूछो झाड़ू को हाथों में पकड़ा दो.
पर इनको अभी बिलकुल भी वोट न दो.
-सन्नी कुमार

[I am against AAP not only because i am a big fan fan of Modi but also i wasted my 2011-2012 without any self interest and then realize Kejriwal and Gang was doing a good politics and made fun of a cause. I believe in Narendra Modi and Keep Praying for His Team. He sounds optimistic and visionary. Even AAP’s official website has praised Modi by posting a pic saying “Delhi Says Modi for PM Kejro for CM” if they accpet this then what the hell his hero, Mr. Mufflerman was doing in Varanasi and why he left varanasi now??]

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बूझो तो जाने

हिन्दुस्तानी भेष,
पाकिस्तानी भाषा,
हर दिन में देता नया वो झांसा,
देश का नेता,
विदेशों से चंदा,
है बेशरम,
सुना करता पोर्न का धंधा..
[कमेंट्स करें अगर समझ गए तो]

एक बेहतर अंत की शुरुआत..

Photo Credit: Google[A Tale of Unfortunate Heart Who Fail to keep his feelings in a right way.]

जो मिला मुझे वह नियती थी,
नहीं उसमें किसी की गलती थी,
दिल था ‘बेचारा’ बेचैन हुआ
आखिर हसरत इसकी अधूरी थी.
चीखा, चिल्लाया, दफ़न हुआ,
बस इसकी, इतनी ही अवधि थी..

आँखों के आंसू तब सूखे थे,
शायर के बोल भी टूटे थे.
दिल की बेचैनी आँखों में,
जब सामने हालातों के सौदागर थे..

वो इश्क नही, था ख्वाब मेरा,
जिसको नादान ने तोड़े थे,
होती बेदर्दी हुस्न के पीछे,
उस रोज रहस्य जाने थे..

छुप-छुप कर मिलने वाले सपने,
उस रोज में चुप्पी साधे थे,
दिल की तड़प में मरने वाले,
सारे जज्बात नदारथ थे.

दिल फिर भी हालातों संग,
अब रोज नयी कोशिश में था,
कभी उसके चाहत में रोये,
कभी उसकी बिछुड़न में..

वादे जिसने थे सारे तोड़े,
बेशर्म उसी को, अब भी थामे था.
जो बची थी उम्मीद, जल्द ही दफ़न हुयी,
आया संदेशा, वो किसी और की हुयी..

था बाजार सजाकर व्यापार हुआ,
दिल के ख्वाबों का मोल-भाव हुआ,
जो खुमार खुद्दारी का भरता था,
वही दिल उस रोज नीलाम हुआ..

न हसरत थी उसकी हथियाने की,
न जबरदस्ती कभी बतियाने की’.
फिर क्यूँ सौदा उसके पीछे हुआ,
अब दिल को ‘बिल'(दिलबर) से खेद हुआ.

दिल लगा पूछने बिल से उसके हालात,
कर गया क्या वो गलत सवालात,
पूछ लिया मोल जोल की शर्तो को,
अपने नीलामी के वचनों को..

हुयी गुस्सा बिल, धिक्कारी भी,
समझाया, हालातो का हल्ला भी.
पर दिल को कुछ आया समझ नहीं,
अब वो पूछे सबसे,
क्या भावों का कोई मोल नहीं..?

अपनों से दूर जो सपना लाया ,
उसकी हसरत ने नफरत भिजवाया.
ख्याल रहा नही तब ख्वाबों का,
न मर्यादाओं, न ही नातों का..

लूट चूका था दिल और दिलबर,
सौदा हुआ था सपनो का.
संबंधो का फाँस लगाकर,
झूल गया था दिल का दिलबर९(बिल)..

नाराजगी दिल को बिल से थी,
और उतनी ही बिल को दिल से भी,
बिल कोसे अपने हालत को,
और दिल बिल के जात को..

दिल जिद्दी और जज्बाती था,
खुद रोता उसे भी रुलाता था.
हुआ दिल था तन्हां, बिल नहीं,
इस बात का उसपर असर नही..

बिल इस बात को लेकर चिंतित थी,
कहीं दिल खोले सारे भेद नहीं.
कल के फरेब के किस्सों से,
हो प्रभावित कहीं आज नहीं,

बिल कहती ‘अब मज़बूरी है’,
पर दिल पूछे क्यूँ तब दुरी थी,
जब बाँटा हमने राजों को था,
साँझा हमारा एक सपना था,
क्यूँ तब तुमने खुद्दारी बेचीं थी,
क्यूँ कोड़े ख्वाब दिखाए थे,
झूठे वादों में भरमाये थे,
बेच आयी मेरे सपनों को,
कहती हो मज़बूरी है..
बिल हुयी नाराज, दिल खूब था रोया,
जिंदगी ने जान को बड़ा थकाया..

बिल के हालत बिल ही जाने,
जो उसने दिल से अब और न बांटे.
यदा कदा ही वो अब मिलती दिल से,
देती थी मर्यादाओं के सीख.
उसको दिल से एक नयी शिकायत,
क्यूँ लिखता है वो कल की तारीख.

अपनी पुरानी यादों से दिल,
अब नए दिन को काला करता था,
बिल का दिल से आखिरी संवाद,
सीखे जीवन से और बढे वो आगे..

जो नसीहत बिल ने दी थी,
वही सब ने भी दुहराया दिल से.
पर आगे की कैसे सोचे दिल आशिक,
जो उसका अक्श है पीछे छुट गया..

सही गलत का रहा अब दिल से मेल नही,
जिंदगी लगे अब बोझिल, कोई खेल नहीं.
पर करता क्या दिल तन्हां था,
मर मर कर रोज में जीता था..

कभी रोता कभी खुद से सवाल वो करता,
कभी पढता किताबें, कभी लिखता रहता,
कभी शक करता, कभी संवाद की कोशिश,
कभी खुद को ही ख़तम करने की साजिश,
पर कुछ भी पहले से आसान न था,
अपनों का दिल पे ध्यान जो था.

दिन जल्दी ही फिर मौन के आये,
दिल अन्दर ही अन्दर गौण हुआ,
था इश्क किया, बिना शर्त रखे,
अब कैसे वो कोई बात कहे,
ना कोई कागज़ न कोई समझौता था,
दिल ‘डील’ के युग में हार गया,
शायद बिल भी अपनों में मारी गयी,
और ये रिश्ता धीरे धीरे पर दफ़न हुआ…

तभी शोर हुआ ‘बाहर बारिश आयी’,
ओह्ह तो मैं सपनो में उलझकर बैठा था,
अच्छा हुआ, जो देखा, बस एक सपना था,
बच गया दिल और इश्क की साख,
पर सच है, सीख बड़ी प्यारी सी थी..

समझ रहा मैं दिल के भावों को,
और रिश्तों में उम्मीदों को,
जो ख्वाब ने दिखाया एक अंत ही था,
पर हौसले कह रहे मुझसे आज,
यही एक बेहतर अंत की शुरुआत..

तुम्हारे इश्क ने हमको जाने क्या बना दिया

Sunny Kumarतुम्हारे इश्क ने हमको जाने क्या बना दिया,
आँखों में अश्क पिरोकर हँसना सीखा दिया.
तुम्हारे रुसवाई ने हमको ये कैसा सजा दिया,
दर्द दबाये दिल होठों पे गाना सजा दिया.
तुम्हारे इश्क ने हमको जाने क्या बना दिया..

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Tumhare ishq ne humko jaane kya banaa diya,
aankhon mein ashq pirokar hansna seekha diya,
tumhare ruswaaye ne humko ye kaisa sajaa diya,
dard dabaaye hothon pe gaana sajaa diya..
Tumhare ishq ne humko jaane kya banaa diya..

उस जिंदगी को कैसे जीया जाए

सन्नी कुमारकल का जिक्र भी जब आज में गुनाह हो जाए,
दिल की हसरत जब जरूरतों में कहीं खो जाए,
अपनों के बीच में भी जो तन्हां रह जाए,
कहो, उस जिंदगी को अब कैसे जीया जाए..
-सन्नी कुमार

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Kal ka jikra bhi jab aaj mein gunaah ho jaaye,
dil ki hastar jab jarooraton mein kahin kho jaaye,
apno ke beech mein bhi jo tanhan rah jaaye,
kaho, us jindagi ko ab kaise jeeye jaaye…
-Sunny Kumar

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बड़े बाबू की तकलीफ

Clean India
बड़ाबाबू आज अखबार देख कर पूरी तरह खींझ गये. दरअसल जबसे(२ अक्टूबर)   स्वक्षता मिशन शुरू हुआ है तब से हर रोज अखबार के पन्ने इस मिशन से जुडी खबरें छाप रही है, प्रधानमन्त्री, राजनेताओ, प्रमुख कलाकारों, अधिकारीयों की खबरें तो पहले सप्ताह मेँ ही छप चुकी थी, अब तो छुटभैय्ये नेताओं, और स्वघोषित समाजस्वकों के इस मिशन से जुड़ने की खबरें आ रही है और ऐसे माहौल में बड़ाबाबू जो खुद को ईमानदार और तत्कालीन सरकार समर्थक कहते है, का इस मिशन में लोगों की नजरों में ना आने का मलाल उनको चिंतित कर रहा था.
बड़ाबाबू ने अब और विलम्ब करना उचित ना समझा, सो प्रेस में खबर भिजवा दी की कल उनके यहाँ स्वक्षता अभियान चलाया जायेगा, समय तय हुआ, बड़ाबाबू ने तैयारिओं के लिए अपने सभी सहकर्मियों को जानकारी दे दी। इस खबर से सहकर्मी भी खुश हुए की इसी बहाने थोड़ी मस्ती हो जाएगी और लोकप्रियता हाथ लगेगी सो अलग. पर लोगों ने बड़े बाबू की इस पहल पर उनसे पूछा की दफ्तर तो पहले से ही साफ़ है, हर रोज नियमित सफाई हो जाती है और आसपास की सड़कें भी V.I.P. है, फिर सफाई कहाँ करेंगे? बड़ाबाबू बोले की यह तो मेरे भी दिमाग में था और ये भी एक वजह है की हम इस मिशन में देर से शामिल हो रहे है पर अब प्रश्नों में नही उलझना है, कल सफाई, सफाई-कर्मचारी नही करेगा, हमलोग स्वयं करेंगे और आप सब आज कोशिश करें की आज का कचरा परिसर में ही छोड़ कर जाए. बड़ाबाबू से सब सहमत हुए और कल की तैयारियां होने लगी.
अगली सुबह सब समय से पहले थे, बड़ाबाबू के मन की प्रसन्नता चेहरे पर स्पष्ट नजर आ रही थी, वे दफ्तर पहुँचते ही सफाई-कर्मचारी से मिले और व्यवस्था को समझा| कुछ स्नैक्स के रैपर, कागज़ और फूल पत्ते सफाई-कर्मचारी ने पहले से एकत्र कर रखा था किन्तु कचरे की मात्रा से बाबूजी संतुष्ट नही थे पर खैर अभियान से जुड़ने की ख़ुशी थी,और उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया फिर उन्होंने झाड़ूओं का निरीक्षण कीया और फिर एक बड़ी लाठी वाले झाड़ू को थाम लिया। तब तक अतिथि और प्रेस वाले भी आ गए थे. दफ्तर के सभी लोग बैनर, झाड़ू लेकर, अभियान की शुरुआत को उत्सुक थे तभी कैमरामैन ने कहा की ये थोड़ा सा कचरा है ठीक से वीडियो ना बन पाएगी. उसकी बात से बड़े बाबू सहमत थे और फिर छोटेबाबू ने तुरंत पास के अस्पताल से कुछ कचरा मंगवा लिया। बड़े बाबू अपने सहकर्मियों के समर्थन और उनके उत्साह से प्रभावित हुए और फिर प्रेससकर्मियों ने देरी हो रही बोलकर, सबको बैनर झाड़ू ले खड़े हो जाने को कहा, प्रेससकर्मियों की इस सुचना के बाद तो झाड़ू पकड़ने और अगली पंक्ति में खड़े होने की अघोषित प्रतिस्पर्धा शुरू हो गयी, बड़े बाबूजो अगली पंक्ति में खरे थे धक्का खाकर पिछली पंक्ति में पहुँच गए थे, फिर उनके आदेश के साथ ये स्पर्धा खत्म हुयी और वो एक बार फिर से अगली पंक्ति में पहुँच चुके थे. आज नियमित सफाई करने वाला व्यक्ति कहीं भीड़ में था और अगली पंक्ति में झाड़ू पकडे शहर के कुछ प्रशासनिक अधिकारी, स्थानीयनेता और बड़ाबाबू स्वक्षता के महत्व के लिए बनावटी गंभीर मुद्रा में झाड़ू संग गन्दगी के विरुद्ध जंग छेड़ रहे थे. इस कार्यक्रम को होते होते दोपहर हो गया फिर बाहरी लोग चाय नाश्ता करके वापिस चले गए| आज कार्यालय का कार्य चर्चाओं के साथ चला. खैर कुल मिलाकर बड़े बाबू अभियान से जुड़ने काफी खुश थे.
अगली सुबह बड़ेबाबू अखबार का बड़े बेसब्री से इन्तेजार कर रहे थे और जब खबर पढ़ी तो उनके पसीने आ गए क्यूंकि अखबार ने उनके कचरा मैनेजमेंट को प्रमुखता से छाप दिया था. अब बड़े बाबू को आभास हो गया था की लोकप्रियता की जरुरत लोगों को ही नहीं अखबारों(मीडिया) को भी हो गयी है.

सन्नी कुमार

[एक निवेदन- आपको यह पोस्ट रचना कैसी लगी, कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]

[Picture is for representation only and and taken from google. I support our Honorable PM for all his Initiative and encourage all बड़ाबाबू kind poeple  to take this mission serious. Thank you.]

अब आनेवाले मौकों को पहचानों

My Secret Diaryदिनों बाद कल फिर कोई ,
ख्वाब आया था,
पहली बार अपना-सा कोई,
अजनबी आया था.
स्पष्ट सबकुछ मुझे याद नहीं हैं,
पर ओढ़े धूल का चादर,
और आँखों में सवालों का सैलाव लिए,
वो मुझसे मिलने आया था..

उसमें अपनापन की खुशबू तो थी,
पर उसका ‘बेरंग’ चेहरा था अंजान।
पूछा जब मैंने परिचय उससे,
बोल बैठी बेशरम “हूँ जिन्दगी तुम्हारी जान
झुंझला गया था सुनकर उसको,
जो उसका मतलब समझ ना आया था,
दिल ने रोक लिया मुझे बेहूदगी करने से,
शायद इसने उसके चहरे पर दर्द को भांपा था..

फिर पूछ लिया मैंने उससे उसके, बे-निमन्त्रण आने का कारण,
हो गुस्सा इस बार वो बोली,
“हर बार तुम्हीं क्यूँ पूछोगे, क्या औरों को यह अधिकार नहीं?”
दे देता उसके प्रश्नों का उत्तर,
कि ख्वाब मेरा और यहाँ तुम हो आयी,
सो इस लिहाज़ अधिकार गंवाई,
मै बोलूं उससे अपने मन की बात,
इससे पहले ही थी शुरू वो “जात”..

वो बोली “तो सुनों मैं क्यूँ तुम्हारे ख्वाब में आयी”

कभी अपने ख़ुशी के लम्हों को तुमने,
संग मेरे सजाया था,
विरह-विदाई की बेबसी को तुमने,
संग मेरे ही बांटा था,
पर ना जानें क्या गलती हुयी हमसे,
तुम मिलने भी अब नही आते हो,
कभी छुपाते थे हमको दुनिया से,
आज तुम ही हमसे छिपते हो.

दिन वो क्यूं जल्दी बीत गया,
जब तुम मुझको राज़दार बनाते थे,
हसरतों की हस्ताक्षर कह,
मुझसे लाड़ जताते थे.
खुश होती थी उस खेल में मैं,
जब औरों को तुम मुझ-खातिर तरसाते थे.

कभी तुमको भी होती थी शिकायत,
की अक्सर लोग बदल जाते है,
आज जो बदले हो तुम खुद को,
तो फिर क्यूं चुप्पी साधे हो?
मै तुम्हें गुज़रें लम्हों में,
और नहीं उलझाने आयी,
जो जाना था कभी मैंने तुमसे,
आज वही तुमसे दुहराने आयी.

मत दबाओ ज़ज्बातों को तुम,
ना ख्वाबों को बेड़ी डालों,
निकलो बाहर डर/गम के क़ैद से तुम,
अपने दायित्वों को पहचानों।
पूरे करो अधूरे ख्वाबों को,
या नए सपने सजा लो,
पर न करो मलाल उसपे जो बीत गया,
कि अब आनेवाले मौकों को पहचानों।।

-सन्नी कुमार
[एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी लगी, कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]

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