कैसे भूल सकता हूँ वो दिन

कैसे भूल सकता हूँ वो दिन,
जब हमारे रिश्ते की बात चल रही थी.
परेशां था मैं तब गुजरे कल से,
जब मेरे आने वाले कल की बात चल रही थी..
अन्दर मुरझा गये थे तब सींचे सपने,
जब बाहर उम्मीदों की बयार चल रही थी.
कैसे भूल सकता हूँ मैं वो खुशनसीबी के दिन,
जब मैं और तुम ‘हम’हो ये बात चल रही थी…
-सन्नी कुमार

Kaise bhul sakta hoon wo din,
Jab humare rishtey ki baat chal rahi thi.
Pareshan tha mai tab beetay kal se,
jab mere aane wale kal ki baat chal rahi thi.
Andar murjha gaye the tab seenche sapne,
jab baahar ummidon ki bayaar chal rahi thi.
kaise bhul sakta hun mai wo khushnasibi ke din,
jab mai aur tum ‘hum’ ho ye baat chal rahi thi.
-Sunny Kumar

तुम वह सितारा हो..

चमकेगा जो कल फलक पर,
तुम वह सितारा हो.
संभाले उम्मीदों का जो खजाना,
तुम वह पिटारा हो.
दिल को जो अभिभूत कर दे,
तुम वह नज़ारा हो.
चमकेगा जो कल फलक पर,
तुम वह सितारा हो..

आजादी के नव भोर में हम सब..

आजादी के नव भोर में हम सब,
याद करें उन वीरों को,
कर दिया समर्पित सर्वस्व जिन्होंने,
भारत माँ की आजादी को,
आओ मिलकर नमन करे हम,
उन इंक़लाब के दीवानों को..
	रहा सालों से जो गुलाम भारत,
	सर्वप्रथम, सन् सत्तावन में गरजा था,
	फूट पड़ी तब अंग्रेजों में,
	जब मंगल पाण्डेय बरसा था,
	अंग्रेजों से लोहा लेने को आतुर,
	तब कई रियासतें रण में था..
आजादी के नवभोर में हम सब,
याद करे उस मंजर को,
जब ८२ वर्ष के वीर कुंवर ने,
ललकारा था अंग्रेजों को,
आओ मिलकर नमन करें हम,
सत्तावन के वीरों को..
	स्तब्ध हुआ था विश्वजगत जब,
	एक रानी ने तलवार उठाया था,
	कहते है रक्तरंजित इतिहास के पन्ने,
	उसने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाया था.
	भारी थी सौ सौ पर वह एक अकेली,
	अंग्रेजों में झाँसी की रानी का दहशत छाया था..
	निश्चय ही वह क्षण गौरव के थे,
	एक बेटी ने माँ का मान बढ़ाया था,
        जननी जन्मभूमि की रक्षा की खातिर,
        उसने सर्वस्व लुटाया था...

चुक गए तब भारतवासी,
नाना-तांत्या-बख्त का जो न साथ दिया,
अलग अलग कुछ खूब लड़े,
पर प्रयास न संयुक्त हुआ,
ख़त्म हो गया कंपनी-राज,
पर देश अब भी अंग्रेजों का गुलाम रहा..

आजादी के इस भोर में हम सब,
समझे उस गुलामी की पीड़ा को,
भूख अशिक्षा से त्रस्त वो भारत,
मान बैठा था किस्मत गुलामी को,
ख़त्म हो रही थी हर रोज उम्मीदें,
तब भारत लड़ने लगा बस रोटी को..
	दिन थे बड़े कष्टमय तब जब,
	भारतवंशियों ने सब अधिकार गंवाया था,
	अंगेजों के चालों में फंसकर,
	हीनता के भ्रम में खुद को उलझाया था,
	थे वह निश्चय ही शर्म के दिन,
	जब अश्तित्व की रक्षा को पहचान मिटाना था..
आजादी के नव भोर में हम सब,
याद करें उन उम्मीदों को,
कर दिया अचम्भित विश्वजगत को,
अपने ज्ञान के बोलों से,
आओ फिर से मनन करें हम,
शिकागो सम्मेलन के मंतव्यों पर..
	कट्टरता के मार्ग पे था जब जग,
	उसने सहनशीलता का अर्थ समझाया था,
	क्या होता है वसुधैव कुटुम्बकम,
	स्वामी ने दुनिया को समझाया था.
	हुआ प्रफुल्लित भारत का जन-जन,
	जग में भारतीय संस्कृति का परचम लहराया था..
मान बढ़ाया कई और संतों ने,
और समाज सुधार का सफल प्रयास किया,
निकले भारत कुप्रथाओं से आगे,
इसलिए मोहन, इश्वर, दयानन्द का अभियान जरुरी था..

आजादी के नव भोर में हम सब,
याद करें उन असीम कोशिशों को,
राष्ट्र हो गया एकजुट तब जब,
शुरू हुआ मुहीम स्वदेशी को.
आओ मिलकर नमन करें हम,
लाल-बाल-पल की कर्मठता को.IMG_112224379377819

To be continued…

क्यूं मैं काफिर कहाता हूँ..

IMG_3537नहीं हूँ मैं नमाजी,
न ही गिरिजा जाता हूँ,
पर तुम्हारी ही मूरत बनाकर,
हर रोज शीश झुकाता हूँ.
फिर क्यूँ कहते है कुछ ख़ास बंदे,
कि मैं गुनाह करता हूँ?

हूँ मैं मुरख प्रेम-मत में,
जो तुम्हें मिट्टी में बसाता हूँ,
पर मैं मुरख हूँ सनातन,
तुम्हें कण-कण में पाता हूँ.
क्या यही है गुनाह मेरा,
जो मैं काफिर कहाता हूँ?

है मेरी नजरे जो कच्ची,
मुझे हर रंग लुभाता है,
कभी तुमको नीला बताता,
कभी काला मैं पाता हूँ.
कभी लगते तुम रंगों से इतर,
कभी ऊर्जा बताता हूँ..

खुदा है तू, तू है ईश,
मैं तो यही मानता हूँ,
होंगे तुम्हारे सौ और नाम,
मैं तो कृष्णा जानता हूँ.
क्या यही है गुनाह मेरा,
जो मैं काफिर कहाता हूँ?
-सन्नी कुमार

आओ मिलकर नमन करे हम

Drafting a poem fr Independence Day….suggest me so it can be more beautiful…
आजादी के नव भोर में हम सब,
याद करे उन वीरों को,
कर दिया समर्पित, सर्वस्व जिन्होंने,
भारत माँ की आजादी को,
आओ मिलकर नमन करे हम,
आजादी के दीवानों को…..

मदर’स डे विशेस

कल फेसबुक पे नहीं था क्योंकि घर में था, अपने बेटे के पास मेरे पापा के साथ, साथ में उसकी माँ भी थी और मेरी माँ भी… इतवार अच्छा गुजरा, मैंने मदर डे की जानकारी नहीं थी न फेसबुकिया इमोशन जागा था पर जब भाई ने माँ को सुबह-सुबह फोन किया तब मालुम हुआ… खैर मैं ढीठ हूँ मैंने उसके बाद भी माँ को कुछ नहीं कहा, बस उसके साथ हमेशा की तरह चिढ़ना-चिढ़ाना करता रहा… जब अकेले में, अपने कमरे में आया तो बीबी ने आकर समझाया की आज तो पूरी दुनिया माँ को सिर्फ मान दे रही है, आप आज भी बच्चों की तरह कर क्यों रहे हो, ये बेवजह की चिढ़ना, चिढ़ाना क्यों?…मैंने बिच में ही टोकते हुए कहा कि मैं आज भी उसका बच्चा ही तो हूँ और जैसे तुम्हारे अद्विक को तुम्हे कुछ बताने के लिए शब्द नहीं चाहिए, मुझे भी नहीं चाहिए.. माँ के साथ हूँ, माँ सब समझ रही है… तभी उसको माँ ने बाहर बुलाया, शायद वो हमे सुन गयी थी.. अब वापिस जब मेरी बीबी आयी तो बोली की माँ को मार्किट जाना है… लो अब तो मैं और चिढ गया कि यार शाम में मुझे वापिस गया जाना है और इस धुप में बाहर! पर माँ ने कहा था तो मैंने हामी भरी, तुरत तैयार होकर बाजार के लिए निकले और फिर माँ एक घड़ी के दुकान में लेकर गयी, बोला की प्रीती के लिए घड़ी देखनी है मुझे anniversary गिफ्ट का सुझा कि अभी ही ले रही , पर उधर जा कर उसने मेरे लिए घड़ी खरीदी, बाद में कहा कि प्रीती के लिए अगले सन्डे जब आओगे तब ले लेंगे…
जब घर पहुंचे और सबको मिठाई दी तो बीबी बोली कि खूब हो आप तो, मदर डे पर बस मिठाई? मम्मी को तो कुछ अलग दीजिये, फिर मैंने चिढ़ाते हुए अपनी घड़ी दिखाई….. और त्वरित कमेंट आया कि आपका सिर्फ इनकमिंग है…. हम दोनों नोक झोंक में उलझ गए और माँ मुस्कुराते हुए चली गयी और फिर उसने सबको मिठाई, समोसा दिया.

शाम में जब घर से निकल रहा था, उसके जब पाँव छुए तो फिर 100 रूपये का नोट जेब में डाल दी…हम बोले की कल सैलरी आ जायेगी माँ, वो बोली नहीं आती तो 100 रूपये में जी लेता क्या? दोनों हंसे और फिर मैं घर से गया के लिए निकल गया।

अब रात में 1 बजे जब गया पहुँच गया तब जाकर घरवालों को नींद आयी, पर बीबी को तब भी चैन नहीं थी, बोली अगली बार जब आप आएंगे मैं और आप दोनों चलेंगे और कुछ मम्मी के लिए खरीदेंगे.. हम मुस्कुराये बोले हम तो सिर्फ इनकमिंग है, हाँ अगर तुम कुछ कांफ्रेंस टाइप करा दो, तो जरूर चलेंगे.. उ बुझी नहीं हम बुझाए नहीं पर मेरी और अद्विक दोनों की माँ, और सबकी माँ बच्चों को बुझती है भले शब्द हो या निशब्द… मेरा अद्विक मुझे वो सब याद दिला रहा जो मुझे कभी याद नहीं था, आज जान रहा हूँ की बच्चे कैसे अपने माँ को उसकी धड़कन से, उसके शरीर के गर्मी से जान लेता है और कैसे एक माँ पूरी रात जगाकर अपने बच्चे को फीड करती है पर नाराज नहीं होती, न किसी को खबर होने देती की उसको रात भर जगना परा. अबये भी जान रहा हूँ की एक बच्चे और माँ दोनों का जन्म भी एक ही दिन होता है दोनों के लिए हर दिन विशेस है.

मेरी सबसे बड़ी ख्वाहिश

यूं तो ख्वाहिशों का कोई अंत नहीं.. ये एक अथाह समन्दर है मन में, जो हमारी पहचान बुनती है, जो जीवन के कालचक्र में ईंधन का काम करती है.. किसी को चाह बचपन की, किसी को चाह तर्पण की,
किसी को जन्नत लुभाता है, तो कोई फरिस्ता बनने की हसरत सजाता है। कोई परिवर्तन को है आतुर तो कोई इस पल में रुकना चाहता है। जितने लोग, उतनी हजार ख्वाहिशें…
ऐसे में मेरी भी कई ख्वाहिशें है, उन्हीं ख्वाहिशों के जरिये आज आपसे अपनी सबसे बड़ी ख्वाहिश बाँट रहा हूँ और मुझे उम्मीद है कि मेरी ख्वाहिशें आप पर भी असर करेगी।

सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं प्रकृति-गुण को अपनाउं,
बनूं वट-वृक्ष सा मैं, औरों को शांति-शीतलता पहुँचाऊँ.
अडिग रहूँ पर्वतों सा मैं, कभी मुश्किलों से ना मैं घबराऊँ,
सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं खुद में प्रकृति गुण को समाउं..

सुख-दुःख के आपाधापी में मैं कभी खुद को न उलझाऊँ,
सीख लूँ नदियों से मैं और अनवरत मंजिल को बढ़ता जाऊं.
चाहतें और जो समुन्दर सी है, उनको बून्द-बून्द भरता जाऊं,
खुद में मैं एक बाग़ बनूँ और दुनिया को महकाउँ..

कदम मिलाऊँ काल चक्र से और परिवर्तन को मैं आत्मसात करूँ,
दूँ अपना योगदान विश्व को और कुछ मैं भी अब ईजाद करूँ.
पर आधुनिकता के आडम्बर में, कभी प्राकृतिक सुंदरता को न बर्बाद करूँ,
बनूँ मैं जब भी प्रेरणाओं का बादल, धरा पर प्रेम-रस की बरसात करूँ..

सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं खुद में प्रकृति गुण को अपनाऊँ,
बनूं वट-वृक्ष सा मैं, औरों को शांति-शीतलता पहुँचाऊँ.
अडिग रहूँ पर्वतों सा मैं, कभी मुश्किलों से ना मैं घबराऊँ,
सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं खुद में प्रकृति गुण को समाउं..

जीऊँ मैं सनातन के मूल्यों पर, वसुधैव कुटुम्बकम् का प्रचारक बन जाऊं,
जगत में है भारत भूमि महान कि इसके गौरव के दिन लौटाउं.
है ऋण बहुत इस धरा का मुझपर, थोडा तो कर्ज चुकाऊं,
दुनिया को अपने सपनों से, जन्नत सा सुंदर सजाऊँ..

रंग-धर्म-भाषा भेद को, ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार करूँ,
है विभिन्नता में बसी खूबसूरती, इस विचार का प्रसार करूँ.
शब्दों से लुभाना जो हमको है आता कि उसका मैं उपयोग करूँ,
है विश्व में हर जीवन अमूल्य, इनको बचाने का मैं अनुरोध करूँ..

मेरी हजारों ख्वाहिशों की ख्वाहिश कि मैं प्रकृति गुण को आत्मसात करूँ,
दुनिया से जो कुछ मिला है मुझको उस सब का मैं सदुपयोग करूँ,
सूरज-सितारों की तरह, छोटा ही सही पर दिप बनूँ,
पूरी दुनिया न सही पर आस-पास तो गुलज़ार करूँ..
-सन्नी कुमार

Credit for this poem goes to my school( G.D. GOENKA PUBLIC SCHOOL, Gaya) Creative Writing Competition as because I got this topic to think upon and once i started i came up with this beautiful poem.
To read my other poems please click on ‘मेरी कविता’ category. Drop your comments and keep me motivated. Thank You for visiting Sunny Kumar’s Blog( http://www.sunnymca.WordPress.com ) Love!