जब खुलेंगे पन्ने मेरी ज

IMG-20170811-WA0001I have written these lines for a special lady with whom I share innocent love, unconditional support and mutual respect. Yes I adore her, and i am assure that we all have such person in our life with whom we feel good and can share things…. So you too can dedicate this for your special one. Thank you. Enjoy Reading and Spread Love!
जब खुलेंगे पन्ने मेरी जिंदगी के,
वहाँ कुछ महकती यादें मिलेंगी,
होगी मुहब्बत कई और हिस्सों में,
पर यहाँ निर्मोही मोह की सुगंध मिलेगी,
खोने-पाने से उपर उठकर,
मेरे हिस्सों से तुमको मुहब्बत मिलेगी,
होगा जिक्र तुम्हारा इस जीवन में,
कि तुम जान मेरी सावन बनोगी…
-सन्नी कुमार
😍😍😍😍

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मेरी मुहब्बत को मेरी आदत न समझो तुम,
मैं शब्दों में वही लिखता हूँ, जो सपने दिखाती तुम.
इसे इस दिल की आवाज ही समझो, कुछ और न समझो तुम,
मेरे शब्दों से सपनों तक, अब हर जगह हो तुम…
-सन्नी कुमार
Dedicate this to someone who inspires you.
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मैं क्या कहूं अब और कि जब सब पहले ही कह चुका हूँ,
हो खूब तुम ख्वाबों से बढ़कर,
कि तुम्हारी फिक्र कर चुका हूं,
मिले तुमको मुहब्बत की महफ़िल,
ऐसी मंगलकामना कर चुका हूं,
कहूं अब मैं क्या और तुमसे,
कि मैं जो सबकुछ कह चुका हूँ।
– सन्नी कुमार

ख्वाबों पे बेड़ी डालूँ तो डालूँ मैं कैसे?

WP_20170730_17_29_16_Proतुम कहती हो अक्सर कि मैं कुछ न कहूं,
पर तुम ही बताओ…..
शब्दों को विराम तो मैं दे भी दूं,
पर ख्यालो को रोकूं तो रोकूं मैं कैसे?
न लिखूँ अब तुमसे जुड़ी कोई ख्वाहिश,
पर यादों को बिसराउँ तो बिसराउँ मैं कैसे?

तुम कहती हो मिलके, न तुमसे मिलूं अब
पर खुद से ही बिछड़ू तो बिछड़ू मैं कैसे?
तुमको हो ऐतराज तो आँखें बंद भी कर लूं,
पर ख्वाबों पे बेड़ी डालूँ तो डालूँ मैं कैसे?
-सन
Celebrating Love on my blog http://www.sunnymca.wordpress.com

ये दिल मुझसे कहता है..

Resharing love.. Read n Enjoy

Life iz Amazing

IMG_20170724_163431तुम हो इतनी  हसीन  कि चुरा लूँ तुम्हें, ये  दिल मुझसे कहता है..
कोई देखे न इस नूर को सो छुपा लूँ तुम्हें, ये दिल मुझसे कहता है..

ख्वाहिशें जो भी है तुम्हारे पुरे कर दूँ मै आज, ये  दिल मुझसे कहता है..
जो भी है ख्वाब तुम्हारे उनको जिंदगी बना दू आज,ये दिल मुझसे कहता है..

चाहे कितनी ही हों उलझनें, मन मुश्किलों में भले हो..
मै  लाऊं मुस्कराहट तेरे चेहरे पे, ये दिल मुझसे कहता है..

तुम हो सबसे हसीं, मीठी मिश्री सी हो तुम..
करू तुमसे दीवानगी का इकरार, ये दिल मुझसे कहता है।

इस रंगीन दुनिया से तेरा रंग चुरा लूँ, ये दिल मुझसे कहता है..
अपने ख्वाब को हकीकत बना दूँ, ये दिल मुझसे कहता है..

हसरतें और भी है पर जी लूँ दो पल तुम्हारे साथ,ये दिल मुझसे कहता है..
तुम हो इतनी  हसीन  कि चुरा लूँ तुम्हें, ये  दिल मुझसे कहता है।

-सन्नी कुमार
[एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी…

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जरूरी है मुहब्बत का होना

किसी से बिछड़कर मुझे, मिलने का हुनर है आया,
खोकर ‘खुद’ को मैंने, मेरे खुद को है पहचाना..
वो एक थी कभी जिसके, अरमां दिल में बसते थे,
आज उसी के अक्श को मैंने, जर्रे-जर्रे में है बसाया..
नहीं खबर ये मुहब्बत है या कोई नई दीवानगी,
पर सच है लगता मुझे अब, निर्मोही मोह समझ आया..
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खैर किसी से बातों-बातों में, कुछ बातें निकली थी,
था चर्चा मुहब्बत का सो, दिल भावों से पिघला था,
उकेरे जो मन के भाव उसने, उसे शब्दों ने सहेजा था,
कि उसने पूछा जब मुहब्बत का परिचय,
मैंने कुछ ये सब कह डाला था….
“ये मुहब्बत ही तो है जो जीना सिखलाती है,
हर रात ख्वाबों में बहलाकर, उम्मीदों का सवेरा ले आती है…

मुहब्बत आँखों का हो या भावों का,
जज्बातों का या ख्यालातों का,
ये मुहब्बत चाहे जैसा हो, जिससे हो,
करने वाले को खूब बनाती है,
छूट जाए गर मीत तो ये शायर बनाती है,
और जो मिलन हुआ मुहब्बत में तब,
जिंदगी जन्नत बन जाती है,
बड़ा जरूरी है मुहब्बत का होना,
कि ये आदम को इंसान बनाती है।”
-सन्नी कुमार

तस्वीर किसान का

चुनावी नारों तक ही सिमटा रह जाता है,
क्यूं हक़ किसान का..
बहस-बातें खूब होती है
कर्ज माफी का ऐलान भी होता है,
फिर भी नहीं बदलता,
क्यूं तस्वीर किसान का..

वो जिसके मेहनत से सबका पेट भरता है,
वही अन्नदाता क्यों अक्सर खाली पेट सोता है?

उसकी हर फसल, हर मेहनत का,
क्यों हश्र एक होता है,
बाढ में, सुखाड़ में,
हर मौसम की मार में,
क्यों वो अकेले,
उम्मीदें बांधे सिसकता है,
और जब फसल हो बढ़िया,
क्यों बाज़ार कौड़ियों के भाव खरीदता है?

सरकार खूब देती है आश्वासन,
विपक्ष बस शोर मचाता है,
पर ७० सालो से देश के ‘हल्कू’ को,
क्यों उसके मेहनत का मोल नहीं मिलता है?

खेती छोड़ चुका युवा, उनको ये घाटे का सौदा लगता है,
गलती उनकी भी नहीं कि उनको किताबों मे खेती सौदा है, मौसमी जुआ है,
यही तो पढाया जाता है,
खेती का साहस युवा करे भी कैसे,
उसको विदर्भ के किसानों का हाल दहलाता है।

70 सालों से, देश के हर नारों में,
चर्चा किसानों का होता हर चौराहों पर,
संसद हो, सड़क हो, या कोई सम्मेलन
सिर्फ बातें ही होती है,
वायदे ही होते है,
पर किसान के समर्थन में क्यों कोई नीति नहीं बनता?

हर रोज नया नारा आता है,
किसानों के नाम से करने कोई तमाशा आता है,
जिसको गेंहू और जौ का फर्क भी न मालूम,
वो भी किसानों की काया पलटने का स्वांग रचाता है,
भाषण होती है, बड़े-बड़े लेख लिखे जाते है,
फिर भी क्यों, न तकदीर बदलती है,
न तस्वीर किसान का?
-सन्नी कुमार (किसान पुत्र)Tasweer Kisaan Ka

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