आज फुर्सत में हूँ

आज फुर्सत में हूँ,
फुर्सत के ही साथ में हूँ,
बहुत दिन से मिली नहीं थी,
थी मुझे बहुत जरूरत उसकी,
पर दिनों से है की दिखी नहीं थी..

आज भी शायद नज़रे चुरा कर,
कहीं और ही जा रही थी,
पर तलब और तबियत के सख्त पहरों से,
आज बच के निकल न सकी थी..

और अब जब साथ में है,
तो है थोड़ी सहमी, थोड़ी शरमाई,
उसका कहना है कि वो भी इंतेजार में थी,
पर मैंने ही न पुकारा,
कि वो तो कबसे आस में थी।

कि वो तो आती थी, मुझसे रोज ही मिलने,
मेरे खाने के बाद, तो कभी सोने से पहले,
पर अक्सर मैं ही मशगूल होता था,
काम के करारनामों में उलझा होता था..

वो भी चाहती थी मुझसे रोज ही मिलना,
मुझसे सच कहना, मेरी कविताओं को सुनना,
पर उस आरामपसंद को मिलने न दिया जाता था,
की तब उलझा होता था मैं, और काम पहरे पे होता था..

उसका कहना है कि आज भी वो कोई नज़रे चुरा कर नहीं जा रही थी,
अरे मिलना वो भी चाहती थी, पर जताना नहीं चाहती थी,
बहुत कुछ हिसाब थे उसके पास, जो कबसे वो देना चाहती थी,
लाई थी कई किस्से, कई ख्वाब भेंट करना चाहती थी,
पर मेरी व्यस्तताओं से डर, दूर हो जाया करती थी,
और आज जब न काम पहरे पे था, न व्यस्तता उसको दिखी,
तभी उसका मिलना सम्भव हुआ,
क्या खोया, क्या पाया, है जाना कहाँ,
आज फुर्सत में फुर्सत से चर्चा हुआ…
©सन्नी कुमार

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NOTA पर विचार

NOTA को विकल्प मानने वाले बन्धुओं क्या आपने विचार किया है कि नोटा का अर्थ होता है इनमें से कोई नहीं, और कोई नहीं कहना ज्यादती होगी और अपने भारतभूमि को कलंकित करने सा होगा जहां आपके अनुसार कोई योग्य नही बचा और आप समाज के ऐसे चौकीदार है जो ज्योतिष भी है जिन्हे साल भर पहले ही मालूम हो गया है कि आपको जितने भी लोगों की उम्मीदवारी मिलेगी सब के सब नकारे होंगे? क्या वाकई आपका क्षेत्र इतना गया गुजरा है?? अगर है, तो हे अर्जुन आप क्यों नहीं इस अँधेरे से अपने बन्धुओं और समाज को उबारने के लिए आगे आते है, आप क्यों नहीं अपनी उम्मीदवारी देते है?
हे सोशल मीडिया के शेरों अगर आपने पहले से ही तय कर लिया है कि आपको 2019 में कोई पसंद नही आनेवाला तो आप खुद को क्यों नहीं एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर अपने अन्य बन्धु-बांधवों और समाज को राजनीतिक कुचक्र से बाहर निकाल लेने का प्रयास करते? अगर नहीं कर सकते तो फिर इतनी हताशा क्यों?
SC ST एक्ट का विरोध जितना जरूरी है उतना ही जरूरी इस नोटा का साल भर पहले ही विकल्प चुन लेना गलत है और लोकतंत्र के हित मे नहीं है। क्या दल के दलदल से दूर कोई स्वतंत्रत, निर्भीक उम्मीदवार नही मिलेगा या आप खुद आगे नही आना चाहेंगे जिसने पार्टी के सेवा के बदले समाज की सेवा की हो? या आपका नोटा बस एक वर्ग विशेष के वोट को बर्बाद कराने से है? खैर बिना भारत बंद कराये अगर सरकार सुनती है तो मैं भी उसके SC ST एक्ट का विरोध करता हूँ, आरक्षण खत्म करने की गुजारिश करता हूँ और चाहूंगा कि सरकार नौकरी के लिए मुफ्त आवेदन निकाले..
समझ आये तो विमर्श करे वरना शांत रहे, समय हम सबका कीमती है।

-सन्नी कुमार

#नोटा #NOTA

भारत बंद नहीं नेताओं के ड्रामे बन्द करे

न तो मैं कभी आरक्षण समर्थक था, न भारत बंद जैसी वाहियात सोंच का समर्थन कर सकता हूँ। मैं दो रोटी कम खाकर, दो वस्त्रों में पूरा जीवन बिता दूंगा पर किसी फालतू नेता और बकवास दलों के दलदल में नहीं परूँगा, क्योंकि अगर बन्दे में दम हो तो रिलायंस जैसा अंपायर बिना किसी सरकारी चाकरी के भी खड़ा किया जा सकता है। आरक्षण के नाम पर दलित और सवर्णों के बीच में ये जातियों के ठेकेदार गुंडे, जो आजादी बाद से ही लड़ाई लगाते रहे है कि साजिश कामयाब न होने दे।
भारत बंद में दिक्कतों को झेलने कोई हाई प्रोफ़ाइल नहीं आएगा, न आपके साथ आज लाठी उठाने आपका नेता आएगा, विश्वास न हो तो अन्ना के सिपाहियों से सबक ले जिनको आपियों ने उल्लू बनाकर दिल्ली की सत्ता ली और अन्ना की सेना कहीं पुणे में गन्ना बेच रही होगी। भारत बन्द और अन्य किसी भी तरह का बन्द एक साजिश है जिसमें सबका अपना एजेंडा होता है और आप बस एक मोहरा की भूमिका में होते है। सो अपनी काबिलियत को यूं जाया न करे और अपने विवेक से काम ले, खुद ही विकल्प बने। आज आपको, जनता को जागरूक होना होगा, खुद ही खुद को सरकार समझे तभी मुल्क सेफ है और हाँ बन्द करना ही है तो नेताओं का इलेक्शन के वक्त प्रचार बन्द करे, अपने गाँव-मुहल्ले में घुसने न दे और अपने लोगों को निर्दलीय उम्मीदवारों को जिताये और कांग्रेस A टीम और B टीम को बाहर करे वरना बनते रहे मूर्ख और बजाते रहे अम्बेडकर का दिया आरक्षण वाला झुनझुना।
-सन्नी कुमार

#भारत_चलता_रहे
#भारत_बढ़ता_रहे

कविता मेरे हर शिष्य के नाम

यह कविता मेरे हर शिष्य के नाम, मेरे भाव, मेरे शब्द आप तक पहुंचे तो सूचित करें, अपने विचार रखें। धन्यवाद!

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ,
है तुम सबसे मेरा एक ही स्वार्थ,
तुम्हारे सफलता का मैं प्रार्थी हूँ..

कोई तुमसे मांग नहीं,
तुम स्वयं को समझो चाहता हूँ,
हो कदम तुम्हारे कल कीर्ति के सीढ़ी,
सो तुम्हें चलना आज सीखाता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न तुमसे सुख-समझौते का अधिकारी हूँ,
है जो थोड़ी अनुभव और ज्ञान की पूंजी,
वह तुम सब संग बांटना चाहता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
मैं वास्तविकता का साक्षी हूँ,
कल को होगे तुम नीति-नियम रचयिता,
सो तुम्हें आज सही-गलत का भान कराता हूँ..

हो कुरुक्षेत्र पुनः यह दु:स्वप्न नहीं,
न कृष्णतुल्य एक कण भी हूँ,
पर यह जीवन भी है महान संघर्ष,
कि इसमें विजयी रहो मैं चाहता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ..
है तुमने जो भी मुकाम चुना,
उस यात्रा में मैं एक सारथी हूँ,
पा लो तुम सब अपनी मंजिल,
मैं यही कामना करता हूँ…

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ..
©सन्नी कुमार
#Happy_Teachers_Day
#Teachers_Day_Poem_in_Hindi
#Teacher_on_Teachers_Day

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समाज, सरकार और हम

मित्रमंडली में भोजपुर में हुए उस अन्याय की चर्चा हो रही थी, मेरा भी भावुक मन यह सोंच कर बैठा जा रहा था कि कितना संवेदनहीन, नपुंसक और लिच्चर हो गया है यह समाज जो खुलेआम एक औरत को नंगा करके पीटता है, और फिर मीडिया इसे खबर बनाकर, TRP और views के लिए मसाला की तरह परोस देती है।
यह सब विमर्श हो रहा था कि इस दौरान एक मित्र ने कहा कि यह सब सुशासन बाबू की नाकामी है और फिर इस घटना को मुजफ्फरपुर की घटना से जोड़ दिया, जो कितना सही है या गलत यह लोग तय करे, और वही लोग यह भी तय करे कि अगर समाज की कोई भूमिका है ही नहीं तो फिर ये समाजिक तानाबाना क्यों?
मेरी समझ में सरकार से ज्यादा भूमिका समाज की है, लोगों की है पर लोग और समाज भ्रस्ट है और तभी दोनों अपनी नपुंसकता को सरकार के माथे सजा देते है..पर ये इस तरह कब तक??
कबतक हम फूहड़ता, निर्लज्जता, नंगई, नपुंसकता और भ्रस्टाचार को ढोते रहेंगे? कब तक जाहिलों को माहौल बिगाड़ते रहने देंगे और फिर ये जाहिल भी तो हम ही है कोई एलियन आकर तो इधर चरस नहीं बोता, यो-यो वाली जो नश्ल तैयार होगी वो उड़ता पंजाब उड़ता बिहार ही बनाएगी और आप अच्छा कुछ कहेंगे तो वॉल्यूम बढ़ा के कह देंगे ‘कि अब करेंगे गन्दी बात’।
ये जो वॉल्यूम लाऊड करके थर्ड ग्रेड के गाने सुनते है और एक से एक फालतू 400 चैनल जो हमलोग टेपते है ये उसी का दें है कि हम ब्रेकिंग न्यूज़ सुनते तो है पर उसके इशारों को समझते नहीं..और यही स्थिति दुःखद है।
मैं बार बार कहता रहा हूँ कि आज का जनरेशन पर्सनालिटी डेवलपमेंट को लेकर अत्यधिक जागरूक है पर कैरेक्टर बिल्डिंग को दरकिनार कर दिया है या यूं कहें की चरित्र निर्माण की जो नींव बालकाल में पड़ती है उसे किशोरावस्था में पहुंचते पहुंचते उखाड़ फेंकते है। आज की फास्टफूड जनरेशन को हवा में कैसल बनाना है वो दस रुपये के लिए सुट्टे से.. और दयनीय स्थिति यह है कि अगर आप उन्हें बुरा समझते है तो ये साबित कर देंगे(चाहे दलील जो भी हो) कि आपकी माइंड आज भी नैरो है।
ख़ैर, मुझे मेरे लिए इतना ही कहना है कि अच्छे लोगों को समाज के भरोसे नहीं रहना होगा बल्कि खुद को सुदृढ़ करना होगा, मजबूत बनाना होगा ताकि ऐसी किसी भी स्थिति को पैदा होने से रोकने की स्थिति में रहे।

इन शार्ट, समाज अब वह गिद्ध है जो सिर्फ मृत्युपरांत भोज के लिए बनी है…भोज खिलाये समाज खुश होके सरकार को दुगुनी ऊर्जा से गाली देने लगेगा।

खैर आपसे इन चार पंक्तियों के माध्यम से यही निवेदन कि

“जिंदा है तो मिसाल बनिये,
जिंदगी हो ऐसी की औरों के ख्वाब बनिये,
लिच्छड़, नपुंसक, भ्रष्ट-भेड़ियों की भेड़ में हो दहशत,
आप ऐसे महानायक भरत बनिये’
©सन्नी कुमार

मेरे अटल जी – Narendra Modi

मेरे अटल जी – Narendra Modi

अटल जी अब नहीं रहे। मन नहीं मानता। अटल जी, मेरी आंखों के सामने हैं, स्थिर हैं। जो हाथ मेरी पीठ पर धौल जमाते थे, जो स्नेह से, मुस्कराते हुए मुझे अंकवार में भर लेते थे, वे स्थिर हैं। अटल जी की ये स्थिरता मुझे झकझोर रही है, अस्थिर कर रही है। एक जलन सी है आंखों में, कुछ कहना है, बहुत कुछ कहना है लेकिन कह नहीं पा रहा। मैं खुद को बार-बार यकीन दिला रहा हूं कि अटल जी अब नहीं हैं, लेकिन ये विचार आते ही खुद को इस विचार से दूर कर रहा हूं। क्या अटल जी वाकई नहीं हैं? नहीं। मैं उनकी आवाज अपने भीतर गूंजते हुए महसूस कर रहा हूं, कैसे कह दूं, कैसे मान लूं, वे अब नहीं हैं।

वे पंचतत्व हैं। वे आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सबमें व्याप्त हैं, वेअटल हैं, वे अब भी हैं। जब उनसे पहली बार मिला था, उसकी स्मृति ऐसी है जैसे कल की ही बात हो। इतने बड़े नेता, इतने बड़े विद्वान। लगता था जैसे शीशे के उस पार की दुनिया से निकलकर कोई सामने आ गया है। जिसका इतना नाम सुना था, जिसको इतना पढ़ा था, जिससे बिना मिले, इतना कुछ सीखा था, वो मेरे सामने था। जब पहली बार उनके मुंह से मेरा नाम निकला तो लगा, पाने के लिए बस इतना ही बहुत है। बहुत दिनों तक मेरा नाम लेती हुई उनकी वह आवाज मेरे कानों से टकराती रही। मैं कैसे मान लूं कि वह आवाज अब चली गई है।

कभी सोचा नहीं था, कि अटल जी के बारे में ऐसा लिखने के लिए कलम उठानी पड़ेगी। देश और दुनिया अटल जी को एक स्टेट्समैन, धारा प्रवाह वक्ता, संवेदनशील कवि, विचारवान लेखक, धारदार पत्रकार और विजनरी जननेता के तौर पर जानती है। लेकिन मेरे लिए उनका स्थान इससे भी ऊपर का था। सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे उनके साथ बरसों तक काम करने का अवसर मिला, बल्कि मेरे जीवन, मेरी सोच, मेरे आदर्शों-मूल्यों पर जो छाप उन्होंने छोड़ी, जो विश्वास उन्होंने मुझ पर किया, उसने मुझे गढ़ा है, हर स्थिति में अटल रहना सिखाया है।

हमारे देश में अनेक ऋषि, मुनि, संत आत्माओं ने जन्म लिया है। देश की आज़ादी से लेकर आज तक की विकास यात्रा के लिए भी असंख्य लोगों ने अपना जीवन समर्पित किया है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र की रक्षा और 21वीं सदी के सशक्त, सुरक्षित भारत के लिए अटल जी ने जो किया, वह अभूतपूर्व है।

उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था -बाकी सब का कोई महत्त्व नहीं। इंडिया फर्स्ट –भारत प्रथम, ये मंत्र वाक्य उनका जीवन ध्येय था। पोखरण देश के लिए जरूरी था तो चिंता नहीं की प्रतिबंधों और आलोचनाओं की, क्योंकि देश प्रथम था।सुपर कंप्यूटर नहीं मिले, क्रायोजेनिक इंजन नहीं मिले तो परवाह नहीं, हम खुद बनाएंगे, हम खुद अपने दम पर अपनी प्रतिभा और वैज्ञानिक कुशलता के बल पर असंभव दिखने वाले कार्य संभव कर दिखाएंगे। और ऐसा किया भी।दुनिया को चकित किया। सिर्फ एक ताकत उनके भीतर काम करती थी- देश प्रथम की जिद।

काल के कपाल पर लिखने और मिटाने की ताकत, हिम्मत और चुनौतियों के बादलों में विजय का सूरज उगाने का चमत्कार उनके सीने में था तो इसलिए क्योंकि वह सीना देश प्रथम के लिए धड़कता था। इसलिए हार और जीत उनके मन पर असर नहीं करती थी। सरकार बनी तो भी, सरकार एक वोट से गिरा दी गयी तो भी, उनके स्वरों में पराजय को भी विजय के ऐसे गगन भेदी विश्वास में बदलने की ताकत थी कि जीतने वाला ही हार मान बैठे।

अटल जी कभी लीक पर नहीं चले। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में नए रास्ते बनाए और तय किए। “आंधियों में भी दीये जलाने” की क्षमता उनमें थी। पूरी बेबाकी से वे जो कुछ भी बोलते थे, सीधा जनमानस के हृदय में उतर जाता था। अपनी बात को कैसे रखना है, कितना कहना है और कितना अनकहा छोड़ देना है, इसमें उन्हें महारत हासिल थी।

राष्ट्र की जो उन्होंने सेवा की, विश्व में मां भारती के मान सम्मान को उन्होंने जो बुलंदी दी, इसके लिए उन्हें अनेक सम्मान भी मिले। देशवासियों ने उन्हें भारत रत्न देकर अपना मान भी बढ़ाया। लेकिन वे किसी भी विशेषण, किसी भी सम्मान से ऊपर थे।

जीवन कैसे जीया जाए, राष्ट्र के काम कैसे आया जाए, यह उन्होंने अपने जीवन से दूसरों को सिखाया। वे कहते थे, “हम केवल अपने लिए ना जीएं, औरों के लिए भी जीएं…हम राष्ट्र के लिए अधिकाधिक त्याग करें। अगर भारत की दशा दयनीय है तो दुनिया में हमारा सम्मान नहीं हो सकता। किंतु यदि हम सभी दृष्टियों से सुसंपन्न हैं तो दुनिया हमारा सम्मान करेगी”

देश के गरीब, वंचित, शोषित के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए वे जीवनभर प्रयास करते रहे। वेकहते थे “गरीबी, दरिद्रता गरिमा का विषय नहीं है, बल्कि यह विवशता है, मजबूरी हैऔर विवशता का नाम संतोष नहीं हो सकता”। करोड़ों देशवासियों को इस विवशता से बाहर निकालने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किए। गरीब को अधिकार दिलाने के लिए देश में आधार जैसी व्यवस्था, प्रक्रियाओं का ज्यादा से ज्यादा सरलीकरण, हर गांव तक सड़क, स्वर्णिम चतुर्भुज, देश में विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्र निर्माण के उनके संकल्पों से जुड़ा था।

आज भारत जिस टेक्नोलॉजी के शिखर पर खड़ा है उसकी आधारशिला अटल जी ने ही रखी थी। वे अपने समय से बहुत दूर तक देख सकते थे – स्वप्न दृष्टा थे लेकिन कर्म वीर भी थे।कवि हृदय, भावुक मन के थे तो पराक्रमी सैनिक मन वाले भी थे। उन्होंने विदेश की यात्राएं कीं। जहाँ-जहाँ भी गए, स्थाई मित्र बनाये और भारत के हितों की स्थाई आधारशिला रखते गए। वे भारत की विजय और विकास के स्वर थे।

अटल जी का प्रखर राष्ट्रवाद और राष्ट्र के लिए समर्पण करोड़ों देशवासियों को हमेशा से प्रेरित करता रहा है। राष्ट्रवाद उनके लिए सिर्फ एक नारा नहीं था बल्कि जीवन शैली थी। वे देश को सिर्फ एक भूखंड, ज़मीन का टुकड़ा भर नहीं मानते थे, बल्कि एक जीवंत, संवेदनशील इकाई के रूप में देखते थे। “भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।”यह सिर्फ भाव नहीं, बल्कि उनका संकल्प था, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया। दशकों का सार्वजनिक जीवन उन्होंने अपनी इसी सोच को जीने में, धरातल पर उतारने में लगा दिया। आपातकाल ने हमारे लोकतंत्र पर जो दाग लगाया था उसको मिटाने के लिए अटल जी के प्रयास को देश हमेशा याद रखेगा।

राष्ट्रभक्ति की भावना, जनसेवा की प्रेरणा उनके नाम के ही अनुकूल अटल रही। भारत उनके मन में रहा, भारतीयता तन में। उन्होंने देश की जनता को ही अपना आराध्य माना। भारत के कण-कण, कंकर-कंकर, भारत की बूंद-बूंद को, पवित्र और पूजनीय माना।

जितना सम्मान, जितनी ऊंचाई अटल जी को मिली उतना ही अधिक वह ज़मीन से जुड़ते गए। अपनी सफलता को कभी भी उन्होंने अपने मस्तिष्क पर प्रभावी नहीं होने दिया। प्रभु से यश, कीर्ति की कामना अनेक व्यक्ति करते हैं, लेकिन ये अटल जी ही थे जिन्होंने कहा,

“हे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना।

गैरों को गले ना लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना”

अपने देशवासियों से इतनी सहजता औरसरलता से जुड़े रहने की यह कामना ही उनको सामाजिक जीवन के एक अलग पायदान पर खड़ा करती है।

वेपीड़ा सहते थे, वेदना को चुपचाप अपने भीतर समाये रहते थे, पर सबको अमृत देते रहे- जीवन भर। जब उन्हें कष्ट हुआ तो कहने लगे- “देह धरण को दंड है, सब काहू को होये, ज्ञानी भुगते ज्ञान से मूरख भुगते रोए।” उन्होंने ज्ञान मार्ग से अत्यंत गहरी वेदनाएं भी सहन कीं और वीतरागी भाव से विदा ले गए।

यदि भारत उनके रोम रोम में था तो विश्व की वेदना उनके मर्म को भेदती थी। इसी वजह से हिरोशिमा जैसी कविताओं का जन्म हुआ। वे विश्व नायक थे। मां भारतीके सच्चे वैश्विक नायक। भारत की सीमाओं के परे भारत की कीर्ति और करुणा का संदेश स्थापित करने वाले आधुनिक बुद्ध।

कुछ वर्ष पहले लोकसभा में जब उन्हें वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया था तब उन्होंने कहा था, “यह देश बड़ा अद्भुत है, अनूठा है। किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा रहा है, अभिनंदन किया जा सकता है।”

अपने पुरुषार्थ को, अपनी कर्तव्यनिष्ठा को राष्ट्र के लिए समर्पित करना उनके व्यक्तित्व की महानता को प्रतिबिंबित करता है। यही सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए उनका सबसे बड़ा और प्रखर संदेश है। देश के साधनों, संसाधनों पर पूरा भरोसा करते हुए, हमें अब अटल जी के सपनों को पूरा करना है, उनके सपनों का भारत बनाना है।

नए भारत का यही संकल्प, यही भावलिए मैं अपनी तरफ से और सवा सौ करोड़ देशवासियों की तरफ से अटल जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, उन्हें नमन करता हूं।

🙏

पाकिस्तान को दुत्कारती अटलजी की यह कविता अवश्य पढ़ें

एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्रता भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।

अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतंत्रता, अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता।
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतंत्रता, दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो, चिनगारी का खेल बुरा होता है।
औरों के घर आग लगाने का जो सपना, वो अपने ही घर में सदा खरा होता है।

अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो, अपने पैरों आप कुल्हाड़ी नहीं चलाओ।
ओ नादान पड़ोसी अपनी आंखे खोलो, आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।

पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है? तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई।
अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं, माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई ?

अमेरिकी शस्त्रों से अपनी आजादी को दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो।
दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से तुम बच लोगे यह मत समझो।

धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो।
हमलों से, अत्याचारों से, संहारों से भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो।

जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार, अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
स्वातंत्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे अगणित जीवन यौवन अशेष।

अमेरिका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध, काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा।

-भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे

विचार मरते नहीं,
शब्द चिरायु है,
आपके कहे हर शब्द,
आपकी लिखी हर बात हमारे बीच है, और रहेंगी।
राष्ट्र सदैव आपका ऋणी रहेगा,
हिन्दी, हिन्दू और हिंदुस्तान को आपके जाने का दुख है पर फिर आशाएं भी है कि आपके लगाए पौधे इस चमन के चेहरे को बदल देंगे।
आपकी सदा ही जय हो हे महामानव, आपने मेरे और मेरे जैसे लाखों लोगों का लेखन और राजनीति में रुचि उतपन्न किया। आप बैकुण्ठ वासी हो यही यही कामना।

अटल जी की यह कविता आज बहुत रुलाती है। आपने मौत पर एक कविता जीतेजी ही लिखी उसे ही दुबारा लिखता हूँ।

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आजमा।

मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

आजादी को आवारगी में न बदले, न बदलने दे

अगर बधाई से फुर्सत मिले तो आज आप अपने बच्चों को आजादी के लिए किए गए संघर्ष को अवश्य याद दिलाए, उन्हें यह भी बताए कि 200 वर्षों तक देश अखण्ड रहा और स्वतंत्रता जब देहरी पर खड़ी थी तो किन स्वार्थियों ने, न केवल मुल्क के दो(तीन) टुकड़े किये बल्कि लाखों लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया।
आज अगर आपका बच्चा पूछे कि देश तो बापू ने आजाद कराया था वो भी बिना खड्ग बिना तलवार तो उनको अवश्य बताएं कि अंग्रेजों ने तब दरअसल एकदम से सत्ता न छोड़ी थी, न उनको यहां से पीट कर भगाया गया था, आज तो दरअसल सत्ता का हस्तांतरण हुआ था और फिर अगर ढूंढ पाए तो ढूंढ के मुझे भी अवश्य बताये की इस दिन हम 47 में क्या वाकई इंडिपेंडेंट हुए थे या हम एक क्रूर सत्ता से फ्री हुए थे, मुक्त हुए थे जिसकी अमानवीय कानून के चलते लाखों लोग भूख से मरे और हजारों उनसे लोहा लेते हुए शहीद हुये?
आज अंग्रेजी संदेशों की बाढ़ में कितने मैसेज पढ़े आपने पढ़े जिसमे “हैप्पी फ्रीडम डे” लिखा था? क्या वाकई फ्रीडम और इंडिपेंडेंस में कोई अंतर नहीं? इन सवालों के जवाब जरूर ढूंढे, और हाँ ये आपको किसी चाटुकार द्वारा लिखे किसी किताब में नहीं मिलेगा..
आप सब को आजादी मुबारक! इस उम्मीद के साथ कि आपने आज जो भी देशभक्ति की बातें की है उसे निभाएंगे और आजादी को आवारगी में न बदलेंगे न किसी को बदलने देंगे।
जय हिन्द

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