मौसम है स्नेह के तेल चढ़ा लेना

गर सुख गया हो दीये सा मन,
मौसम है स्नेह के तेल चढ़ा लेना,
हो मन में कहीं गर लोभ-क्रोध का अंधेरा,
मौका है प्रेम के दिये जला लेना।

घर को, मन को, गर कर चुके हो साफ,
पड़ोस-पड़ोसियों से कचड़ा-क्लेश भी हटा लेना,
कब तक रखोगे रामायण में राम,
आज दिन है खुद में भगवान बसा लेना।

गर सुख गया हो दिये सा मन,
मौसम है स्नेह के तेल चढ़ा लेना..

गर पर्याप्त हो ढ़कने को तन,
किसी और की लाज बचा लेना,
है आज रात जो चाँद को छुट्टी,
उसके भरोसे जो है, उनको दीये दिला देना..

रहेगा न आज कोई कोना अंधेरा,
आप बस अपना दायरा बढ़ा लेना,
राम मिलेंगे आपसे झूम गले,
आप भरत के भाव बसा लेना..

गर सुख गया हो दिये सा मन,
मौसम है स्नेह के तेल चढ़ा लेना..
©सन्नी कुमार ‘अद्विक’

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हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है

हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है,
वो आकर अपनी मुस्तैदियों के चर्चे चलाते है,
आभार करूं या उपहास, उत्साही राहगीरों का,
जो पथप्रदर्शक को ही ‘चले कैसे’ सीखाते है।

‘काम के चर्चे को’ काम समझने वाले,
अक्सर बत्तखों से बेहतर मुर्गियों को बताते है,
आज हर ओर है छाया, कलियुग का घटा घनघोर,
जहाँ मक्कार, मासूमों पे मितव्ययिता की वृष्टि कराते है।

जिन नक्कारों के क़िस्से छिप गए है धूलों से,
उनको अब आँधियों का है डर नहीं, तभी औरों को सफलता के सूत्र बाँटते है,
बड़ी गहरी है मन में क्षोभ, पर कहो किससे कहूँ अद्विक,
वो मैं जिसका होके बैठा हूँ, वही सब मुझको गैर समझते है।

यूं तो हम भी कोई हरिश्चंद्र न है, न हो सकते,
पर जो मुझसे भी है घाघ, आजकल सत्संग के तम्बू लगाते है।
मेरे कविता में जब भी शब्द, जलते है पीड़ा में,
ताज़्जुब है कि सुनकर भी आह नहीं, सबके ‘वाह-वाह’ निकलते है।

हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है,
वो आकर अपनी मुस्तैदियों के चर्चे चलाते है,
आभार करूं या उपहास, उत्साही राहगीरों का,
जो पथप्रदर्शक को ही ‘चले कैसे’ सीखाते है।
© सन्नी कुमार

आपके सही सलाह ही मुझसे मेरा बेहतर निकलवा सकते है तो प्रार्थना है खुले मन से अपनी प्रतिक्रिया दे। आपका स्नेहाकांक्षी 🙏

गाँधी

गांधीजी बेशक राष्ट्रपिता नहीं हो सकते क्योंकि राष्ट्र सबका पोषक और सर्वोच्च है इसलिये गांधीजी को भी राष्ट्रपिता कहना अन्याय है। और मुझे यक़ीन है कि बापू की भी कभी ऐसी इच्छा नहीं रही होगी पर हाँ यह हमारा उनके लिए प्यार था जो उनको किसी ने महात्मा तो किसी ने बापू कहा। उनके बारे में तत्कालीन बुद्धिजीवियों ने एक भविष्यवाणी की थी कि आनेवाली पीढ़ी इस पुरोधा, इसके तरीकों का यकीन नहीं करेगी। लोग यह यकीन नहीं कर पाएंगे कि अहिंसा में इतना बल सम्भव है और कोई यह मानने को तैयार नहीं होगा कि कुछ सालों पहले ही साबरमती के एक अर्धनग्न सन्त ने अहिंसा के बल पर अंग्रेजों को देश से भगाने में सबसे अहम भूमिका निभाई होगी। आज महज 70 सालो में ही उन बुद्धिजीवियों की भविष्यवाणी अंशतः सत्य साबित होने लगी है।

आज जब हम उस महान व्यक्ति का जन्मदिन मना रहे है, सरकारी छुट्टियों का घर मे आनन्द ले रहे है तो हममें से ही बहुत लोग इस इस समय का उपयोग उसी बापू को प्रश्नों के घेरे मे घेड़ने केलिए कर रहे है जो काफी चिंतनीय है। आप जो कोई भी गोडसे को महान बताते है और जिनका मन गांधी के प्रति कोई सम्मान नहीं रखता उन सबसे क्या मैं यह जान सकता हूँ कि क्यों आखिर गांधी अकेले इस विभाजन के लिए दोषी ठहराये जाते रहे है, क्या उनको विभाजन का दुःख नहीं था? देश जानता तो है न कि आजादी के समय मे गांधीजी कहाँ और क्यों थे?इस आजादी से उनको क्या हासिल हुआ? क्या उन्होंने आपसे कहा कि आप उनको महात्मा, बापू, राष्ट्रपिता का सम्मान दे या केवल नोट पे छाप उनके विचारों को बिसरा दो? अरे वो तो जिस वैमनस्य से आपको दूर रखना चाहते थे उसी ने उनकी ईहलीला समाप्त कर दी।

मैं खुद गांधी से कभी पूर्णतः सहमत नहीं हो सकता और मानता हूं कि विभाजन के वक्त किसी भी देशभक्त का विरोध नहीं करना, प्राणों की आहुति न देना अचंभित करता है। मन में आज भी प्रश्न उठते है कि अगर 47 में नेताजी जीवित होते, भगत, आजाद होते तो क्या होता? क्या स्थूति रही होगी, आजाद हिंद फौज के जवानों के मन की स्थिति क्या रही होगी, लाखों लोगों के जान माल के नुकसान के बाद देश ने कैसे खुशी मनाया होगा? पर इन प्रश्नों के लिए, उस अव्यवस्था के लिए गांधी कतई जिम्मेवार नहीं थे और यह एक और यकीन है कि उनको इसका सर्वाधिक दुःख हुआ होगा। जो लोग उन दंगों में मरे उनको सरकार ने भुलाया यह बेशक निंदनीय है पर तब क्या हमारा देश, तात्कालिक नेता आज इतने परिपक्व थे?
आज देश में वैमनस्य शिखर पर है, भारत बंद जिसकी झांकी भर है और ईश्वर ने करे पर यह जिस तेजी से समाज मे खाई पैदा कर रही है वैसे में गृहयुद्ध तक के सम्भावनाओं को नकारा नहीं जा सकता क्यों?

आज देश के पास दो मॉडल है, गांधी मॉडल और अम्बेडकर मॉडल। गांधी मॉडल हमने आजतक अपनाया नहीं और अम्बेडकर मॉडल 70 सालों से स्थिति को यथावत रखे हुए है और आप माने न माने देश को आरक्षण नुकसान उठाना पर रहा है। कुछ लोग गांधीजी पर इसलिए भी प्रश्न उठाते है क्योंकि गांधी का समाज से छुआछूत खत्म करने का प्रयास अम्बेडकर से अलग था। उन्होंने देश के लोगों को अम्बेडकर से विपरीत गाँव की ओर रुख करने को कहा, छुआछूत हटाने के लिए खुद आगे आये, सत्याग्रह की पहल की और आज के दलितों को हरिजन की संज्ञा दी और प्रभु का दूत तक कहा जो आजतक कुछ लोगों को नागवार गुजरता है और वही बुद्धिपिशाच लोग खुद को बहुजन कह इठलाते है। मैं आज यह नहीं पूछूंगा की कैसे हरिजन गाली और बहुजन सम्मानित शब्द हो जाता है। पर गांधीजी की नियत पर शक का अधिकार किसी कुपढ को नहीं होना चाहिए और गांधी का विरोध इसलिए तो बिल्कुल नहीं कि उनका रास्ता सबसे अलग था।

गांधीजी ने समाज में समरसता की बात की, खुद के साथ-साथ औरों का मैला भी खुद उठा लेते थे, छुआछूत न मानते थे न मानने देते थे और इसपर एक बार उन्होंने कस्तूरबा जी को भी खड़ी-खड़ी सुनाया था जब उन्होंने गांधीजी के इन निम्न कार्यों पर प्रश्न उठाया था।

जरा विचारिये गांधीजी के उस साधुत्व के आगे कितने लोग ठहर पाएंगे? वह कैम्पों में सबसे पहले उठ औरों के कचड़ों की, बर्तनों की सफाई करते थे जबकि उस दौर में वह हिंदुस्तान के सबसे लोकप्रिय चेहरे थे और चाहते तो नीली सूट उनको भी रोज शोभता पर उनको इस बात का दर्द था कि देश की आधी आबादी को कपड़े नहीं है सो उन्होंने भी कम कपड़े पहनने शुरू कर दिए। कुछ तो विशेष था, अद्भुत था कि नेताजी ने कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद जीत कर भी बस गांधीजी के मन को रखने के लिए पद और कांग्रेस का त्याग कर दिया पर उसके बाद भी गांधी को दिल मे बसाए रहे और उनके प्रति सम्मान हमेशा रहा।

आज अगर भारत ने गांधी के समरसता के मॉडल को कबका नकार दिया है, पिछड़े लोगों को हरिजन कहाने पर शर्म होता है, गाँव की परंपरागत दक्षता, काम छूट गए है, स्वरोजगार की चटाई को कॉरपोरेट के कार्पेट ने हरा दिया है, मिट्टी के बर्तन चीनी बर्तनों से हार गए है और गांधीजी जिस डिस्ट्रिब्यूटिव सिस्टम की कल्पना करते थे उसको भी साम्प्रदायिक और सत्तालोभियों कि गोली लग चुकी है। जो नियम गांवों से बनने थे, जिन पंचायतों को दिशा देना था उसपे लालकिला की जिद थोपा जाने लगा है और स्वराज का सपना आजतक और शायद हमेशा अधूरा रहेगा।

आज निसन्देह अम्बेडकर का कद बढ़ा है, उन्होंने शहरों की ओर चलने को कहा था और वो सफल है क्योंकि हर गांव पलायन से ग्रस्त है। गांधी के भक्त मिलते नहीं और भीम आर्मी हर ओर देश सेवा के लिए भारत बंद को प्रतिबद्ध है।

आज देश नेहरू, गोडसे या अम्बेडकर से प्रश्न नहीं करता, क्यों? क्या आजादी के वक्त, विभाजन के वक्त सिर्फ गाँधी थे, निर्णय उनका ही था? दरअसल गांधी पर निशाना इसलिए है क्योंकि उनके विचार, नई क्रांति को जन्म दे सकते थे, हिन्दू परिवार जो आज बीखड़ गई है उसको एक कर सकते थे! स्वराज होने से लालकिला की दीवारें, इसके लाउडस्पीकर कमजोर पड़ जाते इसलिए आरामपसंद सत्तालोभियों का इस सन्त पर निशाना लाजिमी है पर क्या हम अपने युवा मित्रों से उम्मीद नहीं कर सकते कि वो इस फेकबुक और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के परिधी से बाहर निकलकर शोध करे, बिना किसी एजेंडे को उस सन्त को पढ़े और उसके विचारों को तौले और फिर अपना निर्णय ले?
बेशक वह भी इंसान थे, बूढ़े हो गये थे अपनों में फंसे थे और क्षोभ में थे तभी तो जब देश जश्न मना रहा था वो अंधेर कोठरियों में कैद रहे। सवाल है, आखिर मोहन दास ने गांधी बन कर क्या पाया? वह जिस देश की कल्पना करते थे उस देश ने तो उनको नोटों पे छापकर उनका ही भ्रस्टाचार के लिए प्रयोग किया और कुछ अधीर गोडसे टाइप लोगों ने उस वयोवृद्ध के सीने में लोहे ठोक कौन सा जग जीत लिया? क्या वो अकेले विभाजन के दोषी थे? क्या उन तीन गोलियों ने राष्ट्र की समस्याएं समाप्त कर दी? क्या हिन्दू मन जो हिन्द से भी बड़ा होने का दम्भ भरता है जिसके सार में वसुधैव कुटुम्बकम है ने उस रोज एक सन्त को मार गर्वित हुआ था? बेशक नहीं, महात्मा गाँधी राष्ट्र के सच्चे सपूत थे जो आखिरी क्षणों में भी पछतावे से रुकसत हुए और लोगों की मानसिकता देख जो बोल निकले वो ‘हे राम’ के थे जिसको समझना मुश्किल नहीं है।

गांधीजी ने क्या त्याग किया, क्या पाया यह शोध का विषय है पर देश के ही बर्बादी के नारे लगाने वाले कुपढ़ छात्रों को इतना वक्त है क्या?

आज आप होते तो आपसे कहता हैप्पी बर्थडे बापू!पर अब जो कहना है वो है कि थोड़ा ही सही मुझमें जिन्दा रहोगे तुम! लभ यू।

जय हिंद!

©सन्नी कुमार

आज फुर्सत में हूँ

आज फुर्सत में हूँ,
फुर्सत के ही साथ में हूँ,
बहुत दिन से मिली नहीं थी,
थी मुझे बहुत जरूरत उसकी,
पर दिनों से है की दिखी नहीं थी..

आज भी शायद नज़रे चुरा कर,
कहीं और ही जा रही थी,
पर तलब और तबियत के सख्त पहरों से,
आज बच के निकल न सकी थी..

और अब जब साथ में है,
तो है थोड़ी सहमी, थोड़ी शरमाई,
उसका कहना है कि वो भी इंतेजार में थी,
पर मैंने ही न पुकारा,
कि वो तो कबसे आस में थी।

कि वो तो आती थी, मुझसे रोज ही मिलने,
मेरे खाने के बाद, तो कभी सोने से पहले,
पर अक्सर मैं ही मशगूल होता था,
काम के करारनामों में उलझा होता था..

वो भी चाहती थी मुझसे रोज ही मिलना,
मुझसे सच कहना, मेरी कविताओं को सुनना,
पर उस आरामपसंद को मिलने न दिया जाता था,
की तब उलझा होता था मैं, और काम पहरे पे होता था..

उसका कहना है कि आज भी वो कोई नज़रे चुरा कर नहीं जा रही थी,
अरे मिलना वो भी चाहती थी, पर जताना नहीं चाहती थी,
बहुत कुछ हिसाब थे उसके पास, जो कबसे वो देना चाहती थी,
लाई थी कई किस्से, कई ख्वाब भेंट करना चाहती थी,
पर मेरी व्यस्तताओं से डर, दूर हो जाया करती थी,
और आज जब न काम पहरे पे था, न व्यस्तता उसको दिखी,
तभी उसका मिलना सम्भव हुआ,
क्या खोया, क्या पाया, है जाना कहाँ,
आज फुर्सत में फुर्सत से चर्चा हुआ…
©सन्नी कुमार

NOTA पर विचार

NOTA को विकल्प मानने वाले बन्धुओं क्या आपने विचार किया है कि नोटा का अर्थ होता है इनमें से कोई नहीं, और कोई नहीं कहना ज्यादती होगी और अपने भारतभूमि को कलंकित करने सा होगा जहां आपके अनुसार कोई योग्य नही बचा और आप समाज के ऐसे चौकीदार है जो ज्योतिष भी है जिन्हे साल भर पहले ही मालूम हो गया है कि आपको जितने भी लोगों की उम्मीदवारी मिलेगी सब के सब नकारे होंगे? क्या वाकई आपका क्षेत्र इतना गया गुजरा है?? अगर है, तो हे अर्जुन आप क्यों नहीं इस अँधेरे से अपने बन्धुओं और समाज को उबारने के लिए आगे आते है, आप क्यों नहीं अपनी उम्मीदवारी देते है?
हे सोशल मीडिया के शेरों अगर आपने पहले से ही तय कर लिया है कि आपको 2019 में कोई पसंद नही आनेवाला तो आप खुद को क्यों नहीं एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर अपने अन्य बन्धु-बांधवों और समाज को राजनीतिक कुचक्र से बाहर निकाल लेने का प्रयास करते? अगर नहीं कर सकते तो फिर इतनी हताशा क्यों?
SC ST एक्ट का विरोध जितना जरूरी है उतना ही जरूरी इस नोटा का साल भर पहले ही विकल्प चुन लेना गलत है और लोकतंत्र के हित मे नहीं है। क्या दल के दलदल से दूर कोई स्वतंत्रत, निर्भीक उम्मीदवार नही मिलेगा या आप खुद आगे नही आना चाहेंगे जिसने पार्टी के सेवा के बदले समाज की सेवा की हो? या आपका नोटा बस एक वर्ग विशेष के वोट को बर्बाद कराने से है? खैर बिना भारत बंद कराये अगर सरकार सुनती है तो मैं भी उसके SC ST एक्ट का विरोध करता हूँ, आरक्षण खत्म करने की गुजारिश करता हूँ और चाहूंगा कि सरकार नौकरी के लिए मुफ्त आवेदन निकाले..
समझ आये तो विमर्श करे वरना शांत रहे, समय हम सबका कीमती है।

-सन्नी कुमार

#नोटा #NOTA

भारत बंद नहीं नेताओं के ड्रामे बन्द करे

न तो मैं कभी आरक्षण समर्थक था, न भारत बंद जैसी वाहियात सोंच का समर्थन कर सकता हूँ। मैं दो रोटी कम खाकर, दो वस्त्रों में पूरा जीवन बिता दूंगा पर किसी फालतू नेता और बकवास दलों के दलदल में नहीं परूँगा, क्योंकि अगर बन्दे में दम हो तो रिलायंस जैसा अंपायर बिना किसी सरकारी चाकरी के भी खड़ा किया जा सकता है। आरक्षण के नाम पर दलित और सवर्णों के बीच में ये जातियों के ठेकेदार गुंडे, जो आजादी बाद से ही लड़ाई लगाते रहे है कि साजिश कामयाब न होने दे।
भारत बंद में दिक्कतों को झेलने कोई हाई प्रोफ़ाइल नहीं आएगा, न आपके साथ आज लाठी उठाने आपका नेता आएगा, विश्वास न हो तो अन्ना के सिपाहियों से सबक ले जिनको आपियों ने उल्लू बनाकर दिल्ली की सत्ता ली और अन्ना की सेना कहीं पुणे में गन्ना बेच रही होगी। भारत बन्द और अन्य किसी भी तरह का बन्द एक साजिश है जिसमें सबका अपना एजेंडा होता है और आप बस एक मोहरा की भूमिका में होते है। सो अपनी काबिलियत को यूं जाया न करे और अपने विवेक से काम ले, खुद ही विकल्प बने। आज आपको, जनता को जागरूक होना होगा, खुद ही खुद को सरकार समझे तभी मुल्क सेफ है और हाँ बन्द करना ही है तो नेताओं का इलेक्शन के वक्त प्रचार बन्द करे, अपने गाँव-मुहल्ले में घुसने न दे और अपने लोगों को निर्दलीय उम्मीदवारों को जिताये और कांग्रेस A टीम और B टीम को बाहर करे वरना बनते रहे मूर्ख और बजाते रहे अम्बेडकर का दिया आरक्षण वाला झुनझुना।
-सन्नी कुमार

#भारत_चलता_रहे
#भारत_बढ़ता_रहे

कविता मेरे हर शिष्य के नाम

यह कविता मेरे हर शिष्य के नाम, मेरे भाव, मेरे शब्द आप तक पहुंचे तो सूचित करें, अपने विचार रखें। धन्यवाद!

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ,
है तुम सबसे मेरा एक ही स्वार्थ,
तुम्हारे सफलता का मैं प्रार्थी हूँ..

कोई तुमसे मांग नहीं,
तुम स्वयं को समझो चाहता हूँ,
हो कदम तुम्हारे कल कीर्ति के सीढ़ी,
सो तुम्हें चलना आज सीखाता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न तुमसे सुख-समझौते का अधिकारी हूँ,
है जो थोड़ी अनुभव और ज्ञान की पूंजी,
वह तुम सब संग बांटना चाहता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
मैं वास्तविकता का साक्षी हूँ,
कल को होगे तुम नीति-नियम रचयिता,
सो तुम्हें आज सही-गलत का भान कराता हूँ..

हो कुरुक्षेत्र पुनः यह दु:स्वप्न नहीं,
न कृष्णतुल्य एक कण भी हूँ,
पर यह जीवन भी है महान संघर्ष,
कि इसमें विजयी रहो मैं चाहता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ..
है तुमने जो भी मुकाम चुना,
उस यात्रा में मैं एक सारथी हूँ,
पा लो तुम सब अपनी मंजिल,
मैं यही कामना करता हूँ…

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ..
©सन्नी कुमार
#Happy_Teachers_Day
#Teachers_Day_Poem_in_Hindi
#Teacher_on_Teachers_Day

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समाज, सरकार और हम

मित्रमंडली में भोजपुर में हुए उस अन्याय की चर्चा हो रही थी, मेरा भी भावुक मन यह सोंच कर बैठा जा रहा था कि कितना संवेदनहीन, नपुंसक और लिच्चर हो गया है यह समाज जो खुलेआम एक औरत को नंगा करके पीटता है, और फिर मीडिया इसे खबर बनाकर, TRP और views के लिए मसाला की तरह परोस देती है।
यह सब विमर्श हो रहा था कि इस दौरान एक मित्र ने कहा कि यह सब सुशासन बाबू की नाकामी है और फिर इस घटना को मुजफ्फरपुर की घटना से जोड़ दिया, जो कितना सही है या गलत यह लोग तय करे, और वही लोग यह भी तय करे कि अगर समाज की कोई भूमिका है ही नहीं तो फिर ये समाजिक तानाबाना क्यों?
मेरी समझ में सरकार से ज्यादा भूमिका समाज की है, लोगों की है पर लोग और समाज भ्रस्ट है और तभी दोनों अपनी नपुंसकता को सरकार के माथे सजा देते है..पर ये इस तरह कब तक??
कबतक हम फूहड़ता, निर्लज्जता, नंगई, नपुंसकता और भ्रस्टाचार को ढोते रहेंगे? कब तक जाहिलों को माहौल बिगाड़ते रहने देंगे और फिर ये जाहिल भी तो हम ही है कोई एलियन आकर तो इधर चरस नहीं बोता, यो-यो वाली जो नश्ल तैयार होगी वो उड़ता पंजाब उड़ता बिहार ही बनाएगी और आप अच्छा कुछ कहेंगे तो वॉल्यूम बढ़ा के कह देंगे ‘कि अब करेंगे गन्दी बात’।
ये जो वॉल्यूम लाऊड करके थर्ड ग्रेड के गाने सुनते है और एक से एक फालतू 400 चैनल जो हमलोग टेपते है ये उसी का देन है कि हम ब्रेकिंग न्यूज़ सुनते तो है पर उसके इशारों को समझते नहीं..और यही सर्वाधिक स्थिति दुःखद है।
मैं बार बार कहता रहा हूँ कि आज का जनरेशन पर्सनालिटी डेवलपमेंट को लेकर अत्यधिक जागरूक है और कैरेक्टर बिल्डिंग को दरकिनार कर दिया है या यूं कहें की चरित्र निर्माण की जो नींव बालकाल में पड़ती है उसे किशोरावस्था में पहुंचते पहुंचते उखाड़ फेंकते है। आज की फास्टफूड जनरेशन को हवा में कैसल बनाना है वो भी दस रुपये के लिए सुट्टे से.. और दयनीय स्थिति यह है कि अगर आप उन्हें बुरा समझते है तो ये साबित कर देंगे(चाहे दलील जो भी हो) कि आपकी माइंड आज भी नैरो है।
ख़ैर, मुझे मेरे लिए इतना ही कहना है कि अच्छे लोगों को समाज के भरोसे नहीं रहना होगा बल्कि खुद को सुदृढ़ करना होगा, मजबूत बनाना होगा ताकि ऐसी किसी भी स्थिति को पैदा होने से रोकने की स्थिति में रहे।

इन शार्ट, समाज अब वह गिद्ध है जो सिर्फ मृत्युपरांत भोज के लिए बनी है…भोज खिलाये समाज खुश होके सरकार को दुगुनी ऊर्जा से गाली देने लगेगा।

खैर आपसे इन चार पंक्तियों के माध्यम से यही निवेदन कि

“जिंदा है तो मिसाल बनिये,
जिंदगी हो ऐसी की औरों के ख्वाब बनिये,
लिच्छड़, नपुंसक, भ्रष्ट-भेड़ियों की भेड़ में हो दहशत,
आप ऐसे महानायक भरत बनिये’
©सन्नी कुमार

मेरे अटल जी – Narendra Modi

मेरे अटल जी – Narendra Modi

अटल जी अब नहीं रहे। मन नहीं मानता। अटल जी, मेरी आंखों के सामने हैं, स्थिर हैं। जो हाथ मेरी पीठ पर धौल जमाते थे, जो स्नेह से, मुस्कराते हुए मुझे अंकवार में भर लेते थे, वे स्थिर हैं। अटल जी की ये स्थिरता मुझे झकझोर रही है, अस्थिर कर रही है। एक जलन सी है आंखों में, कुछ कहना है, बहुत कुछ कहना है लेकिन कह नहीं पा रहा। मैं खुद को बार-बार यकीन दिला रहा हूं कि अटल जी अब नहीं हैं, लेकिन ये विचार आते ही खुद को इस विचार से दूर कर रहा हूं। क्या अटल जी वाकई नहीं हैं? नहीं। मैं उनकी आवाज अपने भीतर गूंजते हुए महसूस कर रहा हूं, कैसे कह दूं, कैसे मान लूं, वे अब नहीं हैं।

वे पंचतत्व हैं। वे आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सबमें व्याप्त हैं, वेअटल हैं, वे अब भी हैं। जब उनसे पहली बार मिला था, उसकी स्मृति ऐसी है जैसे कल की ही बात हो। इतने बड़े नेता, इतने बड़े विद्वान। लगता था जैसे शीशे के उस पार की दुनिया से निकलकर कोई सामने आ गया है। जिसका इतना नाम सुना था, जिसको इतना पढ़ा था, जिससे बिना मिले, इतना कुछ सीखा था, वो मेरे सामने था। जब पहली बार उनके मुंह से मेरा नाम निकला तो लगा, पाने के लिए बस इतना ही बहुत है। बहुत दिनों तक मेरा नाम लेती हुई उनकी वह आवाज मेरे कानों से टकराती रही। मैं कैसे मान लूं कि वह आवाज अब चली गई है।

कभी सोचा नहीं था, कि अटल जी के बारे में ऐसा लिखने के लिए कलम उठानी पड़ेगी। देश और दुनिया अटल जी को एक स्टेट्समैन, धारा प्रवाह वक्ता, संवेदनशील कवि, विचारवान लेखक, धारदार पत्रकार और विजनरी जननेता के तौर पर जानती है। लेकिन मेरे लिए उनका स्थान इससे भी ऊपर का था। सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे उनके साथ बरसों तक काम करने का अवसर मिला, बल्कि मेरे जीवन, मेरी सोच, मेरे आदर्शों-मूल्यों पर जो छाप उन्होंने छोड़ी, जो विश्वास उन्होंने मुझ पर किया, उसने मुझे गढ़ा है, हर स्थिति में अटल रहना सिखाया है।

हमारे देश में अनेक ऋषि, मुनि, संत आत्माओं ने जन्म लिया है। देश की आज़ादी से लेकर आज तक की विकास यात्रा के लिए भी असंख्य लोगों ने अपना जीवन समर्पित किया है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र की रक्षा और 21वीं सदी के सशक्त, सुरक्षित भारत के लिए अटल जी ने जो किया, वह अभूतपूर्व है।

उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था -बाकी सब का कोई महत्त्व नहीं। इंडिया फर्स्ट –भारत प्रथम, ये मंत्र वाक्य उनका जीवन ध्येय था। पोखरण देश के लिए जरूरी था तो चिंता नहीं की प्रतिबंधों और आलोचनाओं की, क्योंकि देश प्रथम था।सुपर कंप्यूटर नहीं मिले, क्रायोजेनिक इंजन नहीं मिले तो परवाह नहीं, हम खुद बनाएंगे, हम खुद अपने दम पर अपनी प्रतिभा और वैज्ञानिक कुशलता के बल पर असंभव दिखने वाले कार्य संभव कर दिखाएंगे। और ऐसा किया भी।दुनिया को चकित किया। सिर्फ एक ताकत उनके भीतर काम करती थी- देश प्रथम की जिद।

काल के कपाल पर लिखने और मिटाने की ताकत, हिम्मत और चुनौतियों के बादलों में विजय का सूरज उगाने का चमत्कार उनके सीने में था तो इसलिए क्योंकि वह सीना देश प्रथम के लिए धड़कता था। इसलिए हार और जीत उनके मन पर असर नहीं करती थी। सरकार बनी तो भी, सरकार एक वोट से गिरा दी गयी तो भी, उनके स्वरों में पराजय को भी विजय के ऐसे गगन भेदी विश्वास में बदलने की ताकत थी कि जीतने वाला ही हार मान बैठे।

अटल जी कभी लीक पर नहीं चले। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में नए रास्ते बनाए और तय किए। “आंधियों में भी दीये जलाने” की क्षमता उनमें थी। पूरी बेबाकी से वे जो कुछ भी बोलते थे, सीधा जनमानस के हृदय में उतर जाता था। अपनी बात को कैसे रखना है, कितना कहना है और कितना अनकहा छोड़ देना है, इसमें उन्हें महारत हासिल थी।

राष्ट्र की जो उन्होंने सेवा की, विश्व में मां भारती के मान सम्मान को उन्होंने जो बुलंदी दी, इसके लिए उन्हें अनेक सम्मान भी मिले। देशवासियों ने उन्हें भारत रत्न देकर अपना मान भी बढ़ाया। लेकिन वे किसी भी विशेषण, किसी भी सम्मान से ऊपर थे।

जीवन कैसे जीया जाए, राष्ट्र के काम कैसे आया जाए, यह उन्होंने अपने जीवन से दूसरों को सिखाया। वे कहते थे, “हम केवल अपने लिए ना जीएं, औरों के लिए भी जीएं…हम राष्ट्र के लिए अधिकाधिक त्याग करें। अगर भारत की दशा दयनीय है तो दुनिया में हमारा सम्मान नहीं हो सकता। किंतु यदि हम सभी दृष्टियों से सुसंपन्न हैं तो दुनिया हमारा सम्मान करेगी”

देश के गरीब, वंचित, शोषित के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए वे जीवनभर प्रयास करते रहे। वेकहते थे “गरीबी, दरिद्रता गरिमा का विषय नहीं है, बल्कि यह विवशता है, मजबूरी हैऔर विवशता का नाम संतोष नहीं हो सकता”। करोड़ों देशवासियों को इस विवशता से बाहर निकालने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किए। गरीब को अधिकार दिलाने के लिए देश में आधार जैसी व्यवस्था, प्रक्रियाओं का ज्यादा से ज्यादा सरलीकरण, हर गांव तक सड़क, स्वर्णिम चतुर्भुज, देश में विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्र निर्माण के उनके संकल्पों से जुड़ा था।

आज भारत जिस टेक्नोलॉजी के शिखर पर खड़ा है उसकी आधारशिला अटल जी ने ही रखी थी। वे अपने समय से बहुत दूर तक देख सकते थे – स्वप्न दृष्टा थे लेकिन कर्म वीर भी थे।कवि हृदय, भावुक मन के थे तो पराक्रमी सैनिक मन वाले भी थे। उन्होंने विदेश की यात्राएं कीं। जहाँ-जहाँ भी गए, स्थाई मित्र बनाये और भारत के हितों की स्थाई आधारशिला रखते गए। वे भारत की विजय और विकास के स्वर थे।

अटल जी का प्रखर राष्ट्रवाद और राष्ट्र के लिए समर्पण करोड़ों देशवासियों को हमेशा से प्रेरित करता रहा है। राष्ट्रवाद उनके लिए सिर्फ एक नारा नहीं था बल्कि जीवन शैली थी। वे देश को सिर्फ एक भूखंड, ज़मीन का टुकड़ा भर नहीं मानते थे, बल्कि एक जीवंत, संवेदनशील इकाई के रूप में देखते थे। “भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।”यह सिर्फ भाव नहीं, बल्कि उनका संकल्प था, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया। दशकों का सार्वजनिक जीवन उन्होंने अपनी इसी सोच को जीने में, धरातल पर उतारने में लगा दिया। आपातकाल ने हमारे लोकतंत्र पर जो दाग लगाया था उसको मिटाने के लिए अटल जी के प्रयास को देश हमेशा याद रखेगा।

राष्ट्रभक्ति की भावना, जनसेवा की प्रेरणा उनके नाम के ही अनुकूल अटल रही। भारत उनके मन में रहा, भारतीयता तन में। उन्होंने देश की जनता को ही अपना आराध्य माना। भारत के कण-कण, कंकर-कंकर, भारत की बूंद-बूंद को, पवित्र और पूजनीय माना।

जितना सम्मान, जितनी ऊंचाई अटल जी को मिली उतना ही अधिक वह ज़मीन से जुड़ते गए। अपनी सफलता को कभी भी उन्होंने अपने मस्तिष्क पर प्रभावी नहीं होने दिया। प्रभु से यश, कीर्ति की कामना अनेक व्यक्ति करते हैं, लेकिन ये अटल जी ही थे जिन्होंने कहा,

“हे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना।

गैरों को गले ना लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना”

अपने देशवासियों से इतनी सहजता औरसरलता से जुड़े रहने की यह कामना ही उनको सामाजिक जीवन के एक अलग पायदान पर खड़ा करती है।

वेपीड़ा सहते थे, वेदना को चुपचाप अपने भीतर समाये रहते थे, पर सबको अमृत देते रहे- जीवन भर। जब उन्हें कष्ट हुआ तो कहने लगे- “देह धरण को दंड है, सब काहू को होये, ज्ञानी भुगते ज्ञान से मूरख भुगते रोए।” उन्होंने ज्ञान मार्ग से अत्यंत गहरी वेदनाएं भी सहन कीं और वीतरागी भाव से विदा ले गए।

यदि भारत उनके रोम रोम में था तो विश्व की वेदना उनके मर्म को भेदती थी। इसी वजह से हिरोशिमा जैसी कविताओं का जन्म हुआ। वे विश्व नायक थे। मां भारतीके सच्चे वैश्विक नायक। भारत की सीमाओं के परे भारत की कीर्ति और करुणा का संदेश स्थापित करने वाले आधुनिक बुद्ध।

कुछ वर्ष पहले लोकसभा में जब उन्हें वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया था तब उन्होंने कहा था, “यह देश बड़ा अद्भुत है, अनूठा है। किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा रहा है, अभिनंदन किया जा सकता है।”

अपने पुरुषार्थ को, अपनी कर्तव्यनिष्ठा को राष्ट्र के लिए समर्पित करना उनके व्यक्तित्व की महानता को प्रतिबिंबित करता है। यही सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए उनका सबसे बड़ा और प्रखर संदेश है। देश के साधनों, संसाधनों पर पूरा भरोसा करते हुए, हमें अब अटल जी के सपनों को पूरा करना है, उनके सपनों का भारत बनाना है।

नए भारत का यही संकल्प, यही भावलिए मैं अपनी तरफ से और सवा सौ करोड़ देशवासियों की तरफ से अटल जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, उन्हें नमन करता हूं।

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