विरोध कब कब?

रोहिंग्या के समर्थन में इस देश के किस शहर में सभाएं नहीं हुई, आजाद पार्क में इन्ही रोहिंग्यों के समर्थन में शहीद स्मारक को भी तोड़ दिया था वतनपरस्तो(?) ने पर सवाल है क्या फिलिस्तीन(गाज़ा) और रोहिंग्या(म्यांमार) भारत के लोग थे, नहीं थे, क्या यह जुल्म भारतीय सेना कर रही थी, नहीं?फिर उनके समर्थन में इस देश का विरोध क्यों? जवाब शायद यह हो कि यह देश का विरोध नहीं था बस उन मजलूमों के हक़ का समर्थन था? फिर इस देश की सम्पत्ति जलाने का, हमारे प्रतीक चिन्हों का हमारे भावनाओं पर हमला करने की जुर्रत और जरूरत क्यो आई??
और इन्हीं मानवतावादी लोगों से यह प्रश्न की क्या आप बताएंगे कि पाकिस्तान और बंग्लादेश जो फिलिस्तीन की तरह मिलों दूर नहीं बल्कि पड़ोस में ही है उनके यहां के अल्पसंख्यको की आवाज़ आपने कितनी बार उठाई, स्टेटिक्स क्या कहते है और इन तीनों देशो में अल्पसंख्यको के साथ सलूक का अंतर कितना है, सिर्फ गाज़ा और रोहिंग्या ही क्यों याद आते है जबकि यजीदियों की पूरी नस्ल बर्बाद हो गई है, सीरिया मुल्क है या बम की क्षमता मापने वाला भूभाग अब यह नहीं समझ आता आपकी उनपर चुप्पी क्यों? आपने कितनी बार बंगलादेशी हिंदुओं के हक के लिए, यहां तक कि कश्मीरी अल्पसंख्यको के लिए मोर्च देखे? नहीं देखे न, पर अब आप शायद देख पाए, क्योंकि यह रोग फैल गया है, अब हर चीज पहले धर्म देखकर होगा और इसकी शुरुआत सोशल मीडिया खंगाले अपने आसपास घटी घटनाओं को देखेंगे तो देर न होगा समझने में।
मैन देखा है कि पटना मुजफ्फरपुर, गया जैसे छोटे शहर में भी लोग गाज़ा के लिए सड़कों पर उतरते है, कौन होते हौ ये लोग फिलिस्तीनी और रोहिंग्यों से इनका क्या रिश्ता है, मानवतावादी है, फिर तो कुर्दो के लिए भी लड़े होंगे, मलाला की आवाज़ बुलंद की होगी, कश्मीरी अल्पसंख्यको के साथ हुए न्याय पर जश्न मनाया होगा, पाकिस्तानी अल्पसंख्यको के लिए भी चिंतित होते होंगे? नहीं! क्यों भाई क्या सेक्युलर ऐसे नही होते है?? अगर ऐसा है तो फिर मोदी-शाह तो आपके शिष्य है, आप दोनों में अंतर क्या है? खुद से पूछिए?

बहरहाल मैं CAB के पक्ष में नहीं हूँ क्योंकि हमारे आसाम के भाई-बहन इससे चिंतित है, उनका विश्वास जितना आवश्यक है, देश को यह बताया जाए कि भारत से कितने घुसपैठिये भगाए जा रहे, कितने बसाए जा रहे। मैं इसके पीछे की सोंच से संतुष्ट हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हर कमजोर को विकल्प मिले, चाहे वो कोई फिलिस्तीनी-सीरिया का मुसलमान हो, या इराक के कूर्द, या ईरान के पारसी या पाकिस्तानी हिन्दू, सबके लिए एक देश हो जो उनके उम्मीद ढो सके, मुझे यकीन है कि इस देश के रोहिंग्या मुसलमानों को हमारे पड़ोसी देश जो खुद को इस्लामिक देश भी कहते है जगह देंगे और म्यांमार में हुए उनसे अन्याय को हल करेंगे, शेख हसीना ने तो रोहिंग्यों के लिए शानदार बाते भी कहीं है अखबरों में पढ़ ले।
एक बात और ज्यादा चिंतित न हो रवीश जी की माने तो अब तक मात्र 4000 पेटिशसन है धार्मिक विस्थापितों के जो इस देश मे जगह चाहते है और यह बिल्कुल सच है कि सरकार वोटबैंक की राजनीति कर रही यह भी सच है पर उनकी इस राजनीति से जिनको फायदा मिलेगा वह वाकई में सताए गए लोग है जिनकी बहु-बेटियों को तैमूर सोंच के लोग आज भी लुटते है, जबरन धर्म परिवर्तन एक काला सच है, क्या ऐसे लोगो को जीने का हक नहीं, क्या इतनी उदारता भारतवर्ष को नहीं दिखाना चाहिए, आपको क्या ऐसा लगता है कि अन्य धर्म के लोग इस देश मे नहीं रह पाएंगे? साहब अदनान सामी को इसी सरकार न नागरिकता दी है, तारिक़ फ़तेह जिसे अब आप भारतीय एजेंट के रूप में जानते होंगे यही है ये दोनों भी पाकिस्तानी मुसलमान ही थे इनको CAB से कितना डर है, क्या उनको इस देश मे डर लगता है पूछे उनसे? तस्लीमा नसरीन को भी जब अपने मुल्क में डर लगा तो डेरा यही उदार देश देता रहा, अब आज कुछ 4000 हिंदुओं का विरोध क्यों??आपको क्या लगता है कि वो इस देश में पाकिस्तान में कोई फिदायीन हमला करके भागे है, या बर्बर है या यहाँ आकर शहीद स्मारक तोड़ेंगे या ट्रेनों में पत्थर मारेंगे?? ये दबे कुचले लोग है, रोहिंगया भी है, यजीदी भी है, सीरिया के लोग भी है, पर रोहिंगया और सीरिया के लिए 56 देश है जो खुद को इस्लामिक कंट्री कहते है पर इन हिंदुओं की आस पूरे विश्वपटल पर यही एक सेक्युलर भूभाग है, यह झूठ है क्या??

अल्पसंख्यकों से विश्व का बर्ताव

इराक में कूर्द,
पाकिस्तान में हिन्दू,
कश्मीर में पंडित,
म्यांमार में मुस्लिम,
जर्मनी में यहूदी,
अरब में काफ़िर,
अल्पसंख्यक है,
इनसे व्यवहार कैसा है,
वहां कानून कैसा है,
जिस दिन इन मुद्दों पर बहस हुई पता लग जायेगा कि जिस जन्नत की बातें पाक किताबों में है, वह मादरे वतन हिंद है, जिसने विस्थापितों को जगह दिया, मान-सम्मान दिया, वो चाहे जर्मनी के सताए यहूदी हो, या ईरान के पारसी, या पाकिस्तान-बंग्लादेश का राजनैतिक विस्थापित, इस मुल्क के आध्यात्मिक सोंच ने बौद्ध और जैन जैसे महान धर्म दिए जिनके ईकोसिस्टम को समझने की आज जरूरत है। आप जिस भाईचारे की, शांति की बात करते है उसकी प्रेरणा पूरे विश्व मे भारत जैसे देश ही देता है जहाँ कुछ टुच्चे पत्तलकार, चाटुकार और अपनी राजनीति चमकाने वाले चौधरी अल्पसंख्यक को उकसाना चाहते है, पर यह देश अगर अल्पंसख्यक का विरोधी होत तो यह देश टाटा को खो चुका होता, मनमोहन सिंह जी जैसा प्रधान न पाता, कलाम साहब ने जितना इसकी सेवा की, जिस सेक्युलर फैब्रिक को वो ओढ़ते थे वह मिसाल है, इरफान पठान और नवाजुद्दीन सिद्दकी बताये कब कब भेद हुआ उनसे, मेरे दोनो ही फेवरिट है, बाबा साहेव प्रवर्तित बौद्ध थे, उनको इस देश का संविधान गढ़ने दिया और उनका भी सम्मान करते है। आज कुछ सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों से बाहर आने का एक लक्ष्य जिसपे देश और हम अग्रसर है फिर ये हर बार माइनॉरिटी को भरमाने की क्या आवश्यक्ता?? अपना ही उदाहरण देता हुँ शुक्रवार को हाफ टाइम में छुट्टी लेने वाले सहकर्मियों के बीच मे रहा हूँ, उनकी सेवई खाई और जब उन्होंने दीवाली का लड्डु नहीं खाया तो ठगा हुआ महसूस हुआ पर इसको कितना ढोए, हम भी नफरत करे जबकि वही बहुत से और भी थे जो बैलेंस बलाना जानते थे…इसी बैलेंस को बनाये रखेंगे थोड़ा इतिहास खुद पढेंगे, तो आपको समझ आएगा कि 56 देश जो इस्लामिक है वहाँ अन्य देशों के लोगो को को यहाँ तक कि मुसलमानों को क्या हक़ मिले है, वहाँ महिला अधिकार कितने है, पर नहीं आपकी नजर इज़राइल पर है, फिलिस्तीन की चिंता में आप मुंबई उजाड़ देते है पर आप ईरान इराक़ और सीरिया पर चुप है और फिर सेव गाज़ा सेव रोहिंज्ञा के लिए सड़कों पर है। एक ओर आप 370 के विरोध में है कि कश्मीरियों के अधिकार सीमित हो जाएंगे पर पंडितों को भूल गए, खुद राहुल बाबा भी कश्मीर से अमेठी और अब तो केरल सेटल हो गए. क्या उनपर जुल्म नही हुआ?? खैर ये राजनीति है हम और आप बैलेंस कैसे बनाये इस पर सोंचे, एक समाज बाहरी मुद्दों पर कभी तख्ती नही उठाता और आप अगर जागरूक लोग है और वैश्विक मुद्दे भी उठाते है तो प्लीज कुर्दों की भी आवाज बनिये, सीरिया को भी बचाइए, अपने देश के अच्छे चीजों के लिए भी धन्यवाद दीजिये, अल्पसंख्यक कोटा में हुए वृद्धि को सराहिये, और प्लीज CAB, NRC जिसका भी विरोध या समर्थन करना है करे पर ट्रेनों पर हमला करना, एम्बुलेंस को निशाना बनाना, पुलिस के खदेड़ना शोभता है, और जब वही पुलिस पेल दे तो मजलूम हो जाना यह सही है? हम और आप बुद्धिमान बने, हम किसी मैग्सेसे की होड़ में नहीं है, गुजरात हो या गोधरा, कश्मीर 1990 का हो या 2019 का, बर्बाद हमलोग होएंगे क्योंकि Primetime वाला पत्रकार या हमारा कोई नेता लाठी नहीं खायेगा, इसलिए बैलेंस बनाये, हमारी सुरक्षा हमारी भी जिम्मेदारी है, CAB को पहले समझिए फिर समर्थन और विरोध तय कीजिये, भारत को कम्युनल बनने की राह में धकेलने से बचे यह सबकी जिम्मेदारी है!
सन्नी कुमार
मुझे आप अपने नजर से देखने के लिए स्वतंत्र है, पर एक आग्रह भी है कि खुद को भी कभी अपनी नजर में तौलिए, सब बुझ जायेगा..

इतिहास और चाटुकार

भारतीय विद्यालयों में इतिहास को एक सस्ते नोबेल की तरह पढ़ाया जाता है, तथ्य कम कहानी ज्यादा, बहुत कम छात्रों (कुछेक शिक्षकों) को आर्थिक इतिहास की ज्यादा जानकारी नहीं है, उन्हें तो मुगल और ब्रिटिश गुलामियों के वृहत कारणों का आभास भी नहीं पर उद्देश्य जो बहुत हद तक परीक्षा में अच्छे अंक लाना है, वह सफल बोले तो नम्बर शत प्रतिशत। अब समय है कि हमारे इतिहास को बिना सुगर कोट किये हुए ऐज इट इज़ पढ़ाया जाए, विदेशी लेखकों का भी रेफेरेंस हो और यह भी बताया जाए कि कैसे 18वीं शताब्दी तक दुनिया की सबसे बड़ी GDP, 21वीं शताब्दी में स्वतंत्र के बाद ज्यादा शिक्षित होने के बाद भी पिछड़ कैसे और क्यों गया? आज के छात्रों को यह भी समझना होगा कि राष्ट्रीयता का क्या महत्व है और क्यों आपसे ज्यादा आज राष्ट्र महत्वपूर्ण है। राष्ट्र के महत्व को पहचानने वाले वीरों हजारों-लाखों देश भक्तों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया था, उनका यह समर्पण हमारे फ्री नेट से देश विरोधी स्लोगन के लिए नहीं था न ही उनका बलिदान आपके उस व्यभिचारी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए था जिसके बुर्के से आप सेना पर पत्थर बरसाते हो या देश मे विभिन्न धार्मिक और जातीय गोलबंद कर राष्ट्र की संपत्तियों को, इसके मान को क्षति पहुँचाते है।
खैर आज भारत बदल रहा है। चूहे परेशान है पर अगर दूरगामी फसल बचाना है तो किसान को असहिष्णु होना होगा वरना एक बार फिर इतिहास दुहराया जाएगा और कलम के चाटुकार उसे सुगरकोट करके ईनाम पाएंगे! एक बात और सिर्फ इतिहास नहीं आस पास के भूगोल का भी ध्यान रखे विस्तृत जानकारी मिलने पर! गलत के लिए असहिष्णु बने और एक सशक्त राष्ट्र के लिए सच के साथ खड़े हो किसी प्रोपेगेंडा के साथ नहीं।
साभार

Giriraj Singh is leading

Begusarai seat is a high profile seat where BJP fire brand leader Giriraj Singh and notorious PHD holder JNU student leader Mr Kanhaiya Kumar is contesting. As counting has started and so far it is Giriraj Singh Who is leading with a margin of approx 50000 votes and kanhaiya is on 2nd position.

NDA is doing exceptionally well in Bihar and was leading on 33 seats out 35 seats where counting begun. There are 40 seats and as per exit polls NDA may win 37 seats here.

Jehanabad RJD leader Surendra Yadav is leading where BjP candidate Mr. Chandravanshi is trailing.

HAM candidate and ex CM of Bihar Mr Manjhi is trailing and Vijay

Manjhi is leading in Gaya.

Muzaffarpur seat is also being lead by BJP Mr. Nishad. Somehow Bihar has turned saffron today.

गांधी और गोडसे का सच

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पहला प्रधान अलोकतांत्रिक तरीके से या यूं कहे तो व्यक्ति विशेष श्री मोहनदास करम चन्द गांधी के मन से तय किया गया, अलोकतांत्रिक इसलिए क्योंकि तब कांग्रेज़ के 16 राज्यों के प्रतिनिधियों में से 13 ने सरदार को पहला पसन्द बनाया था पर महात्माजी की ज़िद नेहरू थे और उनके सम्मान में सरदार जी ने अपना नाम वापस लिया और फिर लाडले नेहरू प्रधान की गद्दी तक पहुंचे, इस बार उनकी चौथी पीढ़ी भी PM की रेस में है, पर अफ़सोस आज महात्मा नहीं है!
गांधीजी वाकई में एक महात्मा ही थे जो एक अलग तन्त्र चाहते थे तभी तो कांग्रेज़ अध्यक्ष पद की चुनाव जब नेताजी सुभाष जीत गए तो गांधी न केवल नाराज हुए बल्कि मूवमेंट से अलग होने की धमकी तक दी और तब सुभाष ने भी उनके सम्मान में न कांग्रेज़ अध्यक्ष का पद छोड़ा बल्कि कांग्रेज़ ही छोड़ दी। ये दो घटनायें ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थी न शायद यह भी की देश बंटवारे में जो सत्ता की भूख में दोनों तरफ मार काट मची और जो ट्रेनें सिर्फ लाशें भरकर लाती थी तब भी महात्मा पूरब और पश्चिम पाकिस्तान के लिए देश के बीचोबीच रास्ता देने की बात करते थे और तब पाकिस्तान को मिलने वाले 75 करोड़ की बची किश्त देने पर हड़ताल पर भी गए। गांधी ऐसे महात्मा थे जिनसे खुद उनका बेटा भी दुखी था, पर गांधी जी अपने लगन, अपनी अनुशासन, अपने प्रयोगों के लिए संकल्पित और सफल थे..
वैसे महात्मा जी बैरिस्टर भी थे वो बात अलग है कि भगत सिंह को बचाने का प्रयास नहीं किया पर इसपर प्रश्न करना गांधी जी का न केवल अपमान होगा बल्कि व्यर्थ भी होगा क्योंकि हम मुन्ना भाई तो है नहीं जो गांधीजी उत्तर देने आएंगे, खैर मैं उनके सम्मान में कभी कमी नहीं कर सकता क्योंकि हमने पढ़ है कि उन्होंने दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना तलवार और फिर जो अहिंसा का मार्ग दिखाकर उन्होंने इस भूमि को धन्य किया है इसके लिए बुद्ध हमेशा उनके आभारी रहेंगे।आप सदा अमर रहे और बिल्कुल देश आपको कभी नहीं भूलेगा न हम किसी को यह प्रश्न करने का अवसर देंगे कि आजाद भारत मे आजाद हिंद फौज की सेना का क्या हुआ? क्या यह सेना भारतीय सेना में शामिल हुई?
और एक बात इस देश को आज गोडसे की जरूरत कतई नहीं है पर अब चूकि यहां अभिव्यक्ति की आजादी है इस लिहाज से अगर उसकी मंशा को जानने का पढ़ने का अवसर मिलता तो इतिहास के छात्रों को लाभ मिलेगा क्योंकि सारा ज्ञान अकेले कमल हासन रखे और हम गोडसे रूपी आतंकी(कमल के अनुसार) से अनजान रहे, ठीक नहीं इसलिये उसकी और उसपर लिखी पुस्तकें बैन नहीं होनी चाहिए, सुना है कि उसकी अस्थियां अब तक प्रवाहित नहीं की गई? जानने का हक़ होना चाहिए न नए भारत को, है कि नहीं??

क्या इसलिये मोदी सही नहीं?

चुनाव समीप है जरा विचारिये की मोदी से इतर हमारे पास विकल्प(अगर है तो) क्या है? कोई कांग्रेसी कार्यकर्ता बतायेगा कि UPA का प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन और किन कारणों से है और वह किस मामले में मोदी से बेहतर है(हो जाएगा नहीं)? NDA और UPA से अलग कोई अन्य गुट भी है क्या, अगर है तो उसके बॉस कौन है(होंगे)?
हर सवाल सत्तापक्ष से ठीक है पर जो मोदी विरोध में देश का महत्वपूर्ण समय बर्बाद करा रहे उस Congrace और उसके पैरविदार मीडिया वाले क्या नमो बनाम अन्य भावी PM उम्मीदवारों में तुलनात्मक विश्लेषण करने का हिम्मत रखेंगे?
आजकल वामपंथी अख़बार मोदी को राफेल, नोटबन्दी और रोजगार सृजन न करने को लेकर घेर रहे है और इसमें वो सफल भी हो रहे है पर मोदी नहीं तो कौन? क्या मुल्क कोशिश करने वाले को ठुकरा कर उनको ले आएगी जिनका पक्षतापूर्ण रवैया एक डरावना सपना था? क्या हम उस दौड़ की वापसी चाहेंगे जब कहीं भी कभी भी पब्लिक प्लेस में बम फट जाता था, क्या हम वह दौड़ फिर से जीना चाहते है जब एक सिलिंडर रिफिल कराने के लिए पूरा दिन बर्बाद करना होता था या कालाबाजारियों से ब्लैक में लेना होता था? क्या हम मनरेगा में फिर उन लोगों को नौकरी दिलाना चाहते है जिनको गुजरे जमाना हो गया? I mean तब तो रोजगार कार्ड उनके भी थे जो न थे? क्या हमें सरकारी सब्सिडियों का सीधे एकाउंट में आना, सिस्टम का ट्रांसपेरेंट होना खटकता है? साहब, आप सम्पन्न है वरना उज्ज्वला योजना से गरीबों को क्या मिला है वह हम जैसे गांव से जुड़े लोग जानते है, मुफ्त में कनेक्शन चूल्हा-सिलिंडर सब, फिर भी आप नाराज है क्यों? प्रधानमंत्री आवास योजना से बनते घरों का जायजा लीजिये इसके लिए दिल्ली के न्यूजरूम से, फेसबुक की दुनिया से निकलकर गाँव आना होगा और फिर तुलना कीजिये। शायद आप हवाई जहाज से घूमते है वरना सड़कों पर हुए काम आपको अवश्य दिखते, 5 साल पहले बिजली कितने घण्टे थी और अब कितनी है, कई गांव ऐसे थे जो अब तक अंधेरे में थे अब वहां बिजली है तो क्या इसकी तारीफ नहीं होगी? नोटबन्दी से परेशान हम भी हुए थे पर 10-20-50 नोट बदलना इतना भी मुश्किल नहीं था और अगर यह प्रयास फेल रहा था तो mygov.in पर सुझाव दे सकते थे, दिया था? राफेल 10 साल तक नहीं लाने वाले अब भी नहीं आने देना चाहते और पूरा विरोध इसी के लिए है पर मोदी और राफेल दोनों थोड़े महंगे है पर जरूरी है क्योंकि अब कैंडल जलाने वाला देश नहीं चाहिए, गांधी टोपी पहन अपना उल्लू सीधा करने वाला नेता नहीं चाहिए अब नेता वह हो जो कोशिश करे सफल हो असफल हो पर कोशिश ईमानदार हो, और फिर टारगेट हिट करे। ऐसा क्यों है कि Dawn और The Hindu का स्वर समान लगता है ऐसा क्यों है कि जो प्रश्न पाकिस्तान के है वह हमारा विपक्ष पूछता है, ऐसी कौन सी दिक्कत हौ कि विपक्षियों से ज्यादा पाकिस्तानी लोग मोदी विरोध के कैम्पेन में लगे है?(कृपया कर मेरा यकीन न करे और फेसबुक ट्विटर और ब्लॉग्स पढ़े आप भी मानेंगे कि पाकिस्तानियों में मोदी को लेकर क्या बेचैनी है.)
तब 2014 में मनमोहन बनाम मोदी का दृश्य नही था, लोगों ने सेंट्रल गवर्नमेंट को फेल मानकर और मोदी को सफल प्रशासक के रूप में स्थापित होने के बाद ही देेश की कमान दी थी और लोगों का मानना था कि गुजरात मॉडल पर देश विकास के पटरी पर तेज दौड़ेगा, लोग सन्तुष्ट भी है और असंतुष्ट भी पर अब जब एक बार फिर से चुनाव का अवसर है जाना है तो तथाकथित बुद्धिजीवी लोग विकल्प में क्या सुझाएंगे? क्या मोदी के मीडिया को सरकारी खर्च पर विदेश भ्रमण न कराने के कारण भी लोग नाखुश है? क्या कालाबाजारी करते लोग भी नाखुश है? क्या ब्लैक से सिलिंडर बेचने वाले युवा बेरोजगार है इसलिए नाखुश है? क्या पूर्व प्रधानमंत्री की तरह इन्होंने देश की संसाधनों पर मज़हब विशेष का पहला हक़ नहीं दिलाया इस लिए नाखुश है? क्या OROP की लंबी मांग सुने जाने के कारण लोग नाखुश है? क्या 1 रुपये में मिलने लगे इन्सुरेंस से और जन धन के अत्यधिक खुल गए एकाउंट से लोग(बैंककर्मी) नाखुश है? क्या अभिनन्दन के सकुशल लौट आने से आप नाखुश है? क्या आप शांति पसन्द लोग है और उड़ी और आप सर्जिजल स्ट्राइक से आप नाखुश है? या आरक्षण की राजनीति करने वाले लोग सवर्णों के लिए घोषित 10% आरक्षण से नाराज है? या आप कुम्भ के दौरान गंगा की अविरल-निर्मल धारा से परेशान है? क्या अन्य नेताओं की तरह मोदी ने भी खुद की मूर्ति का लोकार्पण कर दिया या नेहरू से भी बड़े हो गए सरदार के कद से दिक्कत है? डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, मुद्रा योजना जैसी योजनाओं से कैसा दिक़्क़त या आपकी दिक्कत इस बात से है कि गाँव के लौंडे स्टेशन की फ्री wifi का उपयोग कर आपसे बेहतर विश्लेषण कर देते है और आपको TV स्क्रीन काला करना परता है तो कभी TV न देखने की सलाह देनी पड़ती है। बेशक इन पाँच सालों में बहुत असहिष्णुता हुई है नेताजी से जुड़े अधिकांश दस्तावेज आज पब्लिक डोमेन मे है, 70 साल बाद आजाद हिंद फौज के क्रांतिवीर इंडिया गेट पर पैरेड में शामिल हुए, क्या आप इस विचार से घबराते है?
मोदी निःसन्देह बेहतर नहीं हो सकते पर उनके नियत पे शक किन कारणों से इसको स्पष्ट करेंगे क्या विपक्ष में बैठे लोग? आज नीरव मोदी और माल्या को लेकर घेरा जा रहा है, घेरा जाना भी चाहिए पर अगर वह देश भागने पर मजबूर है तो वजह क्या मौजूदा व्यवस्था नहीं है, क्या यह गलत है कि दोनों ने UPA के शासनकाल में ही सरकार और डेढ़ चुना लगाया था? क्या नीरव मोदी के कारण देश नरेंद्र मोदी को ठुकराकर नेशनल हेराल्ड, अगस्ता वेस्टलैंड, 2G, कमन्वेल्थ, कोयला घोटाले करने वाले दल को और उसके चहेते लालू, ममता मायावती को स्वीकार कर ले??
वैसे मेरा राहुल (द्रविड़) आपके राहुल से बेहतर है. सवाल सारे एक साथ देख घबराए नहीं योग्यता अनुसार उत्तर दे, आपको समयसीमा की पूरी छूट है।
-सन्नी कुमार

राष्ट्रद्रोही स्वीकार नहीं न ही राष्ट्रवाद के नाम पर उद्दंडता

लखनऊ में हुई कश्मीरी युवक की पिटाई कल सुर्ख़ियों में थी, भगवा गमछे में दो उद्दंड लोगों को ये हरक़त करते दिखाया गया। मीडिया ने इसे खूब परोसा पर इसके कारण को समझने की कोशिश न की गई तो सोंचा कि मैं ये कोशिश कर लूं और जो विचार मुझमें है उसे आपके माध्यम से पूरे देश में ले जाऊं।
दरअसल पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद से ही पूरा देश गुस्से में है और यहाँ कश्मीरियों को यह समझना होगा कि अगर भारत भर पे उनका अधिकार है तो भारतभर का अधिकार भी कश्मीर पर है और एकतरफ जब आप खुलेआम घाटी में, JNU, AMU या विभिन्न सोशल साइट्स के माध्यम से भारत विरोध के घटिया नारे लगाते है तब आम जनता आपके खिलाफ विचार बना लेते है और फिर जब आप ग्रेनेड बरसा सकते है, आतंकियों का खुले समर्थन कर सकते है, बुरहान और अफजल के मय्यत को रिक्रूटमेंट शिविर समझ सकते है तो कुछ उद्दंड तो आपको यहाँ भी मिल ही सकते है जो कश्मीर के बारे में गलत विचार बना ले और फिर उसका खामियाजा आपको भुगतना पड़े। इसलिए बिना मतलब का चिखिये मत और सच को समझिए कि आपने जो बबूर बोया यह उसका एक छोटा सा कांटा है, अगर अब भी न सम्भले तो स्थिति आपके लिए और भयावह हो सकती है और इसके लिए दोषी भी स्वयं आप ही होंगे।
आज की तारीख़ में आप हर भारतीय को गांधी-नेहरू समझने की भूल तो बिल्कुल न करे, थोड़ा इमोशनल, थोड़ा सख्त और राष्ट्रीयता को जीता यह न्यू इंडिया है और इससे गलती न हो यह हम सब की जिम्मेदारी है अतः आप, हम सब सही से रहे…
वैसे जिन समाचार पत्रों के फेसबुक पेज ने इस खबर को प्रमुखता से छापा है उन्हीं समाचारों पर जम्मू में हुए विस्फोट को पढ़िए और खुद इनके एजेंडा को समझिए. धन्यवाद
-सन्नी कुमार ‘अद्विक

Why there is Muhammad in JeM

कुछ मासूम है मुल्क में जो पाकिस्तान को सरहद के उस तरफ समझते है, सच को समझिए पाकिस्तान मुल्क कम एक जाहिल सोंच है जो हमारे भारत में भी हजारों जगह पलता है, आस पास में ही लोगों के वक्तव्यों पर गौर फरमाइए पाएंगे सर्जीकल स्ट्राइक की पीड़ा इनलोगों ने भी महसूस की है, यह सोंच ही हमारे मुल्क का दुश्मन है और चिंता इस बात की है कि इस सोंच को रोकने के लिए इलेक्ट्रिक फेंसिंग नहीं कर सकते। यह पाकिस्तानी(जिहादी) सोंच अफ़ग़ान में भी है, इराक में भी सीरिया में भी, फ्रांस में भी और हमारे हिंदुस्तान में भी जिसने इस पूरे विश्व को खंडित रक्तरंजित करने का साजिश रचा हुआ है।
मैं किसी की भावना को ठेस नहीं पहुंचाते हुए पूछ सकता हूँ क्या कि ये जैश ए मोहम्मद नाम, जमात ए इस्लाम, ISIS की जरूरत क्यों? क्या ये साम्प्रदायिक संघठन है या मुहम्मद जी का प्रचार करती है? नहीं न! फिर तमाम आतंकी संघठनो का नाम ऐसे रख किसी सम्प्रदाय को क्यों बदनाम किया जाता है? क्या इसमें भी किसी और की साज़िश है?

कब तक हम आंख बंद करके ऑल इज़ वेल कहते रहेंगे और ख़ुद को सच से दूर रखेंगे? आज ये तमाम आतंकी संगठन किसी मुल्क के लिए नहीं, किसी मानवता या मुहम्मद के प्रचार के लिए नहीं बल्कि खुद का खौफ बेच कर अपनी सत्ता को बढ़ाना चाहते है और इनके शिकार न सिर्फ मुम्बईकर या पुणेकर होते है बल्कि इनकी जाहिलियत से पेशावर और करांची भी कांपता है, युद्ध के साथ साथ अब इनकी आर्थिक नसबंदी भी जरूरी है, आप एक जागरूक खरीददार बनिये और जाने-अनजाने ऐसे किसी पाक प्रेमी से अपने कफन खुद मत खरीदिये। हाँ खुद भी शसक्त बनिये, खून आपमें भी है, खौलने दीजिये। जय हिंद जय भारत।
सन्नी कुमार ‘अद्विक’

Pakistan Supports Terrorist outfit JeM!

इस मुल्क की किस्मत में आतंकी पड़ोसी है और मंदबुद्धि परिवार के लोग है जो इन आतंकियों का जाने अनजाने में समर्थन कर रहे। आज अभिनन्दन रिहा हो रहे है हम सब खुश है पर जो लोग उरी मे, पुलवामा में शहीद हुए वो अब लौट नहीं सकते क्योंकि पाकिस्तान के पाले कुत्ते जिनको जिहाद दिखता है हर आतंकी दहशत में, ने हमारे मुल्क के निर्दोषों को न केवल क्षति पहुंचाया बल्की इन दहशतगर्दों के बचाव में आज पाकिस्तान की सेना भरतीय सेना को चुनौती दे रही है जो शर्मनाक है और साबित करता है कि पाकिस्तान आर्मी भी आतंकियों से भरा हुआ है।
आज सोशल मीडिया में जो लोग इमरान के गुणगान कर रहे है क्या वही लोग उस दोहरे चरित्र वाले आतंकी पोषक PM से अजहर मसूद, हफ़ीज सईद की वापसी मांग सकते? मत भूलिए अभिनन्दन को लौटाना उसकी मजबूरी है वरना जिस जाहिल मुल्क ने कुलभूषण को बंदी रखा है वह इतने नाजुक माहौल में अभिनन्दन को कैसे छोड़ता? आज पीस गेस्चर की नौटंकी करने वाले पाकिस्तान और उसके समर्थक का विरोध तबतक जारी रहे जब तक वह अपने मिट्टी में आतंक को पोषता है.. हमें आज एक साथ हमारे तीनों सेनाओं को, मजबूत सरकार को और विश्व की बड़ी शक्तियों का भी आभार करना चाहिए और एक सशक्त नागरिक बनना चाहिए…क्योंकि मुल्क हमसे ही है, जय हिंद, जय अभिनन्दन!

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