विरोध कब कब?

रोहिंग्या के समर्थन में इस देश के किस शहर में सभाएं नहीं हुई, आजाद पार्क में इन्ही रोहिंग्यों के समर्थन में शहीद स्मारक को भी तोड़ दिया था वतनपरस्तो(?) ने पर सवाल है क्या फिलिस्तीन(गाज़ा) और रोहिंग्या(म्यांमार) भारत के लोग थे, नहीं थे, क्या यह जुल्म भारतीय सेना कर रही थी, नहीं?फिर उनके समर्थन में इस देश का विरोध क्यों? जवाब शायद यह हो कि यह देश का विरोध नहीं था बस उन मजलूमों के हक़ का समर्थन था? फिर इस देश की सम्पत्ति जलाने का, हमारे प्रतीक चिन्हों का हमारे भावनाओं पर हमला करने की जुर्रत और जरूरत क्यो आई??
और इन्हीं मानवतावादी लोगों से यह प्रश्न की क्या आप बताएंगे कि पाकिस्तान और बंग्लादेश जो फिलिस्तीन की तरह मिलों दूर नहीं बल्कि पड़ोस में ही है उनके यहां के अल्पसंख्यको की आवाज़ आपने कितनी बार उठाई, स्टेटिक्स क्या कहते है और इन तीनों देशो में अल्पसंख्यको के साथ सलूक का अंतर कितना है, सिर्फ गाज़ा और रोहिंग्या ही क्यों याद आते है जबकि यजीदियों की पूरी नस्ल बर्बाद हो गई है, सीरिया मुल्क है या बम की क्षमता मापने वाला भूभाग अब यह नहीं समझ आता आपकी उनपर चुप्पी क्यों? आपने कितनी बार बंगलादेशी हिंदुओं के हक के लिए, यहां तक कि कश्मीरी अल्पसंख्यको के लिए मोर्च देखे? नहीं देखे न, पर अब आप शायद देख पाए, क्योंकि यह रोग फैल गया है, अब हर चीज पहले धर्म देखकर होगा और इसकी शुरुआत सोशल मीडिया खंगाले अपने आसपास घटी घटनाओं को देखेंगे तो देर न होगा समझने में।
मैन देखा है कि पटना मुजफ्फरपुर, गया जैसे छोटे शहर में भी लोग गाज़ा के लिए सड़कों पर उतरते है, कौन होते हौ ये लोग फिलिस्तीनी और रोहिंग्यों से इनका क्या रिश्ता है, मानवतावादी है, फिर तो कुर्दो के लिए भी लड़े होंगे, मलाला की आवाज़ बुलंद की होगी, कश्मीरी अल्पसंख्यको के साथ हुए न्याय पर जश्न मनाया होगा, पाकिस्तानी अल्पसंख्यको के लिए भी चिंतित होते होंगे? नहीं! क्यों भाई क्या सेक्युलर ऐसे नही होते है?? अगर ऐसा है तो फिर मोदी-शाह तो आपके शिष्य है, आप दोनों में अंतर क्या है? खुद से पूछिए?

बहरहाल मैं CAB के पक्ष में नहीं हूँ क्योंकि हमारे आसाम के भाई-बहन इससे चिंतित है, उनका विश्वास जितना आवश्यक है, देश को यह बताया जाए कि भारत से कितने घुसपैठिये भगाए जा रहे, कितने बसाए जा रहे। मैं इसके पीछे की सोंच से संतुष्ट हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हर कमजोर को विकल्प मिले, चाहे वो कोई फिलिस्तीनी-सीरिया का मुसलमान हो, या इराक के कूर्द, या ईरान के पारसी या पाकिस्तानी हिन्दू, सबके लिए एक देश हो जो उनके उम्मीद ढो सके, मुझे यकीन है कि इस देश के रोहिंग्या मुसलमानों को हमारे पड़ोसी देश जो खुद को इस्लामिक देश भी कहते है जगह देंगे और म्यांमार में हुए उनसे अन्याय को हल करेंगे, शेख हसीना ने तो रोहिंग्यों के लिए शानदार बाते भी कहीं है अखबरों में पढ़ ले।
एक बात और ज्यादा चिंतित न हो रवीश जी की माने तो अब तक मात्र 4000 पेटिशसन है धार्मिक विस्थापितों के जो इस देश मे जगह चाहते है और यह बिल्कुल सच है कि सरकार वोटबैंक की राजनीति कर रही यह भी सच है पर उनकी इस राजनीति से जिनको फायदा मिलेगा वह वाकई में सताए गए लोग है जिनकी बहु-बेटियों को तैमूर सोंच के लोग आज भी लुटते है, जबरन धर्म परिवर्तन एक काला सच है, क्या ऐसे लोगो को जीने का हक नहीं, क्या इतनी उदारता भारतवर्ष को नहीं दिखाना चाहिए, आपको क्या ऐसा लगता है कि अन्य धर्म के लोग इस देश मे नहीं रह पाएंगे? साहब अदनान सामी को इसी सरकार न नागरिकता दी है, तारिक़ फ़तेह जिसे अब आप भारतीय एजेंट के रूप में जानते होंगे यही है ये दोनों भी पाकिस्तानी मुसलमान ही थे इनको CAB से कितना डर है, क्या उनको इस देश मे डर लगता है पूछे उनसे? तस्लीमा नसरीन को भी जब अपने मुल्क में डर लगा तो डेरा यही उदार देश देता रहा, अब आज कुछ 4000 हिंदुओं का विरोध क्यों??आपको क्या लगता है कि वो इस देश में पाकिस्तान में कोई फिदायीन हमला करके भागे है, या बर्बर है या यहाँ आकर शहीद स्मारक तोड़ेंगे या ट्रेनों में पत्थर मारेंगे?? ये दबे कुचले लोग है, रोहिंगया भी है, यजीदी भी है, सीरिया के लोग भी है, पर रोहिंगया और सीरिया के लिए 56 देश है जो खुद को इस्लामिक कंट्री कहते है पर इन हिंदुओं की आस पूरे विश्वपटल पर यही एक सेक्युलर भूभाग है, यह झूठ है क्या??

अल्पसंख्यकों से विश्व का बर्ताव

इराक में कूर्द,
पाकिस्तान में हिन्दू,
कश्मीर में पंडित,
म्यांमार में मुस्लिम,
जर्मनी में यहूदी,
अरब में काफ़िर,
अल्पसंख्यक है,
इनसे व्यवहार कैसा है,
वहां कानून कैसा है,
जिस दिन इन मुद्दों पर बहस हुई पता लग जायेगा कि जिस जन्नत की बातें पाक किताबों में है, वह मादरे वतन हिंद है, जिसने विस्थापितों को जगह दिया, मान-सम्मान दिया, वो चाहे जर्मनी के सताए यहूदी हो, या ईरान के पारसी, या पाकिस्तान-बंग्लादेश का राजनैतिक विस्थापित, इस मुल्क के आध्यात्मिक सोंच ने बौद्ध और जैन जैसे महान धर्म दिए जिनके ईकोसिस्टम को समझने की आज जरूरत है। आप जिस भाईचारे की, शांति की बात करते है उसकी प्रेरणा पूरे विश्व मे भारत जैसे देश ही देता है जहाँ कुछ टुच्चे पत्तलकार, चाटुकार और अपनी राजनीति चमकाने वाले चौधरी अल्पसंख्यक को उकसाना चाहते है, पर यह देश अगर अल्पंसख्यक का विरोधी होत तो यह देश टाटा को खो चुका होता, मनमोहन सिंह जी जैसा प्रधान न पाता, कलाम साहब ने जितना इसकी सेवा की, जिस सेक्युलर फैब्रिक को वो ओढ़ते थे वह मिसाल है, इरफान पठान और नवाजुद्दीन सिद्दकी बताये कब कब भेद हुआ उनसे, मेरे दोनो ही फेवरिट है, बाबा साहेव प्रवर्तित बौद्ध थे, उनको इस देश का संविधान गढ़ने दिया और उनका भी सम्मान करते है। आज कुछ सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों से बाहर आने का एक लक्ष्य जिसपे देश और हम अग्रसर है फिर ये हर बार माइनॉरिटी को भरमाने की क्या आवश्यक्ता?? अपना ही उदाहरण देता हुँ शुक्रवार को हाफ टाइम में छुट्टी लेने वाले सहकर्मियों के बीच मे रहा हूँ, उनकी सेवई खाई और जब उन्होंने दीवाली का लड्डु नहीं खाया तो ठगा हुआ महसूस हुआ पर इसको कितना ढोए, हम भी नफरत करे जबकि वही बहुत से और भी थे जो बैलेंस बलाना जानते थे…इसी बैलेंस को बनाये रखेंगे थोड़ा इतिहास खुद पढेंगे, तो आपको समझ आएगा कि 56 देश जो इस्लामिक है वहाँ अन्य देशों के लोगो को को यहाँ तक कि मुसलमानों को क्या हक़ मिले है, वहाँ महिला अधिकार कितने है, पर नहीं आपकी नजर इज़राइल पर है, फिलिस्तीन की चिंता में आप मुंबई उजाड़ देते है पर आप ईरान इराक़ और सीरिया पर चुप है और फिर सेव गाज़ा सेव रोहिंज्ञा के लिए सड़कों पर है। एक ओर आप 370 के विरोध में है कि कश्मीरियों के अधिकार सीमित हो जाएंगे पर पंडितों को भूल गए, खुद राहुल बाबा भी कश्मीर से अमेठी और अब तो केरल सेटल हो गए. क्या उनपर जुल्म नही हुआ?? खैर ये राजनीति है हम और आप बैलेंस कैसे बनाये इस पर सोंचे, एक समाज बाहरी मुद्दों पर कभी तख्ती नही उठाता और आप अगर जागरूक लोग है और वैश्विक मुद्दे भी उठाते है तो प्लीज कुर्दों की भी आवाज बनिये, सीरिया को भी बचाइए, अपने देश के अच्छे चीजों के लिए भी धन्यवाद दीजिये, अल्पसंख्यक कोटा में हुए वृद्धि को सराहिये, और प्लीज CAB, NRC जिसका भी विरोध या समर्थन करना है करे पर ट्रेनों पर हमला करना, एम्बुलेंस को निशाना बनाना, पुलिस के खदेड़ना शोभता है, और जब वही पुलिस पेल दे तो मजलूम हो जाना यह सही है? हम और आप बुद्धिमान बने, हम किसी मैग्सेसे की होड़ में नहीं है, गुजरात हो या गोधरा, कश्मीर 1990 का हो या 2019 का, बर्बाद हमलोग होएंगे क्योंकि Primetime वाला पत्रकार या हमारा कोई नेता लाठी नहीं खायेगा, इसलिए बैलेंस बनाये, हमारी सुरक्षा हमारी भी जिम्मेदारी है, CAB को पहले समझिए फिर समर्थन और विरोध तय कीजिये, भारत को कम्युनल बनने की राह में धकेलने से बचे यह सबकी जिम्मेदारी है!
सन्नी कुमार
मुझे आप अपने नजर से देखने के लिए स्वतंत्र है, पर एक आग्रह भी है कि खुद को भी कभी अपनी नजर में तौलिए, सब बुझ जायेगा..

किसे कहूँ क्या उलझन मन की

किसे कहूँ क्या उलझन मन की,
कौन सुने, समझेगा।
किसे बताऊं पीड़ा दिल की,
कौन फुर्सत में जो समझेगा।
सभी उलझे है अपने सपनों में,
है कौन सुलझा जीवन में।।

चिंताओं का घनघोर धुंध आज,
छाया उम्मीदों के अम्बर में,
जो चाहते है जनहित करना,
समर्थन, संसाधन नहीं, उनके संग में,
कौन साथ देगा उनका जो,
प्रयासरत जग सुंदर करने में।

किसे कहूँ क्या उलझन में,
कौन सुने, समझेगा!

© सन्नी कुमार ‘अद्विक’

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