वो सावन अब तक नहीं आया

आज अपनी ही तस्वीर देखी तो कमबख्त ये ख़्याल आया,
कि लिखते रहे औरों को इतना डूबकर कि खुद का ख्याल भी नहीं आया,
औरों को लुभाने की चाह में मैं खुद को ही भूला आया,
आज कहते है सभी अपने कि थोड़ा मैं भी मुस्कुरा लूं,
पर कैसे कि वजह लेकर वो सावन अब तक नहीं आया..
©सन्नी कुमार ‘अद्विक’

महिला दिवस को समर्पित कविता

दुनिया की ख़ास ख़बर नहीं,
मैं आज अपनी बात ही करता हूँ,
नारी का क्या मोल मेरे जीवन में,
मैं उसी पर आज कुछ कहता हूँ।

जब जीवन यह गर्भ में था,
एक नारी ने ही पाला था,
भूल के खुद के कष्टों को जिसने,
मुझे नौ महीने तक संभाला था।

जब जन्म हुआ थी वो सबसे हर्षित,
उसने ही परिचय दुनिया से करवाया था,

नजर लगे न धूप लगे,
सो ममता के आंचल में छिपाया था।
छलके होंगे उसके खुशी के आंसू,
जब मां कहकर उसे पुकारा था,
थी मेरा सर्वस्व वह नारी,
जिसने इस जन्नत में मुझे उतारा था।

बांटती है जो बचपन के किस्से,
मुझे आज भी नादान बूझती है,
बड़ी भोली है माँ मेरी,
वो आज भी ” खाना खाया” पूछती है।

शैशव में मुझे माँ ने संभाला,
बचपन की सखा बहनें भी थी,
खूब लड़े जिन रिश्तों से हम,
वो डोर बड़ी ही पक्की थी।
बहन के रुप में वह नारी,
मेरे चौखट की रौनक थी,
अब भी घर आने से जिसके,
बहार घर में आ जाता है,
है मेरी वो प्यारी बहनें,
जिनसे आंगन उपवन बन जाता है।

और फिर
जीवन बचपन की गलियों से निकल चुका था,
जवानी में अब सड़कें चौड़ी थी,
साइकिल तो कबका छूट गया,
अब मेट्रो में सफर जो करनी थी।
चकाचौंध थी सतरंगी दुनिया,
और ख्वाबों से खुद को भरमाया था,
तब मिली थी एक हसीं दीवानी,
जिस नारी ने इकरार-ए-मुहब्बत कर डाला था।
थे बड़े हसीन वो लम्हे,
जब उसने काबिल-ए-इश्क बताया था,
था तब जीता ख्वाबों को दिल से,
उसने भावों का भूचाल मचाया था।
बदल गए तब कुछ लम्हे शब्दों में,
उसने इस मूरख को शायर बनाया था,
क्या होता है मुहब्बत को जीना,
यह एहसास एक नारी ने ही कराया था।

और फिर छूटे सपने, हकीकत जब रूठा,
फिर कुछ सखाओं ने भी समझाया था,
रिश्तों को निभाते है कैसे,
यह नारियों ने ही भान कराया था,
सहेजे है जो आज पन्नों में यादें,
यह हुनर भी उनसे ही पाया था।

और फिर जब ख्वाबों से निकलकर बाहर आया,
खुद को किसी के सपने में पाया,
थी हसीन ये हकीकत ख्वाबों से ज्यादा,
मुझे जिसने अपना सर्वस्व बनाया,
था अधूरा जो जीवन में अबतक,
उसने उन खुशीयों को संभव कर डाला।

अपने ठौर को बदल के जिसने,
मेरे आंगन को है चमकाया,
कदम मिलाकर जो साथ है चलती,
वह जीवनसाथी नारी है,
दफ्तर, मकान, इलाज जो करती,
उन सब में भी नारी ही है…

संस्कार को जिसने संभाला,
वह ब्रह्माणी-रूद्राणी नारी है,
नित नए जो किर्तीमान रचती,
उन सब में भी नारी है।

रक्तरंजित इतिहास के पन्ने,
वहां वीरांगना लक्ष्मी, पद्मिनी रानी है,
भविष्य की खोज में निकलती कल्पना,
या खेलों में साक्षी, सिंधु या सायना,
देश को रौशन करती बेटियां,
कदम-कदम पर नारी है..

अस्तित्व नहीं मेरा नारी बिन,
तुमने जीवन को महकाया है,
धन्य सभी इस जग की नारी,
दुनिया जो आपने सजाया है,
करबद्ध खड़ा हूँ जो ऋण में हूँ,
आपके उपकारों ने मुझे बनाया है,
नारी तुमने जन्म दिया,
और तुमने ही मुझे संभाला है..
-सन्नी कुमार
http://www.sunnymca.wordpress.com

आप सभी ओजस्वी कल्याणियों को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभेक्षायें, नमन आप सब को। 🙏🏼

बेताब हूँ मैं

तुम्हारे आँखों में उतरने को बेताब हूँ मैं,
तुम दिल में बसा लो इंतजार में हूँ मैं,
तुमको दूंगा हर क्षण प्यार ही प्यार,
तुमसे मुहब्बत की इजाज़त मांगता हूँ मैं।
-सन्नी कुमार


प्यार जगा कर कहती हो क्यूं,
कि प्यार न करो,
आँखों को ख्वाब दिखाकर कहती हो क्यूं,
कि ऐतबार  करो,
मेरे दिल में बसती हो तुम,
तुम्हारी हसरत ही सजाता हूँ,
तुमको है खबर सब कुछ फिर भी,
कहती हो प्यार न करो।
-सन्नी कुमार

​एक प्रेमपत्र भी भेजो न!


तुम्हारे त्वरित सन्देशों से,
मैं खूब प्रफुल्लित होता हूँ,
प्रेम रस में डूबा चैटिंग,
जिसे बार बार मैं पढता हूँ,
दिख जाओ जो ऑनलाइन तुम,
झट से कुछ नया भेजता हूँ,
और जो मिल जाए फौरन जवाब मुझे,
दिल गुब्बारा हो मैं उड़ता हूँ।

दिल है दिल ये मांगे ‘ऑल’,
सो शुरू किया है वीडियो कॉल,
अब तुम्हारी प्यारी सूरत से मैं,
सुबह अपना चमकाता हूँ,
चांदनी रात में बाहर तुमसे,
घण्टो तक बतियाता हूँ..

तुम लिखती हो, मैं पढता हूँ,
तुम बोलती हो, मैं सुनता हूँ,
तुम हंसती हो, मैं खिलता हूँ,
पर तुम्हारे छुअन की हसरत,
दिल में ही रह जाती है,
महक तुम्हारे महसूस करूँ मैं
हसरत अधूरी रह जाती है..

सोंचता हूं कैसे पा लूं ये सब,
जवाब मिलता है,
तुम एक प्रेम पत्र भी भेजो न!

-सन्नी कुमार

जो हमसे रूठ बैठे है..

तारीफों के हकदार वो, क्यूँ हमसे दूर बैठे है,
शाम हुयी आज फिर जवां उनकी याद में,
जो हमसे रूठ बैठे है..

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कुछ पुराने दोहे..

ढूंढ लाते हम उनको गर वो खो जाते,
पर बदले लोगों को ढूंढना नही आता..

ग़म भी है और ख़ुशी भी,
पर वो साथ नहीं,
और वो हम नहीं..

कहते है किसी के चले जाने से जिंदगी ख़त्म नहीं होती,
पर क्या साँसों का चलना भर ही जिंदगी है?
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वो लोग, जो कल तक हमारे लिये दुआएं करते थे,
वही आज तुम्हें भुलाने की सलाह देते है..
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हर ख्वाब पूरा नहीं होता,
पर ख्वाब में कुछ भी अधुरा नहीं होता..
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मिले फिर वही जो कल भी मिले थे,
पर मिलें इस कदर कि वो बिलकुल नए थे..
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घुटता है दिल, कुछ कह भी नहीं पाता,
छोड़ गया मेरा कल, आज अब हंस भी नहीं पाता..
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क्या हस्ती है तुम्हारी..
मुहब्बत हम कर नहीं सकते और नफरत तुम करने नहीं देती..
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अब और नहीं तड़पाओ,
अब और न हमको सताओ,
मै दूर तुमसे चला जाऊं,
आखिरी बार तो मिलने आओ.
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-सन्नी कुमार

 

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