मेरे अटल जी – Narendra Modi

मेरे अटल जी – Narendra Modi

अटल जी अब नहीं रहे। मन नहीं मानता। अटल जी, मेरी आंखों के सामने हैं, स्थिर हैं। जो हाथ मेरी पीठ पर धौल जमाते थे, जो स्नेह से, मुस्कराते हुए मुझे अंकवार में भर लेते थे, वे स्थिर हैं। अटल जी की ये स्थिरता मुझे झकझोर रही है, अस्थिर कर रही है। एक जलन सी है आंखों में, कुछ कहना है, बहुत कुछ कहना है लेकिन कह नहीं पा रहा। मैं खुद को बार-बार यकीन दिला रहा हूं कि अटल जी अब नहीं हैं, लेकिन ये विचार आते ही खुद को इस विचार से दूर कर रहा हूं। क्या अटल जी वाकई नहीं हैं? नहीं। मैं उनकी आवाज अपने भीतर गूंजते हुए महसूस कर रहा हूं, कैसे कह दूं, कैसे मान लूं, वे अब नहीं हैं।

वे पंचतत्व हैं। वे आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सबमें व्याप्त हैं, वेअटल हैं, वे अब भी हैं। जब उनसे पहली बार मिला था, उसकी स्मृति ऐसी है जैसे कल की ही बात हो। इतने बड़े नेता, इतने बड़े विद्वान। लगता था जैसे शीशे के उस पार की दुनिया से निकलकर कोई सामने आ गया है। जिसका इतना नाम सुना था, जिसको इतना पढ़ा था, जिससे बिना मिले, इतना कुछ सीखा था, वो मेरे सामने था। जब पहली बार उनके मुंह से मेरा नाम निकला तो लगा, पाने के लिए बस इतना ही बहुत है। बहुत दिनों तक मेरा नाम लेती हुई उनकी वह आवाज मेरे कानों से टकराती रही। मैं कैसे मान लूं कि वह आवाज अब चली गई है।

कभी सोचा नहीं था, कि अटल जी के बारे में ऐसा लिखने के लिए कलम उठानी पड़ेगी। देश और दुनिया अटल जी को एक स्टेट्समैन, धारा प्रवाह वक्ता, संवेदनशील कवि, विचारवान लेखक, धारदार पत्रकार और विजनरी जननेता के तौर पर जानती है। लेकिन मेरे लिए उनका स्थान इससे भी ऊपर का था। सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे उनके साथ बरसों तक काम करने का अवसर मिला, बल्कि मेरे जीवन, मेरी सोच, मेरे आदर्शों-मूल्यों पर जो छाप उन्होंने छोड़ी, जो विश्वास उन्होंने मुझ पर किया, उसने मुझे गढ़ा है, हर स्थिति में अटल रहना सिखाया है।

हमारे देश में अनेक ऋषि, मुनि, संत आत्माओं ने जन्म लिया है। देश की आज़ादी से लेकर आज तक की विकास यात्रा के लिए भी असंख्य लोगों ने अपना जीवन समर्पित किया है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र की रक्षा और 21वीं सदी के सशक्त, सुरक्षित भारत के लिए अटल जी ने जो किया, वह अभूतपूर्व है।

उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था -बाकी सब का कोई महत्त्व नहीं। इंडिया फर्स्ट –भारत प्रथम, ये मंत्र वाक्य उनका जीवन ध्येय था। पोखरण देश के लिए जरूरी था तो चिंता नहीं की प्रतिबंधों और आलोचनाओं की, क्योंकि देश प्रथम था।सुपर कंप्यूटर नहीं मिले, क्रायोजेनिक इंजन नहीं मिले तो परवाह नहीं, हम खुद बनाएंगे, हम खुद अपने दम पर अपनी प्रतिभा और वैज्ञानिक कुशलता के बल पर असंभव दिखने वाले कार्य संभव कर दिखाएंगे। और ऐसा किया भी।दुनिया को चकित किया। सिर्फ एक ताकत उनके भीतर काम करती थी- देश प्रथम की जिद।

काल के कपाल पर लिखने और मिटाने की ताकत, हिम्मत और चुनौतियों के बादलों में विजय का सूरज उगाने का चमत्कार उनके सीने में था तो इसलिए क्योंकि वह सीना देश प्रथम के लिए धड़कता था। इसलिए हार और जीत उनके मन पर असर नहीं करती थी। सरकार बनी तो भी, सरकार एक वोट से गिरा दी गयी तो भी, उनके स्वरों में पराजय को भी विजय के ऐसे गगन भेदी विश्वास में बदलने की ताकत थी कि जीतने वाला ही हार मान बैठे।

अटल जी कभी लीक पर नहीं चले। उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक जीवन में नए रास्ते बनाए और तय किए। “आंधियों में भी दीये जलाने” की क्षमता उनमें थी। पूरी बेबाकी से वे जो कुछ भी बोलते थे, सीधा जनमानस के हृदय में उतर जाता था। अपनी बात को कैसे रखना है, कितना कहना है और कितना अनकहा छोड़ देना है, इसमें उन्हें महारत हासिल थी।

राष्ट्र की जो उन्होंने सेवा की, विश्व में मां भारती के मान सम्मान को उन्होंने जो बुलंदी दी, इसके लिए उन्हें अनेक सम्मान भी मिले। देशवासियों ने उन्हें भारत रत्न देकर अपना मान भी बढ़ाया। लेकिन वे किसी भी विशेषण, किसी भी सम्मान से ऊपर थे।

जीवन कैसे जीया जाए, राष्ट्र के काम कैसे आया जाए, यह उन्होंने अपने जीवन से दूसरों को सिखाया। वे कहते थे, “हम केवल अपने लिए ना जीएं, औरों के लिए भी जीएं…हम राष्ट्र के लिए अधिकाधिक त्याग करें। अगर भारत की दशा दयनीय है तो दुनिया में हमारा सम्मान नहीं हो सकता। किंतु यदि हम सभी दृष्टियों से सुसंपन्न हैं तो दुनिया हमारा सम्मान करेगी”

देश के गरीब, वंचित, शोषित के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए वे जीवनभर प्रयास करते रहे। वेकहते थे “गरीबी, दरिद्रता गरिमा का विषय नहीं है, बल्कि यह विवशता है, मजबूरी हैऔर विवशता का नाम संतोष नहीं हो सकता”। करोड़ों देशवासियों को इस विवशता से बाहर निकालने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किए। गरीब को अधिकार दिलाने के लिए देश में आधार जैसी व्यवस्था, प्रक्रियाओं का ज्यादा से ज्यादा सरलीकरण, हर गांव तक सड़क, स्वर्णिम चतुर्भुज, देश में विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्र निर्माण के उनके संकल्पों से जुड़ा था।

आज भारत जिस टेक्नोलॉजी के शिखर पर खड़ा है उसकी आधारशिला अटल जी ने ही रखी थी। वे अपने समय से बहुत दूर तक देख सकते थे – स्वप्न दृष्टा थे लेकिन कर्म वीर भी थे।कवि हृदय, भावुक मन के थे तो पराक्रमी सैनिक मन वाले भी थे। उन्होंने विदेश की यात्राएं कीं। जहाँ-जहाँ भी गए, स्थाई मित्र बनाये और भारत के हितों की स्थाई आधारशिला रखते गए। वे भारत की विजय और विकास के स्वर थे।

अटल जी का प्रखर राष्ट्रवाद और राष्ट्र के लिए समर्पण करोड़ों देशवासियों को हमेशा से प्रेरित करता रहा है। राष्ट्रवाद उनके लिए सिर्फ एक नारा नहीं था बल्कि जीवन शैली थी। वे देश को सिर्फ एक भूखंड, ज़मीन का टुकड़ा भर नहीं मानते थे, बल्कि एक जीवंत, संवेदनशील इकाई के रूप में देखते थे। “भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।”यह सिर्फ भाव नहीं, बल्कि उनका संकल्प था, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन न्योछावर कर दिया। दशकों का सार्वजनिक जीवन उन्होंने अपनी इसी सोच को जीने में, धरातल पर उतारने में लगा दिया। आपातकाल ने हमारे लोकतंत्र पर जो दाग लगाया था उसको मिटाने के लिए अटल जी के प्रयास को देश हमेशा याद रखेगा।

राष्ट्रभक्ति की भावना, जनसेवा की प्रेरणा उनके नाम के ही अनुकूल अटल रही। भारत उनके मन में रहा, भारतीयता तन में। उन्होंने देश की जनता को ही अपना आराध्य माना। भारत के कण-कण, कंकर-कंकर, भारत की बूंद-बूंद को, पवित्र और पूजनीय माना।

जितना सम्मान, जितनी ऊंचाई अटल जी को मिली उतना ही अधिक वह ज़मीन से जुड़ते गए। अपनी सफलता को कभी भी उन्होंने अपने मस्तिष्क पर प्रभावी नहीं होने दिया। प्रभु से यश, कीर्ति की कामना अनेक व्यक्ति करते हैं, लेकिन ये अटल जी ही थे जिन्होंने कहा,

“हे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना।

गैरों को गले ना लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना”

अपने देशवासियों से इतनी सहजता औरसरलता से जुड़े रहने की यह कामना ही उनको सामाजिक जीवन के एक अलग पायदान पर खड़ा करती है।

वेपीड़ा सहते थे, वेदना को चुपचाप अपने भीतर समाये रहते थे, पर सबको अमृत देते रहे- जीवन भर। जब उन्हें कष्ट हुआ तो कहने लगे- “देह धरण को दंड है, सब काहू को होये, ज्ञानी भुगते ज्ञान से मूरख भुगते रोए।” उन्होंने ज्ञान मार्ग से अत्यंत गहरी वेदनाएं भी सहन कीं और वीतरागी भाव से विदा ले गए।

यदि भारत उनके रोम रोम में था तो विश्व की वेदना उनके मर्म को भेदती थी। इसी वजह से हिरोशिमा जैसी कविताओं का जन्म हुआ। वे विश्व नायक थे। मां भारतीके सच्चे वैश्विक नायक। भारत की सीमाओं के परे भारत की कीर्ति और करुणा का संदेश स्थापित करने वाले आधुनिक बुद्ध।

कुछ वर्ष पहले लोकसभा में जब उन्हें वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सांसद के सम्मान से सम्मानित किया गया था तब उन्होंने कहा था, “यह देश बड़ा अद्भुत है, अनूठा है। किसी भी पत्थर को सिंदूर लगाकर अभिवादन किया जा रहा है, अभिनंदन किया जा सकता है।”

अपने पुरुषार्थ को, अपनी कर्तव्यनिष्ठा को राष्ट्र के लिए समर्पित करना उनके व्यक्तित्व की महानता को प्रतिबिंबित करता है। यही सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए उनका सबसे बड़ा और प्रखर संदेश है। देश के साधनों, संसाधनों पर पूरा भरोसा करते हुए, हमें अब अटल जी के सपनों को पूरा करना है, उनके सपनों का भारत बनाना है।

नए भारत का यही संकल्प, यही भावलिए मैं अपनी तरफ से और सवा सौ करोड़ देशवासियों की तरफ से अटल जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं, उन्हें नमन करता हूं।

🙏

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पाकिस्तान को दुत्कारती अटलजी की यह कविता अवश्य पढ़ें

एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्रता भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।

अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतंत्रता, अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता।
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतंत्रता, दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो, चिनगारी का खेल बुरा होता है।
औरों के घर आग लगाने का जो सपना, वो अपने ही घर में सदा खरा होता है।

अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो, अपने पैरों आप कुल्हाड़ी नहीं चलाओ।
ओ नादान पड़ोसी अपनी आंखे खोलो, आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।

पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है? तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई।
अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं, माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई ?

अमेरिकी शस्त्रों से अपनी आजादी को दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो।
दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से तुम बच लोगे यह मत समझो।

धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो।
हमलों से, अत्याचारों से, संहारों से भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो।

जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार, अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
स्वातंत्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे अगणित जीवन यौवन अशेष।

अमेरिका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध, काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा।

-भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी

Ideas that can bring change in India (Judiciary Special)

*Judiciary should also come under CPA (Consumer Protection Act)*

👉🏼In the Salman Khan hit and run case the LOWER court judge and the HIGH court judge had the SAME pieces of EVIDENCE to deal with.

👉🏼They also had the SAME Indian LAW to abide by and most probably they had similar education qualifications too.

👉🏼Yet they INTERPRETED the situation in absolutely CONTRASTING manner and gave verdicts which are poles apart.

👉🏼Just imagine what would have happened if a YOUNG doctor sitting in a GOVERNMENT hospital doctor catering to hundreds of patients in a day had diagnosed a celebrity patient presenting with gastric discomfort as GASTRITIS and another hospital had LATER on diagnosed that patient to be having a MYOCARDIAL INFARCTION. I am sure that doctor would have been screwed and jailed.

👉🏼A JUDGE gets YEARS to decide on a case
unlike a DOCTOR who is expected to diagnose and treat everything in the BLINK of an eye.

👉🏼If a doctor making a wrong diagnosis can be prosecuted shouldn’t a judge giving wrong verdicts meet the same fate?

👉🏼If hospitals can be sued for not admitting poor patients shouldn’t the courts be prosecuted for having lacs of impending cases?

👉🏼Is it not appalling that a judge taking 12 years to give a wrong verdict gets away unhurt and a doctor making one mistake is screwed by our legal system?

👉🏼Doctors practice medicine which is more of an art than an exact science whereas law is absolutely 100% manmade, yet doctors are expected to be right on all occasions.

👉🏼If doctors and hospitals have a duty towards the society then does the judiciary not have a responsibility towards the socitey.

👉🏼If there is so much of hue and cry in media about doctors and hospitals charging huge sums from patients then why do we not ever hear a word on the fee that lawyers like Manu singhvi and Jethmalani charge for their court appearances.

👉🏼Government often talks about putting a capping on the fees doctors charge for various procedures but their is no talk of putting a capping on the fee that these lawyers charge to get justice for their clients.

👉🏼If health is a citizen’s right then so is justice. Shall we take our minds off worshipping false heroes & think?

*JUDICIARY SHOULD ALSO COME UNDER CPA (CONSUMER PROTECTION ACT)*

Please share if you agree.

Two Indians concept.

(Forwarded as received)

HO NA HO/ जिन्दगी

नज़रों से नज़रें मिलीं,
दिल ने दिल से बात की ‘
शब्द अर्थहीन लगें
हों ना हों |
मन मिले, मिले विचार,
आत्मा से आत्मा,
तन की बिसात क्या ,
हो ना हो |
दोनों ने एक दूजे को,
प्यार दिया, मान दिया
सौगातों की दरकार क्या ,
हों ना हों |
दोस्ती जनम जनम की,
जिन्दगी भी जी ही लिए
मौत से अब डरना क्या ,
हो तो हो |

सीपियाँ/Indira's Hindi blog

नज़रों से नज़रें मिलीं,
दिल ने दिल से बात की ‘
शब्द अर्थहीन लगें
हों ना हों |
मन मिले, मिले विचार,
आत्मा से आत्मा,
तन की बिसात  क्या ,
हो ना हो |
दोनों ने एक दूजे को,
प्यार दिया, मान दिया
सौगातों की दरकार क्या ,
हों ना हों |
दोस्ती जनम जनम की,
जिन्दगी भी जी ही लिए
मौत से अब डरना क्या ,
हो तो हो |

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आजादी के असली नायक कौन ⇄ काँग्रेस या गुमनाम कर दिये गये सेनानी व शहीद ?

यह लेख मैं परम आदरणीय नेताजी सुभाषचंद्र बोस के रहस्यात्मकता से गायब हो जाने के पश्चात बने जाँच आयोगों की तथाकथित सार्थकता, गंभीरता व सत्यता का विश्लेषण करते हुऐ शुरू करूँगा जिसके अंतर्गत काँग्रेस और इसके पुरोधाओं के असली कुरूप व निकृष्ट चरित्र का यथासंभव किंतु ऐतिहासिक सबूतों सहित तथ्यात्मक पोस्टमार्टम ही किया जाना है। ▼

★ देश आजाद होने के बाद संसद में कई बार माँग उठती है कि कथित विमान-दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए सरकार कोशिश करे। मगर प्रधानमंत्री नेहरूजी इस माँग को प्रायः दस वर्षों तक टालने में सफल रहते हैं। भारत सरकार इस बारे में ताईवान सरकार (फारमोसा का नाम अब ताईवान हो गया है) से भी सम्पर्क नहीं करती।

अन्त में जनप्रतिनिगण जस्टिस राधाविनोद पाल की अध्यक्षता में गैर-सरकारी जाँच आयोग के गठन का निर्णय लेते हैं। तब जाकर नेहरूजी 1956 में भारत सरकार की ओर से जाँच-आयोग के गठन की घोषणा करते हैं।

लोग सोच रहे थे कि जस्टिस राधाविनोद पाल को ही आयोग की अध्यक्षता सौंपी जायेगी। विश्वयुद्ध के बाद जापान के युद्धकालीन प्रधानमंत्री सह युद्धमंत्री जेनरल हिदेकी तोजो पर जो युद्धापराध का मुकदमा चला था, उसकी ज्यूरी (वार क्राईम ट्रिब्यूनल) के एक सदस्य थे- जस्टिस पाल। मुकदमे के दौरान जस्टिस पाल को जापानी गोपनीय दस्तावेजों के अध्ययन का अवसर मिला था, अतः स्वाभाविक रुप से वे उपयुक्त व्यक्ति थे जाँच-आयोग की अध्यक्षता के लिए।
मगर नेहरूजी को आयोग की अध्यक्षता के लिए सबसे योग्य व्यक्ति शाहनवाज खान नजर आते हैं।

शाहनवाज खान- उर्फ, लेफ्टिनेण्ट जेनरल एस.एन. खान। कुछ याद आया?

Source: आजादी के असली नायक कौन ⇄ काँग्रेस या गुमनाम कर दिये गये सेनानी व शहीद ?

बिहार चुनाव में चारामेल

बिहार को जो पहचान बुद्ध, महावीर, चाणक्य, आर्यभटट, मौर्य, अशोक, शेरशाह, राजेन्द्र प्रसाद, दिनकर, जयप्रकाश न दिला पाये वह पहचान हमारे लालटेन मार्का लालू जी ने दिलवाया, इनके और इनकी पांचवी पास बीबी के 15 साल के राज में बिहार ने इतनी तरक्की की की सारे बिहारियों के रोजगार का प्रबन्ध बिहार में ही हो गया… 90 से 2005 तक में तो बिहार के अंदर रोजगार के इतने अवसर पैदा हुए की हर हुनरमन्द बिना किसी ख़ास लागत के अपना उद्योग स्थापित कर सकता था, अब उद्योग कई थे पर अपहरण में नवयुवक दूरदृष्टी कुशल युवकों का विशेस ध्यान था.
बिहार पुरुष लालू जी के राज में किसान इतने कर्मठ और जुझारू हुए की रणवीर सेना जैसी देशभक्त सेना वो भी खुद के पैसो से बना ली, नक्सली तब एक दम शांति प्रिय हो गए, गरीबों के यहां इतने धन हुए की हमने विश्व बैंक को भी उधार दिया, उस दौर में जो भी बिहारी बिहार से बाहर रहे उनसे पूछिये उनकी कितनी इज्जत होती थी बाहर में और वो कितने फक्र से अपनी पहचान बताते थे..
खैर 15 साल के इस बेहद सफल साशन के बाद भाजपा और जदयू साथ में चुनाव लड़ी और लालू जी को धोखे से हरा दिया गया, उस महान आदमी पर चारा चोरी का लांछन लगा, कोर्ट पे टिपण्णी नहीं पर ये भाजपा, जो फासिस्ट है की साजिश थी और आज लालू को ईमानदार और साफ़ चरित्र होने का प्रमाण पत्र युग के सर्वश्रेष्ठ ईमानदार केजरीबवाल द्वारा जारी किया चूका है इसलिए अब लालू जैसे महान व्यक्ति पर कोई टिका टिपण्णी की गुंजाईश नहीं।
चलिए बात करते है लालू के बिछड़े मित्र विकास पुरुष श्री नितीश की जो थोड़े भटक गए थे, साम्प्रदायिक जुमलेबाज भाजपा के समर्थन से दो चुनाव जीत मुख्यमन्त्री बने पर मोदी जैसे फासिस्ट के प्रधानमन्त्री बनते ही उन्होंने मुख्यमन्त्री की कुर्सी तोड़ी और मांझी को पदासीन किया और फिर लालू जी के सुझाव से बिहार में विकास की बहाली के लिए मांझी को गद्दी से कान पकड़ उठा खुद बैठे.. नितीश जो कभी बहक गए थे और भाजपा के साथ बिहारीयोन को बहका लालू जैसे महान नेता के खिलाफ बोलते थे वो आज सब समझ गए है और कॉंग्रेस्स और लालूजी की मदद से बिहार में पुनः विकास और बिहारियों की खोयी पहचान वापस दिलाने के लिए प्रयासरत है इसलिए मित्रों जुमलेबाज भाजपा के बात में न फंसे, नितीश जी आज प्रायश्चित करना चाहते है, कांग्रेस के पप्पू और आपके अपने महानतम नेता श्री लालू को न केवल वोट दे बल्कि साबित करे की बिहार क्या चीज है, हम अव्वल है और केरल सबसे पीछे, धन्यवाद लालूजी, धन्यवाद राबड़ी जी और हाँ नितीश अगली बार भाजपा के इर्द गिर्द भी फटके तो फोड़ दूंगा…
जय चारा,
जय जातिवाद,
जय बिहार

-सन्नी

Avichal : अविचल

अविचल

Bhav-Abhivykti

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है जग वालों का काम यही, वो उर में संशय भर देंगे |

मत भूल पथों के शूल तुझे, पग पग विचलित कर देंगे ||

तम घोर निशा के नैराश्य में, पथ ना दिखाई देगा फ़िर,

स्वरों के प्रचण्ड प्रभंजन में, कुछ ना सुनाई देगा फ़िर |

विपदा तडित और गर्जन भी, पल-पल तुझको डर देंगे |

मत भूल पथों के शूल तुझे, पग पग विचलित कर देंगे ||

संशय, दुविधा के सागर में, डगमग निर्णय नैया डोलेगी,

घोर असमंजश की उठ उठ लहरें, तेरे साहस को तौलेगी |

संकट के चक्रावातों को बस, तेरे धैर्य, शौर्य ही उत्तर देंगे,

मत भूल पथों के शूल तुझे, पग पग विचलित कर देंगे ||

अड़चन गिरी सी आकर सन्मुख, पथ तेरा अवरुद्ध करेगी,

अथाह गर्त की गहराई सी, नाकामी अतिशय क्षुब्ध करेगी |

अवसरवादी प्रतिकूल तेरे हो, अपने और मुखुर स्वर देंगे |

मत भूल पथों के शूल तुझे, पग पग विचलित…

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