उनके इकरार की बातें

उनके साथ जो गुज़ारे, उस शाम की बातें,
वो निश्छल-निगोड़ी, इज़हार-ए-इश्क की बातें,
आज मौसम ने फिर बहाई है जो मिलन की बहार,
तो याद आईं हमें, उनके इकरार की बातें।

वो जो साथ थी मेरे, उनके यकीन की बातें,
वो जो उतर गई साँसों में, उस एहसास की बातें,
आज शहर में फिर मन रहा है जो इश्क का त्योहार,
तो याद आई हमें, उनके इकरार की बातें।

थी बहुत खास जो उस हंसी रात की बातें,
जलन चाँद को जिससे उस बेदाग की बातें,
आज फिर इश्क ने जो है दुनिया को संवारा,
तो याद आई हमें, उनकी कही-अनकहीं बातें।

उनके साथ जो गुज़ारे, उस शाम की बातें,
वो निश्छल-निगोड़ी, इज़हार-ए-इश्क की बातें,
आज मौसम ने फिर बहाई है जो मिलन की बहार,
तो याद आईं हमें, उनके इकरार की बातें।
-सन्नी कुमार

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मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों

(१)
न गीताग्रंथ जपता हूँ,
न आयत-ए-क़ुरआन रटता हूँ,
मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों,
नेकी को सजदा करता हूँ।

है किसी को दीन की चिंता,
किसी को धर्म का है ख्याल,
मैं आशिक हूँ मेरे यारों,
दिलों की बात करता हूँ।

न जन्नत की मुझे ख्वाहिश,
न जहन्नुम का डर सताता है,
मैं ख्याली हूँ मेरे यारों,
ख्वाबों से हक़ीक़त सजाता हूँ।

कोई है ढूंढता रब को,
कोई ईश्वर से आस रखता है,
मैं मिलता हूँ जिससे भी,
उसी में रब ढूंढ लेता हूँ।

न गीताग्रंथ जपता हूँ,
न आयत-ए-क़ुरआन रटता हूँ,
मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों,
प्रकृति से प्रेम करता हूँ।

है मेरी भावनाएं जो जिंदा,
तकलीफों को जान लेता हूँ,
वो जो कुछ कह नहीं सकते,
मैं उनकी बात करता हूँ।
©सन्नी कुमार

कल मुझसे दूर चली जायेगी

वो जो अक्सर कहा करती थी
कि उसे मेरा चैप्टर नहीं बनना,
वो जिसको एक कामयाब किताब बनाने की हसरत थी मेरी,
वो हकीकत अब महज एक ख्वाब बनकर रह जायेगी।

वो जिसके जिक्र से महकता रहा हूँ मैं,
कल मुझसे दूर चली जाएगी,
मेरी किताब, मेरी हसरत, मेरा ख्वाब, मेरी हकीकत,
कल से सब अधूरी रह जायेगी,
कल तक जो मेरी थी, कल मुझसे दूर चली जायेगी।
-सन्नी कुमार

जरूरी है मुहब्बत का होना

किसी से बिछड़कर मुझे, मिलने का हुनर है आया,
खोकर ‘खुद’ को मैंने, मेरे खुद को है पहचाना..
वो एक थी कभी जिसके, अरमां दिल में बसते थे,
आज उसी के अक्श को मैंने, जर्रे-जर्रे में है बसाया..
नहीं खबर ये मुहब्बत है या कोई नई दीवानगी,
पर सच है लगता मुझे अब, निर्मोही मोह समझ आया..
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खैर किसी से बातों-बातों में, कुछ बातें निकली थी,
था चर्चा मुहब्बत का सो, दिल भावों से पिघला था,
उकेरे जो मन के भाव उसने, उसे शब्दों ने सहेजा था,
कि उसने पूछा जब मुहब्बत का परिचय,
मैंने कुछ ये सब कह डाला था….
“ये मुहब्बत ही तो है जो जीना सिखलाती है,
हर रात ख्वाबों में बहलाकर, उम्मीदों का सवेरा ले आती है…

मुहब्बत आँखों का हो या भावों का,
जज्बातों का या ख्यालातों का,
ये मुहब्बत चाहे जैसा हो, जिससे हो,
करने वाले को खूब बनाती है,
छूट जाए गर मीत तो ये शायर बनाती है,
और जो मिलन हुआ मुहब्बत में तब,
जिंदगी जन्नत बन जाती है,
बड़ा जरूरी है मुहब्बत का होना,
कि ये आदम को इंसान बनाती है।”
-सन्नी कुमार

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