हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है

हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है,
वो आकर अपनी मुस्तैदियों के चर्चे चलाते है,
आभार करूं या उपहास, उत्साही राहगीरों का,
जो पथप्रदर्शक को ही ‘चले कैसे’ सीखाते है।

‘काम के चर्चे को’ काम समझने वाले,
अक्सर बत्तखों से बेहतर मुर्गियों को बताते है,
आज हर ओर है छाया, कलियुग का घटा घनघोर,
जहाँ मक्कार, मासूमों पे मितव्ययिता की वृष्टि कराते है।

जिन नक्कारों के क़िस्से छिप गए है धूलों से,
उनको अब आँधियों का है डर नहीं, तभी औरों को सफलता के सूत्र बाँटते है,
बड़ी गहरी है मन में क्षोभ, पर कहो किससे कहूँ अद्विक,
वो मैं जिसका होके बैठा हूँ, वही सब मुझको गैर समझते है।

यूं तो हम भी कोई हरिश्चंद्र न है, न हो सकते,
पर जो मुझसे भी है घाघ, आजकल सत्संग के तम्बू लगाते है।
मेरे कविता में जब भी शब्द, जलते है पीड़ा में,
ताज़्जुब है कि सुनकर भी आह नहीं, सबके ‘वाह-वाह’ निकलते है।

हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है,
वो आकर अपनी मुस्तैदियों के चर्चे चलाते है,
आभार करूं या उपहास, उत्साही राहगीरों का,
जो पथप्रदर्शक को ही ‘चले कैसे’ सीखाते है।
© सन्नी कुमार

आपके सही सलाह ही मुझसे मेरा बेहतर निकलवा सकते है तो प्रार्थना है खुले मन से अपनी प्रतिक्रिया दे। आपका स्नेहाकांक्षी 🙏

गाँधी

गांधीजी बेशक राष्ट्रपिता नहीं हो सकते क्योंकि राष्ट्र सबका पोषक और सर्वोच्च है इसलिये गांधीजी को भी राष्ट्रपिता कहना अन्याय है। और मुझे यक़ीन है कि बापू की भी कभी ऐसी इच्छा नहीं रही होगी पर हाँ यह हमारा उनके लिए प्यार था जो उनको किसी ने महात्मा तो किसी ने बापू कहा। उनके बारे में तत्कालीन बुद्धिजीवियों ने एक भविष्यवाणी की थी कि आनेवाली पीढ़ी इस पुरोधा, इसके तरीकों का यकीन नहीं करेगी। लोग यह यकीन नहीं कर पाएंगे कि अहिंसा में इतना बल सम्भव है और कोई यह मानने को तैयार नहीं होगा कि कुछ सालों पहले ही साबरमती के एक अर्धनग्न सन्त ने अहिंसा के बल पर अंग्रेजों को देश से भगाने में सबसे अहम भूमिका निभाई होगी। आज महज 70 सालो में ही उन बुद्धिजीवियों की भविष्यवाणी अंशतः सत्य साबित होने लगी है।

आज जब हम उस महान व्यक्ति का जन्मदिन मना रहे है, सरकारी छुट्टियों का घर मे आनन्द ले रहे है तो हममें से ही बहुत लोग इस इस समय का उपयोग उसी बापू को प्रश्नों के घेरे मे घेड़ने केलिए कर रहे है जो काफी चिंतनीय है। आप जो कोई भी गोडसे को महान बताते है और जिनका मन गांधी के प्रति कोई सम्मान नहीं रखता उन सबसे क्या मैं यह जान सकता हूँ कि क्यों आखिर गांधी अकेले इस विभाजन के लिए दोषी ठहराये जाते रहे है, क्या उनको विभाजन का दुःख नहीं था? देश जानता तो है न कि आजादी के समय मे गांधीजी कहाँ और क्यों थे?इस आजादी से उनको क्या हासिल हुआ? क्या उन्होंने आपसे कहा कि आप उनको महात्मा, बापू, राष्ट्रपिता का सम्मान दे या केवल नोट पे छाप उनके विचारों को बिसरा दो? अरे वो तो जिस वैमनस्य से आपको दूर रखना चाहते थे उसी ने उनकी ईहलीला समाप्त कर दी।

मैं खुद गांधी से कभी पूर्णतः सहमत नहीं हो सकता और मानता हूं कि विभाजन के वक्त किसी भी देशभक्त का विरोध नहीं करना, प्राणों की आहुति न देना अचंभित करता है। मन में आज भी प्रश्न उठते है कि अगर 47 में नेताजी जीवित होते, भगत, आजाद होते तो क्या होता? क्या स्थूति रही होगी, आजाद हिंद फौज के जवानों के मन की स्थिति क्या रही होगी, लाखों लोगों के जान माल के नुकसान के बाद देश ने कैसे खुशी मनाया होगा? पर इन प्रश्नों के लिए, उस अव्यवस्था के लिए गांधी कतई जिम्मेवार नहीं थे और यह एक और यकीन है कि उनको इसका सर्वाधिक दुःख हुआ होगा। जो लोग उन दंगों में मरे उनको सरकार ने भुलाया यह बेशक निंदनीय है पर तब क्या हमारा देश, तात्कालिक नेता आज इतने परिपक्व थे?
आज देश में वैमनस्य शिखर पर है, भारत बंद जिसकी झांकी भर है और ईश्वर ने करे पर यह जिस तेजी से समाज मे खाई पैदा कर रही है वैसे में गृहयुद्ध तक के सम्भावनाओं को नकारा नहीं जा सकता क्यों?

आज देश के पास दो मॉडल है, गांधी मॉडल और अम्बेडकर मॉडल। गांधी मॉडल हमने आजतक अपनाया नहीं और अम्बेडकर मॉडल 70 सालों से स्थिति को यथावत रखे हुए है और आप माने न माने देश को आरक्षण नुकसान उठाना पर रहा है। कुछ लोग गांधीजी पर इसलिए भी प्रश्न उठाते है क्योंकि गांधी का समाज से छुआछूत खत्म करने का प्रयास अम्बेडकर से अलग था। उन्होंने देश के लोगों को अम्बेडकर से विपरीत गाँव की ओर रुख करने को कहा, छुआछूत हटाने के लिए खुद आगे आये, सत्याग्रह की पहल की और आज के दलितों को हरिजन की संज्ञा दी और प्रभु का दूत तक कहा जो आजतक कुछ लोगों को नागवार गुजरता है और वही बुद्धिपिशाच लोग खुद को बहुजन कह इठलाते है। मैं आज यह नहीं पूछूंगा की कैसे हरिजन गाली और बहुजन सम्मानित शब्द हो जाता है। पर गांधीजी की नियत पर शक का अधिकार किसी कुपढ को नहीं होना चाहिए और गांधी का विरोध इसलिए तो बिल्कुल नहीं कि उनका रास्ता सबसे अलग था।

गांधीजी ने समाज में समरसता की बात की, खुद के साथ-साथ औरों का मैला भी खुद उठा लेते थे, छुआछूत न मानते थे न मानने देते थे और इसपर एक बार उन्होंने कस्तूरबा जी को भी खड़ी-खड़ी सुनाया था जब उन्होंने गांधीजी के इन निम्न कार्यों पर प्रश्न उठाया था।

जरा विचारिये गांधीजी के उस साधुत्व के आगे कितने लोग ठहर पाएंगे? वह कैम्पों में सबसे पहले उठ औरों के कचड़ों की, बर्तनों की सफाई करते थे जबकि उस दौर में वह हिंदुस्तान के सबसे लोकप्रिय चेहरे थे और चाहते तो नीली सूट उनको भी रोज शोभता पर उनको इस बात का दर्द था कि देश की आधी आबादी को कपड़े नहीं है सो उन्होंने भी कम कपड़े पहनने शुरू कर दिए। कुछ तो विशेष था, अद्भुत था कि नेताजी ने कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद जीत कर भी बस गांधीजी के मन को रखने के लिए पद और कांग्रेस का त्याग कर दिया पर उसके बाद भी गांधी को दिल मे बसाए रहे और उनके प्रति सम्मान हमेशा रहा।

आज अगर भारत ने गांधी के समरसता के मॉडल को कबका नकार दिया है, पिछड़े लोगों को हरिजन कहाने पर शर्म होता है, गाँव की परंपरागत दक्षता, काम छूट गए है, स्वरोजगार की चटाई को कॉरपोरेट के कार्पेट ने हरा दिया है, मिट्टी के बर्तन चीनी बर्तनों से हार गए है और गांधीजी जिस डिस्ट्रिब्यूटिव सिस्टम की कल्पना करते थे उसको भी साम्प्रदायिक और सत्तालोभियों कि गोली लग चुकी है। जो नियम गांवों से बनने थे, जिन पंचायतों को दिशा देना था उसपे लालकिला की जिद थोपा जाने लगा है और स्वराज का सपना आजतक और शायद हमेशा अधूरा रहेगा।

आज निसन्देह अम्बेडकर का कद बढ़ा है, उन्होंने शहरों की ओर चलने को कहा था और वो सफल है क्योंकि हर गांव पलायन से ग्रस्त है। गांधी के भक्त मिलते नहीं और भीम आर्मी हर ओर देश सेवा के लिए भारत बंद को प्रतिबद्ध है।

आज देश नेहरू, गोडसे या अम्बेडकर से प्रश्न नहीं करता, क्यों? क्या आजादी के वक्त, विभाजन के वक्त सिर्फ गाँधी थे, निर्णय उनका ही था? दरअसल गांधी पर निशाना इसलिए है क्योंकि उनके विचार, नई क्रांति को जन्म दे सकते थे, हिन्दू परिवार जो आज बीखड़ गई है उसको एक कर सकते थे! स्वराज होने से लालकिला की दीवारें, इसके लाउडस्पीकर कमजोर पड़ जाते इसलिए आरामपसंद सत्तालोभियों का इस सन्त पर निशाना लाजिमी है पर क्या हम अपने युवा मित्रों से उम्मीद नहीं कर सकते कि वो इस फेकबुक और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के परिधी से बाहर निकलकर शोध करे, बिना किसी एजेंडे को उस सन्त को पढ़े और उसके विचारों को तौले और फिर अपना निर्णय ले?
बेशक वह भी इंसान थे, बूढ़े हो गये थे अपनों में फंसे थे और क्षोभ में थे तभी तो जब देश जश्न मना रहा था वो अंधेर कोठरियों में कैद रहे। सवाल है, आखिर मोहन दास ने गांधी बन कर क्या पाया? वह जिस देश की कल्पना करते थे उस देश ने तो उनको नोटों पे छापकर उनका ही भ्रस्टाचार के लिए प्रयोग किया और कुछ अधीर गोडसे टाइप लोगों ने उस वयोवृद्ध के सीने में लोहे ठोक कौन सा जग जीत लिया? क्या वो अकेले विभाजन के दोषी थे? क्या उन तीन गोलियों ने राष्ट्र की समस्याएं समाप्त कर दी? क्या हिन्दू मन जो हिन्द से भी बड़ा होने का दम्भ भरता है जिसके सार में वसुधैव कुटुम्बकम है ने उस रोज एक सन्त को मार गर्वित हुआ था? बेशक नहीं, महात्मा गाँधी राष्ट्र के सच्चे सपूत थे जो आखिरी क्षणों में भी पछतावे से रुकसत हुए और लोगों की मानसिकता देख जो बोल निकले वो ‘हे राम’ के थे जिसको समझना मुश्किल नहीं है।

गांधीजी ने क्या त्याग किया, क्या पाया यह शोध का विषय है पर देश के ही बर्बादी के नारे लगाने वाले कुपढ़ छात्रों को इतना वक्त है क्या?

आज आप होते तो आपसे कहता हैप्पी बर्थडे बापू!पर अब जो कहना है वो है कि थोड़ा ही सही मुझमें जिन्दा रहोगे तुम! लभ यू।

जय हिंद!

©सन्नी कुमार

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