कोई करिश्मा तुझमें है

ऐसा क्यूं है कि जो खोया था कभी उसका अक्स तुझमें है,
ये मुहब्बत की आदत मेरी है या कोई करिश्मा तुझमें है…
-सन्नी कुमार
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क्या इंसान भी फलों सा होता है?
जो बाहर से ज्यादा मीठा वो अंदर से सड़ा होता है??
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तुम याद आती हो अब भी रोज़, पर फिर मैं भुला देता हूँ,
दिल चाहता है तुमसे रूबरू होना, पर हसरतों को दिल में दबा देता हूँ,
आज भी उलझता हूँ, उन रूठे ख्वाबों को सहेजने में,
पर अब हकीकत की खुशी है इतनी,
कि जिन्दगी को कर शुक्रिया, बस मुस्कुरा देता हूं…
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क्यूं संवरती हो उस आईना को देखकर,
संवरा करो तुम इन आँखों में झांककर,
आइना जिससे मिले उसी का हो जाता है,
और ये आँखें है जो सिर्फ तुमको बसाता है..

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क्यों मुस्कुराता हूँ तुमको देख..

IMG_20170528_213434.jpgक्यों मुस्कुराता हूँ तुमको देख,
क्यों रखता हूँ मैं तुमसे आस,
कभी बैठो फुर्सत में पास,
मैं तुमसा ही तो हूँ…

जैसे तुम्हारी जुल्फें शरारती,
वैसे ही मेरा मन,
जैसे तुम्हारी नज़रें लुभाती,
वैसे ही मेरे शब्द,
जैसे तुमको अपने है प्यारे,
वैसे ही मुझको ख्वाब,
जैसे तुमको बच्चे रीझाते,
वैसे ही मुझको बचपन,
जैसे तुम्हारी जुल्फें है नटखट,
वैसे ही मेरा मन….
-सन्नी कुमार ‘अद्विक’

क्या इजाजत है तेरी…. (Some Random Posts…)

IMG_20170724_163431ख्वाब में देखूँ तुम्हें यही अब हसरत है मेरी,
तुम आओगी क्या कह दो,
कि मुझे जरूरत है तेरी,
पढूं नज़रों को तुम्हारे,
लिख दू्ं दिल, तुम्हारे हवाले,
महका लूं तुम्हारे जिक्र से तन-मन,
कहो क्या इजाजत है तेरी… 😍😜
-सन्नी कुमार ‘अद्विक’

आईना और मैं

क्यूं संवरती हो उस आईना को देखकर,
संवरा करो तुम इन आँखों में झांककर,
आइना जिससे मिले उसी का हो जाता है,
और ये आँखें है जो सिर्फ तुमको बसाता है..
-सन्नी कुमार

यही एक फरियाद करता हूँ..

IMG-20170327-WA0004ये खबर अब मुझे भी नहीं,
कि मैं तुमसे क्या कुछ कहता हूँ,
जब आती हो सामने तब,
कब मैं होश में रहता हूँ…

चाहता हूँ कहूं तुमसे वो सब,
जो तुम्हारी आँखों में पढता हूँ,
पर कहो कैसे कहूं,
जो तुम्हारे सामने निशब्द होता हूं…

भाता है मुस्कुराना तुम्हारा,
तभी वे लम्हे नज़रों में कैद करता हूँ..
मुस्कुराओ हरवक्त अब तुम,
ऐसी कोशिश करता हूँ…

मैं  कहूं और तुम सुनो,
ऐसे ही ख्वाब रखता हूँ,
शब्द मेरे लुभाते नहीं शायद,
सो अपनी खामोशी से भी उम्मीद रखता हूँ,
बयां हो जाए मुझसे हाल-ए-दिल,
यही एक फरियाद करता हूँ..
-सन्नी कुमार

[This poem is for someone special who makes me feel good n supporting like a good friend. Gem u already knw it’s(all d lies) for u]

ये विष किसने फैलाया है

आजाद हिन्द की आवोहवा में,
ये विष किसने फैलाया है,
क्रांति के बहाने राष्ट्र में,
सत्तासुख को बस पाया है।

आजादी को हथियार बनाकर,
राष्ट्रीय अखंडता को आघात पहुंचाया है,
शिक्षा के मंदिर को किसने,
उन्मादी विषविद्यालय बनाया है?

अधिकारों का बहाना बताकर,
अश्लीलता समाज में फैलाया है,
संस्कृति का घोट गला कल,
किसने ‘किस आफ लव’ मनाया है?

सौहार्दपूर्ण माहौल था किसने,
फिर बीज फूट का डाला है,
है वो किनके नाजायज़ औलाद,
जिन्होंने राष्ट्र विरोधी नारा लगवाया है?

अपने राजनीति को चमकाने के चक्कर में,
किसने गजेन्द्र को लटकाया है,
लाज बेचकर सत्तासुख पानेवालों,
कहो कौन सी कीर्ति रचाया है?

आजाद हिन्द की आवोहवा में,
ये विष किसने फैलाया है,
गरीबी से लड़ने का ढोंग रचाकर,
गरीबों के हक को ही मारा है।

किसानों संग तस्वीर खींचाकर,
दिल्ली में उल्टे महंगाई का शोर लगाया है,
सत्ता का रास्ता खुला रहे सो,
आरक्षण को मुद्दा बनाया है।
समानता को फांस लगाकर,
किसने आत्मनिर्भरता को कुल्हाड़ी मारा है??

-सन्नी कुमार
(more to add)
sunnymca.wordpress.com

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