रश्मि को रश्मि रहने दो

उसकी अच्छी बातें,
उसकी हाथों पर कलेवा,
उसका नाम, उसका प्यार,
सब फ़रेब निकला..
उसके इश्क़ में डूब कर,
मैंने क्या-क्या न किया,
मेरे वसूल, मेरा विश्वास बदला,
हर रिश्ते-नातेदार बदला,
और जिसके साथ कि खातिर मैंने खुद को बदला,
वह इश्क़, वह आशिक़, उसका नाम तक झुठा निकला..

खैर,
तब माँ मेहंदी के गीत संजो रही थी,
बापू रिश्ते नए रोज ढूंढ रहे थे,
भाई तैयारियों में लगा हुआ था,
और मैं उसके प्यार में डूब गई थी..
सोचा समझा लूंगी माँ को,
बापू रोयेंगे तो मैं मना लुंगी,
भाई के डांट को सर झुका मैं सह लुंगी,
जो न माने मैं रिश्ते तोड़, नए प्यार संग मैं रह लूंगी..

तब बड़ा गुमान था उसके इश्क पर,
उसकी प्यार भरी बातें और अधूरे सच पर,
नहीं पता था अब हल्दी मेरी छीन जाएगी,
सिंदूर बिंदी न मिल पाएगी,
मां का दिया नाम, बापू के पहचान बदल जाएंगे,
आस्थाओं की अर्थी सजाकर,
मैं रश्मि, रजिया बेगम जब बन जाऊंगी,
तब पढ़ कलमा उसके नाम की डोली मैं चढ़ पाऊँगी..

पर रुको क्षणिक, जरा विचार करो,
मेरे ‘कुबूल है’ से पहले बस ये जवाब दे दो,
क्या ये इश्क सिर्फ मेरा है,
क्या ये मिलन की ख्वाहिश बस मेरी है,
गर नहीं तो क्या तुम भी संग हवन करोगे,
मेरे इष्ट के प्रसाद क्या तुम भी मेरे संग भोग करोगे?

नहीं करोगे जानती हूं,
न मैं तुमसे ये सब चाहती हूँ,
बस तुम मेरे प्रेम को प्रेम तक रहने दो,
और मुझको ‘मैं’ रहकर ही जीने दो।

इश्क से पहले शर्तें कहाँ थी,
फिर शर्तों का इश्क में होना हराम ही है,
तो मुझको बापू के आन को जीने दो,
अब भी मुझको मेरी गौ माता पूजने दो,
दे दूंगी तुलसी जल तो क्या बुरा घट जाएगा,
चुटकी भर सिंदूर लगा लूं तो कौन प्रलय आ जायेगा?

इश्क जो हमारा कल तक उन्मुक्त रहा,
उसको बुर्के के अंदर न तुम कैद करो,
है इश्क अब भी तुम्हारे अधूरे सच से,
मुझे उस अधूरेपन को ही जी लेने दो,
जानते हो तुम भी ये प्यार है कोई जुर्म नहीं,
तो मुझको मेरी पहचान ही जीने दो,
है इश्क अगर तुमको रश्मि से,
रश्मि को रश्मि रहने दो…
©सन्नी कुमार

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अक्सर झूठ सच का लिबास पहने आते है

हक़ीक़त रूठी परी है कबसे,
फिर भी ख्वाब रिझाने आते है,
है सब स्व में ही मगन फिर भी,
वो मेरे है दिखाने आते है..

क्या कहूँ क्या लिखूं तुमसे,
कि तुम्हें तो बस पढ़ने अक्षर आते है,
पढो गर पढ़ सको भावों को,
कि वहीं तुम्हें इंसान बनाते है..

पर्सनालिटी डेवलपमेंट का है ये दौर,
की यही तुम्हें त्वरित नौकरी भी दिलाते है,
पर जीवन में चरित्र निर्माण भी है जरूरी,
कि अक्सर केवल मुखौटे काम नहीं आते है..

वक्त की पहचान सीख लो ऐ सन्नी,
कि अपने भी इसी को देख कर मिलने आते है,
जिंदगी में जरूरी है कि तुम सही समझ रखना,
कि अक्सर झूठ सच का लिबास पहनकर आते है..

©सन्नी कुमार

मैंने किसी और का महल भी नहीं गिराया है..

माना मैंने ताजमहल नहीं बनाया है,
पर मैंने किसी और का महल भी नहीं गिराया है..

माना मैं अब तक हूँ महरूम, शोहरत की रौशनी से,
पर फिर मैंने कर बदनाम किसी को, अंधेरा भी नहीं फैलाया है..

माना मेरे(श्री श्री रविशंकर नहीं) वचन, प्रवचन की श्रेणी में अब तक नहीं आते,
पर मैंने किसी को अब तक छल-प्रपंच भी नही सिखाया है..

माना मैने ताजमहल नहीं बनाया है,
पर मैंने किसी और का महल भी नहीं गिराया है..

©सन्नी कुमार

ऐसा नहीं है कि मेरे तरकस में तीर नहीं है

ऐसा नहीं है कि मेरे तरकस में तीर नहीं है,
पर बेवजह बहरों में खर्च करने को अब अनमोल शब्द नहीं है..

बड़ी-बड़ी बातें और बनावटी सपनों की आंधी है शहर में,
सच ढ़ेर है जमीं पर कि उसके कोई साथ नहीं है..

तस्वीर बदलने को तो मेरी खामोशी भी है काफी,
पर तकदीर में शहर के बदलाव और सच का साथ नहीं है..

लफ्फाजियों का संक्रमण ही है जो वक्ताओं का कुम्भ हो गया है ये शहर,
पर उंगलियों पे गिन सकूं उतने भी क़ाबिल श्रोता नहीं…

ऐसा नहीं है कि मेरे तरकस में तीर नहीं है,
पर बेवजह बहरों में खर्च करने को अब अनमोल शब्द नहीं है..
©सन्नी कुमार

मुहब्बत को ख़ुदा मान आया हूँ

अब जब ईमान उसके इश्क़ पे ले आया हूँ,
उसी के ख्यालों से, खूबसूरत दुनिया कर पाया हूँ,
हर नेकी, हर ज़कात की ख़्वाहिश,
अब जो उससे मिलकर ही आई है,
तो क्या कल दिखेगी मुझको भी मेरी चाँद,
क्या कल मिलेगी मुझको भी मेरी ईदी,
कि महीनों मैं भी उसकी तड़प में न खा पाया हूँ..

क्या मिलेंगे मुझसे भी सब गले, मान ईमान वाले,
कि मैं काफ़िर जो अब, मुहब्बत को ख़ुदा मान आया हूँ…
-सन्नी कुमार ‘अद्विक’

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