सनम बनाना चाहता

IMG-20170630-WA0027खूबसूरत हो इतना कि तुमसे ख्वाब भी शरमाता है,
चांद की चांदनी भी तुम्हारे सामने फीका नज़र आता है,
मैं और मेरी बिसात क्या, जो भी देखे तुमको उसे प्यार हो जाता है,
जानेमन तुम नूर हो, ये दिल तुमको सनम बनाना चाहता है।
-सन्नी कुमार

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चलो आज हिसाब करते

FB_20170908_20_31_01_Saved_Pictureचलो आज हिसाब करते है,
कि हम तुमपर कितना मरते है,
क्या तुमसे खरीदना चाहते है,
क्या तुमको बेचना चाहते है,
क्या तुझमें मुझे लुभाता है,
चलो आज हिसाब करते है।

तुमको तो खबर ही है,
तुम्हारी हंसी मुझे लुभाती है,
कुछ कहो तो हम खो जाते है,
देखे थे जो कभी ख्वाब,
उनसे  हकीकत में मिल आते है।
चलो आज हिसाब करते है,
कि हम तुमपर कितना मरते है।

तुम्हारी हंसी हर बार जोड़ते है,
चिंताओं को घटाते है,
मिले जो प्यार हमको तुमसे,
उसे हर बार गुणा करते है,
है तुममें अच्छाई इतनी,
कि उसका भाग लगा लेते है,
कुछ इस तरह से प्यार है तुमसे,
हर लम्हों में लाभ कमा लेते है।

तुमको हो हर बार मुनाफा,
सो अक्सर अपना नुकसान उठा लेते है,
अपने शब्दों का करके निवेश,
तुम्हारी हंसी का लाभ कमा लेते है,
कुछ ऐसा है तुमसे बेजोड़ मतलब,
हर बार ही तुमको जीता देते है….
-सन्नी कुमार

(Dedicated to Beautiful Balikavadhu)

वो तो बस हिन्दी होती

FB_20170509_22_11_20_Saved_Pictureजब भी करनी हो मन को मन से बात,
भाषा हिन्दी होती है,
गूँजते है जो प्रार्थनाओं में बोल,
वो बोली हिन्दी होती है..

ख्वाब, जो खूब रिझाते है हमको,
उन ख्वाबों का माध्यम हिन्दी होती है,
जीवन के सोलहवें बसंत में,
जब सब कुछ नया-नया प्रतीत होता है,
उस जज्बातों के परिवर्तन में,
जो शब्द कागज़ पे अंकित होते है,
उनकी भाषा भी हिन्दी होती है..

माँ-बच्चे के बोली में,
बचपन की हर हमजोली में,
हम जो कहते सुनते है,
वो अपनापन हिन्दी होती है..

शब्दों का अंबार लिए,
सम्मानों की बात किए,
जो सबके दिल को छू जाए,
वो तो बस हिन्दी होती है..
-सन्नी कुमार

आप सबको हिन्दी दिवस (१४ सितंबर) की अग्रिम शुभकामनाएँ।
मेरी अन्य कविताएँ यहाँ पढ़ें।
sunnymca.wordpress.com

 

तुम्हारा जिक्र जरुरी है..

My Secret Diaryजिन्दगी के किताब में,
तुम्हारा जिक्र जरुरी है,
प्यार से महके मेरा जीवन,
सो तुम्हारे यादों का इत्र जरुरी है..
जिन्दगी के किताब में,
तुम्हारा जिक्र जरुरी है..

बेहतर है आज मेरा कल की रूसवाइयों से,
पर इस वर्तमान के मोल की खातिर,
तुम्हारा इतिहास जरुरी है..
जिन्दगी के किताब में,
तुम्हारा जिक्र जरुरी है..
-सन्नी कुमार

क्यों न जनता बागी हो जाए?

हाल के दिनों में जो घटनाएं बिहार में फलित हुयी है उनमें मोटा मोटा ये रहा कि सरकार शराब बन्दी को लेकर सरकार काफी शख्त दिखी और इसके लिए उन्हें धन्यवाद, पर क्या शराब ही एकमात्र बिमारी है इस बदहाल बिहार का? नहीं! यहां बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, जनसंख्या और सबसे घातक बीमारी, अपराध रहा है पर दशकों से बिहार की आम जनता न्याय को तरस रही है और उन्हें मिला कुछ नहीं, बल्कि अपराध और अपराधी खुले घूमते है, चाहे शहाबुद्दीन हो, राजबल्लभ, रॉकी यादव् या सैकड़ों छोटे बड़े नाम जिन्होंने आम जन का शोषण किया हो… बिहार की मिट्टी मानों अपराध के लिए और भी उर्वर हो गयी है। यहाँ निवेश के नाम पर कुछ नहीं है, काश यहाँ के करोड़पति नेता ही कुछ बिजनेस शुरू करते और लोगों को रोजगार देते पर नही ये गरीबी को सिर्फ मुद्दा मानते है और ये वही मुद्दा है जो इन नेताओं को गद्दी तक पहुंचाता है सो ये कतई गरीबी को खत्म या कम करने का प्रयास नही करेंगे.
इन्हीं शिकायतों को, मेरी पीड़ा को यहाँ कविता के रूप में पढें, सहमत हो तो शेयर करें।

तुम निर्लज्जों के ओछे कर्मों से,
लज्जित हुए हम पछताते है,
अखबारों के पन्ने हरदिन जब,
तुम्हारे काले कर्मों से भरे पाते है,
क्यों देते है वोट तुम्हें हम,
सोंच सोंच जल जाते है।

कैसे हो तुम जनता के सेवक,
जो जनता का सोशन करते हो,
फटेहाल हर दूसरी जनता,
और तुम मेर्सेडीज में घूमते हो,
करते हो तुम कौन व्यापार,
जो अकेले ही फलते हो,
रोजगार के त्रस्त है जनता,
क्यों उनको भी अवसर नहीं देते हो?

बाँट बाँट कर धर्म-जात में,
तुम अपना हित बस साधते हो,
टोपी-तिलक और ऊंच नीच में,
जनता को भरमाते हो,
और अभिनव भारत के सपने पर,
मौन मोहन बन जाते हो।

लूट-गबन और हत्या से तुम,
कौन सी कीर्ति रचते हो,
शर्म नहीं आती क्या तुमको,
जो दोहरी नीति रखते हो,
जनता को तुम नित नियम सिखाते,
और खुद अपराधियों से साठ-गांठ रखते हो,
जनता को मिले अब न्याय भी कैसे,
तुम जो न्याय को बंधक रखते हो..

कहो क्यों न जनता बागी हो जाए,
और फ़ेंक उखाड़े सिस्टम को,
क्यों न उठा ले शस्त्र खुदी हम,
न्याय, धर्म की रक्षा को,
मिलते है जो अपराध को शह अब,
क्यों न मार भगाये इन नाकारों को,
कब तक सहे आखिर हम जनता,
तुम भ्रष्ट सत्तासुख लोभियों को?

अब जब मिलता न्याय नहीं,
न बनती है हक़ में कानून,
कब तक रखे धैर्य हम जनता,
कब तक रखें हम सब मौन,
क्यों न खुद की किस्मत अब खुद ही लिख लें,
कहो, अब क्यों न हम बागी हो जाए?
-सन्नी कुमार

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