मैं वही हिन्दुस्तान हूँ

जीत कर सोने की लंका जो लौटा दे,
उस भगवान राम का धाम हूँ,
पूजा जाता है हर जीवन जहाँ,
उस सनातन-संस्कार का प्राण हूँ,
जिसने दुनिया को जीना सिखाया,
उस सभ्यता का मैं साक्ष्य हूँ,
ले रहा अंगड़ाई जो छूने को आसमान,
मैं वही हिन्दुस्तान हूँ, मैं वही हिन्दुस्तान हूँ…
© -सन्नी कुमार

jeet kar sabkuch jo lauta de,
us bhagwan raam ka dhaam hoon,
puja jaata hai jahan har ek jeevan,
us sanaatan-sanskaar ka praan hoon,
jisne duniya ko jeena seekhaya,
us sabhyataa ka mai sakshya hoon,
le rahaa angraayee jo aaj chhune ko aasman,
mai wahi hindustaan hoon,
mai wahi hindustaan hoon..
© -Sunny Kumar

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Best School in Gaya | G D Goenka

G D Goenka Public School, Gaya receives Best School Award for the marvelous performance in Inter State Karate Championship organised by Institute of Martial Arts, India . It all have happened as a result of extraordinary performance of Goenkan Karate team which has bagged 25 medals in different categories including 7 gold, 8 silver and 10 bronze under the guidance of Karate Coach Kundan Kumar. I am happy to share this news as i was also a part of that winning team as a Team Manager and our players made us proud.

This news was yesterday’s highlight in most of the Hindi daily of Gaya. Have a look.

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क्यों न जनता बाग़ी हो जाए

IMG-20170906-WA0030तुम निर्लज्जों के ओछे कर्मों से,
लज्जित हुए हम पछताते है,
अखबारों के पन्ने हरदिन जब,
तुम्हारे काले कर्मों से भरे पाते है,
क्यों देते है वोट तुम्हें हम,
सोंच सोंच जल जाते है।

कैसे हो तुम जनता के सेवक,
जो जनता का सोशन करते हो,
फटेहाल हर दूसरी जनता,
और तुम मेर्सेडीज में घूमते हो,
करते हो तुम कौन व्यापार,
जो अकेले ही फलते हो,
रोजगार के त्रस्त है जनता,
क्यों उनको भी अवसर नहीं देते हो?

बाँट बाँट कर धर्म-जात में,
तुम अपना हित बस साधते हो,
टोपी-तिलक और ऊंच नीच में,
जनता को भरमाते हो,
और अभिनव भारत के सपने पर,
मौन मोहन बन जाते हो।

लूट-गबन और हत्या से तुम,
कौन सी कीर्ति रचते हो,
शर्म नहीं आती क्या तुमको,
जो दोहरी नीति रखते हो,
जनता को तुम नित नियम सिखाते,
और खुद अपराधियों से साठ-गांठ रखते हो,
जनता को मिले अब न्याय भी कैसे,
तुम जो न्याय को बंधक रखते हो..

क्यों न जनता बाग़ी हो जाए
और फ़ेंक उखाड़े सिस्टम को,
क्यों न उठा ले शस्त्र खुदी हम,
न्याय, धर्म की रक्षा को,
मिलते है जो अपराध को शह अब,
क्यों न मार भगाये इन नाकारों को,
कब तक सहे आखिर हम जनता,
तुम भ्रष्ट सत्तासुख लोभियों को?

अब जब मिलता न्याय नहीं,
न बनती है हक़ में कानून,
कब तक रखे धैर्य हम जनता,
कब तक रखें हम सब मौन,
क्यों न खुद की किस्मत अब खुद ही लिख लें,
कहो, अब क्यों न हम बाग़ी हो जाए?
© -सन्नी कुमार
——————————————-
Tum Nirlajjon ke ocche karmon se,
lajjit huye hum pachhtate hai,
akhbaron ke panne har din jab,
tumhare kaale karmo se bhare paate hai,
kyon dete hai vote tumhein,
sonch sonch jal jaate hai..

kaise ho tum janta ke sewak,
jo janta ka shoshan karte ho,
phatehaal har dusri janta,
aur tum mercedez mein ghume ho,
karte ho tum koun vyapar,
jo akele hi tum phalte ho,
rojgaar se trast hai janta,
kyun unko bhi awasar nahin dete ho?

baant-baant kar jaat-dharam mein,
tum apna hit bus saadhte ho,
topi tilak aur unch neech mein,
jantaa ko bharmaate ho,
aur bhinav bharat ke sapne par,
maun-mohan ban jaate ho..

loot gaban aur hatya se tum,
kaun si kirti rachte ho,
sharm nahi aati kya tumko,
jo dohri neeti rakhte ho,
janta ko tum nit niyam seekhate,
khud apradhiyon se saanth-gaanth rakhte ho,
janta ko mile ab nyay bhi kaise,
jo tum nyay ko bandhak rakhte ho..

kaho kyon na janta baagi ho jaaye,
aur phenk ukhaare system ko,
kyon na uthaa le shastra khudi hum,
nyay-dharm ki raksha ko,
milte hai jo apradh ko shah ab,
kyon na maar bhagaaye naakaron ko,
kab tak sahe aakhir hum janta,
tum bhrasjt sattasukh lobhiyon ko..

ab jab milta nyay nahi,
na banti hai haq mein kaanun,
kab tak rakhein dhairya hum janta,
kab tak rakhein hum sab maun,
kyon na khud ki kismat khud hi likh lein,
kaho, ab kyon na hum baaghi ho jaaye?
©-Sunny Kumar

You may please also read my other poems on political scenario 🙂 :-

दिल कहता है कलम छोड़, अब बन्दूक उठा लूँ

गिर रहे लोगों के भाव लिखो..

चुनाव नहीं मतदान करें

है दिल्ली से अनुरोध

 

Media’s Contribution in development

What is the contribution of Indian Media after independence??
सुबह का अखबार दोपहर में मेज साफ़ करने या शाम को समोसा लपेटने का काम आता है, समाचार चैनलों के पास खबर कम गप्प और विज्ञापन ज्यादा है। निकम्मे इतने है कि हर खबर दिल्ली-एनसीआर में ही बना लेते है, दक्षीण भारत का खबर तो तबतक नहीं दिखाते जबतक बाहुबली १००० करोड़ न कमा ले या खुद थलाइवा राजनीति में कूद न जाए, खैर दक्षीण देर-सवेर दिख भी जाता है पर पूर्वोत्तर राज्य? आधे पत्तरकारों(पत्रकार नहीं) को तो इन राज्यों के नाम भी न पता होंगे बावजूद ये अपनी कलम और आवाज़ को बेच आधी हकीकत दिखाएंगे। आज हर चैनल चंदे से और अखबार विज्ञापनों से भरा है, समाचार तो ये नेताओं का ट्वीट पढकर बना लेते है और जब क्रांति करनी हो तो आपसे आपका जात पूछेंगे। खुद बिके है बावजूद ये किसी को कुछ भी कहने/पूछने को स्वतंत्र है। कोई बताएगा इनका योगदान?? दुनिया की सबसे भ्रष्ट मीडिया कहाँ की है??(अपवाद हर जगह हो सकते है)

गलती न मेरी थी, न उनकी थी

Life-iz-Lonely-But-Happyगलती न मेरी थी, न उनकी थी,
था करार, कि तब शायद जरुरत दोनों को थी,
उनको संवरना था पसंद और मैं तब भी शब्दों से आइना दिखाता था,
आज आइना कहाँ, फ्रंट कैमरा चलता है सन्नी,
शब्दों में बहते जज्बात को कौन समझे,
अब तो हर सेकण्ड में हैशटैग भी बदलता है,
कि वो जो कभी ट्रेंड न हुआ उन एहसासों कौन समझे..

गलती न मेरी थी, न उनकी थी,
बस दोनों की जरूरतें थी….
©-सन्नी कुमार

Galti na meri thi, na unki thi,
tha karaar ki tab shayad jaroorat dono ki thi,
unko sanwarana tha pasand aur mai tab bhi shabdon se aaina dikhaata tha,
aaj aaina kahan, front camera chalta hai sunny,
Shabdon mein bahte jajbaat ko koun samjhe,
ab to har second mein hashtag bhi badalta hai,
ki wo jo kabhi trend n huaa un ehsaason ko kounsamjhe…
©-Sunny Kumar

[Image credit:- Google Images]
My other random poems hope you like this too 🙂 :-
ऐ सर्द हवा कर थोड़ा रहम
वो तो बस हिन्दी होती
वो थे सबसे सुनहरे पल..तस्वीर किसान का
तुम्हारा जिक्र जरुरी है..

दहेज का इतिहास

IMG-20180121-WA0003उत्तर वैदिक काल में विवाह के समय पिता अपनी पुत्री को अपनी इच्छा अनुसार उपहार दिया करते थे जो पहले से निश्चित नहीं हुआ करता था, मध्यकाल में इस उपहार ने अपना स्वरूप बदला और फिर यह स्त्रीधन के रुप में जाने जाना लगा। स्त्रीधन का उद्देश्य कन्या को उसके पारिवारिक जरूरतों समेत ऐसी वस्तुओं को देना था जो उसके बुरे वक्त में काम आए, इसमें धन सम्मिलित था और यह राज परिवारों विशेषकर राजपूतों में प्रचलित था और कन्यापक्ष इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ कर देखते थे। मध्यकाल में स्त्रीधन संपन्नो तक सीमित था और पूर्णतः ऐच्छिक था।
आज जिस दहेज की बात करते है उससे ग्रसित थोड़ा-बहुत मै और आप,सब है। आज इच्छा नगण्य और दवाब का दानव इतना बड़ा है कि कन्या के जन्म से ही उसका परिवार शादी की चिंताओ में मरने लगता है। यह दहेज़ रूपी शैतान बेटी का खून कभी उसी के माँ-बाप से(भ्रूण हत्या) तो कभी दहेज़ लोभी पति से करवा देता है।
ऐसे में सरकार ने जो पहल की है वो सराहनीय है, जितने बच्चे व नवयुवक आज इस मानव श्रृंखला में सम्मिलित हुए उनमें सेअगर एक चौथाई भी दहेज़ को खारिज कर दे तो संभवतः आनेवाले दशक में यह शैतान दम तोड़ देगा।
बहरहाल यह शोध का विषय अवश्य है कि दहेज़ शब्द और इसके शैतानी संक्रमण की शुरुआत कब और कहाँ से हुई।
शुभकामनाएँ
साभार
सन्नी कुमार

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