सारे बोल-बच्चन तो सच से है घबराते

सारी कथाएं, सारे प्रवचन, सत्य की महिमा सुनाते,
हर किताब, हर लेख, सत्य की ही विजय बताते,
पर एक सत्य यह भी है इस दो-गली दुनिया की,
कि जब जब मैंने सत्य कहा मेरे अपने तक हम से है कट जाते…

सत्य बिना श्रृंगार की वह सुंदरी है जिसका सौंदर्य नहीं सब बूझ पाते,
सत्य वह ग्लूकोज़ ड्रिप है जो अधीर, असहायों की जान बचाते,
पर एक सत्य यह भी है इस सेल्फी-की-मारी दुनिया की,
कि सत्य-साधारण पर सब झूठ का मेकअप है खूब चढ़ाते..

सत्य तो सीधा है, सरल है, पर उन पुराने सिक्कों सा है,
जिनकी महत्ता बस क़ाबिल जौहरी लगाते,
बाकि बकैतों के लत की मारी दुनिया में,
सारे बोल-बच्चन तो सच से है घबराते….
©सन्नी कुमार

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वो सावन अब तक नहीं आया

आज अपनी ही तस्वीर देखी तो कमबख्त ये ख़्याल आया,
कि लिखते रहे औरों को इतना डूबकर कि खुद का ख्याल भी नहीं आया,
औरों को लुभाने की चाह में मैं खुद को ही भूला आया,
आज कहते है सभी अपने कि थोड़ा मैं भी मुस्कुरा लूं,
पर कैसे कि वजह लेकर वो सावन अब तक नहीं आया..
©सन्नी कुमार ‘अद्विक’

जन्नत में मुझको दिलचस्पी नहीं है

जन्नत में मुझको दिलचस्पी नहीं है,
पर सुना है वहाँ हूरें 72 मिलती है..
सम्भव है दीदार हो उस पर्दानशीं का वहाँ,
जो मेरे मुहल्ले से रोज गुजरती है..

उसको देखा नहीं पर वो अज़नबी भी नहीं है,
कि उसकी नजरों में मुझे दुनिया तमाम मिलती है..
हसरतों में सिर्फ वो है ऐसा भी नहीं है,
पर इस फेहरिस्त की शुरूआत भी उससे ही होती है..

मुझे बस चेहरों में कोई दिलचस्पी नहीं है,
पर कानों में रोज उसके नेकी के चर्चे मिलते है..
मर जाऊंगा उसके बगैर ऐसा भी नहीं है,
पर जीने को उससे खूबसूरत वजहें रोज मिलती है..

उनके हुस्न का मुझको इल्म भी नहीं है,
पर उनके ज़िक्र से मेरी कविता खूब सजती है,
मेरे भाव का भले उनको अबतक आभास नहीं है,
पर सुना है मेरी ग़ज़ल वो भी खूब पढ़ती है..

जन्नत में मुझको दिलचस्पी नहीं है,
पर सुना है वहाँ हूरें 72 मिलती है..
सम्भव है दीदार हो उस पर्दानशीं का वहाँ,
जो मेरे मुहल्ले से रोज गुजरती है..
©सन्नी कुमार ‘अद्विक’

हे कृष्णा

हे कृष्णा,
मेरी कलम में तुम थोड़े,
बंसी के लय घोलो न..
मुझे पढ़कर सबमें प्रेम बढ़े,
ऐसे किस्से मुझसे गढ़वाओं न..
सुनने को सब मुझे भी ललचे,
कुछ ऐसी मायाजाल बिछाओ न..
मेरी कलम में तुम थोड़े,
बंसी के लय घोलो न..

प्रेम-धर्म की स्थापना को,
हे वसुदेव तुम जब उतरते हो,
तो कभी मेरे शब्दों में भी,
अपने संदेश सुनाओ न..
है रण होता रोज आज भी,
कि आज भी युवा-अर्जुन है भ्रम में,
उसे बताने सही-गलत तुम,
उसके मन-मस्तिष्क में बसों न..
मेरी कलम में तुम थोड़े,
गीता-सत्य को घोलो न.

हर जगह फसाने को,
सकुनी पासा थामे बैठा है,
जहाँ युधिष्ठिर रोज दाव हारते है,
और मोह में अंधे दुर्योधन को श्रेष्ठ बताते है,
दिलाने पांडवों को हक़,
हे कृष्ण शंख बजाओ न..
होती है हमेशा सत्य की जीत,
आज के अर्जुनों को बताओं न..

चाहता हूँ जो कहूँ सबसे,
वही पहले तुम्हें सुनाता हूँ,
हे हरि! सच में, यहां खुद को,
मैं भी अकेला ही खुद को पाता हूँ..
आकांक्षाएं मेरी कुछेक जो है,
उसपे दुर्योधनों का ही सत्ता पाता हूँ,
ताउ धृतराष्ट्र की मर्यादा है,
और राजा से बैर कर द्रोही नहीं बनना चाहता हूँ,
पर फिर यह महान जीवन जो व्यर्थ रहेगा,
ऐसा होते भी नही देखना चाहता हूं..

सो इस भवसागर से हे भगवान,
मुझको भी पार लगाओ न,
गर्व लिखूँ, मैं भी गर्व जीऊँ,
मुझको अपना पार्थ बनाओ न,
क्या सही क्या है गलत,
इसके भान कराओ न,
अपने इस अर्जुन को,
रण में मार्ग दिखाओ न..

हे कृष्णा मेरे कविता में,
अपने बंसी के धुन घोलो न,
लिखूं मैं जब-जब धर्म की रक्षा में,
तब तुम मेरे शब्दों में विराजों न..
मेरे जीवन, मेरे आचरण में भी तुम,
कभी अपनी झलक दिखाओं न..
मैं भी जीउ-लिखूं बस प्रेम-धर्म को,
मुझे भी अपना शिष्य बनाओ न..
©सन्नी कुमार

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