आज थमने को दिल करता है..

ना जाने कब से भाग रहा हूँ,
कभी समय से आगे,
कभी साथ,
तो कभी पीछे,
कभी ख्याल नहीं आया,
न ही पहले कभी सोचा था,
की आखिर कहाँ जाना है..

अब तक के इस सफ़र में,
बस चलता, भागता जा रहूँ हूँ,
कई बार मुश्किल के दौर से उबरा,
कई बार खुशियों से साक्षात्कार की,
पर बिना रुके बढ़ता गया,
जिंदगी जो भी मिली बस जीते गया..

मालुम नहीं कब जिंदगी बदलने लगी,
ह्रदय भाव विहीन होने लगा,
न ही ख़ुशी महसूस होती, न गम,
किसी के साथ होने न होने का,
फर्क भी ख़त्म अब होने लगा..

खूबसूरती से आकृष्ट होना पुरानी बातें थी,
परिपक्वता का ठोस बहाना मिल गया था..
अपनों से बातें, एक चैटबॉक्स में सिमट रही थी,
और मिलने का मोह भी ख़त्म होने लगा था।
खुद को साबित करने की कोशिश ने,
ढेरों कृत्रिम विचार भी बनाए,
नदियों को देखा, फुलवारी सजाई,
पर कोई भी उपाय काम न आया..

फिर मन ने ये आवाज लगाई,
कि आज थमने को दिल करता है..
जीया है जो अबतक उसपे,
बात करने को दिल करता है..

आज ये मन एक नयी उधेर में है,
जब खुशियाँ मिलीं थी रुके नहीं,
मुश्किलें थी तब भागे नहीं,
फिर क्या छुटा, क्या भुला,
जो अब भी भाग रहा हूँ..

क्या पाता हूँ आज यहाँ की,
हममें  “साधन-साध्य” की आदत लगी है,
हमने यन्त्र लाये थे जीवन में,
आज खुद ही यन्त्र से बन रहे है..

कहीं पढ़ा था, आज समझा हूँ,
कि केवल चलना, भागना ही जीवन नहीं है,
खुशियों का आलिंगन कर उन्हें संजोना,
मुश्किल से सीख आगे बढ़ना,
और समर्पित ईश को करना
ही एक सच्चा जीवन है|

-सन्नी कुमार
[एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी लगी कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]

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आ जाओ मिलने इक बार सही…

sunny_kumar_Poemइससे पहली की टूट के बिखर जाऊं,
बिन कहे ही मै, चुप हो जाऊ,
आ जाओ मिलने इस दोस्त से,
कि शायद फिर मै संभल जाऊं..

उलझा हूँ आज क्यूँ, किसको सुनाऊ,
क्या गुज़री है दिल पे, किसको बताऊँ,
आ जाओ मिलने इक बार सही,
की शायद आगे न मिल पाऊं..

बिछड़े हो तुम जबसे, रूठा है दिल मुझसे.
तेरी यादों के सहारे ही, जीता था मै तबसे.
इससे पहले की ये जिंदगी, बिछड़ जाए मुझसे.
किसी बहाने आ जाओ, तुम मुझसे मिलने..

नहीं मांगता मै, गुज़रा ज़माना.
न उन वादों को निभाने का, जोर देता हूँ..
आ जाओ मिलने इस बीते कल से,
मै टूटा आज, ये ख्वाहिश रखता हूँ..

इससे पहली की टूट के बिखर जाऊं,
बिन कहे ही मै, चुप हो जाऊ,
आ जाओ मिलने इस दोस्त से,
कि शायद फिर मै संभल जाऊं..

-सन्नी कुमार
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Isase pahle ki toot ke bikhad jaaun,
Bin kahe hi mai chup ho jaaun,
aa jaao milne is dost se,
ki shayad phir mai sambhal jaaun..

Uljha hu kyun aaj kisko sunaaun,
Beeti hai kya dil pe kisko bataaun,
aa jaao milne ek baar sahi,
ki aage shayad mai n mil paaun..

Bichhade ho tum jabse, rutha hai dil mujhse,
Teri yaadon ke hi sahaare jeeta tha mai tabse,
Isase pahle ki ye jindagi bichhad jaaye mujhse,
Kisi bahaane tum aa jaao mujhse milne..

Nahin mangta mai gujra jamaana,
na un waadon ko nibhane ka jod deta hun,
aa jaao milne is beete kal se,
mai toota aaj ye khwahish rakhta hun..

Isase pahle ki toot ke bikhad jaaun,
Bin kahe hi mai chup ho jaaun,
aa jaao milne is dost se,
ki shayad phir mai sambhal jaaun..

आज सच लिखता हूँ…

guruक्या कहूँ और क्या लिखूँ,
आज अपनी कविता में..?

शब्दों में सिर्फ फूल लिखूँ,
या कांटो संग कहानी भी?
दिल के जो है जज्बात लिखूँ,
या झेल रही परेशानी भी?
जिंदगी के जश्न और जीत लिखूँ,
या चल रही मन में चिंताएं भी?

आज हिम्मत करता हूँ, सच लिखता हूँ,
अपनों में अपनी बाग़ रखता हूँ…

हूँ सीधा सरल एक नौजवान,
कामयाबी की ख्वाहिश रखता हूँ,
दिन भर भटकने के बाद,
मायूस होकर सोता हूँ..
अगली सुबह वापिस से,
सपने सच करने को लड़ता हूँ…

क्या कहूँ और क्या लिखूँ,
मजबूर मन के हालत पे,
आज हिम्मत करता हूँ, सच लिखता हूँ..

अपनों में अपनी उलझन रखता हूँ..

जान रहा ये मन है मेरा,
माँ(देश) समय आज मांग रही,
पर मुश्किल है बीबी(नौकरी) मेरी,
जो साथ आज नहीं दे रही..
नहीं कर पाना इच्छानुसार,
बड़ा रोष बढाता है,
पर एक छोटी सी कोशिश भी,
बड़ा संतोष दिलाता है..

क्या कहूँ और क्या लिखूँ,
इस दिल के दीवानगी पे,

आज करता याद माशूक को हूँ,
और अपनों में मुहब्बत रखता हूँ..

इस दिल के है जज्बात निराले,
जो फंसा इश्क के चक्कर में ये,
विज्ञान को भी ये झुठलाये,
जो हो देशों दूर हमसे,
उसको सबसे करीब बताये..
दो पल के इन्तेजार में,
जो हो खुद से खींज जाए,
उसी शख्स से घंटों ये,
माशूक का इन्तेजार कराये..

क्या कहूँ और क्या लिखूँ मैं,
इस जीवन के बारे में,
एक कोशिश करता हूँ, सच लिखता हूँ,

आज सबको अपनी बात रखता हूँ..

जिंदगी का ये कटु सत्य है,
की जीना हमें अकेले है,
पर माँ-बाप के आशीष तले,
और साथी के साथ हुए,
ये यात्रा सुगम, सहज कटती है..
वैमनस्य से बड़ा प्यार है,
और सेवा है सहयोग में,
कर्मपथ पे बढ़ते जाना,
यही ये जीवन कहती है..

क्या कहूँ और क्या लिखूँ मैं,
आज अपने बारे में,
हिम्मत करता हूँ, सच लिखता हूँ,

अपनों में अपनी बात रखता हूँ..

-सन्नी कुमार [एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी लगी कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]

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