आज फुर्सत में हूँ

आज फुर्सत में हूँ,
फुर्सत के ही साथ में हूँ,
बहुत दिन से मिली नहीं थी,
थी मुझे बहुत जरूरत उसकी,
पर दिनों से है की दिखी नहीं थी..

आज भी शायद नज़रे चुरा कर,
कहीं और ही जा रही थी,
पर तलब और तबियत के सख्त पहरों से,
आज बच के निकल न सकी थी..

और अब जब साथ में है,
तो है थोड़ी सहमी, थोड़ी शरमाई,
उसका कहना है कि वो भी इंतेजार में थी,
पर मैंने ही न पुकारा,
कि वो तो कबसे आस में थी।

कि वो तो आती थी, मुझसे रोज ही मिलने,
मेरे खाने के बाद, तो कभी सोने से पहले,
पर अक्सर मैं ही मशगूल होता था,
काम के करारनामों में उलझा होता था..

वो भी चाहती थी मुझसे रोज ही मिलना,
मुझसे सच कहना, मेरी कविताओं को सुनना,
पर उस आरामपसंद को मिलने न दिया जाता था,
की तब उलझा होता था मैं, और काम पहरे पे होता था..

उसका कहना है कि आज भी वो कोई नज़रे चुरा कर नहीं जा रही थी,
अरे मिलना वो भी चाहती थी, पर जताना नहीं चाहती थी,
बहुत कुछ हिसाब थे उसके पास, जो कबसे वो देना चाहती थी,
लाई थी कई किस्से, कई ख्वाब भेंट करना चाहती थी,
पर मेरी व्यस्तताओं से डर, दूर हो जाया करती थी,
और आज जब न काम पहरे पे था, न व्यस्तता उसको दिखी,
तभी उसका मिलना सम्भव हुआ,
क्या खोया, क्या पाया, है जाना कहाँ,
आज फुर्सत में फुर्सत से चर्चा हुआ…
©सन्नी कुमार

NOTA पर विचार

NOTA को विकल्प मानने वाले बन्धुओं क्या आपने विचार किया है कि नोटा का अर्थ होता है इनमें से कोई नहीं, और कोई नहीं कहना ज्यादती होगी और अपने भारतभूमि को कलंकित करने सा होगा जहां आपके अनुसार कोई योग्य नही बचा और आप समाज के ऐसे चौकीदार है जो ज्योतिष भी है जिन्हे साल भर पहले ही मालूम हो गया है कि आपको जितने भी लोगों की उम्मीदवारी मिलेगी सब के सब नकारे होंगे? क्या वाकई आपका क्षेत्र इतना गया गुजरा है?? अगर है, तो हे अर्जुन आप क्यों नहीं इस अँधेरे से अपने बन्धुओं और समाज को उबारने के लिए आगे आते है, आप क्यों नहीं अपनी उम्मीदवारी देते है?
हे सोशल मीडिया के शेरों अगर आपने पहले से ही तय कर लिया है कि आपको 2019 में कोई पसंद नही आनेवाला तो आप खुद को क्यों नहीं एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर अपने अन्य बन्धु-बांधवों और समाज को राजनीतिक कुचक्र से बाहर निकाल लेने का प्रयास करते? अगर नहीं कर सकते तो फिर इतनी हताशा क्यों?
SC ST एक्ट का विरोध जितना जरूरी है उतना ही जरूरी इस नोटा का साल भर पहले ही विकल्प चुन लेना गलत है और लोकतंत्र के हित मे नहीं है। क्या दल के दलदल से दूर कोई स्वतंत्रत, निर्भीक उम्मीदवार नही मिलेगा या आप खुद आगे नही आना चाहेंगे जिसने पार्टी के सेवा के बदले समाज की सेवा की हो? या आपका नोटा बस एक वर्ग विशेष के वोट को बर्बाद कराने से है? खैर बिना भारत बंद कराये अगर सरकार सुनती है तो मैं भी उसके SC ST एक्ट का विरोध करता हूँ, आरक्षण खत्म करने की गुजारिश करता हूँ और चाहूंगा कि सरकार नौकरी के लिए मुफ्त आवेदन निकाले..
समझ आये तो विमर्श करे वरना शांत रहे, समय हम सबका कीमती है।

-सन्नी कुमार

#नोटा #NOTA

भारत बंद नहीं नेताओं के ड्रामे बन्द करे

न तो मैं कभी आरक्षण समर्थक था, न भारत बंद जैसी वाहियात सोंच का समर्थन कर सकता हूँ। मैं दो रोटी कम खाकर, दो वस्त्रों में पूरा जीवन बिता दूंगा पर किसी फालतू नेता और बकवास दलों के दलदल में नहीं परूँगा, क्योंकि अगर बन्दे में दम हो तो रिलायंस जैसा अंपायर बिना किसी सरकारी चाकरी के भी खड़ा किया जा सकता है। आरक्षण के नाम पर दलित और सवर्णों के बीच में ये जातियों के ठेकेदार गुंडे, जो आजादी बाद से ही लड़ाई लगाते रहे है कि साजिश कामयाब न होने दे।
भारत बंद में दिक्कतों को झेलने कोई हाई प्रोफ़ाइल नहीं आएगा, न आपके साथ आज लाठी उठाने आपका नेता आएगा, विश्वास न हो तो अन्ना के सिपाहियों से सबक ले जिनको आपियों ने उल्लू बनाकर दिल्ली की सत्ता ली और अन्ना की सेना कहीं पुणे में गन्ना बेच रही होगी। भारत बन्द और अन्य किसी भी तरह का बन्द एक साजिश है जिसमें सबका अपना एजेंडा होता है और आप बस एक मोहरा की भूमिका में होते है। सो अपनी काबिलियत को यूं जाया न करे और अपने विवेक से काम ले, खुद ही विकल्प बने। आज आपको, जनता को जागरूक होना होगा, खुद ही खुद को सरकार समझे तभी मुल्क सेफ है और हाँ बन्द करना ही है तो नेताओं का इलेक्शन के वक्त प्रचार बन्द करे, अपने गाँव-मुहल्ले में घुसने न दे और अपने लोगों को निर्दलीय उम्मीदवारों को जिताये और कांग्रेस A टीम और B टीम को बाहर करे वरना बनते रहे मूर्ख और बजाते रहे अम्बेडकर का दिया आरक्षण वाला झुनझुना।
-सन्नी कुमार

#भारत_चलता_रहे
#भारत_बढ़ता_रहे

कविता मेरे हर शिष्य के नाम

यह कविता मेरे हर शिष्य के नाम, मेरे भाव, मेरे शब्द आप तक पहुंचे तो सूचित करें, अपने विचार रखें। धन्यवाद!

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ,
है तुम सबसे मेरा एक ही स्वार्थ,
तुम्हारे सफलता का मैं प्रार्थी हूँ..

कोई तुमसे मांग नहीं,
तुम स्वयं को समझो चाहता हूँ,
हो कदम तुम्हारे कल कीर्ति के सीढ़ी,
सो तुम्हें चलना आज सीखाता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न तुमसे सुख-समझौते का अधिकारी हूँ,
है जो थोड़ी अनुभव और ज्ञान की पूंजी,
वह तुम सब संग बांटना चाहता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
मैं वास्तविकता का साक्षी हूँ,
कल को होगे तुम नीति-नियम रचयिता,
सो तुम्हें आज सही-गलत का भान कराता हूँ..

हो कुरुक्षेत्र पुनः यह दु:स्वप्न नहीं,
न कृष्णतुल्य एक कण भी हूँ,
पर यह जीवन भी है महान संघर्ष,
कि इसमें विजयी रहो मैं चाहता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ..
है तुमने जो भी मुकाम चुना,
उस यात्रा में मैं एक सारथी हूँ,
पा लो तुम सब अपनी मंजिल,
मैं यही कामना करता हूँ…

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ..
©सन्नी कुमार
#Happy_Teachers_Day
#Teachers_Day_Poem_in_Hindi
#Teacher_on_Teachers_Day

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