मैं माँ को सदा खुश रखूँ

मेरे कोई शब्द इतने मधुर नहीं, कि कोई कविता लिखूं
जिसने मुझे रचा उसके भाव, मैं कैसे रचूं?
वो मेरी उम्मीदों का आसमां है,
उसके दुआओं की बरसात में मैं रोज भिंगु,
उसकी सारी चाहतें, सारे ख्वाब मुझसे है,
कृष्णा देना इतनी हिम्मत मैं माँ को सदा खुश रखूं।
©सन्नी कुमार

(रविवार देख के मदर डे मनानेवालों ये पाश्चातय संस्कृति का ही देन है कि आज वृद्धाश्रम आम हो गया है, निवेदन है कि हर दिन अपनी माँ को अपने परिवार को दे और ये मई के दूसरे रविवार को मनाया जाने वाला दिन पश्चिम को ही मुबारक रहने दो।)

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बनवास पे था मेरे घर का बचपन

बनवास पे था मेरे घर का बचपन,
सबको खबर हो वो अब लौट आया है,
चहकने लगी है आज सीढिया छत की,
जो उनसे लिपटने, उनपे रेंगने,
नन्हें कदमों का दौड़ आया है..

सज रही है खिड़की पार की पेड़-पौधे-झाड़ियां,
कि उनको समझने, उनकी बात करने,
नई नज़र लिए मेहमान आया है,
बनवास पे था जो मेरे घर का बचपन,
सबको ख़बर हो वो अब लौट आया है….

©सन्नी कुमार

मिलना जब जरूरी हो

मिलना जब हो जरूरी,
तो अक्सर पल नहीं मिलते,
लिखना जब हो कुछ खास, तो अक्सर शब्द नहीं मिलते,
आज जब चाहता हूं कि मिलके दूँ तुम्हें मुबारकबाद,
समय का खेल है ऐसा
कि अब आप नहीं मिलते।

है यादों में हमारे,
आपका रोज ही आना,
पर अब यादों से इतर,
हम रूबरू नहीं मिलते,
हो आपको खबर ये कि
अब भी बहुत मानते है हम,
जताते दिल के हर जज़्बात,
जो एक बार तुम मिलते।
©सन्नी कुमार

ऐसा कब सम्भव हो पाया है

मुस्कुराता रहा दिन भर,
जो तुम फिर याद आयी थी,
मालूम चला कि तप रहा हूँ बुखार में,
जब हक़ीक़त पास आई थी..

थी तुम एक हसीन ख्वाब,
जो मुझको मुझसे दूर ले गई,
जीवन के कड़वे सच का,
इस मूरख को ज्ञान दे गई।

आज मस्त हूँ अपने बढ़ते सफर में,
फिर ये मौसम, ये गलियां,

और गिनती के अच्छे लोग,
तुम्हारी याद दिलाते है,
पढ़ लेता हूँ अक्सर वो पन्ने,
जो तुम्हारी याद दिलाते है।

तुम हो नहीं आज,
पर तुमसे ज्यादा पाया है,
ख्वाबों से बेहतर हो गई जिंदगी,
तुम्हारे दुआओं में खुद को महफूज़ पाया है,
है हसरत एक आज भी,
की तुमसे मिलूं,
पर अतीत और वर्तमान मिल जाये,
ऐसा कब सम्भव हो पाया है? 😊
© सन्नी कुमार

मैं मूरख अंग्रेजी पर मरता हूँ

मैं हिंदी का बेटा हूँ,
उर्दू मेरी मासी है,
भोजपुरी भौजाई दाखिल,
बज्जिका मेरी बोली है..
मगही-मैथिली मुझे है चाहने वाले,
अवधी-खरी में जी मैं जंचता हूँ,
पर अपनों की खास कदर नहीं जी,
मैं मूरख अंग्रेजी पे मरता हूँ…
©सन्नी कुमार

मैं उनसा होना चाहता हूं

कुछ लोग मेरी मजबूरी है,
कुछ लोगों की मैं मजबूरी हूँ,
कुछ हुए अब तक मजबूर नहीं,
मैं उनसा होना चाहता हूँ…

कुछ को शोर शराबे की आदत,
कुछ चापलूसी के नायक है,
कुछ बचे है अब भी कर्मों के सिपाही,
मिल जिनसे रोज मैं सीखता हूँ।

कुछ बातों के अधिनायक है,
कुछ चुप्पी के महासागर है,
कुछ कर्मपथ के शांत सरोवर,
मैं जिनको लिखना चाहता हूं।

कुछ लोग मेरी मजबूरी है,
कुछ लोगों की मैं मजबूरी हूँ,
कुछ हुए अब तक मजबूर नहीं,
मैं उनसा होना चाहता हूँ…
©सन्नी कुमार

कुछ लोग मेरी मजबूरी है

कुछ लोग मेरी मजबूरी है,
कुछ लोगों की मजबूरी मैं हूँ,
भीड़ में न सब उनके है, न मेरे है,
पर जो मजबूर नहीं, उनकी मज़बूती मैं हूँ.. 🙏🏼

©सन्नी कुमार

हुनर में खास क्या रखा है

भावनाओं को समझिए तस्वीर में क्या रखा है,
यहां रोज चखते है मूर्ख सफलता का स्वाद लेकर आरक्षण की सीढ़ियां,
फिर हुनर में खास क्या रखा है?

यहां भारत बंद कराने की राजनीति ही होती आई है सालों से,
फिर गरीबी से लड़ाई में क्या रखा है?
सरकारी खर्चे पे रिसर्च करने वाला गरीबी से कुछ यूं लड़ता है,
खुद इंडस्ट्री लगा नहीं सकता शायद तभी पूछता है कि औरों ने कैसे लगा रखा है?

©सन्नी कुमार

अंबेडकर जयंति की शुभकामनाएं

बाबा के जन्मदिन पर उनको बधाई, आप जैसा व्यक्तित्व ढूंढना और समझना बहुत मुश्किल है खास कर तब जब भारतीय किताबों में, शहर के चौराहों पर, आपके संविधान और आपके खेले दलित कार्ड में विरोधाभास हो।
I mean एक तरफ जब देश के एक सम्पन्न वकील ने अफ्रीका से क्रांति की शुरुआत की और भारत आकर जिन कपड़ों और नियमों की होली जलाकर खुद आगे नंगे घूम रहे थे, एक ics क्वालीफाईड नेता ब्रिटैन की नौकरी छोड़ आजाद सेना बना रहा था, तो वहीं तब आप एक ऐसे गरीब परिवार से निकले जिसको विदेश मे न सिर्फ पढ़ने का बल्कि देश के लिए संविधान गढ़ने का भी अवसर मिला, और आपने शोषितों के लिए एक शानदार और बराबरी का कानून भी बनाया जो आज फेल साबित हो रहा है/किया जा रहा है, और आज यह निश्चित ही सामाजिक वैमनस्य का कारण बना हुआ है। आपकी आरक्षण को लेकर क्या सोंच थी और इसे किस तरह लागू किया गया है समझना मुश्किल है पर आज यह राजनेताओं के लिए संजीवनी है और पोस्टर बॉय बनाने का यह एक आजमाया आसान तरीका है। खैर आप आज होते तो आप भी क्षुब्ध होते क्योंकि आप बिना किसी आरक्षण के पढ़े थे और उस वक्त विदेश में पढ़े और सबके चहेते रहे जब देश बंगाल-बिहार में लाखों लोग अनाज के दो दानों के लिए तरसते होते थे, पर आज देश आजाद है आपकी बनाई कानून है और लोग अलग अलग जातियों के पोस्टर बैनर लिए भारत को बंद कराना चाहते, इनमे न कोई अधनंगा संत गांधी है, न खून के बदले आजादी सौंपने वाला नेताजी और न आप जैसा ब्लू सूट वाला महान चिंतक…

अम्बेडकर जयंती की शुभकामनाएं सिर्फ उनको जो दल के दलदल से बाहर है, और मौजूदा आरक्षण को लीगल भ्रस्टाचार मानते है।
हे राम!
जय हिंद!
जय भीम!

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