जी. डी. गोयनका में प्रतिष्ठापन समारोह हुआ सम्पन्न

गया शहर में अपनी एक अलग पहचान बना चुके चर्चित विद्यालय, जी. डी. गोयंका पब्लिक में शनिवार को स्कूल ऑडिटोरियम में इंवेस्टिचर सेरेमनी(प्रतिस्ठापन समारोह ) का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य छात्रों को उनकी कर्तव्यों व उत्तरदायित्वो को समझाने और भविष्य में सफल नेता बनने के लिए सशक्त रूप से सक्षम बनाना था। आयोजन की शुरुआत प्राचार्या स्वाति अहमद, एडमिन रौशन सिंह, कॉर्डिनेटर सन्नी कुमार व संदीपिका सिंह द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया गया। ततपश्चात विद्यालय के ही इग्नाइटर बैंड द्वारा स्वागत गीत “आ चल के तुझे” प्रस्तुत किया गया जिसे मौजूद दर्शकों ने खूब सराहा।

आज का दिन नई उम्मीदों को पंख देने का था, नए वादों का था जहाँ कल के लीडर आज अपने कर्तव्यों का भान करते हुए विद्यालय व शहर को अपनी ऊर्जा व क्षमता से विकसित भारत के सपने को आश्वस्त कर रहे थे। आज बच्चो के मतदान द्वारा चुने गए नए सत्र के स्टूडेंट कौंसिल की घोषणा हुई।जिसमें विभिन्न हाउस के कप्तान, उपकप्तान, डिसिप्लिन हेड, स्पोर्ट हेड, कल्चरल हेड, हेड बॉय, हेड गर्ल की घोषणा हुई और उनको सैशे व बैचेस पहनाई गई, साथ ही चयनित प्रतिनिधियों को उनके कर्तव्यों का भान कराते हुए प्राचार्या श्री स्वाति अहमद ने शपथ ग्रहण कराया गया।

कौंसिल के लिए हेड बॉय आदित्य, हेड गर्ल गीतांजलि, कल्चरल हेड श्रुति चटर्जी व आतिफ हसन, डिसिप्लिन हेड मुशर्रफ व खदीजा, स्पोर्ट्स हेड आदित्य राज व जुविरिया का चयन हुआ वहीं टेरेसा हाउस कप्तान ऋषित व तनुष्का, टैगोर हाउस कप्तान रवि कुमार रहे।

इस कार्यक्रम में चुनाव प्रक्रिया, परिणाम घोषणा और फिर बच्चों के लिए शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन कराने में समस्त शिक्षकों व एडमिन टीम का योगदान रहा। कुछ शिक्षको, जिसमे SST विभाग के तौसीफ़ सर, प्रीतम सर, फ्रेंच टीचर बिपिन सर, म्यूजिक टीचर साहिल सर, आर्ट्स टीचर तनुजा मैम व डांस टीचर अभिषेक सर का इस कार्यक्रम में अहम योगदान रहा। यह समस्त जानकारी विद्यालय के मीडिया प्रभारी व हिंदी विभाध्यक्ष श्री जनार्दन प्रसाद ने दी।

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मेरे शब्द उसके ख्वाब लिखते है

मेरे शब्द उसके ख्वाब लिखते है
और आँसू उसकी हक़ीक़त।

उसकी तस्वीरें दिल को सुकून देते है,

और उसकी याद दिल को तड़प।

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माफ करना मैं मशीन नहीं,
जो तुमको यूजर मैन्युअल दे दूं,
अगर तलब है तो उतरो आंखों में,
मैं तुमको प्यार का दरिया दे दूं।

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अक्सर हम लोगों का उपयोग करते है और मशीनों को समझते है जबकि जरूरत ठीक इसके विपरीत की है।
-श्री श्री (रविशंकर नहीं)

©सन्नी कुमार

-सन्नी कुमार

बड़बोले मत बनिये!

गोलू शरीर से बड़ा था तो मोलू को हमेशा कम आंकता था, वहीं दूसरी ओर मोलू बहुत परिश्रमी था और गोलू को नजरअंदाज करता था। कल की ही बात है जब मोलू ने GPL में 52 रन ठोक दिए वो भी मात्र 23 गेंदों मे पर कप्तान गोलू उससे नाराज रहा और बदले उसकी सराहना करने के उसने सुना दिया ‘कि यार मोलू तुमने 5-7 गेंदे डॉट कर दी वरना और बेहतर मैच बनता’।
मोलू सा हाल ही उस भोली का भी है जो अपने दफ्तर में खूब काम करने के बाद भी सुनती है, और ये सुनना FM सुनने की तरह सुरीला नहीं होता। आज ही कि बात है उसके घण्टों के काम को किसी आरामपसंद बड़बोले ने मिनट भर का बता उसे कम आंक दिया पर आज तो मानो भोली भोली न थी कोई अंजना ॐ कश्यम थी जिसने तराक से पूछ लिया कि महाराज यूं तो दिल्ली एक घण्टे में जाया जा सकता पर क्या आप हेलीकॉप्टर उपलब्ध करा सकते है? मतलब ये कि अगर data सही होगा तभी information सटीक मांगेंगे आप, खेत में गुल्ली डंडा देकर कोहली बन जाऊं ऐसी डिमांड क्यों रखते है….?

मैं माँ को सदा खुश रखूँ

मेरे कोई शब्द इतने मधुर नहीं, कि कोई कविता लिखूं
जिसने मुझे रचा उसके भाव, मैं कैसे रचूं?
वो मेरी उम्मीदों का आसमां है,
उसके दुआओं की बरसात में मैं रोज भिंगु,
उसकी सारी चाहतें, सारे ख्वाब मुझसे है,
कृष्णा देना इतनी हिम्मत मैं माँ को सदा खुश रखूं।
©सन्नी कुमार

(रविवार देख के मदर डे मनानेवालों ये पाश्चातय संस्कृति का ही देन है कि आज वृद्धाश्रम आम हो गया है, निवेदन है कि हर दिन अपनी माँ को अपने परिवार को दे और ये मई के दूसरे रविवार को मनाया जाने वाला दिन पश्चिम को ही मुबारक रहने दो।)

बनवास पे था मेरे घर का बचपन

बनवास पे था मेरे घर का बचपन,
सबको खबर हो वो अब लौट आया है,
चहकने लगी है आज सीढिया छत की,
जो उनसे लिपटने, उनपे रेंगने,
नन्हें कदमों का दौड़ आया है..

सज रही है खिड़की पार की पेड़-पौधे-झाड़ियां,
कि उनको समझने, उनकी बात करने,
नई नज़र लिए मेहमान आया है,
बनवास पे था जो मेरे घर का बचपन,
सबको ख़बर हो वो अब लौट आया है….

©सन्नी कुमार

मिलना जब जरूरी हो

मिलना जब हो जरूरी,
तो अक्सर पल नहीं मिलते,
लिखना जब हो कुछ खास, तो अक्सर शब्द नहीं मिलते,
आज जब चाहता हूं कि मिलके दूँ तुम्हें मुबारकबाद,
समय का खेल है ऐसा
कि अब आप नहीं मिलते।

है यादों में हमारे,
आपका रोज ही आना,
पर अब यादों से इतर,
हम रूबरू नहीं मिलते,
हो आपको खबर ये कि
अब भी बहुत मानते है हम,
जताते दिल के हर जज़्बात,
जो एक बार तुम मिलते।
©सन्नी कुमार

ऐसा कब सम्भव हो पाया है

मुस्कुराता रहा दिन भर,
जो तुम फिर याद आयी थी,
मालूम चला कि तप रहा हूँ बुखार में,
जब हक़ीक़त पास आई थी..

थी तुम एक हसीन ख्वाब,
जो मुझको मुझसे दूर ले गई,
जीवन के कड़वे सच का,
इस मूरख को ज्ञान दे गई।

आज मस्त हूँ अपने बढ़ते सफर में,
फिर ये मौसम, ये गलियां,

और गिनती के अच्छे लोग,
तुम्हारी याद दिलाते है,
पढ़ लेता हूँ अक्सर वो पन्ने,
जो तुम्हारी याद दिलाते है।

तुम हो नहीं आज,
पर तुमसे ज्यादा पाया है,
ख्वाबों से बेहतर हो गई जिंदगी,
तुम्हारे दुआओं में खुद को महफूज़ पाया है,
है हसरत एक आज भी,
की तुमसे मिलूं,
पर अतीत और वर्तमान मिल जाये,
ऐसा कब सम्भव हो पाया है? 😊
© सन्नी कुमार

मैं मूरख अंग्रेजी पर मरता हूँ

मैं हिंदी का बेटा हूँ,
उर्दू मेरी मासी है,
भोजपुरी भौजाई दाखिल,
बज्जिका मेरी बोली है..
मगही-मैथिली मुझे है चाहने वाले,
अवधी-खरी में जी मैं जंचता हूँ,
पर अपनों की खास कदर नहीं जी,
मैं मूरख अंग्रेजी पे मरता हूँ…
©सन्नी कुमार

मैं उनसा होना चाहता हूं

कुछ लोग मेरी मजबूरी है,
कुछ लोगों की मैं मजबूरी हूँ,
कुछ हुए अब तक मजबूर नहीं,
मैं उनसा होना चाहता हूँ…

कुछ को शोर शराबे की आदत,
कुछ चापलूसी के नायक है,
कुछ बचे है अब भी कर्मों के सिपाही,
मिल जिनसे रोज मैं सीखता हूँ।

कुछ बातों के अधिनायक है,
कुछ चुप्पी के महासागर है,
कुछ कर्मपथ के शांत सरोवर,
मैं जिनको लिखना चाहता हूं।

कुछ लोग मेरी मजबूरी है,
कुछ लोगों की मैं मजबूरी हूँ,
कुछ हुए अब तक मजबूर नहीं,
मैं उनसा होना चाहता हूँ…
©सन्नी कुमार

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