कैसी समानता?

मै “सामान्य” हूँ, पर मैं इनके नही सामान हूँ, बचपन में आजादी नहीं थी संग सबके खेलने की, दादाजी कहते थे तुम भूमिहार हो तुम्हारे समान नही सब  जात,  खेलना कूदना पढना सिर्फ ब्राह्मण भूमिहार बच्चों के साथ पर समय के साथ सब बदला, बदलना ही था जो गलत था पर जो सही था उनको क्यूँ बदला?
याद है की तब मैं ६-७ वर्ष का था, गाँव के ही एक हरिजन के बेटी की शादी थी, बाबूजी ने ५ रुपये दिए थे और बोला था की जब उसका दामाद तुम्हें प्रणाम करे तो ये पैसे तुम उसे देना, दो तीन शादियों में ऐसा हुआ की लोग जो मुझसे बड़े थे मुझे प्रणाम करते थे, मुझे अच्छा लगता था तब, पर मै पूछता था अक्सर घर में की हम भी कोई बड़े रईस नही, कोई बड़ी गाडी तो छोड़ घर पर एक भी चार चक्के की सवारी नही फिर भी इतनी खातारिदारी? बाबूजी चुप रहते थे मेरे सवालों से पर इतना कहते थे की ये लोग वो है जिनको हमने रहने के लिए जमीं दी थी, हमारे खेतों में काम करने का मौका, ये हमारे लिए काम करते है और हम इन्हें खाने पीने और जरुरत का सामान देते है. तब मुझे बड़ा लुभाता था यह सब, सच्ची मुझे भूमिहार होने का तब गर्व होता था.
फिर धीरे धीरे हम बड़े होने लगे, वक़्त जब बदल रहा था तभी गाँव में सालों बाद पंचायत चुनाव हुए मुखिया बने, फिर कई गरीबों का पक्का का घर बनाना शुरू हुआ, उससे पहले हमारे घर में शायद ही किसी हरिजन का पक्का का घर हुआ करता था, पर पक्के घर मिल जाने के बाद उनके हर साल घर की मरम्मत का फिक्र ख़तम हुआ और हमपर उनका बहत हद तक निर्भर होना भी. मुफ्त में आवास मिलने से कुछ बुजुर्ग चिंतित भी थे शायद उन्होंने आने वाले कल को भांप लिया था, शायद हमारे हाथ के लगाम को जाता जान लिया था. सरकार से खैरात में मिले घर अब धीरे धीरे सब के पास थे, और अब तो सरकार ने उन हरिजनों को नमक से भी सस्ते दर पर अनाज मुहैया कराना शुरू कर दिया, नतीजा यह हुआ की गाँव में कृषि मजदुर कम गए, उनकी मांग बढ़ी और उनकी भाव भी बढ़ गयी, आखिर उनको भोजन सस्ती मिलने लगी थी सो उनका खेतों में काम करने अब लुभाता नही था, अनाज सस्ता हो गया था उनके लिए फिर क्यों करते वो कृषि मजदूरी जहाँ अक्सर अनाज ही मिलता था, अब तो गाँव में लोग अनाज भी किसानो से कम और सरकारी राशन की दूकान से सस्ते में लेने लगे थे, एक तरफ मजदुर नही मिलते थे दूसरी तरफ अनाज का बाजार गाँव में समाप्त और बाजार जाकर बेचने की मुश्किल..धीरे धीरे फिर पलायन का दौर आया, मुझे याद है बचपन में शायद ही कोई कम पढ़ा लिखा व्यक्ति बाहर जाता था, सब खेती करते थे या फिर मजदूरी पर अब धीरे-धीरे हालत बदलने लगा था, सारे जवान पढ़े अनपढ़ शहरों की और भागने लगे थे, दादाजी भी वक़्त के साथ दूर हो गए और इस परिवर्तन को नहीं देख पाए.
आज हालत यह है की हम भूमिहार, जो कभी खेतों का दंभ भरते थे खेत बेचने को मजबूर है, खेत को बिन खेती छोड़ने को मजबूर है क्युकी कृषि मजदुर जो किसी जमाने में अनाज लेकर काम करते थे आज गाँव में मिलते नही, आखिर मिलते भी कैसे जब सरकार की महरबानियों ने कुछ हद तक उनको नकारा बना दिया था. कुछ लोग इसे एक साजिश भी कहते थे की भूमिहार जिनकी संख्या कम है और जो अधिकांश भूभाग पर स्वामित्व रखते है उनसे खेत छिनने का, उनको बेचने पर विवश करने का यह एक आसन उपाय था. खैर  सामान्य वर्ग में आना वाला यह समूह कभी सामान्य नही था, बिना सरकारी मदद के भी आज खडा है, हाँ यहाँ युवा वर्ग के युवाओं को घोर निराशा है आरक्षण को लेकर, सामान अवसर न मिलने को लेकर, किसान हतोत्साह भी है मजदुर न मिलने को लेकर पर संख्याबल की राजनीती के कारण कभी समाज का सिरमौर होने वाला समाज आज खुद को सरकारी लामबंदियों में, कुशाशन के कुचक्र, असमानता और सरकार का सताया हुआ मानता है. जो कभी खुद को समाज का मार्गदर्शक समझते थे आज के परिवर्तन के दौड़ में खुद की जमीं तलाश रहे है, उम्मीदें है की इस वर्ग के आने वाले बचपन को भले ही बड़े उम्र के लोगों से मुफ्त का सम्मान न मिले पर इनको सामान अवसर मिले, युवाओं को सरकार संख्याबल पर आंकना छोड़ कर उनकी दक्षता पर जांचें और मुफ्तखोरी के बजाय एक स्वस्थ समाज बनाएं जहाँ सबके लिए समान अवसर हो, और हमें सामान्य वर्ग में होना खले नहीं.

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