मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों

(१)
न गीताग्रंथ जपता हूँ,
न आयत-ए-क़ुरआन रटता हूँ,
मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों,
नेकी को सजदा करता हूँ।

है किसी को दीन की चिंता,
किसी को धर्म का है ख्याल,
मैं आशिक हूँ मेरे यारों,
दिलों की बात करता हूँ।

न जन्नत की मुझे ख्वाहिश,
न जहन्नुम का डर सताता है,
मैं ख्याली हूँ मेरे यारों,
ख्वाबों से हक़ीक़त सजाता हूँ।

कोई है ढूंढता रब को,
कोई ईश्वर से आस रखता है,
मैं मिलता हूँ जिससे भी,
उसी में रब ढूंढ लेता हूँ।

न गीताग्रंथ जपता हूँ,
न आयत-ए-क़ुरआन रटता हूँ,
मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों,
प्रकृति से प्रेम करता हूँ।

है मेरी भावनाएं जो जिंदा,
तकलीफों को जान लेता हूँ,
वो जो कुछ कह नहीं सकते,
मैं उनकी बात करता हूँ।
©सन्नी कुमार

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क्यूं मैं काफिर कहाता हूँ..

IMG_3537नहीं हूँ मैं नमाजी,
न ही गिरिजा जाता हूँ,
पर तुम्हारी ही मूरत बनाकर,
हर रोज शीश झुकाता हूँ.
फिर क्यूँ कहते है कुछ ख़ास बंदे,
कि मैं गुनाह करता हूँ?

हूँ मैं मुरख प्रेम-मत में,
जो तुम्हें मिट्टी में बसाता हूँ,
पर मैं मुरख हूँ सनातन,
तुम्हें कण-कण में पाता हूँ.
क्या यही है गुनाह मेरा,
जो मैं काफिर कहाता हूँ?

है मेरी नजरे जो कच्ची,
मुझे हर रंग लुभाता है,
कभी तुमको नीला बताता,
कभी काला मैं पाता हूँ.
कभी लगते तुम रंगों से इतर,
कभी ऊर्जा बताता हूँ..

खुदा है तू, तू है ईश,
मैं तो यही मानता हूँ,
होंगे तुम्हारे सौ और नाम,
मैं तो कृष्णा जानता हूँ.
क्या यही है गुनाह मेरा,
जो मैं काफिर कहाता हूँ?
-सन्नी कुमार

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