आज एक और दिसम्बर बीत गया..

दिन बदलते-बदलते,
अब ये बरस भी बदल गया।
धीरे धीरे ही सही,
ये मंजर सारा बदल गया।

द्रुत रफ़्तार से बढती जिंदगी,
उस मोड़ से आगे निकल गयी,
जहाँ दोस्तों का निर्मोह साथ था,
वो मोड़ अब पीछे छुट गया।

एक मयूरी जहाँ मिलती थी,
जहां छोटे बच्चो संग मस्ती किया करते थे,
अपने धुन में खो खुद की करना,
वो ज़माना अब पीछे छुट गया।।

जिंदगी मुझे मिली थी दिसम्बर में,
आज एक और दिसम्बर बीत गया।

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वो जिंदगी तुम हो

Swwweetttiiieeee
Swwweetttiiieeee

बंद आँखों से जिसे पढता हूँ वो किताब तुम हो,
होठो पे हरवक्त जो फबता है वो ग़ज़ल खास तुम हो,
हर घडी जिसे सुनता हूँ, वो लाजवाब धुन तुम हो,
जिसके हसरत में मै जगता हूँ, जिसके ख्वाब को सोता हूँ,
वो जिंदगी तुम हो, वो बंदगी तुम हो।

-सन्नी कुमार

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