चुनाव नहीं मतदान करें

Sunny Kumar Votedचुनाव नहीं मतदान करें,
नए भारत का निर्माण करें.

मत दो वोट गिरगिटों को,
न जयचंद की औलादों को,
है जिनका खुद स्पस्ट मत नहीं,
उन गद्दारों को अब वोट न दो।

दो ऐसा मत, सेना का मान बढे,
बेदी हो हर घर, न दूसरी दुर्भाग्यिनि बनें.
फिर कभी कश्मीर में तिरंगा लुटे न,
मुज़फ्फरनगर, कोकराझार में देश टूटे ना.

था विश्वगुरु यह भारत, फिर से वही गौरवमयी इतिहास बनें,
न बटें आपस में पाखंडो के नाम पर,
आदेश हो सर्वधर्म रक्षा की,
आओ ऐसे हम मतदान करें.

चुनते आ रहे पिछले ६५ सालो से,
इस बार, कुछ नया करना है,
अब और ना उलझे रोटी की जद में,
की इस बार मतदान हमें अब करना है.

मत दो ऐसे मतवाले को,
जो हो मतवाला, देश समर्पित,
न करो मतभेद जो भेष न बदले,
होगा काफी वो देश के हालत जो बदले.

भारत जग में और महान बने,
गौ, गंगा, गायत्री का भी सम्मान रहे,
कोई रोके न हिंदुस्तानी को हिंदुस्तान में,
सारे वतन में तिरंगा आन रहे.

की अब और नहीं घोटाला हो,
न कलमाड़ी न कोई राजा हो,
न ही लड़ाई छोड़ने वाला बेचारा हो,
जो दम्भ भरे और जग मूक हो जाए,
ऐसे हाथो में तुम कमान को दो.

जो सेवक हो, सेवा का अनुभव भी हो,
ऐसे सक्षम बेटे को बल अब दो,
क्या हुआ जो गांधी सा नाम नहीं,
कम है क्या बारह सालों में कोई दाग नहीं?

आप मत उलझो मेरे शब्दों में,
बस खुद से कुछ सवाल करो,
क्यों घेर रहे सब मिलके, उसको अभिमन्यु सा,
क्यों नहीं उससे कोई तरक्की की बात करें?

जो मिले जवाब उस को बुलंद करो,
जीते कोई जीत हो भारत की,
बस इतना ही तुम ख्याल रखो,
इस बार से वोट नहीं,
अपने मत का तुम दान करों,
की आओ इस बार मतदान करो.

-सन्नी कुमार
[एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी लगी कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]

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नरेंद्र मोदी जी को समर्पित मेरी कुछ बोल.

आज शंखनाद हुआ है.

२०१४ गुलज़ार होने वाला है तुझसे..

वो शुप्त नहीं है..

चुनाव नहीं मतदान करें

अरविन्द जी  के  ‘आप’ के लिए मेरे कुछ शब्द..

है दिल्ली से अनुरोध

आप किसकी बात करते हो

वो शुप्त नहीं है

narendra modi next pm indiaवो शुप्त नहीं है,
न ही रौशनी विहीन,
पर दिखे उन आँखों को कैसे,
जिनपे हो पट्टियाँ लगी?
है वो ओज़ गुण संपन्न,
सनातन धर्म से जुड़ा,
उसमें शंखनाद की हिम्मत,
विकास-पुरुष वो हुआ..

उसमें तेज है जान,
बहुतों ने दिए जलवाए,
कुछ ने आग भी लगवाएं,
किया क्या कोई उसने जुर्म,
जो उसने तेज धर्म निभाएं?

जिस रस्ते हो तेल छिड़का,
वहीँ से आग भी गुजरे,
फिर वहां जले न कोई,
क्या ऐसा हुआ है कभी?

क्यूँ आरोप बस उस आग पे,
की उसने घर थे जलाये,
क्यूँ नहीं उनका कुछ,
जिन्होंने तेल थे फैलाए?

नहीं करता कोई विवाद,
ना कोई पूर्व से प्रश्न,
मैं मानता ये सच हूँ,
कि उसने मान है बढायें|

वो शुप्त नहीं है,
न ही रौशनी विहीन,
पर दिखे उन आँखों को कैसे,
जिनको आँखें ही नहीं?

-सन्नी कुमार
[एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी लगी कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]
 

नरेंद्र मोदी जी को समर्पित मेरी अन्य कवितायें.

आज शंखनाद हुआ है.

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वो शुप्त नहीं है..

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