This is Azhaf Jamal. (Just a Test post)

azhaf-jamalThis is Azhaf Jamal, one of my student who asked me that how google find us. This post is just to show him how google can find Azhaf 🙂

Actually he is having two wishes first he want to be popular on search engines and second he want to be a good photo editor so that he can patch his pictures with Varun Dhawan. I have promised him to help for both…

Right Azhaf??

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मेरी सबसे बड़ी ख्वाहिश

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यूं तो ख्वाहिशों का कोई अंत नहीं.. ये एक अथाह समन्दर है मन में, जो हमारी पहचान बुनती है, जो जीवन के कालचक्र में ईंधन का काम करती है.. किसी को चाह बचपन की, किसी को चाह तर्पण की,
किसी को जन्नत लुभाता है, तो कोई फरिस्ता बनने की हसरत सजाता है। कोई परिवर्तन को है आतुर तो कोई इस पल में रुकना चाहता है। जितने लोग, उतनी हजार ख्वाहिशें…
ऐसे में मेरी भी कई ख्वाहिशें है, उन्हीं ख्वाहिशों के जरिये आज आपसे अपनी सबसे बड़ी ख्वाहिश बाँट रहा हूँ और मुझे उम्मीद है कि मेरी ख्वाहिशें आप पर भी असर करेगी।

सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं प्रकृति-गुण को अपनाउं,
बनूं वट-वृक्ष सा मैं, औरों को शांति-शीतलता पहुँचाऊँ.
अडिग रहूँ पर्वतों सा मैं, कभी मुश्किलों से ना मैं घबराऊँ,
सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं खुद में प्रकृति गुण को समाउं..

सुख-दुःख के आपाधापी में मैं कभी खुद को न उलझाऊँ,
सीख लूँ नदियों से मैं और अनवरत मंजिल को बढ़ता जाऊं.
चाहतें और जो समुन्दर सी है, उनको बून्द-बून्द भरता जाऊं,
खुद में मैं एक बाग़ बनूँ और दुनिया को महकाउँ..

कदम मिलाऊँ काल चक्र से और परिवर्तन को मैं आत्मसात करूँ,
दूँ अपना योगदान विश्व को और कुछ मैं भी अब ईजाद करूँ.
पर आधुनिकता के आडम्बर में, कभी प्राकृतिक सुंदरता को न बर्बाद करूँ,
बनूँ मैं जब भी प्रेरणाओं का बादल, धरा पर प्रेम-रस की बरसात करूँ..

सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं खुद में प्रकृति गुण को अपनाऊँ,
बनूं वट-वृक्ष सा मैं, औरों को शांति-शीतलता पहुँचाऊँ.
अडिग रहूँ पर्वतों सा मैं, कभी मुश्किलों से ना मैं घबराऊँ,
सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं खुद में प्रकृति गुण को समाउं..

जीऊँ मैं सनातन के मूल्यों पर, वसुधैव कुटुम्बकम् का प्रचारक बन जाऊं,
जगत में है भारत भूमि महान कि इसके गौरव के दिन लौटाउं.
है ऋण बहुत इस धरा का मुझपर, थोडा तो कर्ज चुकाऊं,
दुनिया को अपने सपनों से, जन्नत सा सुंदर सजाऊँ..

रंग-धर्म-भाषा भेद को, ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार करूँ,
है विभिन्नता में बसी खूबसूरती, इस विचार का प्रसार करूँ.
शब्दों से लुभाना जो हमको है आता कि उसका मैं उपयोग करूँ,
है विश्व में हर जीवन अमूल्य, इनको बचाने का मैं अनुरोध करूँ..

मेरी हजारों ख्वाहिशों की ख्वाहिश कि मैं प्रकृति गुण को आत्मसात करूँ,
दुनिया से जो कुछ मिला है मुझको उस सब का मैं सदुपयोग करूँ,
सूरज-सितारों की तरह, छोटा ही सही पर दिप बनूँ,
पूरी दुनिया न सही पर आस-पास तो गुलज़ार करूँ..
-सन्नी कुमार

Credit for this poem goes to my school( G.D. GOENKA PUBLIC SCHOOL, Gaya) Creative Writing Competition as because I got this topic to think upon and once i started i came up with this beautiful poem.
To read my other poems please click on ‘मेरी कविता’ category. Drop your comments and keep me motivated. Thank You for visiting Sunny Kumar’s Blog( http://www.sunnymca.WordPress.com ) Love!

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