वो पल अब भी है साथ..

वक़्त भले बीत गया,
पर वो पल अब भी है साथ|
होता था जब साथ हमारा,
सूर्योदय-सूर्यास्त…

सुबह की पहली धुप जब,
सेकते थे हम सब साथ|
हलकी-फुल्की योगा या फिर,
करते थे कुछ कसरत खास ..

था मौसम गर्मी का वो,
पर छुट्टी से तो सबको प्यार,
गर्मी की उन छुट्टियों में,
क्रिकेट का था चढ़ा बुखार..

सुबह की पहली किरणों संग ही,
लहरा देते थे बल्ला यार,
जो जीत गए सुबह की मैचें,
दिन भर करते थे आराम..

जब सुबहें हार दिखाती थी,
करते शाम का इन्तेजार,
और शाम की जीत के साथ,
सुबह को हम भूलते थे..

जो भी हो उन खेल का पर
वो पल अब भी साथ..
खेलो में यारो के नखरे,
नहीं कोई नयी बात..

उन सुबहों की ताजगी,
ताजा करती मुझे आज भी..
सूरज को जब देखता हूँ,
वही स्फूर्ति फिर पाता हूँ..

वक़्त भले बीत गया,
पर वो पल अब भी है साथ|
होता था जब साथ हमारा,
सूर्योदय-सूर्यास्त…

-सन्नी कुमार
[एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी लगी कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]

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