आज तू और आसमां

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Wd Love

आज तू और आसमां, मुझपे दोनों ही मेहरबान है..

तुम्हारे एहसासों की गर्मी और ये बारिश की नरमी,
हर रिश्ते की गर्माहट, देती खुशियों की नई आहट,
सपनों से अपनों तक का करता आज सफर,
ये खूबसूरत लम्हें ही तो है, जिनपे करूं मैं खूब फकर..

आज तू और ये रेल, मुझपे दोनों ही मेहरबान है..
तुम्हारे दिल पे मेरा जोर, और इंजन के सीटियों का शोर,
है ये रोमांचकारी भोर, जो ले जा रहा सपनों की ओर,
सरपट दौड़ता ट्रेन का चक्का, और साथ तुम्हारा पक्का,
ये मिट्टी की ख़ुशबू वाला इत्र, और तुम्हारा मेरे कंफर्ट को लेकर फ़िक्र,
ये खूबसूरत यात्राएं हीं तो है, जिनका करूं मैं खूब जिक्र..
-सन्नी कुमार

बस मुस्कुरा देता हूं…

तुम याद आती हो अब भी रोज़, पर फिर मैं भुला देता हूँ,
दिल चाहता है तुमसे रूबरू होना, पर हसरतों को दिल में दबा देता हूँ,
आज भी उलझता हूँ, उन रूठे ख्वाबों को सहेजने में,
पर अब हकीकत की खुशी है इतनी,
कि जिन्दगी को कर शुक्रिया, बस मुस्कुरा देता हूं…
-सन्नी कुमार

तुम्हारा जिक्र जरुरी है..

My Secret Diaryजिन्दगी के किताब में,
तुम्हारा जिक्र जरुरी है,
प्यार से महके मेरा जीवन,
सो तुम्हारे यादों का इत्र जरुरी है..
जिन्दगी के किताब में,
तुम्हारा जिक्र जरुरी है..

बेहतर है आज मेरा कल की रूसवाइयों से,
पर इस वर्तमान के मोल की खातिर,
तुम्हारा इतिहास जरुरी है..
जिन्दगी के किताब में,
तुम्हारा जिक्र जरुरी है..
-सन्नी कुमार

क्यों न जनता बागी हो जाए?

हाल के दिनों में जो घटनाएं बिहार में फलित हुयी है उनमें मोटा मोटा ये रहा कि सरकार शराब बन्दी को लेकर सरकार काफी शख्त दिखी और इसके लिए उन्हें धन्यवाद, पर क्या शराब ही एकमात्र बिमारी है इस बदहाल बिहार का? नहीं! यहां बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, जनसंख्या और सबसे घातक बीमारी, अपराध रहा है पर दशकों से बिहार की आम जनता न्याय को तरस रही है और उन्हें मिला कुछ नहीं, बल्कि अपराध और अपराधी खुले घूमते है, चाहे शहाबुद्दीन हो, राजबल्लभ, रॉकी यादव् या सैकड़ों छोटे बड़े नाम जिन्होंने आम जन का शोषण किया हो… बिहार की मिट्टी मानों अपराध के लिए और भी उर्वर हो गयी है। यहाँ निवेश के नाम पर कुछ नहीं है, काश यहाँ के करोड़पति नेता ही कुछ बिजनेस शुरू करते और लोगों को रोजगार देते पर नही ये गरीबी को सिर्फ मुद्दा मानते है और ये वही मुद्दा है जो इन नेताओं को गद्दी तक पहुंचाता है सो ये कतई गरीबी को खत्म या कम करने का प्रयास नही करेंगे.
इन्हीं शिकायतों को, मेरी पीड़ा को यहाँ कविता के रूप में पढें, सहमत हो तो शेयर करें।

तुम निर्लज्जों के ओछे कर्मों से,
लज्जित हुए हम पछताते है,
अखबारों के पन्ने हरदिन जब,
तुम्हारे काले कर्मों से भरे पाते है,
क्यों देते है वोट तुम्हें हम,
सोंच सोंच जल जाते है।

कैसे हो तुम जनता के सेवक,
जो जनता का सोशन करते हो,
फटेहाल हर दूसरी जनता,
और तुम मेर्सेडीज में घूमते हो,
करते हो तुम कौन व्यापार,
जो अकेले ही फलते हो,
रोजगार के त्रस्त है जनता,
क्यों उनको भी अवसर नहीं देते हो?

बाँट बाँट कर धर्म-जात में,
तुम अपना हित बस साधते हो,
टोपी-तिलक और ऊंच नीच में,
जनता को भरमाते हो,
और अभिनव भारत के सपने पर,
मौन मोहन बन जाते हो।

लूट-गबन और हत्या से तुम,
कौन सी कीर्ति रचते हो,
शर्म नहीं आती क्या तुमको,
जो दोहरी नीति रखते हो,
जनता को तुम नित नियम सिखाते,
और खुद अपराधियों से साठ-गांठ रखते हो,
जनता को मिले अब न्याय भी कैसे,
तुम जो न्याय को बंधक रखते हो..

कहो क्यों न जनता बागी हो जाए,
और फ़ेंक उखाड़े सिस्टम को,
क्यों न उठा ले शस्त्र खुदी हम,
न्याय, धर्म की रक्षा को,
मिलते है जो अपराध को शह अब,
क्यों न मार भगाये इन नाकारों को,
कब तक सहे आखिर हम जनता,
तुम भ्रष्ट सत्तासुख लोभियों को?

अब जब मिलता न्याय नहीं,
न बनती है हक़ में कानून,
कब तक रखे धैर्य हम जनता,
कब तक रखें हम सब मौन,
क्यों न खुद की किस्मत अब खुद ही लिख लें,
कहो, अब क्यों न हम बागी हो जाए?
-सन्नी कुमार

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मेरी सबसे बड़ी ख्वाहिश

यूं तो ख्वाहिशों का कोई अंत नहीं.. ये एक अथाह समन्दर है मन में, जो हमारी पहचान बुनती है, जो जीवन के कालचक्र में ईंधन का काम करती है.. किसी को चाह बचपन की, किसी को चाह तर्पण की,
किसी को जन्नत लुभाता है, तो कोई फरिस्ता बनने की हसरत सजाता है। कोई परिवर्तन को है आतुर तो कोई इस पल में रुकना चाहता है। जितने लोग, उतनी हजार ख्वाहिशें…
ऐसे में मेरी भी कई ख्वाहिशें है, उन्हीं ख्वाहिशों के जरिये आज आपसे अपनी सबसे बड़ी ख्वाहिश बाँट रहा हूँ और मुझे उम्मीद है कि मेरी ख्वाहिशें आप पर भी असर करेगी।

सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं प्रकृति-गुण को अपनाउं,
बनूं वट-वृक्ष सा मैं, औरों को शांति-शीतलता पहुँचाऊँ.
अडिग रहूँ पर्वतों सा मैं, कभी मुश्किलों से ना मैं घबराऊँ,
सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं खुद में प्रकृति गुण को समाउं..

सुख-दुःख के आपाधापी में मैं कभी खुद को न उलझाऊँ,
सीख लूँ नदियों से मैं और अनवरत मंजिल को बढ़ता जाऊं.
चाहतें और जो समुन्दर सी है, उनको बून्द-बून्द भरता जाऊं,
खुद में मैं एक बाग़ बनूँ और दुनिया को महकाउँ..

कदम मिलाऊँ काल चक्र से और परिवर्तन को मैं आत्मसात करूँ,
दूँ अपना योगदान विश्व को और कुछ मैं भी अब ईजाद करूँ.
पर आधुनिकता के आडम्बर में, कभी प्राकृतिक सुंदरता को न बर्बाद करूँ,
बनूँ मैं जब भी प्रेरणाओं का बादल, धरा पर प्रेम-रस की बरसात करूँ..

सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं खुद में प्रकृति गुण को अपनाऊँ,
बनूं वट-वृक्ष सा मैं, औरों को शांति-शीतलता पहुँचाऊँ.
अडिग रहूँ पर्वतों सा मैं, कभी मुश्किलों से ना मैं घबराऊँ,
सबसे बड़ी ख्वाहिश मेरी कि मैं खुद में प्रकृति गुण को समाउं..

जीऊँ मैं सनातन के मूल्यों पर, वसुधैव कुटुम्बकम् का प्रचारक बन जाऊं,
जगत में है भारत भूमि महान कि इसके गौरव के दिन लौटाउं.
है ऋण बहुत इस धरा का मुझपर, थोडा तो कर्ज चुकाऊं,
दुनिया को अपने सपनों से, जन्नत सा सुंदर सजाऊँ..

रंग-धर्म-भाषा भेद को, ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार करूँ,
है विभिन्नता में बसी खूबसूरती, इस विचार का प्रसार करूँ.
शब्दों से लुभाना जो हमको है आता कि उसका मैं उपयोग करूँ,
है विश्व में हर जीवन अमूल्य, इनको बचाने का मैं अनुरोध करूँ..

मेरी हजारों ख्वाहिशों की ख्वाहिश कि मैं प्रकृति गुण को आत्मसात करूँ,
दुनिया से जो कुछ मिला है मुझको उस सब का मैं सदुपयोग करूँ,
सूरज-सितारों की तरह, छोटा ही सही पर दिप बनूँ,
पूरी दुनिया न सही पर आस-पास तो गुलज़ार करूँ..
-सन्नी कुमार

Credit for this poem goes to my school( G.D. GOENKA PUBLIC SCHOOL, Gaya) Creative Writing Competition as because I got this topic to think upon and once i started i came up with this beautiful poem.
To read my other poems please click on ‘मेरी कविता’ category. Drop your comments and keep me motivated. Thank You for visiting Sunny Kumar’s Blog( http://www.sunnymca.WordPress.com ) Love!

ख्वाबों को बुनने दो

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ख्वाबों को बुनने दो,
ख्यालों को पलने दो,
समेट लेंगे ये चादर में आसमां,
जो इनको उड़ने की आजादी दो।

कलियों को खिलने दो,
बचपन को संवरने दो,
बदलेंगे यही संसार को कल में,
जो इनको आज से सपने दो!

बेमतलब न रोको-टोको इनको,
न समझ की सीमाओं में बांधो,
ये स्वछन्द मन कल संवारेंगे दुनिया,
इनको बस सही लगन लगवा दो।

चुनने दो इनको अपने सपने,
जो मर्जी है बनने दो,
ख्याल रखो इनके ख्यालों का,
और सही गलत का भान करा दो।

ख्वाबों को बुनने दो,
ख्यालों को पलने दो,
समेट लेंगे ये चादर में आसमां,
जो इनको उड़ने की आजादी दो।
-सन्नी कुमार

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उसके साथ की वो तस्वीर

उसके साथ की वो तस्वीर,
जिसे देख वर्षों मुस्कुराता रहा,
कभी उसको,
कभी ईश्वर को आभार जताता रहा,
कभी लिखकर, कभी जीकर,
खुद को मैं बहलाता रहा..

वही, उसके साथ की वो तस्वीर,
पिछले साल रुलाने लगी,
उसके हसीन किस्सों को,
यह जब फरेब बताने लगी,
थक कर छुपा दिया उसको,
जब हर पल दिल को दुखाने लगी..

उसके साथ की वो तस्वीर!

जो उसकी तरह ही दिल के करीब थी,
महीनों आँखों से ओझल रही,
बिछड़कर उससे दिल को,
उसके ख्याल भी खूब आये,
पर उसके साथ में रोने को,
हाथों में फिर वो तस्वीर नहीं आयी..

मुश्किल था यादों के भँवर से निकलना,
पर बेमन ही सही मैं निकल कर आया,
जब डुबोने मुझे, मेरे सामने,
उसकी साथ की वो तस्वीर नहीं आयी..
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कल जब हंस रहा था बीते दिनों पर,
वफ़ा-बेवफा के बेतुकेपन पर,
फिर याद, उसके साथ की वो तस्वीर आयी..

-सन्नी कुमार

(कमेंट करेंगे तो लिखेंगे, वरना काम और भी है 😉 )