बाल दिवस पर कविता

बाल दिवस

तुम ख़ुशियों के वो बादल हो,
जो बरसे सावन ले आये,
तुम उम्मीदें इस आँगन की,
जिसे बढ़ता देखना सब चाहे।

तुम गीली मिट्टी के वो मानस हो,
जो चाहे खुद में बन जाओ,
हर ज्ञान तुम्हारे अंदर है,
जो मर्ज़ी बाहर ले आओ।

तुम खुशियों के वो बादल हो,
जो बरसे सावन ले आओ।

हर आशीष तुम्हें, हर साथ तुम्हें,
तुम अपनी जिंदगी जी भर जी जाओ,
पढ़े किताबें दुनिया तुम्हारी,
ऐसी एक सहज कहानी लिख जाओ।

सफ़ल-असफ़ल सब मिथ्या है,
हे अर्जुन! अपना कर्म बस कर जाओ,
है तुमसे यह धन्य धरा,
तुम इसे अपने रंगों से रंग जाओ।

तुम खुशियों के जो बादल हो,
आज बरसो सावन ले आओ।

आपका
सन्नी कुमार अद्विक

Wish you all a happy children day आप सब में जो बचपन समाया है उसे जश्न के हजारों अवसर मिले यही कामना।

आज फुर्सत में हूँ

आज फुर्सत में हूँ,
फुर्सत के ही साथ में हूँ,
बहुत दिन से मिली नहीं थी,
थी मुझे बहुत जरूरत उसकी,
पर दिनों से है की दिखी नहीं थी..

आज भी शायद नज़रे चुरा कर,
कहीं और ही जा रही थी,
पर तलब और तबियत के सख्त पहरों से,
आज बच के निकल न सकी थी..

और अब जब साथ में है,
तो है थोड़ी सहमी, थोड़ी शरमाई,
उसका कहना है कि वो भी इंतेजार में थी,
पर मैंने ही न पुकारा,
कि वो तो कबसे आस में थी।

कि वो तो आती थी, मुझसे रोज ही मिलने,
मेरे खाने के बाद, तो कभी सोने से पहले,
पर अक्सर मैं ही मशगूल होता था,
काम के करारनामों में उलझा होता था..

वो भी चाहती थी मुझसे रोज ही मिलना,
मुझसे सच कहना, मेरी कविताओं को सुनना,
पर उस आरामपसंद को मिलने न दिया जाता था,
की तब उलझा होता था मैं, और काम पहरे पे होता था..

उसका कहना है कि आज भी वो कोई नज़रे चुरा कर नहीं जा रही थी,
अरे मिलना वो भी चाहती थी, पर जताना नहीं चाहती थी,
बहुत कुछ हिसाब थे उसके पास, जो कबसे वो देना चाहती थी,
लाई थी कई किस्से, कई ख्वाब भेंट करना चाहती थी,
पर मेरी व्यस्तताओं से डर, दूर हो जाया करती थी,
और आज जब न काम पहरे पे था, न व्यस्तता उसको दिखी,
तभी उसका मिलना सम्भव हुआ,
क्या खोया, क्या पाया, है जाना कहाँ,
आज फुर्सत में फुर्सत से चर्चा हुआ…
©सन्नी कुमार

हे कृष्णा

हे कृष्णा,
मेरी कलम में तुम थोड़े,
बंसी के लय घोलो न..
मुझे पढ़कर सबमें प्रेम बढ़े,
ऐसे किस्से मुझसे गढ़वाओं न..
सुनने को सब मुझे भी ललचे,
कुछ ऐसी मायाजाल बिछाओ न..
मेरी कलम में तुम थोड़े,
बंसी के लय घोलो न..

प्रेम-धर्म की स्थापना को,
हे वसुदेव तुम जब उतरते हो,
तो कभी मेरे शब्दों में भी,
अपने संदेश सुनाओ न..
है रण होता रोज आज भी,
कि आज भी युवा-अर्जुन है भ्रम में,
उसे बताने सही-गलत तुम,
उसके मन-मस्तिष्क में बसों न..
मेरी कलम में तुम थोड़े,
गीता-सत्य को घोलो न.

हर जगह फसाने को,
सकुनी पासा थामे बैठा है,
जहाँ युधिष्ठिर रोज दाव हारते है,
और मोह में अंधे दुर्योधन को श्रेष्ठ बताते है,
दिलाने पांडवों को हक़,
हे कृष्ण शंख बजाओ न..
होती है हमेशा सत्य की जीत,
आज के अर्जुनों को बताओं न..

चाहता हूँ जो कहूँ सबसे,
वही पहले तुम्हें सुनाता हूँ,
हे हरि! सच में, यहां खुद को,
मैं भी अकेला ही खुद को पाता हूँ..
आकांक्षाएं मेरी कुछेक जो है,
उसपे दुर्योधनों का ही सत्ता पाता हूँ,
ताउ धृतराष्ट्र की मर्यादा है,
और राजा से बैर कर द्रोही नहीं बनना चाहता हूँ,
पर फिर यह महान जीवन जो व्यर्थ रहेगा,
ऐसा होते भी नही देखना चाहता हूं..

सो इस भवसागर से हे भगवान,
मुझको भी पार लगाओ न,
गर्व लिखूँ, मैं भी गर्व जीऊँ,
मुझको अपना पार्थ बनाओ न,
क्या सही क्या है गलत,
इसके भान कराओ न,
अपने इस अर्जुन को,
रण में मार्ग दिखाओ न..

हे कृष्णा मेरे कविता में,
अपने बंसी के धुन घोलो न,
लिखूं मैं जब-जब धर्म की रक्षा में,
तब तुम मेरे शब्दों में विराजों न..
मेरे जीवन, मेरे आचरण में भी तुम,
कभी अपनी झलक दिखाओं न..
मैं भी जीउ-लिखूं बस प्रेम-धर्म को,
मुझे भी अपना शिष्य बनाओ न..
©सन्नी कुमार

बनवास पे था मेरे घर का बचपन

बनवास पे था मेरे घर का बचपन,
सबको खबर हो वो अब लौट आया है,
चहकने लगी है आज सीढिया छत की,
जो उनसे लिपटने, उनपे रेंगने,
नन्हें कदमों का दौड़ आया है..

सज रही है खिड़की पार की पेड़-पौधे-झाड़ियां,
कि उनको समझने, उनकी बात करने,
नई नज़र लिए मेहमान आया है,
बनवास पे था जो मेरे घर का बचपन,
सबको ख़बर हो वो अब लौट आया है…
-©सन्नी कुमार

बनवास पे था मेरे घर का बचपन,
सबको खबर हो वो अब लौट आया है,
चहकने लगी है आज सीढिया छत की,
जो उनसे लिपटने, उनपे रेंगने,
नन्हें कदमों का दौड़ आया है..

सज रही है खिड़की पार की पेड़-पौधे-झाड़ियां,
कि उनको समझने, उनकी बात करने,
नई नज़र लिए मेहमान आया है,
बनवास पे था जो मेरे घर का बचपन,
सबको ख़बर हो वो अब लौट आया है….

©सन्नी कुमार

मजदूर का जीवन

फूस के मकान में मेरा जन्म हुआ,
और फूस में ही बीता बचपन, ब्याह हुआ,
धन्य हो यह सरकार जो हाल में परधान मंत्री आवास मिला,
कहने को तो घर ही है, पर भ्रस्टाचार से बचा बस दीवार मिला।

हिस्से में जमीन, जो कुछ गज भर थी,
सो अपनों में तकरार हुआ,
थी टीस बड़ी पर न्याय सुलभ कहाँ,
है जेब भी खाली आभास हुआ,
फिर किस मुंह से जाते कोट-कचहरी,
सो लाठी-गारी से सब बात हुआ,
कुछ लोग थके कुछ हम भी थके,
फिर अपनी पेट भरने में सब भूल गया।

हर रोज सुबह एक नई मुसीबत,
पर मैं कभी हिम्मत न हारा,
हारता भी कैसे तब भूख ही मेरी प्रेरक थी,
मैं रोज रोटी जीतकर लाता था,
कभी खेतों से, कभी कारखानों से,
कभी दफ्तर से, कभी दुकानों से,
आसान नहीं था हर रोज काम पाना,
पर फिर मैं भर पेट भोजन पे भी तो खट आता था,
ज्यादा ख्वाब नहीं थे मेरे तभी चैन की नींद मैं पाता था,
मैं था कोई कवि नहीं, न इश्क़ मुझे भरमाता था,
था शायद यही कारण कि मुझे चाँद भी नहीं लुभाता था।

खैर बचपन बीता बाप भरोसे,
जवानी पसीनों के बल पर मैंने जीया,
पर आज बुढापा मार रही है,
हूँ बोझ ऐसा बता रही है,
बेटे बहू का कैसे दोष मैं दूं,
वो दूर भले पर कुछ रोटी तो भेज रहे है,
ये घर गांव आज भी उजड़ा है,
और वो मेरी तरह औरों के आशियां सजा रहे है।

आज दोपहर मुझको चिढा रही है,
हूँ बेकार बतला रही है,
कामगारों की किस्मत का,
जिंदगी रोज मखौल उड़ा रही है,
देश की नीतियों से गायब है वृद्ध,
और सरकार विकास का शोर मचा रही है।

दोष कैसे दूँ मैं औरों को,
कि जवानी में मैं क्यों मजदूर हुआ,
तब खिचड़ी नहीं थे स्कूलों में,
सो बचपन से ही कामगार हुआ,
काश तब पढ़ लेता दो-चार किताबें,
और पा लेता कोई नौकरी आम,
फिर होता पेंशन का अधिकारी,
नहीं मिलती बुढापे अकेलेपन और भूख की मार,
काश बना लेता एक आशियाँ अपना भी,
तो ये सूरज और चांद न चिढाते आज,
जो कुछ मैं आज झेल रहा हूँ,
आगे यह अब देश न झेले,
ऐसा कोई करो विधान,
हो हर वृद्ध सशक्त, मिले सम्मान।
©सन्नी कुमार

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