कभी मुग्ध हो मेरी कविता पर..

कभी मुग्ध हो मेरी कविता पर,
तुम अपने कहानी में जो मोड़ बनाओ,
कभी मान मेरी बातों को,
तुम अपने जीवन में जो नए अर्थ सजाओ,
कभी खोकर मेरी आँखों में,
तुम अपने ख़्वाबों में जो मुझे बसाओ,
हो सरस-सुफल मेरा यह जीवन,
तुम अपने में जो मुझे बसाओ..
©सन्नी कुमार ‘अद्विक’

वो सावन अब तक नहीं आया

आज अपनी ही तस्वीर देखी तो कमबख्त ये ख़्याल आया,
कि लिखते रहे औरों को इतना डूबकर कि खुद का ख्याल भी नहीं आया,
औरों को लुभाने की चाह में मैं खुद को ही भूला आया,
आज कहते है सभी अपने कि थोड़ा मैं भी मुस्कुरा लूं,
पर कैसे कि वजह लेकर वो सावन अब तक नहीं आया..
©सन्नी कुमार ‘अद्विक’

बनवास पे था मेरे घर का बचपन

बनवास पे था मेरे घर का बचपन,
सबको खबर हो वो अब लौट आया है,
चहकने लगी है आज सीढिया छत की,
जो उनसे लिपटने, उनपे रेंगने,
नन्हें कदमों का दौड़ आया है..

सज रही है खिड़की पार की पेड़-पौधे-झाड़ियां,
कि उनको समझने, उनकी बात करने,
नई नज़र लिए मेहमान आया है,
बनवास पे था जो मेरे घर का बचपन,
सबको ख़बर हो वो अब लौट आया है…
-©सन्नी कुमार

बनवास पे था मेरे घर का बचपन,
सबको खबर हो वो अब लौट आया है,
चहकने लगी है आज सीढिया छत की,
जो उनसे लिपटने, उनपे रेंगने,
नन्हें कदमों का दौड़ आया है..

सज रही है खिड़की पार की पेड़-पौधे-झाड़ियां,
कि उनको समझने, उनकी बात करने,
नई नज़र लिए मेहमान आया है,
बनवास पे था जो मेरे घर का बचपन,
सबको ख़बर हो वो अब लौट आया है….

©सन्नी कुमार

हुनर में खास क्या रखा है

भावनाओं को समझिए तस्वीर में क्या रखा है,
यहां रोज चखते है मूर्ख सफलता का स्वाद लेकर आरक्षण की सीढ़ियां,
फिर हुनर में खास क्या रखा है?

यहां भारत बंद कराने की राजनीति ही होती आई है सालों से,
फिर गरीबी से लड़ाई में क्या रखा है?
सरकारी खर्चे पे रिसर्च करने वाला गरीबी से कुछ यूं लड़ता है,
खुद इंडस्ट्री लगा नहीं सकता शायद तभी पूछता है कि औरों ने कैसे लगा रखा है?

©सन्नी कुमार

युवावों का देश, युवाओं के नारे

युवावों का देश, युवाओं के नारे,
सत्ता में गायब है फिर भी बेचारे।
पक्ष जिनको पकौड़ा तलना सीखा रहा,
और विपक्ष पत्थरबाजी जिनसे करा रहा,
नाज करे क्या उस युवादेश पर,
जो मुल्क की बर्बादी के नारे लगा रहा?

सत्ता कहती है- मरता है रोहित मरने दो,
कन्हैया-खालिद को कचड़ा करने दो,
इनको ॐ-सुंदर-सत्या से अनजान रखो,
बस इनकी लाइक-कमेंट की भूख बरकरार रखो।
ये फिर कल पकौड़ा या पत्थर चुन लेंगे,
और तब हम इनको कार्यकर्ता मुफ्त में रख लेंगे।

ये तोते है रट लगाएंगे,
पर तुम तो बस जाल फैलाओ,
जात-धर्म और ऊंच नीच में,
हर बार खुदी ये फस जाएंगे,
बड़ी जल्दी में है इनके चाहत का ट्रिगर,
ये बर्बादी तक इसे चलाएंगे।

कैसे करु मैं नाज इस युवादेश पर,
जो सियासत का बनता चारा है,
दिन रात है रहता रटता किताबें,
ले-देकर नौकरी की आस में जीता है,
सत्ता-सियासत ने जिसको बस वोट है समझा,
क्या वो क्रांति की जुर्रत रखता है?
©सन्नी कुमार

दिल कहता है कलम छोड़, अब बन्दूक उठा लूँ

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दिल कहता है कलम छोड़, अब बन्दूक उठा लूँ,
स्याही फीके हो गए, गदर से अपनी बात सूना दूँ,
शिकायतों का हो दौर खत्म,
कपूतों को उनके अंजाम बता दूँ,
दिल कहता है कलम छोड़, अब बन्दूकें उठा लूँ।

जेहादी कट्टरता ने बहकाया बहुत, की थोडा इनको भी समझा दूँ,
भ्रस्टाचारी कांपे थरथर, कुछ ऐसी दहशत फैला दूँ,
गधों को घोड़े संग दौराने की जिद को फौरन रुकबा दूँ,
दिल कहता है कलम छोड़, अब बन्दूकें उठा लूँ।

-सन्नी कुमार


“Dil hai kalam chhod,
ab bandook utha loon,
syahi pheeke ho gaye,
gadar se apni baat sunaa doon,
shiqayton ka ho daud khatm,
kaputon ko unke anjaam bataa du,
dil kahta hai kalam chhod,
ab bandook utha loon..

Jehaadi kattarta ne bahkaaya bahut,
ki thoda inko bhi samjha doon,
bhrastachaari kaape tharthar,
kuchh aisi dahshar phailaa doon,
gadho ko ghode sang duudane ki,
Jeed phauran rukwa doon,
dil kahta hai kalam chhod,
ab bandook uthaa loon…”

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