ख्वाबों को बुनने दो

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ख्वाबों को बुनने दो,
ख्यालों को पलने दो,
समेट लेंगे ये चादर में आसमां,
जो इनको उड़ने की आजादी दो।

कलियों को खिलने दो,
बचपन को संवरने दो,
बदलेंगे यही संसार को कल में,
जो इनको आज से सपने दो!

बेमतलब न रोको-टोको इनको,
न समझ की सीमाओं में बांधो,
ये स्वछन्द मन कल संवारेंगे दुनिया,
इनको बस सही लगन लगवा दो।

चुनने दो इनको अपने सपने,
जो मर्जी है बनने दो,
ख्याल रखो इनके ख्यालों का,
और सही गलत का भान करा दो।

ख्वाबों को बुनने दो,
ख्यालों को पलने दो,
समेट लेंगे ये चादर में आसमां,
जो इनको उड़ने की आजादी दो।
-सन्नी कुमार

(credit:- Students of G D Goenka Public School, Gaya)

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Kacchi Sadak, Pakke Dost

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वो बचपन, निराला, मासूम, बचपन.
कितना प्यारा था,
आज भी मुस्कुराने की वजहें देता है,
वो आजाद बचपन.

उसकी संकड़ी गलियां, थोड़ी कच्ची थी,
पर वहां मिलने वाले दोस्त, सब पक्के थे.
वो सड़क शहर जो से मिलती नहीं थी,
सो आराम में थी,
हमारी हमारे लिए ही थी.

आज बचपन में बने वो दोस्त,
उन गलियों से निकलकर,
कही खो गए है,
शहर के पक्की, चौड़ी सड़कों पर।

मालुम है वो भी याद करते है हमको,
और गाँव की उस आजाद,
आरामपसंद कच्ची सड़क को..

पर हम अब न बच्चे है,
न वो आजादी है,
न वो सड़क कच्ची है,
न अब दोस्ती रही पक्की..

सब खो गया है,
समृद्धि और नए मुकाम की जद में..
दिल है जो हमेशा याद करेगा,
उस कच्ची सड़क को,
उसकी आराम पसंद, आजादी को,
और कच्चे सड़क पर मिलने वाले पक्के दोस्तों को..

-सन्नी कुमार
[एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी लगी कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]

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Wo bachpan, Nirala, Masum bachpan.
Kitna pyara tha,
aaj bhi muskurane ki wajahein deta hai,
wahi aajad bachpan…

Uski sankadi galiyan, thodi kacchi thi.
par wahan milne waale sab dost, pakke the..
wo gali shehar se jo milti nahi thi, bade aaram mein thi.
humaari humaare liye hi thi..

Aaj bachpan ke bane wo dost,
un galiyon se nikalkar,
kahin kho gaye hai,
shehar ki pakki chauri sadakon par..

Maalum hai wo bhi yaad karte hai humko,
aur gaaon ki us aajad,
aaram pasand kacchi sadak ko,

par ab hum na bacche hai na wo sadak kacchi,
na ab dosti pakki.
Sab kho gayaa hai,
samriddhi aur naye mukaam ki jad mein.

Dil hai jo yaad karega,
un kaachi sadakon ko,
uski aarampasand aajadi ko,
aur kacchi sadak par milne wale pakke doston ko..

किश्तों में उनसे हार रहे है..

बचपन का खेल था,

और जीत की जीत भी,

तब जीत गए उनसे एकबार,

आज किश्तों में उनसे हार रहे है।

कभी उनकी मुलाक़ात से,

कभी उस मासूम मुस्कान से,

कभी बिन बुलाये उसके याद से,

तो कभी दोस्तों के दिलाये आस से,

बस अब हर दिन हार रहे है।।

-सन्नी कुमार
[एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी लगी कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]

वो पल अब भी है साथ..

वक़्त भले बीत गया,
पर वो पल अब भी है साथ|
होता था जब साथ हमारा,
सूर्योदय-सूर्यास्त…

सुबह की पहली धुप जब,
सेकते थे हम सब साथ|
हलकी-फुल्की योगा या फिर,
करते थे कुछ कसरत खास ..

था मौसम गर्मी का वो,
पर छुट्टी से तो सबको प्यार,
गर्मी की उन छुट्टियों में,
क्रिकेट का था चढ़ा बुखार..

सुबह की पहली किरणों संग ही,
लहरा देते थे बल्ला यार,
जो जीत गए सुबह की मैचें,
दिन भर करते थे आराम..

जब सुबहें हार दिखाती थी,
करते शाम का इन्तेजार,
और शाम की जीत के साथ,
सुबह को हम भूलते थे..

जो भी हो उन खेल का पर
वो पल अब भी साथ..
खेलो में यारो के नखरे,
नहीं कोई नयी बात..

उन सुबहों की ताजगी,
ताजा करती मुझे आज भी..
सूरज को जब देखता हूँ,
वही स्फूर्ति फिर पाता हूँ..

वक़्त भले बीत गया,
पर वो पल अब भी है साथ|
होता था जब साथ हमारा,
सूर्योदय-सूर्यास्त…

-सन्नी कुमार
[एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी लगी कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]

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