गांधी और गोडसे का सच

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पहला प्रधान अलोकतांत्रिक तरीके से या यूं कहे तो व्यक्ति विशेष श्री मोहनदास करम चन्द गांधी के मन से तय किया गया, अलोकतांत्रिक इसलिए क्योंकि तब कांग्रेज़ के 16 राज्यों के प्रतिनिधियों में से 13 ने सरदार को पहला पसन्द बनाया था पर महात्माजी की ज़िद नेहरू थे और उनके सम्मान में सरदार जी ने अपना नाम वापस लिया और फिर लाडले नेहरू प्रधान की गद्दी तक पहुंचे, इस बार उनकी चौथी पीढ़ी भी PM की रेस में है, पर अफ़सोस आज महात्मा नहीं है!
गांधीजी वाकई में एक महात्मा ही थे जो एक अलग तन्त्र चाहते थे तभी तो कांग्रेज़ अध्यक्ष पद की चुनाव जब नेताजी सुभाष जीत गए तो गांधी न केवल नाराज हुए बल्कि मूवमेंट से अलग होने की धमकी तक दी और तब सुभाष ने भी उनके सम्मान में न कांग्रेज़ अध्यक्ष का पद छोड़ा बल्कि कांग्रेज़ ही छोड़ दी। ये दो घटनायें ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थी न शायद यह भी की देश बंटवारे में जो सत्ता की भूख में दोनों तरफ मार काट मची और जो ट्रेनें सिर्फ लाशें भरकर लाती थी तब भी महात्मा पूरब और पश्चिम पाकिस्तान के लिए देश के बीचोबीच रास्ता देने की बात करते थे और तब पाकिस्तान को मिलने वाले 75 करोड़ की बची किश्त देने पर हड़ताल पर भी गए। गांधी ऐसे महात्मा थे जिनसे खुद उनका बेटा भी दुखी था, पर गांधी जी अपने लगन, अपनी अनुशासन, अपने प्रयोगों के लिए संकल्पित और सफल थे..
वैसे महात्मा जी बैरिस्टर भी थे वो बात अलग है कि भगत सिंह को बचाने का प्रयास नहीं किया पर इसपर प्रश्न करना गांधी जी का न केवल अपमान होगा बल्कि व्यर्थ भी होगा क्योंकि हम मुन्ना भाई तो है नहीं जो गांधीजी उत्तर देने आएंगे, खैर मैं उनके सम्मान में कभी कमी नहीं कर सकता क्योंकि हमने पढ़ है कि उन्होंने दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना तलवार और फिर जो अहिंसा का मार्ग दिखाकर उन्होंने इस भूमि को धन्य किया है इसके लिए बुद्ध हमेशा उनके आभारी रहेंगे।आप सदा अमर रहे और बिल्कुल देश आपको कभी नहीं भूलेगा न हम किसी को यह प्रश्न करने का अवसर देंगे कि आजाद भारत मे आजाद हिंद फौज की सेना का क्या हुआ? क्या यह सेना भारतीय सेना में शामिल हुई?
और एक बात इस देश को आज गोडसे की जरूरत कतई नहीं है पर अब चूकि यहां अभिव्यक्ति की आजादी है इस लिहाज से अगर उसकी मंशा को जानने का पढ़ने का अवसर मिलता तो इतिहास के छात्रों को लाभ मिलेगा क्योंकि सारा ज्ञान अकेले कमल हासन रखे और हम गोडसे रूपी आतंकी(कमल के अनुसार) से अनजान रहे, ठीक नहीं इसलिये उसकी और उसपर लिखी पुस्तकें बैन नहीं होनी चाहिए, सुना है कि उसकी अस्थियां अब तक प्रवाहित नहीं की गई? जानने का हक़ होना चाहिए न नए भारत को, है कि नहीं??

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