ऐसा नहीं है कि मेरे तरकस में तीर नहीं है

ऐसा नहीं है कि मेरे तरकस में तीर नहीं है,
पर बेवजह बहरों में खर्च करने को अब अनमोल शब्द नहीं है..

बड़ी-बड़ी बातें और बनावटी सपनों की आंधी है शहर में,
सच ढ़ेर है जमीं पर कि उसके कोई साथ नहीं है..

तस्वीर बदलने को तो मेरी खामोशी भी है काफी,
पर तकदीर में शहर के बदलाव और सच का साथ नहीं है..

लफ्फाजियों का संक्रमण ही है जो वक्ताओं का कुम्भ हो गया है ये शहर,
पर उंगलियों पे गिन सकूं उतने भी क़ाबिल श्रोता नहीं…

ऐसा नहीं है कि मेरे तरकस में तीर नहीं है,
पर बेवजह बहरों में खर्च करने को अब अनमोल शब्द नहीं है..
©सन्नी कुमार

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