अक्सर झूठ सच का लिबास पहने आते है

हक़ीक़त रूठी परी है कबसे,
फिर भी ख्वाब रिझाने आते है,
है सब स्व में ही मगन फिर भी,
वो मेरे है दिखाने आते है..

क्या कहूँ क्या लिखूं तुमसे,
कि तुम्हें तो बस पढ़ने अक्षर आते है,
पढो गर पढ़ सको भावों को,
कि वहीं तुम्हें इंसान बनाते है..

पर्सनालिटी डेवलपमेंट का है ये दौर,
की यही तुम्हें त्वरित नौकरी भी दिलाते है,
पर जीवन में चरित्र निर्माण भी है जरूरी,
कि अक्सर केवल मुखौटे काम नहीं आते है..

वक्त की पहचान सीख लो ऐ सन्नी,
कि अपने भी इसी को देख कर मिलने आते है,
जिंदगी में जरूरी है कि तुम सही समझ रखना,
कि अक्सर झूठ सच का लिबास पहनकर आते है..

©सन्नी कुमार

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वो ख्वाब हो रोज अब सिरहाने में मेरे..

IMG-20180213-WA0018काश सुन ले कभी वो कहानी मेरी,
हो जाउं मुकम्मल गर हो जुबानी मेरी..
है जो तस्वीर बनाया शब्दों से मैंने,
वो अब रूबरू मिले, है ख्वाहिशें ये मेरी..

काश जल्द ही अब वो शाम भी आए,
दो चाँद हो जब आँगन में मेरे..
हूँ महकता जिसके जिक्र से रोज,
वो ख्वाब हो रोज अब सिरहाने में मेरे..
-सन्नी कुमार

ऐ सर्द हवा कर थोड़ा रहम

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ऐ सर्द हवा कर थोड़ा रहम,
तू बसा के ला उस खुशबू को,
हो कम जिससे इस दिल के जख़म,
और सांस मिले इन सांसो को,
ऐ सर्द हवा कर थोड़ा रहम,
तू बसा के ला मेरी चाहत को…

होगी सहमी-सिहरती मेरी परी,
उसे प्यार के चादर में लिपटा,
हो रही आस में आँखें पत्थर,
उसको मेरे जज़्बात बता,
ऐ सर्द हवा कर थोड़ा रहम,
तु बसा के ला मेरी चाहत को…

मेरे शब्दों का कुण्डल बनाके,
ऐ सर्द हवा उसको पहना,
है जमा रही मुझे दूर की सर्दी,
मेरे महबूब को मेरी रज़ा बता,
ऐ सर्द हवा कर इतना रहम,
तु बसा के ला मेरी चाहत को…

ऐ सर्द हवा कर थोड़ा रहम,
दूर ले जा धूंध की दूरी को,
खिले जीवन में फिर इश्क़ के धूप,
तू संग ले आ मेरी रौशनी को,
तापे तुम संग फिर अलाव मिलकर,
ये हसरत उस तक पहुंचा…

ऐ सर्द हवा कर थोड़ा रहम,
मेरे ख्याल बता मेरी प्रियतम को,
लौटे जल्दी ही मिलन के लम्हे,
और ख्वाब खिले फिर जीवन में,
ऐ सर्द हवा कर थोड़ा रहम,
तु बसा के ला मेरी चाहत को….
-सन्नी कुमार

Read my other poems on my blog. https://sunnymca.wordpress.com

Thank you for inspirations…

अपने पराए हो गए

कुछ ख्वाब हकीकत हो गए,
और कुछ हकीकत ख्वाब हो गए,
जिंदगी ने ली कुछ करवट ऐसी,
कि कुछ पराए अपने हो गए,
और कुछ अपने पराए हो गए।
-सन्नी कुमार

प्यार न करो

प्यार जगा कर कहती हो क्यूं,
कि प्यार न करो,
आँखों को ख्वाब दिखाकर कहती हो क्यूं,
कि ऐतबार न करो,
मेरे दिल में बसती हो तुम,
तुम्हारी हसरतें सजाता हूँ,
तुमको है खबर सबकुछ फिर भी,
कहती हो क्यूं कि प्यार न करो।
-सन्नी कुमार

ख्वाबों को बुनने दो

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ख्वाबों को बुनने दो,
ख्यालों को पलने दो,
समेट लेंगे ये चादर में आसमां,
जो इनको उड़ने की आजादी दो।

कलियों को खिलने दो,
बचपन को संवरने दो,
बदलेंगे यही संसार को कल में,
जो इनको आज से सपने दो!

बेमतलब न रोको-टोको इनको,
न समझ की सीमाओं में बांधो,
ये स्वछन्द मन कल संवारेंगे दुनिया,
इनको बस सही लगन लगवा दो।

चुनने दो इनको अपने सपने,
जो मर्जी है बनने दो,
ख्याल रखो इनके ख्यालों का,
और सही गलत का भान करा दो।

ख्वाबों को बुनने दो,
ख्यालों को पलने दो,
समेट लेंगे ये चादर में आसमां,
जो इनको उड़ने की आजादी दो।
-सन्नी कुमार

(credit:- Students of G D Goenka Public School, Gaya)

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आज कल बीमार हूँ

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अपनी बातों को शब्दों में आज कहना नहीं आ रहा,
अपनों से मिलकर आज नजरें मिलाना नहीं आ रहा,
चुप तो हूँ आज पर आज कोई शांति नहीं है,
आज आंसुओं से गम को धोना भी नहीं आ रहा।

सोचता हूँ छोड़ दू अब लिखना अपनों को,
सोचता हूँ छोड़ दू अब जीना सपनों को,
अब जब फ़र्क़ नहीं परता उनपर मेरे शब्दों का,
सोचता हूँ विराम दूँ अब अपने अल्फ़ाज़ों को।

सुन्न हो रही हथेली को और कितना बोझ दूँ,
जीना छूट गया पीछे, लिखूं अब किस झूठ को,
भाव थे जो सारे आज आंसुओ में बहा दिए,
ख्वाब देखे थे जो कभी, आज है सब जला दिए गए।

न कहने को कुछ नया है,
न अपने अब अपनी सुनाते है,
एक दुरी है दरम्यान,
शिकायत है की मेरी बातें नही ठीक,
न तरीका न इरादा कुछ भी नही ठीक,
मैं भी मानता हूँ की अब कुछ नहीं ठीक,
न हिम्मत है अब और की कर सकूँ सब ठीक,
सो सोचता हूँ कहीं दूर चला जाऊं,
पर खुद से मैं पीछा कहो कैसे छुड़ाऊं?
– सन्नी कुमार
……………………………………………

ख्वाब

IMG_0716ख्वाब,
जिससे मन की खूबसूरती झांकती,
जिसको नहीं जरूरतें बाँधती,
जिसपे किसी का न चलता है जोर,
जो अँधेरी रातों को भी कर दे भोर,
उसी ख्वाब का अब होना है हमको,
उसी ख्वाब को जीना है वर्षों।

ख्वाब,
जिसको शिकायत नहीं लम्हों से,
जिसमें सिफारिश नहीं औरों से,
जो हसरतों के है जहाज सजाता,
जो टूट कर फिर से है जीना सिखाता।
उसी ख्वाब का होना है हमको,
उसी ख्वाब में खोना है हमको।

wordleहाँ वही ख्वाब,
जिसपर न बस मेरा न तुम्हारा,
पर जिसमें हो जग सारा हमारा,
उसी ख्वाब में अब जीते है हम,
और उसी ख्वाब को अब मरते है हम।
हो एक हकीकत और वही ख्वाब हो,
ऐसी ही कोशिश अब हर बार हो।
© -सन्नी कुमार

अब आनेवाले मौकों को पहचानों

My Secret Diaryदिनों बाद कल फिर कोई ,
ख्वाब आया था,
पहली बार अपना-सा कोई,
अजनबी आया था.
स्पष्ट सबकुछ मुझे याद नहीं हैं,
पर ओढ़े धूल का चादर,
और आँखों में सवालों का सैलाव लिए,
वो मुझसे मिलने आया था..

उसमें अपनापन की खुशबू तो थी,
पर उसका ‘बेरंग’ चेहरा था अंजान।
पूछा जब मैंने परिचय उससे,
बोल बैठी बेशरम “हूँ जिन्दगी तुम्हारी जान
झुंझला गया था सुनकर उसको,
जो उसका मतलब समझ ना आया था,
दिल ने रोक लिया मुझे बेहूदगी करने से,
शायद इसने उसके चहरे पर दर्द को भांपा था..

फिर पूछ लिया मैंने उससे उसके, बे-निमन्त्रण आने का कारण,
हो गुस्सा इस बार वो बोली,
“हर बार तुम्हीं क्यूँ पूछोगे, क्या औरों को यह अधिकार नहीं?”
दे देता उसके प्रश्नों का उत्तर,
कि ख्वाब मेरा और यहाँ तुम हो आयी,
सो इस लिहाज़ अधिकार गंवाई,
मै बोलूं उससे अपने मन की बात,
इससे पहले ही थी शुरू वो “जात”..

वो बोली “तो सुनों मैं क्यूँ तुम्हारे ख्वाब में आयी”

कभी अपने ख़ुशी के लम्हों को तुमने,
संग मेरे सजाया था,
विरह-विदाई की बेबसी को तुमने,
संग मेरे ही बांटा था,
पर ना जानें क्या गलती हुयी हमसे,
तुम मिलने भी अब नही आते हो,
कभी छुपाते थे हमको दुनिया से,
आज तुम ही हमसे छिपते हो.

दिन वो क्यूं जल्दी बीत गया,
जब तुम मुझको राज़दार बनाते थे,
हसरतों की हस्ताक्षर कह,
मुझसे लाड़ जताते थे.
खुश होती थी उस खेल में मैं,
जब औरों को तुम मुझ-खातिर तरसाते थे.

कभी तुमको भी होती थी शिकायत,
की अक्सर लोग बदल जाते है,
आज जो बदले हो तुम खुद को,
तो फिर क्यूं चुप्पी साधे हो?
मै तुम्हें गुज़रें लम्हों में,
और नहीं उलझाने आयी,
जो जाना था कभी मैंने तुमसे,
आज वही तुमसे दुहराने आयी.

मत दबाओ ज़ज्बातों को तुम,
ना ख्वाबों को बेड़ी डालों,
निकलो बाहर डर/गम के क़ैद से तुम,
अपने दायित्वों को पहचानों।
पूरे करो अधूरे ख्वाबों को,
या नए सपने सजा लो,
पर न करो मलाल उसपे जो बीत गया,
कि अब आनेवाले मौकों को पहचानों।।

-सन्नी कुमार
[एक निवेदन- आपको हमारी रचना कैसी लगी, कमेंट करके हमें सूचित करें. धन्यवाद।]

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