ऐसा कब सम्भव हो पाया है

मुस्कुराता रहा दिन भर,
जो तुम फिर याद आयी थी,
मालूम चला कि तप रहा हूँ बुखार में,
जब हक़ीक़त पास आई थी..

थी तुम एक हसीन ख्वाब,
जो मुझको मुझसे दूर ले गई,
जीवन के कड़वे सच का,
इस मूरख को ज्ञान दे गई।

आज मस्त हूँ अपने बढ़ते सफर में,
फिर ये मौसम, ये गलियां,

और गिनती के अच्छे लोग,
तुम्हारी याद दिलाते है,
पढ़ लेता हूँ अक्सर वो पन्ने,
जो तुम्हारी याद दिलाते है।

तुम हो नहीं आज,
पर तुमसे ज्यादा पाया है,
ख्वाबों से बेहतर हो गई जिंदगी,
तुम्हारे दुआओं में खुद को महफूज़ पाया है,
है हसरत एक आज भी,
की तुमसे मिलूं,
पर अतीत और वर्तमान मिल जाये,
ऐसा कब सम्भव हो पाया है? 😊
© सन्नी कुमार

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सच को छिपा देता हूँ

IMG-20170822-WA0003लिख के जो लिखना है वो तो मिटा देता हूँ,
फिर लिखता ही क्यूं हूँ जब सच को छिपा देता हूँ ..
ये डर है कि सच की कड़वाहट से सब खफा हो जाएंगे,
इसलिए कर जिक्र झूठ का मैं सबको हंसा देता हूँ..
-सन्नी कुमार

Likh k Jo likhna h wo to mitaa deta hun, phir likhta hi kyun Hu jab sach ko chhupa deta hun 😟
Ye dar hai Ki sanch Ki kadwahat se sab khafaa Ho jayenge,
Isiliye kar jikra jhuth ka Mai sabko hansa deta hun..
-sunny kumar

 

जरूरी है मुहब्बत का होना

किसी से बिछड़कर मुझे, मिलने का हुनर है आया,
खोकर ‘खुद’ को मैंने, मेरे खुद को है पहचाना..
वो एक थी कभी जिसके, अरमां दिल में बसते थे,
आज उसी के अक्श को मैंने, जर्रे-जर्रे में है बसाया..
नहीं खबर ये मुहब्बत है या कोई नई दीवानगी,
पर सच है लगता मुझे अब, निर्मोही मोह समझ आया..
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खैर किसी से बातों-बातों में, कुछ बातें निकली थी,
था चर्चा मुहब्बत का सो, दिल भावों से पिघला था,
उकेरे जो मन के भाव उसने, उसे शब्दों ने सहेजा था,
कि उसने पूछा जब मुहब्बत का परिचय,
मैंने कुछ ये सब कह डाला था….
“ये मुहब्बत ही तो है जो जीना सिखलाती है,
हर रात ख्वाबों में बहलाकर, उम्मीदों का सवेरा ले आती है…

मुहब्बत आँखों का हो या भावों का,
जज्बातों का या ख्यालातों का,
ये मुहब्बत चाहे जैसा हो, जिससे हो,
करने वाले को खूब बनाती है,
छूट जाए गर मीत तो ये शायर बनाती है,
और जो मिलन हुआ मुहब्बत में तब,
जिंदगी जन्नत बन जाती है,
बड़ा जरूरी है मुहब्बत का होना,
कि ये आदम को इंसान बनाती है।”
-सन्नी कुमार

तुम बढ़ के वीर, उसे गले लगाओ..

मौसम माशूक़ सा प्यारा हो,
या तेज सूरज झुलसाने आया हो..
आज भीनी हवा स्फूर्ति बढ़ाती हो,
या कठोर ठण्ड डराने आया हो..
कर्मपथ के वीरों तुम रुकना मत,
चाहे रोकने आया आज सारा ज़माना हो..

हे, इस सामान्य पथ के असामान्य पथिकों,
तुम कर्मठ सबमें विशेष हो..
जो भी तय की है,  मंजिल तुमने,
मानो उन्हीं को पूरा करने आये हो..

मत सोचो कभी ये,  है मंजिल दूर,
जानो, वो तो राह में तेरे बैठी है,
आएगा उसका चहेता, अगले ही क्षण,
ऐसे अरमान सजाये बैठी है..

तुम हो पथिक अपना धर्म निभाओ,
बस मंजिल को बढ़ते जाओ..

देखो वो भी दे रही है आवाज़,
की इन मोड़ों से तुम मत घबराओ..
अगले क्षण में मिलने को वो आतुर,
तुम बढ़ के वीर, उसे गले लगाओ..

– सन्नी कुमार

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