आरक्षण का आधार

WP_20170705_06_48_43_Proआरक्षण समर्थकों के घिसे पिटे बण्डलबाजीयों में से जो सबसे प्रमुख है उनमें से कुछ को यहाँ बाँटना चाहूंगा। आरक्षण समर्थकों के अनुसार दलितों और पिछड़ों का शोषण हुआ था, उन्हें समाज में दुत्कारा गया इसलिए उनको बढ़ने का असवर देने के लिए आरक्षण आवश्यक है।
वैसे आपको वो ये बताने में असमर्थ होंगे की शोषण किसने किया? जवाब में कोई तर्क नहीं मिलेगा बल्कि फिर से बण्डलबाजी की मनुस्मृति में ये है, वो है और ब्राह्मणों ने दोहन किया….अब हम और आप, बल्कि वो भी जानते है कि मनुस्मृति कोई पढ़ता नहीं, आजादी से पूर्व ब्राह्मण नहीं बल्कि अंग्रेज और फिर उनसे पहले मुगलों, नवाबों का शाशन था फिर ब्राह्मण अकेले कैसे शोषण कर सकता था? दरअसल हर कायर एक कमजोर दुश्मन चाहता है, इनको भी चाहिए होगा? (कायर-आरक्षण समर्थक, कमजोर- ब्राह्मण, अपवाद की गुंजाईश हर जगह होती है)

हास्यास्पद ये है कि वो वर्षों की गुलामी का नारा लगा देते है, अधिकार मांगते है पर ये नहीं स्वीकारते की असमानता हमेशा थी, है और रहेगी पर आरक्षण जैसी व्यवस्था जो एक कोढ़ है भारत को न केवल पीछे धकेलती है बल्कि समाज में वैमनश्य और जात-पात की राजनीति को बढ़ावा देती है। वो आपसे ये भी न कहेंगे कि 70 साल के बाद अभी कितने साल और आरक्षण चाहिए।

खैर आरक्षण समर्थकों का एक और दलील है कि भारत में उनको नीच समझा जाता है, उनको कोई अपनी बेटी नहीं देता, न समाज इज्जत, मंदिरों में उनके प्रवेश पर रोक है, और वो असमानता के शिकार है। यहाँ मैं उनसे थोड़ा सहमत हूँ की उनसे असमानता होती है, बल्कि असमानता का शिकार तो हम आप, हर कोई है…देखिये जो इज्जत ‘बच्चन’ को मिलेगा वो ‘बेचन’ को नहीं मिल सकता न इस बात को लेकर बेचन को ईर्ष्या करना चाहिए बल्कि उसे इस सत्य का भान होना चाहिए की बच्चन(प्रतिभावान) कोई भी बन सकता, बेचन से बच्चन बनते देर नहीं लगती। उदाहरण के लिए हजारों नाम है जिनको दुनिया बिना उनके जात को जाने भी इज्जत देती है और ये असमानता दुनिया के हर कोने में मिलेगा। अब कुछ लोग हमें काफीर कहते है तो क्या किसी के कहने से हम कुछ हो जायेंगे?? हाँ, हमारा कर्म हमारी पहचान है और अगर काम 4th ग्रेड का हो तो इज्जत 1st ग्रेड की मिल सकेगी? ये तो नौकरी, बिजनेस, व्यवहार समाज हर जगह लागु है.. यहाँ कर्म की प्रधानता है। वैसे वो आपको ये नहीं बताएंगे की आज कोई उन्हें बाध्य नही करता की वो एक तय काम ही करे बल्कि जात का प्रमाणपत्र भी वो खुद बनवाते और फिर कहते की जातिवाद से नुकसान है उनका।

वो ये भी नहीं कहेंगे कि 70 सालों में आरक्षण ने देश का कितना भला कराया है और कितना नुकसान। हाँ उन्हें ये चाहिए क्योंकि उनको किसी ने बताया है कि उनके दादा-परदादों का सोशन हुआ। ये वोट बैंक की राजनीती का बड़ा हिस्सा बन गया है जो राष्ट्र को भारी नुकसान पहुंचा रहा और समाज को बाँट रहा है ऐसा मुझे लगता है।

वैसे यहां क्या मैं पूछ सकता हूँ की जो लोग आज 4थ ग्रेड, बोले तो सेवा कार्य, नौकरी कर रहे उनको भी आरक्षण मिलेगा या ये सुविधा सिर्फ मनु के प्रशंशकों(वही जो पढ़ते कम जलाते ज्यादा है) के लिए है???? और शोषित समाज का timeline तय कर दिया गया है? क्योंकी आज भी नौकरियों में कम पैसे पर लोगों को रखा जाता है, काम लिया जाता है, पर इन बेचारों के लिए किसी मनु ने कुछ नया लिखा नहीं है तो क्या इनके पोतों(ग्रैंड सन) के लिए भविष्य में आरक्षण मिल सकता है?

एक और खतरनाक बकवास होता है उनके पास की मंदिरों में पंडितों का 100 प्रतिशत आरक्षण क्यों है, अब उनको हजार बार हजार लोगों ने समझाया होगा कि भाई जो मन्दिर बनायेगा वही पुजारी निर्धारित करेगा, तुम एक मंदिर बना लो बन जाओ पुजारी कोई रोकेगा नहीं, अगर रोकता है तो on कैमरा क्रांति कर दो, पर तुम कुछ क्यों करोगे तुमहे तो दान का लोभ है, फिर कटोरी का जुगाड़ कर लो, सबकुछ पंडितों को ही नहीं मिलता.. पर इत्ती सी बात भी न समझेंगे और जातिवाद से लड़ने के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाके ऐसी तैसी करा लेंगे…..

आप क्या कहते है???

बाकि प्रतिभा बेमेल है, विजयी है जिससे सबको सहमत होना है, सो प्रतिभावान बने, निर्विवाद बने।

-सन्नी

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तू भेद न कर

दिल ने लाख समझाया कि तू भेद न कर,
मानव है मानवता से बैर न कर..
रंग, बोली, धर्म-जात के है भेद बेवजह,
तू जी खुद को औरों से रंज न कर..

पर वो दिल की क्यों सुने कि वो दिमाग जो था,
कहा डपट कर कि रह औकात में तू,
और देशी संविधान से बैर न कर.
नहीं पांचो ऊँगली बराबर तू जीद न कर,
हाँ तू जोड़ लगा सबको अपना मोल बता,
पर है सब एक, ये बेवकूफी न तू हमको बुझा..

-सन्नी कुमार

क्या प्रेश्यायें गर्भवती है?

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भारतीय मीडिया खुजलीवाल को नायक के रूप में जाहिलों के बीच स्थापित कर चूका है, राष्ट्रवादियों के राह के इस रोड़े को हम हटाते की मीडिया फिर से गर्भवती हो गयी है, खुजली गैंग प्रसन्न है, मीडिया बधाई गा रही है, नीकु चचा गुजरात मॉडल को फ़ैल बता रहे…कुल मिला के देश को तोड़ने वाले सारे बकलोल-बेशर्म गुजरात की व्यवस्था को बिगाड़ रहे है.. 13 साल से शांत रहा गुजरात अचानक से आरक्षण रूपी भीख के लिए इस कदर रोने लगे, चौंकाने वाला है।
आम्बेडकर के बोये आरक्षण के फसल को काटने के चक्कर में मुफ्तखोर बेशर्म भीड़ एक दूसरे का गला काटने को तैयार हो गयी है, गुजराती भीड़ कम भाड़े के टट्टू ज्यादा क्रियाशील हुए जा रहे….
यह सब प्रधानमन्त्री के UAE के सफल दौरे के बाद और बिहार चुनाव से पहले हो रहा है, एक बार फिर से आंदोलन के जरिये सत्ता की सीढ़ी चढ़ने की तयारी है. खैर, उधर युगपुरुष जी अपने भाई के होने की ख़ुशी में इतने उदार हो गए है की लालू-नीकु से गलबगिया कर रहे है और बिहार मॉडल को दुरुस्त और गुजरात मॉडल को फ़ैल बता रहे है, दिल्ली में wifi, बिजली, पानी मुफ़्त करने, महिलाओं को सुरक्षित करने, हर हाथ रोजगार देने और 500 स्कूल खोल देने के बाद अब वो जल्द ही लालू को ईमानदारी का सर्टिफिकेट देने की और बिहार को न्यूयॉर्क से बेहतर बनाने की कोशिश में लग गए है… हो सकता है अपने भाई के होने के ख़ुशी में वो सिब्बल, चिदंबरम, कलमाड़ी रजा को भी ईमानदारी का प्रमाण पत्र दे दे।

आरक्षण एक भीख है

आरक्षण एक भीख है…क्यूंकि अगर यह उधार होता तो लेने वाले को लौटाना होता, यह पारिश्रमिक भी नहीं हो सकता क्योंकि इसके लाभार्थी इसके बदले कोई सेवा नही देते..और अब अगर ७ दशक बाद भी लोग आरक्षण के लिए सड़कें जाम करते है, ट्रेन की पटरियों पे डेरा जमाते है तो मन खीजता है… कभी जाट, कभी गुज्जर, कभी पटेल…ये गद्दी की ख्वाहिश रखने वाले लोग अजीब अजीब मुद्दों से सीढियाँ बना रहे..
मेरा व्यक्तिगत तौर पे यह मानना है की अगर ७ दशक में आरक्षण आपको नहीं सुधार पाई तो फिर आपका इलाज कुछ और है. और हाँ जिस तरह से भीख लोगों में बेकारी बढ़ाती है, एक अयोग्य भी मांग-मांग कर पूंजी बना लेता है, नशा का लत लगा लेते है, वैसे ही आरक्षण का लिफ्ट चढ़ के कई अयोग्य पूरा इंजिन बर्बाद करते है…
सरकार गरीब परिवार को अवसर दे, उनको प्रसिक्षण दें, और कम से कम कुछ तो ऐसा करे जहाँ हम सब एक हो कर कहें की हम भारतीय है. ये १५ अगस्त २६ जनवरी वाला देशभक्त हर रोज जीए ऐसा कुछ हो..क्यूँ नही कोई ऐसी व्यवस्था की जाए जहाँ हर वर्ग के नवयुवक एक साथ रहे, उनपर सरकार इन्वेस्ट करें और लाभ दोनों को हो. ऐसा माहौल दिया जाए जहाँ कोई जात, कोई धर्म का जीकर न हो, चर्चा हो तो नयी पहचान गढ़ने की, भारत को मजबूत बनाने की. ये बदबूदार जात-पात की राजनीति, ये आरक्षण का टुकड़ा,, इन कुव्यवस्थाओं से बेहतर है एक सैनिक स्कूल जहाँ सबको सामान शिक्षा दे और बदले में सरकार उनसे कम से कम २ साल की सेवा ले ताकि सरकार पर यह प्रशिक्षण बोझ न हो और युवा भी देश के प्रति झुकाव रखें. नये लडको को बेरोज्गादी का खतरा भी न होगा और असमर्थता, बेकारी,और मेधा-बलात्कार का बहाना भी न होगा….काश की सरकार एक ऐसा उपवन लगाए जहाँ नए पौधे, नव-युवकों को एक साथ रखे, राष्ट्रभक्ति सिखाएं, हिम्मत, हौसला बढाये, सबको काबिल बनाएं और इस भीख की लत छुड़वाए..

समृद्ध भारत का सपना आरक्षित कपोलो के सहारे सम्भव नही.. मेधा का हो सम्मान, यही हमारी मांग…
-सन्नी कुमार

#Against_Reservation

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