गाँधी

गांधीजी बेशक राष्ट्रपिता नहीं हो सकते क्योंकि राष्ट्र सबका पोषक और सर्वोच्च है इसलिये गांधीजी को भी राष्ट्रपिता कहना अन्याय है। और मुझे यक़ीन है कि बापू की भी कभी ऐसी इच्छा नहीं रही होगी पर हाँ यह हमारा उनके लिए प्यार था जो उनको किसी ने महात्मा तो किसी ने बापू कहा। उनके बारे में तत्कालीन बुद्धिजीवियों ने एक भविष्यवाणी की थी कि आनेवाली पीढ़ी इस पुरोधा, इसके तरीकों का यकीन नहीं करेगी। लोग यह यकीन नहीं कर पाएंगे कि अहिंसा में इतना बल सम्भव है और कोई यह मानने को तैयार नहीं होगा कि कुछ सालों पहले ही साबरमती के एक अर्धनग्न सन्त ने अहिंसा के बल पर अंग्रेजों को देश से भगाने में सबसे अहम भूमिका निभाई होगी। आज महज 70 सालो में ही उन बुद्धिजीवियों की भविष्यवाणी अंशतः सत्य साबित होने लगी है।

आज जब हम उस महान व्यक्ति का जन्मदिन मना रहे है, सरकारी छुट्टियों का घर मे आनन्द ले रहे है तो हममें से ही बहुत लोग इस इस समय का उपयोग उसी बापू को प्रश्नों के घेरे मे घेड़ने केलिए कर रहे है जो काफी चिंतनीय है। आप जो कोई भी गोडसे को महान बताते है और जिनका मन गांधी के प्रति कोई सम्मान नहीं रखता उन सबसे क्या मैं यह जान सकता हूँ कि क्यों आखिर गांधी अकेले इस विभाजन के लिए दोषी ठहराये जाते रहे है, क्या उनको विभाजन का दुःख नहीं था? देश जानता तो है न कि आजादी के समय मे गांधीजी कहाँ और क्यों थे?इस आजादी से उनको क्या हासिल हुआ? क्या उन्होंने आपसे कहा कि आप उनको महात्मा, बापू, राष्ट्रपिता का सम्मान दे या केवल नोट पे छाप उनके विचारों को बिसरा दो? अरे वो तो जिस वैमनस्य से आपको दूर रखना चाहते थे उसी ने उनकी ईहलीला समाप्त कर दी।

मैं खुद गांधी से कभी पूर्णतः सहमत नहीं हो सकता और मानता हूं कि विभाजन के वक्त किसी भी देशभक्त का विरोध नहीं करना, प्राणों की आहुति न देना अचंभित करता है। मन में आज भी प्रश्न उठते है कि अगर 47 में नेताजी जीवित होते, भगत, आजाद होते तो क्या होता? क्या स्थूति रही होगी, आजाद हिंद फौज के जवानों के मन की स्थिति क्या रही होगी, लाखों लोगों के जान माल के नुकसान के बाद देश ने कैसे खुशी मनाया होगा? पर इन प्रश्नों के लिए, उस अव्यवस्था के लिए गांधी कतई जिम्मेवार नहीं थे और यह एक और यकीन है कि उनको इसका सर्वाधिक दुःख हुआ होगा। जो लोग उन दंगों में मरे उनको सरकार ने भुलाया यह बेशक निंदनीय है पर तब क्या हमारा देश, तात्कालिक नेता आज इतने परिपक्व थे?
आज देश में वैमनस्य शिखर पर है, भारत बंद जिसकी झांकी भर है और ईश्वर ने करे पर यह जिस तेजी से समाज मे खाई पैदा कर रही है वैसे में गृहयुद्ध तक के सम्भावनाओं को नकारा नहीं जा सकता क्यों?

आज देश के पास दो मॉडल है, गांधी मॉडल और अम्बेडकर मॉडल। गांधी मॉडल हमने आजतक अपनाया नहीं और अम्बेडकर मॉडल 70 सालों से स्थिति को यथावत रखे हुए है और आप माने न माने देश को आरक्षण नुकसान उठाना पर रहा है। कुछ लोग गांधीजी पर इसलिए भी प्रश्न उठाते है क्योंकि गांधी का समाज से छुआछूत खत्म करने का प्रयास अम्बेडकर से अलग था। उन्होंने देश के लोगों को अम्बेडकर से विपरीत गाँव की ओर रुख करने को कहा, छुआछूत हटाने के लिए खुद आगे आये, सत्याग्रह की पहल की और आज के दलितों को हरिजन की संज्ञा दी और प्रभु का दूत तक कहा जो आजतक कुछ लोगों को नागवार गुजरता है और वही बुद्धिपिशाच लोग खुद को बहुजन कह इठलाते है। मैं आज यह नहीं पूछूंगा की कैसे हरिजन गाली और बहुजन सम्मानित शब्द हो जाता है। पर गांधीजी की नियत पर शक का अधिकार किसी कुपढ को नहीं होना चाहिए और गांधी का विरोध इसलिए तो बिल्कुल नहीं कि उनका रास्ता सबसे अलग था।

गांधीजी ने समाज में समरसता की बात की, खुद के साथ-साथ औरों का मैला भी खुद उठा लेते थे, छुआछूत न मानते थे न मानने देते थे और इसपर एक बार उन्होंने कस्तूरबा जी को भी खड़ी-खड़ी सुनाया था जब उन्होंने गांधीजी के इन निम्न कार्यों पर प्रश्न उठाया था।

जरा विचारिये गांधीजी के उस साधुत्व के आगे कितने लोग ठहर पाएंगे? वह कैम्पों में सबसे पहले उठ औरों के कचड़ों की, बर्तनों की सफाई करते थे जबकि उस दौर में वह हिंदुस्तान के सबसे लोकप्रिय चेहरे थे और चाहते तो नीली सूट उनको भी रोज शोभता पर उनको इस बात का दर्द था कि देश की आधी आबादी को कपड़े नहीं है सो उन्होंने भी कम कपड़े पहनने शुरू कर दिए। कुछ तो विशेष था, अद्भुत था कि नेताजी ने कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद जीत कर भी बस गांधीजी के मन को रखने के लिए पद और कांग्रेस का त्याग कर दिया पर उसके बाद भी गांधी को दिल मे बसाए रहे और उनके प्रति सम्मान हमेशा रहा।

आज अगर भारत ने गांधी के समरसता के मॉडल को कबका नकार दिया है, पिछड़े लोगों को हरिजन कहाने पर शर्म होता है, गाँव की परंपरागत दक्षता, काम छूट गए है, स्वरोजगार की चटाई को कॉरपोरेट के कार्पेट ने हरा दिया है, मिट्टी के बर्तन चीनी बर्तनों से हार गए है और गांधीजी जिस डिस्ट्रिब्यूटिव सिस्टम की कल्पना करते थे उसको भी साम्प्रदायिक और सत्तालोभियों कि गोली लग चुकी है। जो नियम गांवों से बनने थे, जिन पंचायतों को दिशा देना था उसपे लालकिला की जिद थोपा जाने लगा है और स्वराज का सपना आजतक और शायद हमेशा अधूरा रहेगा।

आज निसन्देह अम्बेडकर का कद बढ़ा है, उन्होंने शहरों की ओर चलने को कहा था और वो सफल है क्योंकि हर गांव पलायन से ग्रस्त है। गांधी के भक्त मिलते नहीं और भीम आर्मी हर ओर देश सेवा के लिए भारत बंद को प्रतिबद्ध है।

आज देश नेहरू, गोडसे या अम्बेडकर से प्रश्न नहीं करता, क्यों? क्या आजादी के वक्त, विभाजन के वक्त सिर्फ गाँधी थे, निर्णय उनका ही था? दरअसल गांधी पर निशाना इसलिए है क्योंकि उनके विचार, नई क्रांति को जन्म दे सकते थे, हिन्दू परिवार जो आज बीखड़ गई है उसको एक कर सकते थे! स्वराज होने से लालकिला की दीवारें, इसके लाउडस्पीकर कमजोर पड़ जाते इसलिए आरामपसंद सत्तालोभियों का इस सन्त पर निशाना लाजिमी है पर क्या हम अपने युवा मित्रों से उम्मीद नहीं कर सकते कि वो इस फेकबुक और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के परिधी से बाहर निकलकर शोध करे, बिना किसी एजेंडे को उस सन्त को पढ़े और उसके विचारों को तौले और फिर अपना निर्णय ले?
बेशक वह भी इंसान थे, बूढ़े हो गये थे अपनों में फंसे थे और क्षोभ में थे तभी तो जब देश जश्न मना रहा था वो अंधेर कोठरियों में कैद रहे। सवाल है, आखिर मोहन दास ने गांधी बन कर क्या पाया? वह जिस देश की कल्पना करते थे उस देश ने तो उनको नोटों पे छापकर उनका ही भ्रस्टाचार के लिए प्रयोग किया और कुछ अधीर गोडसे टाइप लोगों ने उस वयोवृद्ध के सीने में लोहे ठोक कौन सा जग जीत लिया? क्या वो अकेले विभाजन के दोषी थे? क्या उन तीन गोलियों ने राष्ट्र की समस्याएं समाप्त कर दी? क्या हिन्दू मन जो हिन्द से भी बड़ा होने का दम्भ भरता है जिसके सार में वसुधैव कुटुम्बकम है ने उस रोज एक सन्त को मार गर्वित हुआ था? बेशक नहीं, महात्मा गाँधी राष्ट्र के सच्चे सपूत थे जो आखिरी क्षणों में भी पछतावे से रुकसत हुए और लोगों की मानसिकता देख जो बोल निकले वो ‘हे राम’ के थे जिसको समझना मुश्किल नहीं है।

गांधीजी ने क्या त्याग किया, क्या पाया यह शोध का विषय है पर देश के ही बर्बादी के नारे लगाने वाले कुपढ़ छात्रों को इतना वक्त है क्या?

आज आप होते तो आपसे कहता हैप्पी बर्थडे बापू!पर अब जो कहना है वो है कि थोड़ा ही सही मुझमें जिन्दा रहोगे तुम! लभ यू।

जय हिंद!

©सन्नी कुमार

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NOTA पर विचार

NOTA को विकल्प मानने वाले बन्धुओं क्या आपने विचार किया है कि नोटा का अर्थ होता है इनमें से कोई नहीं, और कोई नहीं कहना ज्यादती होगी और अपने भारतभूमि को कलंकित करने सा होगा जहां आपके अनुसार कोई योग्य नही बचा और आप समाज के ऐसे चौकीदार है जो ज्योतिष भी है जिन्हे साल भर पहले ही मालूम हो गया है कि आपको जितने भी लोगों की उम्मीदवारी मिलेगी सब के सब नकारे होंगे? क्या वाकई आपका क्षेत्र इतना गया गुजरा है?? अगर है, तो हे अर्जुन आप क्यों नहीं इस अँधेरे से अपने बन्धुओं और समाज को उबारने के लिए आगे आते है, आप क्यों नहीं अपनी उम्मीदवारी देते है?
हे सोशल मीडिया के शेरों अगर आपने पहले से ही तय कर लिया है कि आपको 2019 में कोई पसंद नही आनेवाला तो आप खुद को क्यों नहीं एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर अपने अन्य बन्धु-बांधवों और समाज को राजनीतिक कुचक्र से बाहर निकाल लेने का प्रयास करते? अगर नहीं कर सकते तो फिर इतनी हताशा क्यों?
SC ST एक्ट का विरोध जितना जरूरी है उतना ही जरूरी इस नोटा का साल भर पहले ही विकल्प चुन लेना गलत है और लोकतंत्र के हित मे नहीं है। क्या दल के दलदल से दूर कोई स्वतंत्रत, निर्भीक उम्मीदवार नही मिलेगा या आप खुद आगे नही आना चाहेंगे जिसने पार्टी के सेवा के बदले समाज की सेवा की हो? या आपका नोटा बस एक वर्ग विशेष के वोट को बर्बाद कराने से है? खैर बिना भारत बंद कराये अगर सरकार सुनती है तो मैं भी उसके SC ST एक्ट का विरोध करता हूँ, आरक्षण खत्म करने की गुजारिश करता हूँ और चाहूंगा कि सरकार नौकरी के लिए मुफ्त आवेदन निकाले..
समझ आये तो विमर्श करे वरना शांत रहे, समय हम सबका कीमती है।

-सन्नी कुमार

#नोटा #NOTA

भारत बंद नहीं नेताओं के ड्रामे बन्द करे

न तो मैं कभी आरक्षण समर्थक था, न भारत बंद जैसी वाहियात सोंच का समर्थन कर सकता हूँ। मैं दो रोटी कम खाकर, दो वस्त्रों में पूरा जीवन बिता दूंगा पर किसी फालतू नेता और बकवास दलों के दलदल में नहीं परूँगा, क्योंकि अगर बन्दे में दम हो तो रिलायंस जैसा अंपायर बिना किसी सरकारी चाकरी के भी खड़ा किया जा सकता है। आरक्षण के नाम पर दलित और सवर्णों के बीच में ये जातियों के ठेकेदार गुंडे, जो आजादी बाद से ही लड़ाई लगाते रहे है कि साजिश कामयाब न होने दे।
भारत बंद में दिक्कतों को झेलने कोई हाई प्रोफ़ाइल नहीं आएगा, न आपके साथ आज लाठी उठाने आपका नेता आएगा, विश्वास न हो तो अन्ना के सिपाहियों से सबक ले जिनको आपियों ने उल्लू बनाकर दिल्ली की सत्ता ली और अन्ना की सेना कहीं पुणे में गन्ना बेच रही होगी। भारत बन्द और अन्य किसी भी तरह का बन्द एक साजिश है जिसमें सबका अपना एजेंडा होता है और आप बस एक मोहरा की भूमिका में होते है। सो अपनी काबिलियत को यूं जाया न करे और अपने विवेक से काम ले, खुद ही विकल्प बने। आज आपको, जनता को जागरूक होना होगा, खुद ही खुद को सरकार समझे तभी मुल्क सेफ है और हाँ बन्द करना ही है तो नेताओं का इलेक्शन के वक्त प्रचार बन्द करे, अपने गाँव-मुहल्ले में घुसने न दे और अपने लोगों को निर्दलीय उम्मीदवारों को जिताये और कांग्रेस A टीम और B टीम को बाहर करे वरना बनते रहे मूर्ख और बजाते रहे अम्बेडकर का दिया आरक्षण वाला झुनझुना।
-सन्नी कुमार

#भारत_चलता_रहे
#भारत_बढ़ता_रहे

समाज, सरकार और हम

मित्रमंडली में भोजपुर में हुए उस अन्याय की चर्चा हो रही थी, मेरा भी भावुक मन यह सोंच कर बैठा जा रहा था कि कितना संवेदनहीन, नपुंसक और लिच्चर हो गया है यह समाज जो खुलेआम एक औरत को नंगा करके पीटता है, और फिर मीडिया इसे खबर बनाकर, TRP और views के लिए मसाला की तरह परोस देती है।
यह सब विमर्श हो रहा था कि इस दौरान एक मित्र ने कहा कि यह सब सुशासन बाबू की नाकामी है और फिर इस घटना को मुजफ्फरपुर की घटना से जोड़ दिया, जो कितना सही है या गलत यह लोग तय करे, और वही लोग यह भी तय करे कि अगर समाज की कोई भूमिका है ही नहीं तो फिर ये समाजिक तानाबाना क्यों?
मेरी समझ में सरकार से ज्यादा भूमिका समाज की है, लोगों की है पर लोग और समाज भ्रस्ट है और तभी दोनों अपनी नपुंसकता को सरकार के माथे सजा देते है..पर ये इस तरह कब तक??
कबतक हम फूहड़ता, निर्लज्जता, नंगई, नपुंसकता और भ्रस्टाचार को ढोते रहेंगे? कब तक जाहिलों को माहौल बिगाड़ते रहने देंगे और फिर ये जाहिल भी तो हम ही है कोई एलियन आकर तो इधर चरस नहीं बोता, यो-यो वाली जो नश्ल तैयार होगी वो उड़ता पंजाब उड़ता बिहार ही बनाएगी और आप अच्छा कुछ कहेंगे तो वॉल्यूम बढ़ा के कह देंगे ‘कि अब करेंगे गन्दी बात’।
ये जो वॉल्यूम लाऊड करके थर्ड ग्रेड के गाने सुनते है और एक से एक फालतू 400 चैनल जो हमलोग टेपते है ये उसी का देन है कि हम ब्रेकिंग न्यूज़ सुनते तो है पर उसके इशारों को समझते नहीं..और यही सर्वाधिक स्थिति दुःखद है।
मैं बार बार कहता रहा हूँ कि आज का जनरेशन पर्सनालिटी डेवलपमेंट को लेकर अत्यधिक जागरूक है और कैरेक्टर बिल्डिंग को दरकिनार कर दिया है या यूं कहें की चरित्र निर्माण की जो नींव बालकाल में पड़ती है उसे किशोरावस्था में पहुंचते पहुंचते उखाड़ फेंकते है। आज की फास्टफूड जनरेशन को हवा में कैसल बनाना है वो भी दस रुपये के लिए सुट्टे से.. और दयनीय स्थिति यह है कि अगर आप उन्हें बुरा समझते है तो ये साबित कर देंगे(चाहे दलील जो भी हो) कि आपकी माइंड आज भी नैरो है।
ख़ैर, मुझे मेरे लिए इतना ही कहना है कि अच्छे लोगों को समाज के भरोसे नहीं रहना होगा बल्कि खुद को सुदृढ़ करना होगा, मजबूत बनाना होगा ताकि ऐसी किसी भी स्थिति को पैदा होने से रोकने की स्थिति में रहे।

इन शार्ट, समाज अब वह गिद्ध है जो सिर्फ मृत्युपरांत भोज के लिए बनी है…भोज खिलाये समाज खुश होके सरकार को दुगुनी ऊर्जा से गाली देने लगेगा।

खैर आपसे इन चार पंक्तियों के माध्यम से यही निवेदन कि

“जिंदा है तो मिसाल बनिये,
जिंदगी हो ऐसी की औरों के ख्वाब बनिये,
लिच्छड़, नपुंसक, भ्रष्ट-भेड़ियों की भेड़ में हो दहशत,
आप ऐसे महानायक भरत बनिये’
©सन्नी कुमार

अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे

विचार मरते नहीं,
शब्द चिरायु है,
आपके कहे हर शब्द,
आपकी लिखी हर बात हमारे बीच है, और रहेंगी।
राष्ट्र सदैव आपका ऋणी रहेगा,
हिन्दी, हिन्दू और हिंदुस्तान को आपके जाने का दुख है पर फिर आशाएं भी है कि आपके लगाए पौधे इस चमन के चेहरे को बदल देंगे।
आपकी सदा ही जय हो हे महामानव, आपने मेरे और मेरे जैसे लाखों लोगों का लेखन और राजनीति में रुचि उतपन्न किया। आप बैकुण्ठ वासी हो यही यही कामना।

अटल जी की यह कविता आज बहुत रुलाती है। आपने मौत पर एक कविता जीतेजी ही लिखी उसे ही दुबारा लिखता हूँ।

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आजमा।

मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

आजादी को आवारगी में न बदले, न बदलने दे

अगर बधाई से फुर्सत मिले तो आज आप अपने बच्चों को आजादी के लिए किए गए संघर्ष को अवश्य याद दिलाए, उन्हें यह भी बताए कि 200 वर्षों तक देश अखण्ड रहा और स्वतंत्रता जब देहरी पर खड़ी थी तो किन स्वार्थियों ने, न केवल मुल्क के दो(तीन) टुकड़े किये बल्कि लाखों लोगों को मरने के लिए छोड़ दिया।
आज अगर आपका बच्चा पूछे कि देश तो बापू ने आजाद कराया था वो भी बिना खड्ग बिना तलवार तो उनको अवश्य बताएं कि अंग्रेजों ने तब दरअसल एकदम से सत्ता न छोड़ी थी, न उनको यहां से पीट कर भगाया गया था, आज तो दरअसल सत्ता का हस्तांतरण हुआ था और फिर अगर ढूंढ पाए तो ढूंढ के मुझे भी अवश्य बताये की इस दिन हम 47 में क्या वाकई इंडिपेंडेंट हुए थे या हम एक क्रूर सत्ता से फ्री हुए थे, मुक्त हुए थे जिसकी अमानवीय कानून के चलते लाखों लोग भूख से मरे और हजारों उनसे लोहा लेते हुए शहीद हुये?
आज अंग्रेजी संदेशों की बाढ़ में कितने मैसेज पढ़े आपने पढ़े जिसमे “हैप्पी फ्रीडम डे” लिखा था? क्या वाकई फ्रीडम और इंडिपेंडेंस में कोई अंतर नहीं? इन सवालों के जवाब जरूर ढूंढे, और हाँ ये आपको किसी चाटुकार द्वारा लिखे किसी किताब में नहीं मिलेगा..
आप सब को आजादी मुबारक! इस उम्मीद के साथ कि आपने आज जो भी देशभक्ति की बातें की है उसे निभाएंगे और आजादी को आवारगी में न बदलेंगे न किसी को बदलने देंगे।
जय हिन्द

इस स्वतन्त्रता दिवस आप इन प्रश्नों का उत्तर अवश्य ढूंढे

समस्त भरतवंश को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.. हम सब ऋणी है उन हजारों-लाखों स्वतन्त्रता सेनानियों के जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर इस देश का सम्मान स्थापित किया।
मित्रों देश की करेंसी पे जगह कम है, शायद इसीलिये केवल गांधीजी फिट बैठते है, पर हमारे और आपके दिलों में उन क्रांतिवीरों के लिए आदर कम ना रहे, जिन्होंने अपना सर्वस्व त्यागा और भारत माँ की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। आज वक्त है खुदिरामबोस, बैकुंठ शुक्ल, जुब्बा सहनी जैसे उन लाखों वीरों को याद करने का जिनकी गाथा गुमनाम हो गई, आज दिन है उस नेताजी को याद करने का जिसने अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए गैर मुल्क में भारतीय फौज खड़ी की। सो आप उन लोगों को भी न केवल याद करें, उनकी कुछ बातें खुद में उतारे, तभी यह मुल्क अखण्ड रहेगा।

आज 14 अगस्त है, पाकिस्तान आज अपनी आजादी मना रहा है। इसी अगस्त के महीने में, सन 1947 में जब दो मुल्क आजादी की खुशी में पागल हुआ जा रहा था तो वहीं दोनों मुल्कों में लाखों लोग काटे गए, उनको घर-व्यापार छोड़कर भागना पड़ा, क्यों? पाकिस्तान की पैदाईश का आधार क्या था? क्या नेताजी और गरम दल के बड़े क्रांतिकारीयों के रहते भी पाकिस्तान होता? बंटवारा होता? आपके मन को बार बार आपसे पूछना चाहिए कि भगत सिंह को बचाने के लिए कौन कौन वकील लड़ा था जबकि गांधीजी समेत बहुत से लोग वकील थे।
जिन महापुरुषों की कल हम स्तुति करेंगे, उनमें से कौन-कौन लोग थे जो आजादी के घोषणा होने तक जीवित थे? जो जीवित रहे उनका मुल्क को एक रखने का क्या प्रयास था? कितने लोगों ने देश की अखंडता बनाये रखने के लिए लड़ाई की? आजादी क्या वाकई हमने बिना खड्ग, बिना तलवार पाई जैसा अक्सर गीतों, काव्यों, कहानियों के द्वारा बताया जाता है? नेहरूजी महान नेता थे, उनको अंग्रेजों ने जेल में बहुत यातना दी ऐसा ही तो? और उनके इसी संघर्ष के पारितोषिक स्वरूप उनको देश का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया? पर जिस देश को हम लोकतांत्रिक देश कहते है उसके पहले प्रधानमंत्री को किसने चुना? लोकतंत्र(1950) बहाली से पहले तक जो तंत्र था उसे इतिहास क्या कहता है? आजाद हिंद फौज, और तमाम शहीद क्रांतिकारियों के परिवारों को आजाद मुल्क से क्या सम्मान मिला?
ये कुछ सवाल है जिसके जवाब अवश्य ढूंढे, तभी आप समझ पाएंगे कि हमने क्या गलत किया और क्यों इस मुल्क में यहीं खाकर इसी के टुकड़े-टुकड़े हो ऐसा नारा लगाते है…

जय हिंद
जय हिंद की सेना
वन्दे मातरम
भारत माता की जय
-सन्नी कुमार
http://www.sunnymca.wordpress.com

इस स्वतन्त्रता दिवस आप इन प्रश्नों का उत्तर अवश्य ढूंढे

समस्त भरतवंश को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.. हम सब ऋणी है उन हजारों-लाखों स्वतन्त्रता सेनानियों के जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर इस देश का सम्मान स्थापित किया।
मित्रों देश की करेंसी पे जगह कम है, शायद इसीलिये केवल गांधीजी फिट बैठते है, पर हमारे और आपके दिलों में उन क्रांतिवीरों के लिए आदर कम ना रहे, जिन्होंने अपना सर्वस्व त्यागा और भारत माँ की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। आज वक्त है खुदिरामबोस, बैकुंठ शुक्ल, जुब्बा सहनी जैसे उन लाखों वीरों को याद करने का जिनकी गाथा गुमनाम हो गई, आज दिन है उस नेताजी को याद करने का जिसने अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए गैर मुल्क में भारतीय फौज खड़ी की। सो आप उन लोगों को भी न केवल याद करें, उनकी कुछ बातें खुद में उतारे, तभी यह मुल्क अखण्ड रहेगा।

आज 14 अगस्त है, पाकिस्तान आज अपनी आजादी मना रहा है। इसी अगस्त के महीने में, सन 1947 में जब दो मुल्क आजादी की खुशी में पागल हुआ जा रहा था तो वहीं दोनों मुल्कों में लाखों लोग काटे गए, उनको घर-व्यापार छोड़कर भागना पड़ा, क्यों? पाकिस्तान की पैदाईश का आधार क्या था? क्या नेताजी और गरम दल के बड़े क्रांतिकारीयों के रहते भी पाकिस्तान होता? बंटवारा होता? आपके मन को बार बार आपसे पूछना चाहिए कि भगत सिंह को बचाने के लिए कौन कौन वकील लड़ा था जबकि गांधीजी समेत बहुत से लोग वकील थे।
जिन महापुरुषों की कल हम स्तुति करेंगे, उनमें से कौन-कौन लोग थे जो आजादी के घोषणा होने तक जीवित थे? जो जीवित रहे उनका मुल्क को एक रखने का क्या प्रयास था? कितने लोगों ने देश की अखंडता बनाये रखने के लिए लड़ाई की? आजादी क्या वाकई हमने बिना खड्ग, बिना तलवार पाई जैसा अक्सर गीतों, काव्यों, कहानियों के द्वारा बताया जाता है? नेहरूजी महान नेता थे, उनको अंग्रेजों ने जेल में बहुत यातना दी ऐसा ही तो? और उनके इसी संघर्ष के पारितोषिक स्वरूप उनको देश का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया? पर जिस देश को हम लोकतांत्रिक देश कहते है उसके पहले प्रधानमंत्री को किसने चुना? लोकतंत्र(1950) बहाली से पहले तक जो तंत्र था उसे इतिहास क्या कहता है? आजाद हिंद फौज, और तमाम शहीद क्रांतिकारियों के परिवारों को आजाद मुल्क से क्या सम्मान मिला?
ये कुछ सवाल है जिसके जवाब अवश्य ढूंढे, तभी आप समझ पाएंगे कि हमने क्या गलत किया और क्यों इस मुल्क में यहीं खाकर इसी के टुकड़े-टुकड़े हो ऐसा नारा लगाते है…

जय हिंद
जय हिंद की सेना
वन्दे मातरम
भारत माता की जय
-सन्नी कुमार
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हुनर में खास क्या रखा है

भावनाओं को समझिए तस्वीर में क्या रखा है,
यहां रोज चखते है मूर्ख सफलता का स्वाद लेकर आरक्षण की सीढ़ियां,
फिर हुनर में खास क्या रखा है?

यहां भारत बंद कराने की राजनीति ही होती आई है सालों से,
फिर गरीबी से लड़ाई में क्या रखा है?
सरकारी खर्चे पे रिसर्च करने वाला गरीबी से कुछ यूं लड़ता है,
खुद इंडस्ट्री लगा नहीं सकता शायद तभी पूछता है कि औरों ने कैसे लगा रखा है?

©सन्नी कुमार

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