सपने में लंकेश

 

C__Data_Users_DefApps_AppData_INTERNETEXPLORER_Temp_Saved Images_images(1)कल रात ख्वाब में एक बूढी महिला आई जो उम्र में मेरे दादी सी थी। अब चूंकि सपने स्पष्ट नहीं होते तो पहले तो गाँव की एक दादी सी लगी पर फिर उनकी अंग्रेजी लूक पे ध्यान गया और मैं समझ गया कि ये गाँव की नहीं बल्कि शहर की कोई ग्रैनी है परन्तु मैं अभी भी उन्हें पहचान नहीं पा रहा था और चूंकि अजनबीयों से कुछ भी पूछना आसान नहीं होता तो मैं उनके कुछ कहने का इंतजार करता रहा और फिर वो बोली “एम लंकेश”, लंकेश सुनते ही ( कन्फ्यूजन वाले लूक में) अपन बोले लंकेश?? पर बाबा आप ग्रैनी लुक में? वो बोली “व्हाट हैपेन? डोंट यू नो मी?
अब तो म अबोध अद्विक की तरह सर हिला के अपनी अज्ञानता बताये.. फिर वो बोली “हे एम गोरी लंकेश, द जर्नलिस्ट हू हैज़ बीन किल्ड आन फीफ्थ सेप्टेम्बर” मेरा तो इतना सुनते ही पसीना छूट गया, सपने में था और वहां भी आँख बन्द और हनुमान चालीसा शुरू हो गया पर तभी वो बोली “अरे वेट, वेट! डोंट रिएक्ट लाइक अ भक्त! हम मने में बोले कि जब भक्त है तो नास्तिक टाइप रिएक्शन कैसे होगा तब तक वो फिर बोलने लगी “आइ वांट यू टू राइट आन सीरियस इसूज़ इन्सटीड दीस पर्सनल अफेयर एंड पोएट्री.. यू नो नेशन इज़ इन रौंग हैंड एंड सी आय हैव बीन किल्ड फाॅर स्पीकींग ट्रूथ..
हम बोले लंकेश जी मुझे आपकी हत्या का दुख है पर आधे सच को मैं अगर झूठ नहीं कह सकता तो आप भी इसे सच नहीं कह सकती। आज जर्नलिस्ट लोग इसी आधे सच से अपनी दुकान चला रहे, क्या आप इससे अछूती थी? आप अगर सच ही बोलती तो प्रहलाद जोशी वाले मानहानि मामले में आप जेल न जाती, बुरा मत मिनिएगा पर आप जिस इंडिया की कल्पना करती है उससे बहुत अलग है मेरा भारत, आप जिस आजादी की बात करती है उसे मेरे गाँव की महिलाएं सनक समझती है…. अब तो वो पूरे गुस्से में थी और बोली मेरा बेटा कन्हैया भी तो उसी गांव से है वो तो मुझसे न केवल सहमत है बल्कि मेरे विचार को आगे युवाओं में लेकर जा रहा, अगर तुम्हारे जैसे युवा उसका साथ दे तो वो गरीबी से, जातियता से फासिवाद से आजादी जरूर दिलवा देगा…अब मेरी हंसी 😁 छूट गई और पूछ लिया कि लंकेश जी क्या आपके समर्थन में कन्हैया और उसके साथी कोई उद्योग लगाएंगे जिससे रोज़गार के अवसर मिलेंगे और गरीबी कम होगी, या आपके समर्थक जातिवाद को खत्म करने के लिए सरकार को जातीय आधार पर लाभ देने से रोकेंगी? अब वो थोड़ी बेचैनी में थी, कहने लगी रोजगार देना, गरीबी रोकना, जातिवाद खत्म करना सरकार की जिम्मेदारी है। उनके इस बात से हम भी सहमत थे फिर वो बोलने लगी कि संघी ब्राह्मणों ने लोगों का शोषण किया है, ब्राह्मणों ने मंदिरो के चंदा से गरीबों  को दूर रखा है, अघोषित आरक्षण है मंदिरों में क्यों? हम बोले आप चाहती तो अपना मंदिर बना सकती थी यकीन जानिए किसी को आपत्ति न होती बल्कि आपके भी कुछेक अंधभक्त जरूर होते, देश में गुरमित राम रहीम जैसे कि कमी थोड़े न है और वैसे भी पुजारी कौन होगा ये तो मंदिर बनाने वाला ही तय करेगा है कि नहीं? आप भी मंदिर निर्माण कर खुद पुजारी बन सकते है। पर आपको खुद के मन में खुद के लिए स्थापित हीन भावना सताता रहा और आप दोष संघी को देती रही, जिस ब्राह्मणों को आप सब वामपंथी टारगेट करते है क्या देश उसकी वजह से गुलाम रहा? कब किस सदी में देश अपने स्वर्णिम काल में था और क्यों इसपे विचारा कभी आपलोगो ने? क्या विचारती आप आजादी की ऐसी पैरवीकार थी जिनकी दिलचस्पी फ्री सेक्स, किस आफ लव, बीफ, नो ब्रा जैसे मुद्दों में ज्यादा थी। आप ही बताये इन मुद्दों से आप किस गरीब का भला कर रही थी?? अब तो वो गुस्से में मानो नाककटी सूपनखा हो गई और तमतमाती हुई बोली ” don’t act like a Sanghi, try to understand India is a secular country and we all have freedom to express, freedom to eat freedom to convert… हम बिच में ही टोकते हुए बोले कि freedom to hurt, freedom to blame, freedom to nautanki भी मिला था क्या जो हर बार हमारी ही आस्था को चोट पहुंचाती रही? आप गाय खाओ या गू ये आपकी मर्जी पर आप उस निरीह पशु के बहाने हमें चिढाती रही..इतना सुनते ही वह लगभग चिल्लाती हुई बोली I never meant to hurt but in India people should not be divided on the basis of eating habbit…उनकी इस बात से हम सहमत हो गये और भावनात्मक होते हुए एक उम्मीद से बोले कि बस आप एक गाय छोड़ दीजिए बाकि जानवरों से मेरा सरोकार कम ही है…मैं खत्म करता उससे पहले ही वो बोली “नैरो माइंडेड रीलिजीयस फूल यू आर. यू नो इंडिया इज टाप बीफ एक्सपोर्टर… हम बोले कि सब जानते है और आदम की सोंच नहीं समझ पाते कि कैसे कुत्तों को टहलाने वाले एनिमल लवर और गाय को रोटी देने वाले रीलिजीयस फूल हो जाते है….
अब तो वो पूरी नाउम्मीद हो गई और बोली “see you won’t understand, you can’t even see how sanghi Brahmins have made the life of SC/STs a hell. Hinduism is dividing people on caste that is totally insane.
अब उनकी इस आधी हकीकत सो फिर एकबारगी हम सहमत हुए पर जो सच छुपा दिया गया वो पूछ लिया कि क्यों इस जातिय भेद को संविधान खत्म कर देता, जाति तो हिन्दू समाज में कभी था ही नहीं, वर्ण थे वो भी कर्म आधारित मतलब कर्म बदलते ही वर्ण बदल जाता था उदाहरण के लिए बाल्मीकी, ब जैसे कई नाम है। उसके बाद भी अगर वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से गलत थी तो याद रखिए उस युग में भारत ज्ञान, कला, विज्ञान में अग्रणी था और हर घर में मैनूफैक्चरींग होती थी, क्या वो स्वरोजगार, वो संपन्नत अब भी है? क्या हम आज भी सबसे बड़ी GDP है क्या देश आज भी सोने की  चीड़िया है? अगर नहीं तो क्यों? क्या इसके लिए ब्राह्मण ही  दोषी है आपके उठाए किन मुद्दों से देश पुनः वह गौरव पा सकेगा?? वो बोली “Sunny, I don’t have much time to discuss all this now. I want you to write a post on my murderer and keep highlighting this so police can take action against those bloody terrorists. This state funeral and gun rounds are not enough.
इतना सुनते ही अहसास हुआ कि देश में दरिंदगी बढ़ गई है, खूनी खेल केरल-कर्नाटक-कश्मीर-बिहार-यूपी-असम-अम्रीतसर हर जगह बढ गया है, पत्रकार भी खूब मरे है पर उनमें से कोई न तो मेरे सपने में आया न उनको तोपों की सलामी नसीब हुई फिर आपकी लेखन, जीवन में क्या खास था??
अब वो एकदम से चिल्लायी You narrow minded bhakt, see what I am doing now… मेरा तो डरके हालत खराब अबकि चालीसा भी भूल गया पर भला हो उस आदमी का जिसने दरवाजा खटखटाते हुए आवाज़ दिया “सन्नी सर, विष्णुपद चलेंगे, पितरीपक्ष में पितरों को याद करने”

(This post is just to share my view on Late Lankesh, may her murders get punished but we are different and having different ideology, I think being a journalist she only shared Hal truths and half cant be full. Share I you agree.)

 

 

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बधाई हो वोटर हुआ है!!

sunny-kumar-121विचित्र भारत! जहां एक ओर किताबों में जातिवाद के दोष पढाये जाते है तो दूसरी ओर राशन कार्ड, नौकरी और तमाम सरकारी कामों में जाति पूछा जाता है. जहां सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च न्यायायिक संस्था को धर्म और जात के नाम पर चुनाव लड़ना गलत लगता है पर अल्पसंख्य्क, SC,एसटी मतलब धर्म और जाति के आधार पर मिलने वाले रहम जायज़ लगते है, पूछ सकता हूँ कैसे?

विचित्र भारत! जहां सरकार उद्योगपतियों के साथ पीपीपी मौडल बनाकर काम करती है, उन्हें अरबों का ऋण देती है पर किसानों के लिये उसके सारे योजना हवाई होते है, फुस्स होते है, हद तो ये है की किसानों का शोषण किया जाता है, जब फ़सल नहीं हुयी तो नुकसान किसान का, अगर खूब हो गया तो 2 रुपये किलो बेचने को मजबूर होना होता और शायद यही कारण है की किताबों में कृषी को घाटे का शौदा और जुआ कहा गया है, और आज की युवा खेती से दूर भाग गयी है पर अगर किसान बनने बंद हो जाए, खेती को शौदा न समझ सेवा समझने वाले न रहे तो जीवन बचेगा? उगाना छोड़ दिया, खाना छोड़ सकेंगे.? नहीं न? तो फिर खेती शौदा है ये पढाना बंद करेंगे? सरकार कुछ हिम्मत किसानों संग दिखायेगी या सारा विकास कुछ चंद क्षेत्रों के विकास से ही हो जायेगा??
विचित्र भारत! जहां चपरासी बनना हो तो शैक्षनीक योग्यता तय है पर राजनेता अंगुठा टेप कर भी बन जाते. क्यों क्या नेताओं के अनपढ़ होने से उनके निर्णय का असर समाज, देश पर नहीं परता? अगर नहीं तो फिर नेताओं की जरूरत ही क्यों?
विचित्र भारत जहां जनसंख्या विस्फोट की स्थिति के बावजूद बच्चों के जन्म पर इनाम(प्रोत्साह्न) राशि मिलता है. क्यूँ? क्या सरकार ये सोंचती है कि बधाई हो वोटर हुआ है!!

 

आरक्षण का आधार

WP_20170705_06_48_43_Proआरक्षण समर्थकों के घिसे पिटे बण्डलबाजीयों में से जो सबसे प्रमुख है उनमें से कुछ को यहाँ बाँटना चाहूंगा। आरक्षण समर्थकों के अनुसार दलितों और पिछड़ों का शोषण हुआ था, उन्हें समाज में दुत्कारा गया इसलिए उनको बढ़ने का असवर देने के लिए आरक्षण आवश्यक है।
वैसे आपको वो ये बताने में असमर्थ होंगे की शोषण किसने किया? जवाब में कोई तर्क नहीं मिलेगा बल्कि फिर से बण्डलबाजी की मनुस्मृति में ये है, वो है और ब्राह्मणों ने दोहन किया….अब हम और आप, बल्कि वो भी जानते है कि मनुस्मृति कोई पढ़ता नहीं, आजादी से पूर्व ब्राह्मण नहीं बल्कि अंग्रेज और फिर उनसे पहले मुगलों, नवाबों का शाशन था फिर ब्राह्मण अकेले कैसे शोषण कर सकता था? दरअसल हर कायर एक कमजोर दुश्मन चाहता है, इनको भी चाहिए होगा? (कायर-आरक्षण समर्थक, कमजोर- ब्राह्मण, अपवाद की गुंजाईश हर जगह होती है)

हास्यास्पद ये है कि वो वर्षों की गुलामी का नारा लगा देते है, अधिकार मांगते है पर ये नहीं स्वीकारते की असमानता हमेशा थी, है और रहेगी पर आरक्षण जैसी व्यवस्था जो एक कोढ़ है भारत को न केवल पीछे धकेलती है बल्कि समाज में वैमनश्य और जात-पात की राजनीति को बढ़ावा देती है। वो आपसे ये भी न कहेंगे कि 70 साल के बाद अभी कितने साल और आरक्षण चाहिए।

खैर आरक्षण समर्थकों का एक और दलील है कि भारत में उनको नीच समझा जाता है, उनको कोई अपनी बेटी नहीं देता, न समाज इज्जत, मंदिरों में उनके प्रवेश पर रोक है, और वो असमानता के शिकार है। यहाँ मैं उनसे थोड़ा सहमत हूँ की उनसे असमानता होती है, बल्कि असमानता का शिकार तो हम आप, हर कोई है…देखिये जो इज्जत ‘बच्चन’ को मिलेगा वो ‘बेचन’ को नहीं मिल सकता न इस बात को लेकर बेचन को ईर्ष्या करना चाहिए बल्कि उसे इस सत्य का भान होना चाहिए की बच्चन(प्रतिभावान) कोई भी बन सकता, बेचन से बच्चन बनते देर नहीं लगती। उदाहरण के लिए हजारों नाम है जिनको दुनिया बिना उनके जात को जाने भी इज्जत देती है और ये असमानता दुनिया के हर कोने में मिलेगा। अब कुछ लोग हमें काफीर कहते है तो क्या किसी के कहने से हम कुछ हो जायेंगे?? हाँ, हमारा कर्म हमारी पहचान है और अगर काम 4th ग्रेड का हो तो इज्जत 1st ग्रेड की मिल सकेगी? ये तो नौकरी, बिजनेस, व्यवहार समाज हर जगह लागु है.. यहाँ कर्म की प्रधानता है। वैसे वो आपको ये नहीं बताएंगे की आज कोई उन्हें बाध्य नही करता की वो एक तय काम ही करे बल्कि जात का प्रमाणपत्र भी वो खुद बनवाते और फिर कहते की जातिवाद से नुकसान है उनका।

वो ये भी नहीं कहेंगे कि 70 सालों में आरक्षण ने देश का कितना भला कराया है और कितना नुकसान। हाँ उन्हें ये चाहिए क्योंकि उनको किसी ने बताया है कि उनके दादा-परदादों का सोशन हुआ। ये वोट बैंक की राजनीती का बड़ा हिस्सा बन गया है जो राष्ट्र को भारी नुकसान पहुंचा रहा और समाज को बाँट रहा है ऐसा मुझे लगता है।

वैसे यहां क्या मैं पूछ सकता हूँ की जो लोग आज 4थ ग्रेड, बोले तो सेवा कार्य, नौकरी कर रहे उनको भी आरक्षण मिलेगा या ये सुविधा सिर्फ मनु के प्रशंशकों(वही जो पढ़ते कम जलाते ज्यादा है) के लिए है???? और शोषित समाज का timeline तय कर दिया गया है? क्योंकी आज भी नौकरियों में कम पैसे पर लोगों को रखा जाता है, काम लिया जाता है, पर इन बेचारों के लिए किसी मनु ने कुछ नया लिखा नहीं है तो क्या इनके पोतों(ग्रैंड सन) के लिए भविष्य में आरक्षण मिल सकता है?

एक और खतरनाक बकवास होता है उनके पास की मंदिरों में पंडितों का 100 प्रतिशत आरक्षण क्यों है, अब उनको हजार बार हजार लोगों ने समझाया होगा कि भाई जो मन्दिर बनायेगा वही पुजारी निर्धारित करेगा, तुम एक मंदिर बना लो बन जाओ पुजारी कोई रोकेगा नहीं, अगर रोकता है तो on कैमरा क्रांति कर दो, पर तुम कुछ क्यों करोगे तुमहे तो दान का लोभ है, फिर कटोरी का जुगाड़ कर लो, सबकुछ पंडितों को ही नहीं मिलता.. पर इत्ती सी बात भी न समझेंगे और जातिवाद से लड़ने के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाके ऐसी तैसी करा लेंगे…..

आप क्या कहते है???

बाकि प्रतिभा बेमेल है, विजयी है जिससे सबको सहमत होना है, सो प्रतिभावान बने, निर्विवाद बने।

-सन्नी

दिवाली देशफ्रेंडली बनाये

​दीपावली सिर्फ पर्यावरण फ्रेंडली मनाने भर से काम न चलेगा, रामभक्तों को इस बार की दिवाली को देशफ्रेंडली बनाना होगा अर्थात चीनी उत्पादों को नकारते हुए घर को रोशन करना होगा.. एक और बात, मीठा का मतलब घर के सदस्यों के लिए चॉकलेट का डब्बा नहीं बल्कि घर और पड़ोस के लोगों के लिए मिठाई(भले प्रसाद के रूप में,)भी होता है। वैसे बच्चों में नया संस्कार देना है, कुछ देने की आदत डालनी है तो फिर दिवाली एक बेहतर दिन है किसी जरूरतमंद की मदद करने के लिए, आप बच्चों को प्रेरित कर सकते है कि महंगे फटाकों के क्षणिक सूख से बेहतर है किसी जरूरतमंद को कम्बल देना जो आपको एक अलग अनुभूति प्रदान करेगा, बोले तो मन को अच्छा लगेगा। बच्चे और आप कनेक्ट हो सकेंगे खुद से और राम जी से और फिर मुझे तो ये भी लगता है कि रामजी को घर में नहीं मन में बुलाना चाहिए, और ये बेहतर तरीका है उनको भी खुश करने का। है कि नहीं?

और फिर इस तरह से औरों के संग मिठाई बाँट कर, आसपास सफाई अभियान चलाकर, किसी मदद कर हम दिवाली मनाये, थोड़े कम फटाके फोडे बावजूद बड़ा आनन्द आयेगा…,बाकि हम सब समझदार है।

मदर’स डे विशेस

कल फेसबुक पे नहीं था क्योंकि घर में था, अपने बेटे के पास मेरे पापा के साथ, साथ में उसकी माँ भी थी और मेरी माँ भी… इतवार अच्छा गुजरा, मैंने मदर डे की जानकारी नहीं थी न फेसबुकिया इमोशन जागा था पर जब भाई ने माँ को सुबह-सुबह फोन किया तब मालुम हुआ… खैर मैं ढीठ हूँ मैंने उसके बाद भी माँ को कुछ नहीं कहा, बस उसके साथ हमेशा की तरह चिढ़ना-चिढ़ाना करता रहा… जब अकेले में, अपने कमरे में आया तो बीबी ने आकर समझाया की आज तो पूरी दुनिया माँ को सिर्फ मान दे रही है, आप आज भी बच्चों की तरह कर क्यों रहे हो, ये बेवजह की चिढ़ना, चिढ़ाना क्यों?…मैंने बिच में ही टोकते हुए कहा कि मैं आज भी उसका बच्चा ही तो हूँ और जैसे तुम्हारे अद्विक को तुम्हे कुछ बताने के लिए शब्द नहीं चाहिए, मुझे भी नहीं चाहिए.. माँ के साथ हूँ, माँ सब समझ रही है… तभी उसको माँ ने बाहर बुलाया, शायद वो हमे सुन गयी थी.. अब वापिस जब मेरी बीबी आयी तो बोली की माँ को मार्किट जाना है… लो अब तो मैं और चिढ गया कि यार शाम में मुझे वापिस गया जाना है और इस धुप में बाहर! पर माँ ने कहा था तो मैंने हामी भरी, तुरत तैयार होकर बाजार के लिए निकले और फिर माँ एक घड़ी के दुकान में लेकर गयी, बोला की प्रीती के लिए घड़ी देखनी है मुझे anniversary गिफ्ट का सुझा कि अभी ही ले रही , पर उधर जा कर उसने मेरे लिए घड़ी खरीदी, बाद में कहा कि प्रीती के लिए अगले सन्डे जब आओगे तब ले लेंगे…
जब घर पहुंचे और सबको मिठाई दी तो बीबी बोली कि खूब हो आप तो, मदर डे पर बस मिठाई? मम्मी को तो कुछ अलग दीजिये, फिर मैंने चिढ़ाते हुए अपनी घड़ी दिखाई….. और त्वरित कमेंट आया कि आपका सिर्फ इनकमिंग है…. हम दोनों नोक झोंक में उलझ गए और माँ मुस्कुराते हुए चली गयी और फिर उसने सबको मिठाई, समोसा दिया.

शाम में जब घर से निकल रहा था, उसके जब पाँव छुए तो फिर 100 रूपये का नोट जेब में डाल दी…हम बोले की कल सैलरी आ जायेगी माँ, वो बोली नहीं आती तो 100 रूपये में जी लेता क्या? दोनों हंसे और फिर मैं घर से गया के लिए निकल गया।

अब रात में 1 बजे जब गया पहुँच गया तब जाकर घरवालों को नींद आयी, पर बीबी को तब भी चैन नहीं थी, बोली अगली बार जब आप आएंगे मैं और आप दोनों चलेंगे और कुछ मम्मी के लिए खरीदेंगे.. हम मुस्कुराये बोले हम तो सिर्फ इनकमिंग है, हाँ अगर तुम कुछ कांफ्रेंस टाइप करा दो, तो जरूर चलेंगे.. उ बुझी नहीं हम बुझाए नहीं पर मेरी और अद्विक दोनों की माँ, और सबकी माँ बच्चों को बुझती है भले शब्द हो या निशब्द… मेरा अद्विक मुझे वो सब याद दिला रहा जो मुझे कभी याद नहीं था, आज जान रहा हूँ की बच्चे कैसे अपने माँ को उसकी धड़कन से, उसके शरीर के गर्मी से जान लेता है और कैसे एक माँ पूरी रात जगाकर अपने बच्चे को फीड करती है पर नाराज नहीं होती, न किसी को खबर होने देती की उसको रात भर जगना परा. अबये भी जान रहा हूँ की एक बच्चे और माँ दोनों का जन्म भी एक ही दिन होता है दोनों के लिए हर दिन विशेस है.

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