बधाई हो वोटर हुआ है!!

sunny-kumar-121विचित्र भारत! जहां एक ओर किताबों में जातिवाद के दोष पढाये जाते है तो दूसरी ओर राशन कार्ड, नौकरी और तमाम सरकारी कामों में जाति पूछा जाता है. जहां सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च न्यायायिक संस्था को धर्म और जात के नाम पर चुनाव लड़ना गलत लगता है पर अल्पसंख्य्क, SC,एसटी मतलब धर्म और जाति के आधार पर मिलने वाले रहम जायज़ लगते है, पूछ सकता हूँ कैसे?

विचित्र भारत! जहां सरकार उद्योगपतियों के साथ पीपीपी मौडल बनाकर काम करती है, उन्हें अरबों का ऋण देती है पर किसानों के लिये उसके सारे योजना हवाई होते है, फुस्स होते है, हद तो ये है की किसानों का शोषण किया जाता है, जब फ़सल नहीं हुयी तो नुकसान किसान का, अगर खूब हो गया तो 2 रुपये किलो बेचने को मजबूर होना होता और शायद यही कारण है की किताबों में कृषी को घाटे का शौदा और जुआ कहा गया है, और आज की युवा खेती से दूर भाग गयी है पर अगर किसान बनने बंद हो जाए, खेती को शौदा न समझ सेवा समझने वाले न रहे तो जीवन बचेगा? उगाना छोड़ दिया, खाना छोड़ सकेंगे.? नहीं न? तो फिर खेती शौदा है ये पढाना बंद करेंगे? सरकार कुछ हिम्मत किसानों संग दिखायेगी या सारा विकास कुछ चंद क्षेत्रों के विकास से ही हो जायेगा??
विचित्र भारत! जहां चपरासी बनना हो तो शैक्षनीक योग्यता तय है पर राजनेता अंगुठा टेप कर भी बन जाते. क्यों क्या नेताओं के अनपढ़ होने से उनके निर्णय का असर समाज, देश पर नहीं परता? अगर नहीं तो फिर नेताओं की जरूरत ही क्यों?
विचित्र भारत जहां जनसंख्या विस्फोट की स्थिति के बावजूद बच्चों के जन्म पर इनाम(प्रोत्साह्न) राशि मिलता है. क्यूँ? क्या सरकार ये सोंचती है कि बधाई हो वोटर हुआ है!!

 

आरक्षण का आधार

​आरक्षण समर्थकों के घिसे पिटे बण्डलबाजीयों में से जो सबसे प्रमुख है उनमें से कुछ को यहाँ बाँटना चाहूंगा। आरक्षण समर्थकों के अनुसार दलितों और पिछड़ों का शोषण हुआ था, उन्हें समाज में दुत्कारा गया इसलिए उनको बढ़ने का असवर देने के लिए आरक्षण आवश्यक है।
वैसे आपको वो ये बताने में असमर्थ होंगे की शोषण किसने किया? जवाब में कोई तर्क नहीं मिलेगा बल्कि फिर से बण्डलबाजी की मनुस्मृति में ये है, वो है और ब्राह्मणों ने दोहन किया….अब हम और आप, बल्कि वो भी जानते है कि मनुस्मृति कोई पढ़ता नहीं, आजादी से पूर्व ब्राह्मण नहीं बल्कि अंग्रेज और फिर उनसे पहले मुगलों, नवाबों का शाशन था फिर ब्राह्मण अकेले कैसे शोषण कर सकता था? दरअसल हर कायर एक कमजोर दुश्मन चाहता है, इनको भी चाहिए होगा? (कायर-आरक्षण समर्थक, कमजोर- ब्राह्मण, अपवाद की गुंजाईश हर जगह होती है)

हास्यास्पद ये है कि वो वर्षों की गुलामी का नारा लगा देते है, अधिकार मांगते है पर ये नहीं स्वीकारते की असमानता हमेशा थी, है और रहेगी पर आरक्षण जैसी व्यवस्था जो एक कोढ़ है भारत को न केवल पीछे धकेलती है बल्कि समाज में वैमनश्य और जात-पात की राजनीति को बढ़ावा देती है। वो आपसे ये भी न कहेंगे कि 70 साल के बाद अभी कितने साल और आरक्षण चाहिए।

खैर आरक्षण समर्थकों का एक और दलील है कि भारत में उनको नीच समझा जाता है, उनको कोई अपनी बेटी नहीं देता, न समाज इज्जत, मंदिरों में उनके प्रवेश पर रोक है, और वो असमानता के शिकार है। यहाँ मैं उनसे थोड़ा सहमत हूँ की उनसे असमानता होती है, बल्कि असमानता का शिकार तो हम आप, हर कोई है…देखिये जो इज्जत ‘बच्चन’ को मिलेगा वो ‘बेचन’ को नहीं मिल सकता न इस बात को लेकर बेचन को ईर्ष्या करना चाहिए बल्कि उसे इस सत्य का भान होना चाहिए की बच्चन(प्रतिभावान) कोई भी बन सकता, बेचन से बच्चन बनते देर नहीं लगती। उदाहरण के लिए हजारों नाम है जिनको दुनिया बिना उनके जात को जाने भी इज्जत देती है और ये असमानता दुनिया के हर कोने में मिलेगा। अब कुछ लोग हमें काफीर कहते है तो क्या किसी के कहने से हम कुछ हो जायेंगे?? हाँ, हमारा कर्म हमारी पहचान है और अगर काम 4th ग्रेड का हो तो इज्जत 1st ग्रेड की मिल सकेगी? ये तो नौकरी, बिजनेस, व्यवहार समाज हर जगह लागु है.. यहाँ कर्म की प्रधानता है। वैसे वो आपको ये नहीं बताएंगे की आज कोई उन्हें बाध्य नही करता की वो एक तय काम ही करे बल्कि जात का प्रमाणपत्र भी वो खुद बनवाते और फिर कहते की जातिवाद से नुकसान है उनका।

वो ये भी नहीं कहेंगे कि 70 सालों में आरक्षण ने देश का कितना भला कराया है और कितना नुकसान। हाँ उन्हें ये चाहिए क्योंकि उनको किसी ने बताया है कि उनके दादा-परदादों का सोशन हुआ। ये वोट बैंक की राजनीती का बड़ा हिस्सा बन गया है जो राष्ट्र को भारी नुकसान पहुंचा रहा और समाज को बाँट रहा है ऐसा मुझे लगता है।

वैसे यहां क्या मैं पूछ सकता हूँ की जो लोग आज 4थ ग्रेड, बोले तो सेवा कार्य, नौकरी कर रहे उनको भी आरक्षण मिलेगा या ये सुविधा सिर्फ मनु के प्रशंशकों(वही जो पढ़ते कम जलाते ज्यादा है) के लिए है???? और शोषित समाज का timeline तय कर दिया गया है? क्योंकी आज भी नौकरियों में कम पैसे पर लोगों को रखा जाता है, काम लिया जाता है, पर इन बेचारों के लिए किसी मनु ने कुछ नया लिखा नहीं है तो क्या इनके पोतों(ग्रैंड सन) के लिए भविष्य में आरक्षण मिल सकता है? 

एक और खतरनाक बकवास होता है उनके पास की मंदिरों में पंडितों का 100 प्रतिशत आरक्षण क्यों है, अब उनको हजार बार हजार लोगों ने समझाया होगा कि भाई जो मन्दिर बनायेगा वही पुजारी निर्धारित करेगा, तुम एक मंदिर बना लो बन जाओ पुजारी कोई रोकेगा नहीं, अगर रोकता है तो on कैमरा क्रांति कर दो, पर तुम कुछ क्यों करोगे तुमहे तो दान का लोभ है, फिर कटोरी का जुगाड़ कर लो, सबकुछ पंडितों को ही नहीं मिलता.. पर इत्ती सी बात भी न समझेंगे और जातिवाद से लड़ने के लिए जाति प्रमाण पत्र बनवाके ऐसी तैसी करा लेंगे…..

आप क्या कहते है???

बाकि प्रतिभा बेमेल है, विजयी है जिससे सबको सहमत होना है, सो प्रतिभावान बने, निर्विवाद बने।

-सन्नी

दिवाली देशफ्रेंडली बनाये

​दीपावली सिर्फ पर्यावरण फ्रेंडली मनाने भर से काम न चलेगा, रामभक्तों को इस बार की दिवाली को देशफ्रेंडली बनाना होगा अर्थात चीनी उत्पादों को नकारते हुए घर को रोशन करना होगा.. एक और बात, मीठा का मतलब घर के सदस्यों के लिए चॉकलेट का डब्बा नहीं बल्कि घर और पड़ोस के लोगों के लिए मिठाई(भले प्रसाद के रूप में,)भी होता है। वैसे बच्चों में नया संस्कार देना है, कुछ देने की आदत डालनी है तो फिर दिवाली एक बेहतर दिन है किसी जरूरतमंद की मदद करने के लिए, आप बच्चों को प्रेरित कर सकते है कि महंगे फटाकों के क्षणिक सूख से बेहतर है किसी जरूरतमंद को कम्बल देना जो आपको एक अलग अनुभूति प्रदान करेगा, बोले तो मन को अच्छा लगेगा। बच्चे और आप कनेक्ट हो सकेंगे खुद से और राम जी से और फिर मुझे तो ये भी लगता है कि रामजी को घर में नहीं मन में बुलाना चाहिए, और ये बेहतर तरीका है उनको भी खुश करने का। है कि नहीं?

और फिर इस तरह से औरों के संग मिठाई बाँट कर, आसपास सफाई अभियान चलाकर, किसी मदद कर हम दिवाली मनाये, थोड़े कम फटाके फोडे बावजूद बड़ा आनन्द आयेगा…,बाकि हम सब समझदार है।

मदर’स डे विशेस

कल फेसबुक पे नहीं था क्योंकि घर में था, अपने बेटे के पास मेरे पापा के साथ, साथ में उसकी माँ भी थी और मेरी माँ भी… इतवार अच्छा गुजरा, मैंने मदर डे की जानकारी नहीं थी न फेसबुकिया इमोशन जागा था पर जब भाई ने माँ को सुबह-सुबह फोन किया तब मालुम हुआ… खैर मैं ढीठ हूँ मैंने उसके बाद भी माँ को कुछ नहीं कहा, बस उसके साथ हमेशा की तरह चिढ़ना-चिढ़ाना करता रहा… जब अकेले में, अपने कमरे में आया तो बीबी ने आकर समझाया की आज तो पूरी दुनिया माँ को सिर्फ मान दे रही है, आप आज भी बच्चों की तरह कर क्यों रहे हो, ये बेवजह की चिढ़ना, चिढ़ाना क्यों?…मैंने बिच में ही टोकते हुए कहा कि मैं आज भी उसका बच्चा ही तो हूँ और जैसे तुम्हारे अद्विक को तुम्हे कुछ बताने के लिए शब्द नहीं चाहिए, मुझे भी नहीं चाहिए.. माँ के साथ हूँ, माँ सब समझ रही है… तभी उसको माँ ने बाहर बुलाया, शायद वो हमे सुन गयी थी.. अब वापिस जब मेरी बीबी आयी तो बोली की माँ को मार्किट जाना है… लो अब तो मैं और चिढ गया कि यार शाम में मुझे वापिस गया जाना है और इस धुप में बाहर! पर माँ ने कहा था तो मैंने हामी भरी, तुरत तैयार होकर बाजार के लिए निकले और फिर माँ एक घड़ी के दुकान में लेकर गयी, बोला की प्रीती के लिए घड़ी देखनी है मुझे anniversary गिफ्ट का सुझा कि अभी ही ले रही , पर उधर जा कर उसने मेरे लिए घड़ी खरीदी, बाद में कहा कि प्रीती के लिए अगले सन्डे जब आओगे तब ले लेंगे…
जब घर पहुंचे और सबको मिठाई दी तो बीबी बोली कि खूब हो आप तो, मदर डे पर बस मिठाई? मम्मी को तो कुछ अलग दीजिये, फिर मैंने चिढ़ाते हुए अपनी घड़ी दिखाई….. और त्वरित कमेंट आया कि आपका सिर्फ इनकमिंग है…. हम दोनों नोक झोंक में उलझ गए और माँ मुस्कुराते हुए चली गयी और फिर उसने सबको मिठाई, समोसा दिया.

शाम में जब घर से निकल रहा था, उसके जब पाँव छुए तो फिर 100 रूपये का नोट जेब में डाल दी…हम बोले की कल सैलरी आ जायेगी माँ, वो बोली नहीं आती तो 100 रूपये में जी लेता क्या? दोनों हंसे और फिर मैं घर से गया के लिए निकल गया।

अब रात में 1 बजे जब गया पहुँच गया तब जाकर घरवालों को नींद आयी, पर बीबी को तब भी चैन नहीं थी, बोली अगली बार जब आप आएंगे मैं और आप दोनों चलेंगे और कुछ मम्मी के लिए खरीदेंगे.. हम मुस्कुराये बोले हम तो सिर्फ इनकमिंग है, हाँ अगर तुम कुछ कांफ्रेंस टाइप करा दो, तो जरूर चलेंगे.. उ बुझी नहीं हम बुझाए नहीं पर मेरी और अद्विक दोनों की माँ, और सबकी माँ बच्चों को बुझती है भले शब्द हो या निशब्द… मेरा अद्विक मुझे वो सब याद दिला रहा जो मुझे कभी याद नहीं था, आज जान रहा हूँ की बच्चे कैसे अपने माँ को उसकी धड़कन से, उसके शरीर के गर्मी से जान लेता है और कैसे एक माँ पूरी रात जगाकर अपने बच्चे को फीड करती है पर नाराज नहीं होती, न किसी को खबर होने देती की उसको रात भर जगना परा. अबये भी जान रहा हूँ की एक बच्चे और माँ दोनों का जन्म भी एक ही दिन होता है दोनों के लिए हर दिन विशेस है.

गांधी और अम्बेडकर

गांधी और अम्बेडकर दोनों ने वंचितों के लिए आवाज उठायी, गांधी अफ्रीका में कालों के अधिकार के लिए लड़े, समानता मांगी पर अम्बेडकर ने आरक्षण रूपी भीख माँगा.. आज आरक्षण ने इस देश का कबारा कर दिया और अम्बेडकर सिर्फ आरक्षण लाभार्थियों के हीरो बनके रह गए पर गांधी विश्व के हर कोने में सराहे गए।
अम्बेडकर ने शूद्रों को दलित बनाया, चमारों को हीनता से ग्रसित करवाया और BATA को ब्रांड बनने दिया पर गांधी ने शूद्रों को हरिजन बुलाया, सबको सफाई के लिए विशेसकर खुद का मैला खुद साफ़ करने के लिए प्रेरित किया।
हो सकता है कि गांधी और अम्बेडकर दोनों आने वाले वक़्त में ख़ारिज कर दिए जाए और हमे मायावती और रागा किताबों में मिले पर इतना तय है की अम्बेडकर के आरक्षण ने भले कुछ वंचितों का कल्याण किया हो पर इसने देश को बहुत पीछे धकेला और इसके कारण देश आज भी टूटता है।
रोहित बेमुल्ला जैसे दलितों को शिकायत होती है की उनसे भेदभाव होता है पर ऐसे निर्लज्ज भूल जाते है की सवर्णों के साथ भेदभाव करके ही वहां तक पहुंचे है। जो लोव खुद जाति प्रमाण पत्र दे के शिक्षा पाते हो, नौकरी और प्रमोशन पाते हो उनको कोई हक़ नहीं की वो जातीय भेदभाव पे बोले। एक बात और अगर अम्बेडकर के आरक्षण से वाक़ई फायदा हुआ है तो फिर आज आरक्षण की जरूरत खत्म होनी चाहिए थी पर न अब तो जाट, गुज्जर, पटेलों को भी आरक्षण चाहिए, वो क्या है की मुफ़्त की मलाई सब खोजते है।
जय भीम का नारा लगा सकते है पर जय चमार, जय दुसाध कहने में शरमाते है और फिर दोष ब्राह्मणों पे… हीनता का इलाज अम्बेडकर के पास नही बल्कि गांधी के पास ही मिलेगा ये कब समझेंगे हम?

लाश की राजनीती या राजनीती के कारण लाश?

वैसे तो दुनिया में हर रोज हजारों सुसाइड हो रहे, कोई खुद को बम से उड़ा रहा, कोई फंदे से झूल रहा..कुछ को अवसाद ले डूबती है कुछ को हूरों की लालसा पर रोहित की आत्महत्या को जो सुर्खियां मिल रही, खुद को पिछड़ा और पिछड़ों के पैरवीकार बताने वाले उसके लिए प्रार्थना करने के बदले नौटँकीया कर रहे, अख़बार उसे दलित लिख रहा, कुछ लोग कंवर्टेड ईसाई बता रहे तो कुछ उसको याकूब के हमदर्द.. बात जो भी हो पर एक शब्द में कहे तो वह बस एक डरपोक था, हो सकता है उसे किसी बात का पछतावा रहा हो या फिर अपने किये पर शर्मिंदा रहा हो या ये भी की उसके ही साथियों ने उसको उकसा अपने कदम पीछे खिंच लिए हो और वह बेचारा तन्हाइयों का हवाला देकर खुद की हत्या कर लेता है.. पर जो भी हुआ नहीं होना चाहिए था..
एक विश्वविद्यालय के मेधावी छात्र, जिसको सरकार से 25000 मासिक की छात्रवृति मिले वही छात्र याकूब का हमदर्द बन जाये, ऐसा नहीं होना चाहिए था.. मरने वाला लिख के मरा है की वो अकेलेपन की पीड़ा से मरा है, ये शर्मनाक है उसके साथियों के लिए पर शायद वो साले बेशर्म है जो जीते जी साथ न दे पाये पर मरने बाद राजनीती कर रहे। मुझे रोहित से कोई भी सहानुभूति नहीं है पर उसके घरवालों से है, अपने दोस्तों से है जो अक्सर अवसाद में घिरे होते है… जिंदगी जीने के लिए है इसे यूँही किसी के राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध के लिए बेकार मत करो.. छात्र हो तो पढ़ो, भारत के लिए संघर्ष करो, और राजनैतिक मोहरा मत बनो वरना आज भले तुम क्रूस पे लटक जाओ फिर भी यीशु नहीं बनोगे न बम से उड़ाने बाद ही जन्नत मिलनी है।

जाते-जाते

न सिख, न जैन,
न ब्राह्मण, न दलित,
न ईसाई, न कसाई,
न भेष, न भाषायी,

भारत में है ‘सिर्फ भारतीय’
की कमी हो आयी..

Bhoj (भोज)

kharaunaखरौना की कई विशेषता है, कई बातें है जो हमें राज्य के अन्य गाँवों से बेहतर बनाती है पर मुझे जो हमेशा से भाता रहा है वह है गाँव में होने वाला भोज. भोज को लेकर गाँव में खूब उत्साह होता है, आज भी लोग भोज से ही किसी समारोह की सफलता को आंकते है और हमारे गाँव का भोज विशेषकर दही चुरा तो मशहूर ही है.. खरौना के लोगों का  दही-चुरा से प्रेम भी जगजाहिर है..तो आइये आज उसी भोज की कुछ अच्छी बातें यहाँ आप सब से बांटते है.
खरौना, २२ टोला का गाँव,  जहाँ समय के  साथ भोज के तौर तरीके भी खूब बदले है पर इसका क्रेज और दही प्रेम अब भी वही है, हाँ पहले की तरह एक एक हरीया(मिटटी का बर्तन जिसमे १० से १२ लिटर दूध का दही जमा सकते) दही खाने वाले धुरंधर अब नही है और न ही खुद से भोजन तैयार करने वाला समाज बचा है.. आज भोज में भोजन की अधिकांश जिम्मेवारी हलवाई पर होती है, पहले की तरह लोग खुद से भोज नही बनाते. शायद प्रेम, काबिलियत और समय की कमी हो, पर हां लोगों को परोस कर खिलाने का प्यार अब भी गाँव में शेष है, इसके लिए हमें आज भी कैटरिंग और  भाड़े के लोगों पर निर्भर नहीं होना होता  और इस लिहाज से  आप  कह सकते है की समाज अभी पूरी तरह से हाशिये पे नही गया..
भोज को लोग यहाँ उत्सव की तरह मनाते है और जिनके यहाँ भोज होने वाला होता है उनके यहाँ बीडी, सिगरेट सुपारी तो सप्ताह भर पहले से ही बटने लगता है, लोगों की  भीड़ पहले से  ही जुटने  लगती  है. चिटठा बनाने की प्रक्रिया, या फिर दिन गुनाने के दिन के भीड़ से ही भोज की चर्चा
शुरू हो जाती है. ये दिनगुनाने का रिवाज और उस दिन चाय-नास्ता आपको और कहीं नही दिखेगा, ये खरौना की स्पेशलिटी है सार्वजिनक रूप से चिटठा(भोज में होने वालाअनुमानित खर्च) बनाने का रिवाज भी आपने शायद ही कहीं देखा हो, इन चिट्ठों को बनाने  के लिए पूरा समाज आमंत्रित होता है, और सबके रजामंदी से  ही भोज की रूप रेखा तैयार  होती है.
चलिए, चिटठा बन गया, अब अंगिया(निमन्त्रण) के प्रकार पे भी विचार करिये…अंगिया मुख्यतः तीन तरह के है, पहला घरजन्ना जिसमे घर से किसी एक व्यक्ति के लिए निमन्त्रण होता है, दूसरा समदरका जिसमे घर के सभी पुरुष और बच्चे निमंत्रित होते है और तीसरा चुलिहालेबार जिसमे घर के सभी सदस्य, महिलाएं भी आमंत्रित होती है.. इन तीनों के अलावा गाँव में चौरासी भी चलन में है जिसमे व्यक्तिगत रूप से किसी व्यक्ति या  परिवार को आमन्त्रण नही मिलता बल्कि  पुरे गाँव को एक साथ  ही अंगिया दिया जाता है. चौरासी भोज में में आपका भोज वाले से भले रिश्ता हो न हो, आप आमंत्रित हो जाते है.. निमंत्रण के बाद भोज वाले दिन अंगिया बोले तो बुलावा भेजने का भी अलग से रिवाज है. जब भोज तैयार होता है तब भोजी(जो भोज दे) के यहाँ से ‘विजय भेलौ हो’ जैसे शोर कराए जाते है ताकि लोग समझ जाए.. ये ग्रीन सिग्नल है;)
अब भोज परोसने के वक्त होता है..आज भी कुछ भोजों में केले के पत्ते पर भोजन परोसा जाता रहा है, पर हाल के दिनों में हम कागज और प्लास्टिक से बने पत्तलों पे निर्भर होने लगे है, ये मेरे विचार में शायद अच्छा नही है, पर बावजूद इसके हम इन्ही पत्तलों पर मजबूर हो रहे, खैर मैं इस पोस्ट से आपको प्लास्टिक, प्रदुषण, और पर्यावरण पे लेक्चर नहीं दूंगा, आप सब खुदे समझदार है..पर मैं यह भी कहने से न चुकूँगा की केले के पत्ते जब पहले भोज वाले के यहाँ जमा होता था, तो हम पछे उससे बन्दुक बना के खूब खेलते थे और फिर अपने लिए अच्छे पत्ते भी अलग से जुगाड़ कर रखते थे..वैसे केले के पत्ते प्लास्टिक पत्तलों से बेहतर विकल्प है, और उसका खेतों को नु्कसान भी नही… अरे यार फिर, लेकचर..छोरिये. अच्छा तो पत्तों की बात हो गयी, अब ज़रा जमीन पर बैठ के जो बेहतरीन तरीके से खाते है उसकी भी बात हो जाए? मुझे तो जमीन पर बैठ के खाना कुर्सी टेबुल से बेहतर लगता है, पर शहरों में आज मांग मांग कर खाने वाला चलन अब जोरों पर है और शायद गाँव में भी यह संक्रमण जल्द फैले पर जी अबतक हम इससे अछूते है. गाँव में सेल्फसर्विस जैसी नंगई अभी नही आयी है, और आज भी गाँव के ही लोगों द्वारा बड़े प्रेम से लोगों को स्वादिष्ट भोजन परोसा जाता हाही.. अच्छा मांग, मांग कर खाने वाली बात से याद आया की पहले जब भोज में जाता था और बगल में कोई धुरंधर बैठे होते थे, जिनको खुद के लिए कुछ लेना होता था तो वो बारीक(जो लोग भोजन परोसते है) को यह कह कर बुलाते थे की ये बच्चा कुछ लेगा, और जब बच्चा मना कर दे तो बड़ी चालाकी से कहते थे की अच्छा ये नही लेगा तो थोडा इधर ही डाल दो  ऐसाु क्या आपके साथ हुआ था कभी?
खैर गाँव में जमीन पर बैठ कर, अपने परोस के लोगों के साथ, एक बार में दो सौ लोगों के साथ भोजन करना बहुत बेहतरीन लगता था, भोजन जब अपनों के साथ हो, अपनों द्वारा परोसा जाये तो स्वाद तो आएगा ही…वैसे पलथी मार के दही सुरुकने वाले कुछ लोगों को अगर आप खाते देख ले तो हो सकता है आपका मुड खराब हो जाए, पर हम औरों को काहे देखेंगे अपना दही सुरुकेंगे की नही? क्यूँ..
और हाँ भोज के बाद भोज का पोस्टमार्टम भी होता है, और भोज था कैसा उसके लिए एक ही पैमाना है..की दही कैसा था..अगर दही मीठा, तजा था, तो भोज सफल वरना लोग भूल जाते है और अगले अंगेया का इन्तजार करते है…

आपका नही पता पर मुझे तो अपने गाँव का भोज बेहतरीन लगता है, और छुट्टियों में भोज मिल जाए तो गंगा नहाने वाली फीलिंग मिल जाती है..
अब विजय होगा?

गाँव के वेबसाईट  और गाँव  में आप आमंत्रित  है 🙂
आपका सन्नी
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