इतिहास और चाटुकार

भारतीय विद्यालयों में इतिहास को एक सस्ते नोबेल की तरह पढ़ाया जाता है, तथ्य कम कहानी ज्यादा, बहुत कम छात्रों (कुछेक शिक्षकों) को आर्थिक इतिहास की ज्यादा जानकारी नहीं है, उन्हें तो मुगल और ब्रिटिश गुलामियों के वृहत कारणों का आभास भी नहीं पर उद्देश्य जो बहुत हद तक परीक्षा में अच्छे अंक लाना है, वह सफल बोले तो नम्बर शत प्रतिशत। अब समय है कि हमारे इतिहास को बिना सुगर कोट किये हुए ऐज इट इज़ पढ़ाया जाए, विदेशी लेखकों का भी रेफेरेंस हो और यह भी बताया जाए कि कैसे 18वीं शताब्दी तक दुनिया की सबसे बड़ी GDP, 21वीं शताब्दी में स्वतंत्र के बाद ज्यादा शिक्षित होने के बाद भी पिछड़ कैसे और क्यों गया? आज के छात्रों को यह भी समझना होगा कि राष्ट्रीयता का क्या महत्व है और क्यों आपसे ज्यादा आज राष्ट्र महत्वपूर्ण है। राष्ट्र के महत्व को पहचानने वाले वीरों हजारों-लाखों देश भक्तों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया था, उनका यह समर्पण हमारे फ्री नेट से देश विरोधी स्लोगन के लिए नहीं था न ही उनका बलिदान आपके उस व्यभिचारी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए था जिसके बुर्के से आप सेना पर पत्थर बरसाते हो या देश मे विभिन्न धार्मिक और जातीय गोलबंद कर राष्ट्र की संपत्तियों को, इसके मान को क्षति पहुँचाते है।
खैर आज भारत बदल रहा है। चूहे परेशान है पर अगर दूरगामी फसल बचाना है तो किसान को असहिष्णु होना होगा वरना एक बार फिर इतिहास दुहराया जाएगा और कलम के चाटुकार उसे सुगरकोट करके ईनाम पाएंगे! एक बात और सिर्फ इतिहास नहीं आस पास के भूगोल का भी ध्यान रखे विस्तृत जानकारी मिलने पर! गलत के लिए असहिष्णु बने और एक सशक्त राष्ट्र के लिए सच के साथ खड़े हो किसी प्रोपेगेंडा के साथ नहीं।
साभार

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गांधी और गोडसे का सच

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का पहला प्रधान अलोकतांत्रिक तरीके से या यूं कहे तो व्यक्ति विशेष श्री मोहनदास करम चन्द गांधी के मन से तय किया गया, अलोकतांत्रिक इसलिए क्योंकि तब कांग्रेज़ के 16 राज्यों के प्रतिनिधियों में से 13 ने सरदार को पहला पसन्द बनाया था पर महात्माजी की ज़िद नेहरू थे और उनके सम्मान में सरदार जी ने अपना नाम वापस लिया और फिर लाडले नेहरू प्रधान की गद्दी तक पहुंचे, इस बार उनकी चौथी पीढ़ी भी PM की रेस में है, पर अफ़सोस आज महात्मा नहीं है!
गांधीजी वाकई में एक महात्मा ही थे जो एक अलग तन्त्र चाहते थे तभी तो कांग्रेज़ अध्यक्ष पद की चुनाव जब नेताजी सुभाष जीत गए तो गांधी न केवल नाराज हुए बल्कि मूवमेंट से अलग होने की धमकी तक दी और तब सुभाष ने भी उनके सम्मान में न कांग्रेज़ अध्यक्ष का पद छोड़ा बल्कि कांग्रेज़ ही छोड़ दी। ये दो घटनायें ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थी न शायद यह भी की देश बंटवारे में जो सत्ता की भूख में दोनों तरफ मार काट मची और जो ट्रेनें सिर्फ लाशें भरकर लाती थी तब भी महात्मा पूरब और पश्चिम पाकिस्तान के लिए देश के बीचोबीच रास्ता देने की बात करते थे और तब पाकिस्तान को मिलने वाले 75 करोड़ की बची किश्त देने पर हड़ताल पर भी गए। गांधी ऐसे महात्मा थे जिनसे खुद उनका बेटा भी दुखी था, पर गांधी जी अपने लगन, अपनी अनुशासन, अपने प्रयोगों के लिए संकल्पित और सफल थे..
वैसे महात्मा जी बैरिस्टर भी थे वो बात अलग है कि भगत सिंह को बचाने का प्रयास नहीं किया पर इसपर प्रश्न करना गांधी जी का न केवल अपमान होगा बल्कि व्यर्थ भी होगा क्योंकि हम मुन्ना भाई तो है नहीं जो गांधीजी उत्तर देने आएंगे, खैर मैं उनके सम्मान में कभी कमी नहीं कर सकता क्योंकि हमने पढ़ है कि उन्होंने दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना तलवार और फिर जो अहिंसा का मार्ग दिखाकर उन्होंने इस भूमि को धन्य किया है इसके लिए बुद्ध हमेशा उनके आभारी रहेंगे।आप सदा अमर रहे और बिल्कुल देश आपको कभी नहीं भूलेगा न हम किसी को यह प्रश्न करने का अवसर देंगे कि आजाद भारत मे आजाद हिंद फौज की सेना का क्या हुआ? क्या यह सेना भारतीय सेना में शामिल हुई?
और एक बात इस देश को आज गोडसे की जरूरत कतई नहीं है पर अब चूकि यहां अभिव्यक्ति की आजादी है इस लिहाज से अगर उसकी मंशा को जानने का पढ़ने का अवसर मिलता तो इतिहास के छात्रों को लाभ मिलेगा क्योंकि सारा ज्ञान अकेले कमल हासन रखे और हम गोडसे रूपी आतंकी(कमल के अनुसार) से अनजान रहे, ठीक नहीं इसलिये उसकी और उसपर लिखी पुस्तकें बैन नहीं होनी चाहिए, सुना है कि उसकी अस्थियां अब तक प्रवाहित नहीं की गई? जानने का हक़ होना चाहिए न नए भारत को, है कि नहीं??

क्या इसलिये मोदी सही नहीं?

चुनाव समीप है जरा विचारिये की मोदी से इतर हमारे पास विकल्प(अगर है तो) क्या है? कोई कांग्रेसी कार्यकर्ता बतायेगा कि UPA का प्रधानमंत्री उम्मीदवार कौन और किन कारणों से है और वह किस मामले में मोदी से बेहतर है(हो जाएगा नहीं)? NDA और UPA से अलग कोई अन्य गुट भी है क्या, अगर है तो उसके बॉस कौन है(होंगे)?
हर सवाल सत्तापक्ष से ठीक है पर जो मोदी विरोध में देश का महत्वपूर्ण समय बर्बाद करा रहे उस Congrace और उसके पैरविदार मीडिया वाले क्या नमो बनाम अन्य भावी PM उम्मीदवारों में तुलनात्मक विश्लेषण करने का हिम्मत रखेंगे?
आजकल वामपंथी अख़बार मोदी को राफेल, नोटबन्दी और रोजगार सृजन न करने को लेकर घेर रहे है और इसमें वो सफल भी हो रहे है पर मोदी नहीं तो कौन? क्या मुल्क कोशिश करने वाले को ठुकरा कर उनको ले आएगी जिनका पक्षतापूर्ण रवैया एक डरावना सपना था? क्या हम उस दौड़ की वापसी चाहेंगे जब कहीं भी कभी भी पब्लिक प्लेस में बम फट जाता था, क्या हम वह दौड़ फिर से जीना चाहते है जब एक सिलिंडर रिफिल कराने के लिए पूरा दिन बर्बाद करना होता था या कालाबाजारियों से ब्लैक में लेना होता था? क्या हम मनरेगा में फिर उन लोगों को नौकरी दिलाना चाहते है जिनको गुजरे जमाना हो गया? I mean तब तो रोजगार कार्ड उनके भी थे जो न थे? क्या हमें सरकारी सब्सिडियों का सीधे एकाउंट में आना, सिस्टम का ट्रांसपेरेंट होना खटकता है? साहब, आप सम्पन्न है वरना उज्ज्वला योजना से गरीबों को क्या मिला है वह हम जैसे गांव से जुड़े लोग जानते है, मुफ्त में कनेक्शन चूल्हा-सिलिंडर सब, फिर भी आप नाराज है क्यों? प्रधानमंत्री आवास योजना से बनते घरों का जायजा लीजिये इसके लिए दिल्ली के न्यूजरूम से, फेसबुक की दुनिया से निकलकर गाँव आना होगा और फिर तुलना कीजिये। शायद आप हवाई जहाज से घूमते है वरना सड़कों पर हुए काम आपको अवश्य दिखते, 5 साल पहले बिजली कितने घण्टे थी और अब कितनी है, कई गांव ऐसे थे जो अब तक अंधेरे में थे अब वहां बिजली है तो क्या इसकी तारीफ नहीं होगी? नोटबन्दी से परेशान हम भी हुए थे पर 10-20-50 नोट बदलना इतना भी मुश्किल नहीं था और अगर यह प्रयास फेल रहा था तो mygov.in पर सुझाव दे सकते थे, दिया था? राफेल 10 साल तक नहीं लाने वाले अब भी नहीं आने देना चाहते और पूरा विरोध इसी के लिए है पर मोदी और राफेल दोनों थोड़े महंगे है पर जरूरी है क्योंकि अब कैंडल जलाने वाला देश नहीं चाहिए, गांधी टोपी पहन अपना उल्लू सीधा करने वाला नेता नहीं चाहिए अब नेता वह हो जो कोशिश करे सफल हो असफल हो पर कोशिश ईमानदार हो, और फिर टारगेट हिट करे। ऐसा क्यों है कि Dawn और The Hindu का स्वर समान लगता है ऐसा क्यों है कि जो प्रश्न पाकिस्तान के है वह हमारा विपक्ष पूछता है, ऐसी कौन सी दिक्कत हौ कि विपक्षियों से ज्यादा पाकिस्तानी लोग मोदी विरोध के कैम्पेन में लगे है?(कृपया कर मेरा यकीन न करे और फेसबुक ट्विटर और ब्लॉग्स पढ़े आप भी मानेंगे कि पाकिस्तानियों में मोदी को लेकर क्या बेचैनी है.)
तब 2014 में मनमोहन बनाम मोदी का दृश्य नही था, लोगों ने सेंट्रल गवर्नमेंट को फेल मानकर और मोदी को सफल प्रशासक के रूप में स्थापित होने के बाद ही देेश की कमान दी थी और लोगों का मानना था कि गुजरात मॉडल पर देश विकास के पटरी पर तेज दौड़ेगा, लोग सन्तुष्ट भी है और असंतुष्ट भी पर अब जब एक बार फिर से चुनाव का अवसर है जाना है तो तथाकथित बुद्धिजीवी लोग विकल्प में क्या सुझाएंगे? क्या मोदी के मीडिया को सरकारी खर्च पर विदेश भ्रमण न कराने के कारण भी लोग नाखुश है? क्या कालाबाजारी करते लोग भी नाखुश है? क्या ब्लैक से सिलिंडर बेचने वाले युवा बेरोजगार है इसलिए नाखुश है? क्या पूर्व प्रधानमंत्री की तरह इन्होंने देश की संसाधनों पर मज़हब विशेष का पहला हक़ नहीं दिलाया इस लिए नाखुश है? क्या OROP की लंबी मांग सुने जाने के कारण लोग नाखुश है? क्या 1 रुपये में मिलने लगे इन्सुरेंस से और जन धन के अत्यधिक खुल गए एकाउंट से लोग(बैंककर्मी) नाखुश है? क्या अभिनन्दन के सकुशल लौट आने से आप नाखुश है? क्या आप शांति पसन्द लोग है और उड़ी और आप सर्जिजल स्ट्राइक से आप नाखुश है? या आरक्षण की राजनीति करने वाले लोग सवर्णों के लिए घोषित 10% आरक्षण से नाराज है? या आप कुम्भ के दौरान गंगा की अविरल-निर्मल धारा से परेशान है? क्या अन्य नेताओं की तरह मोदी ने भी खुद की मूर्ति का लोकार्पण कर दिया या नेहरू से भी बड़े हो गए सरदार के कद से दिक्कत है? डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, मुद्रा योजना जैसी योजनाओं से कैसा दिक़्क़त या आपकी दिक्कत इस बात से है कि गाँव के लौंडे स्टेशन की फ्री wifi का उपयोग कर आपसे बेहतर विश्लेषण कर देते है और आपको TV स्क्रीन काला करना परता है तो कभी TV न देखने की सलाह देनी पड़ती है। बेशक इन पाँच सालों में बहुत असहिष्णुता हुई है नेताजी से जुड़े अधिकांश दस्तावेज आज पब्लिक डोमेन मे है, 70 साल बाद आजाद हिंद फौज के क्रांतिवीर इंडिया गेट पर पैरेड में शामिल हुए, क्या आप इस विचार से घबराते है?
मोदी निःसन्देह बेहतर नहीं हो सकते पर उनके नियत पे शक किन कारणों से इसको स्पष्ट करेंगे क्या विपक्ष में बैठे लोग? आज नीरव मोदी और माल्या को लेकर घेरा जा रहा है, घेरा जाना भी चाहिए पर अगर वह देश भागने पर मजबूर है तो वजह क्या मौजूदा व्यवस्था नहीं है, क्या यह गलत है कि दोनों ने UPA के शासनकाल में ही सरकार और डेढ़ चुना लगाया था? क्या नीरव मोदी के कारण देश नरेंद्र मोदी को ठुकराकर नेशनल हेराल्ड, अगस्ता वेस्टलैंड, 2G, कमन्वेल्थ, कोयला घोटाले करने वाले दल को और उसके चहेते लालू, ममता मायावती को स्वीकार कर ले??
वैसे मेरा राहुल (द्रविड़) आपके राहुल से बेहतर है. सवाल सारे एक साथ देख घबराए नहीं योग्यता अनुसार उत्तर दे, आपको समयसीमा की पूरी छूट है।
-सन्नी कुमार

राष्ट्रद्रोही स्वीकार नहीं न ही राष्ट्रवाद के नाम पर उद्दंडता

लखनऊ में हुई कश्मीरी युवक की पिटाई कल सुर्ख़ियों में थी, भगवा गमछे में दो उद्दंड लोगों को ये हरक़त करते दिखाया गया। मीडिया ने इसे खूब परोसा पर इसके कारण को समझने की कोशिश न की गई तो सोंचा कि मैं ये कोशिश कर लूं और जो विचार मुझमें है उसे आपके माध्यम से पूरे देश में ले जाऊं।
दरअसल पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद से ही पूरा देश गुस्से में है और यहाँ कश्मीरियों को यह समझना होगा कि अगर भारत भर पे उनका अधिकार है तो भारतभर का अधिकार भी कश्मीर पर है और एकतरफ जब आप खुलेआम घाटी में, JNU, AMU या विभिन्न सोशल साइट्स के माध्यम से भारत विरोध के घटिया नारे लगाते है तब आम जनता आपके खिलाफ विचार बना लेते है और फिर जब आप ग्रेनेड बरसा सकते है, आतंकियों का खुले समर्थन कर सकते है, बुरहान और अफजल के मय्यत को रिक्रूटमेंट शिविर समझ सकते है तो कुछ उद्दंड तो आपको यहाँ भी मिल ही सकते है जो कश्मीर के बारे में गलत विचार बना ले और फिर उसका खामियाजा आपको भुगतना पड़े। इसलिए बिना मतलब का चिखिये मत और सच को समझिए कि आपने जो बबूर बोया यह उसका एक छोटा सा कांटा है, अगर अब भी न सम्भले तो स्थिति आपके लिए और भयावह हो सकती है और इसके लिए दोषी भी स्वयं आप ही होंगे।
आज की तारीख़ में आप हर भारतीय को गांधी-नेहरू समझने की भूल तो बिल्कुल न करे, थोड़ा इमोशनल, थोड़ा सख्त और राष्ट्रीयता को जीता यह न्यू इंडिया है और इससे गलती न हो यह हम सब की जिम्मेदारी है अतः आप, हम सब सही से रहे…
वैसे जिन समाचार पत्रों के फेसबुक पेज ने इस खबर को प्रमुखता से छापा है उन्हीं समाचारों पर जम्मू में हुए विस्फोट को पढ़िए और खुद इनके एजेंडा को समझिए. धन्यवाद
-सन्नी कुमार ‘अद्विक

Why there is Muhammad in JeM

कुछ मासूम है मुल्क में जो पाकिस्तान को सरहद के उस तरफ समझते है, सच को समझिए पाकिस्तान मुल्क कम एक जाहिल सोंच है जो हमारे भारत में भी हजारों जगह पलता है, आस पास में ही लोगों के वक्तव्यों पर गौर फरमाइए पाएंगे सर्जीकल स्ट्राइक की पीड़ा इनलोगों ने भी महसूस की है, यह सोंच ही हमारे मुल्क का दुश्मन है और चिंता इस बात की है कि इस सोंच को रोकने के लिए इलेक्ट्रिक फेंसिंग नहीं कर सकते। यह पाकिस्तानी(जिहादी) सोंच अफ़ग़ान में भी है, इराक में भी सीरिया में भी, फ्रांस में भी और हमारे हिंदुस्तान में भी जिसने इस पूरे विश्व को खंडित रक्तरंजित करने का साजिश रचा हुआ है।
मैं किसी की भावना को ठेस नहीं पहुंचाते हुए पूछ सकता हूँ क्या कि ये जैश ए मोहम्मद नाम, जमात ए इस्लाम, ISIS की जरूरत क्यों? क्या ये साम्प्रदायिक संघठन है या मुहम्मद जी का प्रचार करती है? नहीं न! फिर तमाम आतंकी संघठनो का नाम ऐसे रख किसी सम्प्रदाय को क्यों बदनाम किया जाता है? क्या इसमें भी किसी और की साज़िश है?

कब तक हम आंख बंद करके ऑल इज़ वेल कहते रहेंगे और ख़ुद को सच से दूर रखेंगे? आज ये तमाम आतंकी संगठन किसी मुल्क के लिए नहीं, किसी मानवता या मुहम्मद के प्रचार के लिए नहीं बल्कि खुद का खौफ बेच कर अपनी सत्ता को बढ़ाना चाहते है और इनके शिकार न सिर्फ मुम्बईकर या पुणेकर होते है बल्कि इनकी जाहिलियत से पेशावर और करांची भी कांपता है, युद्ध के साथ साथ अब इनकी आर्थिक नसबंदी भी जरूरी है, आप एक जागरूक खरीददार बनिये और जाने-अनजाने ऐसे किसी पाक प्रेमी से अपने कफन खुद मत खरीदिये। हाँ खुद भी शसक्त बनिये, खून आपमें भी है, खौलने दीजिये। जय हिंद जय भारत।
सन्नी कुमार ‘अद्विक’

Pakistan Supports Terrorist outfit JeM!

इस मुल्क की किस्मत में आतंकी पड़ोसी है और मंदबुद्धि परिवार के लोग है जो इन आतंकियों का जाने अनजाने में समर्थन कर रहे। आज अभिनन्दन रिहा हो रहे है हम सब खुश है पर जो लोग उरी मे, पुलवामा में शहीद हुए वो अब लौट नहीं सकते क्योंकि पाकिस्तान के पाले कुत्ते जिनको जिहाद दिखता है हर आतंकी दहशत में, ने हमारे मुल्क के निर्दोषों को न केवल क्षति पहुंचाया बल्की इन दहशतगर्दों के बचाव में आज पाकिस्तान की सेना भरतीय सेना को चुनौती दे रही है जो शर्मनाक है और साबित करता है कि पाकिस्तान आर्मी भी आतंकियों से भरा हुआ है।
आज सोशल मीडिया में जो लोग इमरान के गुणगान कर रहे है क्या वही लोग उस दोहरे चरित्र वाले आतंकी पोषक PM से अजहर मसूद, हफ़ीज सईद की वापसी मांग सकते? मत भूलिए अभिनन्दन को लौटाना उसकी मजबूरी है वरना जिस जाहिल मुल्क ने कुलभूषण को बंदी रखा है वह इतने नाजुक माहौल में अभिनन्दन को कैसे छोड़ता? आज पीस गेस्चर की नौटंकी करने वाले पाकिस्तान और उसके समर्थक का विरोध तबतक जारी रहे जब तक वह अपने मिट्टी में आतंक को पोषता है.. हमें आज एक साथ हमारे तीनों सेनाओं को, मजबूत सरकार को और विश्व की बड़ी शक्तियों का भी आभार करना चाहिए और एक सशक्त नागरिक बनना चाहिए…क्योंकि मुल्क हमसे ही है, जय हिंद, जय अभिनन्दन!

भारत में डर लगता है!

नसीरुद्दीन साहब, आमिर खान या इन जैसे हाई प्रोफाइल लोगों के द्वारा भारत मे डर लगने वाला बयान आता है और हम जैसे महामूर्ख उनको गालियां देने लगते है और ये अपने मकसद में कामयाब होते है…आप पूछ रहे होंगे की ये मकसद क्या है? तो जानिए इनका मकसद होता है देश के दूसरों मुद्दों से आपका ध्यान भटकाना.. क्या बीता हफ्ता राफेल पर आए कोर्ट के निर्णय पर होने का नहीं था? क्या सज्जन कुमार को मिली उम्रकैद इसपर चर्चा होने का नहीं था? और जब इन दोनों मुद्दों पर चर्चा होती तो किसका नुकसान होता, तो साहब ये महाधूर्त फिल्मी नचनिये आपको ऐसे ही भरमायेंगे…वरना किसको नही मालूम कि दुनिया में अल्पसंख्यकों के लिए सबसे फ्रेंडली मुल्क भारत है, यहाँ आकर पारसियों और यहूदियों को जो मिला वो उनको अपने मुल्क में भी न हासिल हुआ…वैसे डेटा देखिये की मुल्क के बंटवारे के वक्त भारत मे 8% अल्पसंख्यक थे और पाकिस्तान में 28%, हमारे यहां आज 20% से अधिक अल्पसंख्यक है और पाक में 2%.. खैर मैं पाक जैसे पिद्दी मुल्क से भारत का तुलना नहीं करता पर आपको बताना जरूरी है क्योंकि आपलोग बिना कुछ जाने भी राय बनाते है, कुछ कमीने तो मोदी विरोध मे मुल्क का ही विरोध करने लगे है..
अच्छा एक बात उन कांग्रेसी लोगों से की जिस तर्क और नाथूराम के कारण आप आरएसएस का विरोध करते है क्या वही तर्क लागू कर सज्जन कुमार के कारण पूरे मुल्क से कांग्रेस को बैन करने का मांग नहीं होना चाहिए? जिस राफेल का रायता आपके जमानत पर छूटे राहुल ने फैलाया है क्या उस पोगो लवर को माफ़ी न मांगनी चाहिए..
नसीर साहब हम आपको पाकिस्तान जाने नहीं बोलेंगे उधर के नचनिये तो यहां नाचते है पर दुनिया बड़ी है, ढूढे जगह या इस भारत से प्यार करे इतना भी मुश्किल नहीं है..
जय हिंद
सन्नी कुमार

गाँधी

गांधीजी बेशक राष्ट्रपिता नहीं हो सकते क्योंकि राष्ट्र सबका पोषक और सर्वोच्च है इसलिये गांधीजी को भी राष्ट्रपिता कहना अन्याय है। और मुझे यक़ीन है कि बापू की भी कभी ऐसी इच्छा नहीं रही होगी पर हाँ यह हमारा उनके लिए प्यार था जो उनको किसी ने महात्मा तो किसी ने बापू कहा। उनके बारे में तत्कालीन बुद्धिजीवियों ने एक भविष्यवाणी की थी कि आनेवाली पीढ़ी इस पुरोधा, इसके तरीकों का यकीन नहीं करेगी। लोग यह यकीन नहीं कर पाएंगे कि अहिंसा में इतना बल सम्भव है और कोई यह मानने को तैयार नहीं होगा कि कुछ सालों पहले ही साबरमती के एक अर्धनग्न सन्त ने अहिंसा के बल पर अंग्रेजों को देश से भगाने में सबसे अहम भूमिका निभाई होगी। आज महज 70 सालो में ही उन बुद्धिजीवियों की भविष्यवाणी अंशतः सत्य साबित होने लगी है।

आज जब हम उस महान व्यक्ति का जन्मदिन मना रहे है, सरकारी छुट्टियों का घर मे आनन्द ले रहे है तो हममें से ही बहुत लोग इस इस समय का उपयोग उसी बापू को प्रश्नों के घेरे मे घेड़ने केलिए कर रहे है जो काफी चिंतनीय है। आप जो कोई भी गोडसे को महान बताते है और जिनका मन गांधी के प्रति कोई सम्मान नहीं रखता उन सबसे क्या मैं यह जान सकता हूँ कि क्यों आखिर गांधी अकेले इस विभाजन के लिए दोषी ठहराये जाते रहे है, क्या उनको विभाजन का दुःख नहीं था? देश जानता तो है न कि आजादी के समय मे गांधीजी कहाँ और क्यों थे?इस आजादी से उनको क्या हासिल हुआ? क्या उन्होंने आपसे कहा कि आप उनको महात्मा, बापू, राष्ट्रपिता का सम्मान दे या केवल नोट पे छाप उनके विचारों को बिसरा दो? अरे वो तो जिस वैमनस्य से आपको दूर रखना चाहते थे उसी ने उनकी ईहलीला समाप्त कर दी।

मैं खुद गांधी से कभी पूर्णतः सहमत नहीं हो सकता और मानता हूं कि विभाजन के वक्त किसी भी देशभक्त का विरोध नहीं करना, प्राणों की आहुति न देना अचंभित करता है। मन में आज भी प्रश्न उठते है कि अगर 47 में नेताजी जीवित होते, भगत, आजाद होते तो क्या होता? क्या स्थूति रही होगी, आजाद हिंद फौज के जवानों के मन की स्थिति क्या रही होगी, लाखों लोगों के जान माल के नुकसान के बाद देश ने कैसे खुशी मनाया होगा? पर इन प्रश्नों के लिए, उस अव्यवस्था के लिए गांधी कतई जिम्मेवार नहीं थे और यह एक और यकीन है कि उनको इसका सर्वाधिक दुःख हुआ होगा। जो लोग उन दंगों में मरे उनको सरकार ने भुलाया यह बेशक निंदनीय है पर तब क्या हमारा देश, तात्कालिक नेता आज इतने परिपक्व थे?
आज देश में वैमनस्य शिखर पर है, भारत बंद जिसकी झांकी भर है और ईश्वर ने करे पर यह जिस तेजी से समाज मे खाई पैदा कर रही है वैसे में गृहयुद्ध तक के सम्भावनाओं को नकारा नहीं जा सकता क्यों?

आज देश के पास दो मॉडल है, गांधी मॉडल और अम्बेडकर मॉडल। गांधी मॉडल हमने आजतक अपनाया नहीं और अम्बेडकर मॉडल 70 सालों से स्थिति को यथावत रखे हुए है और आप माने न माने देश को आरक्षण नुकसान उठाना पर रहा है। कुछ लोग गांधीजी पर इसलिए भी प्रश्न उठाते है क्योंकि गांधी का समाज से छुआछूत खत्म करने का प्रयास अम्बेडकर से अलग था। उन्होंने देश के लोगों को अम्बेडकर से विपरीत गाँव की ओर रुख करने को कहा, छुआछूत हटाने के लिए खुद आगे आये, सत्याग्रह की पहल की और आज के दलितों को हरिजन की संज्ञा दी और प्रभु का दूत तक कहा जो आजतक कुछ लोगों को नागवार गुजरता है और वही बुद्धिपिशाच लोग खुद को बहुजन कह इठलाते है। मैं आज यह नहीं पूछूंगा की कैसे हरिजन गाली और बहुजन सम्मानित शब्द हो जाता है। पर गांधीजी की नियत पर शक का अधिकार किसी कुपढ को नहीं होना चाहिए और गांधी का विरोध इसलिए तो बिल्कुल नहीं कि उनका रास्ता सबसे अलग था।

गांधीजी ने समाज में समरसता की बात की, खुद के साथ-साथ औरों का मैला भी खुद उठा लेते थे, छुआछूत न मानते थे न मानने देते थे और इसपर एक बार उन्होंने कस्तूरबा जी को भी खड़ी-खड़ी सुनाया था जब उन्होंने गांधीजी के इन निम्न कार्यों पर प्रश्न उठाया था।

जरा विचारिये गांधीजी के उस साधुत्व के आगे कितने लोग ठहर पाएंगे? वह कैम्पों में सबसे पहले उठ औरों के कचड़ों की, बर्तनों की सफाई करते थे जबकि उस दौर में वह हिंदुस्तान के सबसे लोकप्रिय चेहरे थे और चाहते तो नीली सूट उनको भी रोज शोभता पर उनको इस बात का दर्द था कि देश की आधी आबादी को कपड़े नहीं है सो उन्होंने भी कम कपड़े पहनने शुरू कर दिए। कुछ तो विशेष था, अद्भुत था कि नेताजी ने कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद जीत कर भी बस गांधीजी के मन को रखने के लिए पद और कांग्रेस का त्याग कर दिया पर उसके बाद भी गांधी को दिल मे बसाए रहे और उनके प्रति सम्मान हमेशा रहा।

आज अगर भारत ने गांधी के समरसता के मॉडल को कबका नकार दिया है, पिछड़े लोगों को हरिजन कहाने पर शर्म होता है, गाँव की परंपरागत दक्षता, काम छूट गए है, स्वरोजगार की चटाई को कॉरपोरेट के कार्पेट ने हरा दिया है, मिट्टी के बर्तन चीनी बर्तनों से हार गए है और गांधीजी जिस डिस्ट्रिब्यूटिव सिस्टम की कल्पना करते थे उसको भी साम्प्रदायिक और सत्तालोभियों कि गोली लग चुकी है। जो नियम गांवों से बनने थे, जिन पंचायतों को दिशा देना था उसपे लालकिला की जिद थोपा जाने लगा है और स्वराज का सपना आजतक और शायद हमेशा अधूरा रहेगा।

आज निसन्देह अम्बेडकर का कद बढ़ा है, उन्होंने शहरों की ओर चलने को कहा था और वो सफल है क्योंकि हर गांव पलायन से ग्रस्त है। गांधी के भक्त मिलते नहीं और भीम आर्मी हर ओर देश सेवा के लिए भारत बंद को प्रतिबद्ध है।

आज देश नेहरू, गोडसे या अम्बेडकर से प्रश्न नहीं करता, क्यों? क्या आजादी के वक्त, विभाजन के वक्त सिर्फ गाँधी थे, निर्णय उनका ही था? दरअसल गांधी पर निशाना इसलिए है क्योंकि उनके विचार, नई क्रांति को जन्म दे सकते थे, हिन्दू परिवार जो आज बीखड़ गई है उसको एक कर सकते थे! स्वराज होने से लालकिला की दीवारें, इसके लाउडस्पीकर कमजोर पड़ जाते इसलिए आरामपसंद सत्तालोभियों का इस सन्त पर निशाना लाजिमी है पर क्या हम अपने युवा मित्रों से उम्मीद नहीं कर सकते कि वो इस फेकबुक और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के परिधी से बाहर निकलकर शोध करे, बिना किसी एजेंडे को उस सन्त को पढ़े और उसके विचारों को तौले और फिर अपना निर्णय ले?
बेशक वह भी इंसान थे, बूढ़े हो गये थे अपनों में फंसे थे और क्षोभ में थे तभी तो जब देश जश्न मना रहा था वो अंधेर कोठरियों में कैद रहे। सवाल है, आखिर मोहन दास ने गांधी बन कर क्या पाया? वह जिस देश की कल्पना करते थे उस देश ने तो उनको नोटों पे छापकर उनका ही भ्रस्टाचार के लिए प्रयोग किया और कुछ अधीर गोडसे टाइप लोगों ने उस वयोवृद्ध के सीने में लोहे ठोक कौन सा जग जीत लिया? क्या वो अकेले विभाजन के दोषी थे? क्या उन तीन गोलियों ने राष्ट्र की समस्याएं समाप्त कर दी? क्या हिन्दू मन जो हिन्द से भी बड़ा होने का दम्भ भरता है जिसके सार में वसुधैव कुटुम्बकम है ने उस रोज एक सन्त को मार गर्वित हुआ था? बेशक नहीं, महात्मा गाँधी राष्ट्र के सच्चे सपूत थे जो आखिरी क्षणों में भी पछतावे से रुकसत हुए और लोगों की मानसिकता देख जो बोल निकले वो ‘हे राम’ के थे जिसको समझना मुश्किल नहीं है।

गांधीजी ने क्या त्याग किया, क्या पाया यह शोध का विषय है पर देश के ही बर्बादी के नारे लगाने वाले कुपढ़ छात्रों को इतना वक्त है क्या?

आज आप होते तो आपसे कहता हैप्पी बर्थडे बापू!पर अब जो कहना है वो है कि थोड़ा ही सही मुझमें जिन्दा रहोगे तुम! लभ यू।

जय हिंद!

©सन्नी कुमार

NOTA पर विचार

NOTA को विकल्प मानने वाले बन्धुओं क्या आपने विचार किया है कि नोटा का अर्थ होता है इनमें से कोई नहीं, और कोई नहीं कहना ज्यादती होगी और अपने भारतभूमि को कलंकित करने सा होगा जहां आपके अनुसार कोई योग्य नही बचा और आप समाज के ऐसे चौकीदार है जो ज्योतिष भी है जिन्हे साल भर पहले ही मालूम हो गया है कि आपको जितने भी लोगों की उम्मीदवारी मिलेगी सब के सब नकारे होंगे? क्या वाकई आपका क्षेत्र इतना गया गुजरा है?? अगर है, तो हे अर्जुन आप क्यों नहीं इस अँधेरे से अपने बन्धुओं और समाज को उबारने के लिए आगे आते है, आप क्यों नहीं अपनी उम्मीदवारी देते है?
हे सोशल मीडिया के शेरों अगर आपने पहले से ही तय कर लिया है कि आपको 2019 में कोई पसंद नही आनेवाला तो आप खुद को क्यों नहीं एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर अपने अन्य बन्धु-बांधवों और समाज को राजनीतिक कुचक्र से बाहर निकाल लेने का प्रयास करते? अगर नहीं कर सकते तो फिर इतनी हताशा क्यों?
SC ST एक्ट का विरोध जितना जरूरी है उतना ही जरूरी इस नोटा का साल भर पहले ही विकल्प चुन लेना गलत है और लोकतंत्र के हित मे नहीं है। क्या दल के दलदल से दूर कोई स्वतंत्रत, निर्भीक उम्मीदवार नही मिलेगा या आप खुद आगे नही आना चाहेंगे जिसने पार्टी के सेवा के बदले समाज की सेवा की हो? या आपका नोटा बस एक वर्ग विशेष के वोट को बर्बाद कराने से है? खैर बिना भारत बंद कराये अगर सरकार सुनती है तो मैं भी उसके SC ST एक्ट का विरोध करता हूँ, आरक्षण खत्म करने की गुजारिश करता हूँ और चाहूंगा कि सरकार नौकरी के लिए मुफ्त आवेदन निकाले..
समझ आये तो विमर्श करे वरना शांत रहे, समय हम सबका कीमती है।

-सन्नी कुमार

#नोटा #NOTA

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