क्यों ठेकेदारों को गुस्सा आया है

जब जरूरत हो तब सब यार होते है,
और जब जरूरत न हो तब पलटवार होते है,
यकीन जानिए और इनको सुनना बन्द कीजिये,
है ये भी गद्दार जो चुनाव में ही आपके हमदर्द होते है…

कल तक सिद्धू-शत्रु कांग्रेस की बजाते थे,
कि कल तक साईकल को हाथी फूटी आँख न भाते थे,
पर आज भय है कालेधन की तरह ख़ारिज हो जाने का,
इसलिए बहाना कि देश खतरे में है चलो महागठबंधन बनाते है..

सब कहते है और मैं भी दिल से मानता हूँ,
कि मोदी सख्त है, जाली नोट बन्द, सब्सिडी की हेरा-फेरी बन्द है,
किसान की तरह वह भी हो गया क्रूर है,
कह रहा फसल लगे खेत में चूहों का प्रवेश बन्द है…

खल रहा है उसका होना क्यों देश के हर गद्दार को,
बेल पे छूटे नेताओं और हर तड़ीपार-नजरबंद को,
कोई खुल के बतायेगा क्या की उसने आखिर किस बिल में पानी डाला है,
क्या कालाधन माटी हो गया तुम्हारा,
क्या तुम्हारे खज़ाने में भी ताला मारा है?
आखिर क्यों असहिष्णुता, राफेल जैसे मिथक मुद्दों पर,
तुमने इतना उत्पात मचाया है…

जरा देखिए नौंवी फेल नेता ने क्या-क्या आरोप लगाया है,
राफेल को तोप-बोफोर्स समझने वालों ने भी मुद्दों को उछाला है,
जिसको पैंतीस और विश्वेश्वरैया समझ न आया,
उस युवराज ने डील की गणित समझाया है,
हद है कि जिस दल के सांसद कम और घोटाले की संख्या ज्यादा है,
कि जिनके रहते सेना का असला खत्म था, रक्षा सौदा अधूरा था,
उन्होंने भी इस मुद्दे पर बेशर्मी से खुद का पीठ थपथपाया है…

पूछो की ये कैसे लोग है,
ये कैसी पारदर्शिता की बात करते है,
जिन्होंने डिजिटल इंडिया को ठुकराया है,
मदद आती है अब सीधे एकाउंट में,
क्या यही कारण है कि ठेकेदारों को गुस्सा आया है?
क्रमशः
©सन्नी कुमार ‘अद्विक’
http://www.sunnymca.wordpress.com

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ये तो बस मेरा मन जानता है

या कि कृष्णा जानता है,
या ये दिल जानता है,
क्या है तुम्हारे होने का मतलब,
ये तो बस मेरा मन जानता है…

या कि गुनगुनाती हवाएं जानती है,
या मेरा हर सांस जानता है,
कितनी है मुझे जरूरत तुम्हारी,
ये तो बस मेरा रूह जानता है…

या कि फूलों पे मंडराता भँवरा जानता है,
या बारिश में झूमता मोर जानता है,
कितनी मिलती है मुझे खुशी तुमसे मिलके,
ये मुझसे मिलने वाला हर फ़कीर जानता है…

या कि वर्ल्डकप को निहारता तेंदुलकर जानता है,
या कि गोलपोस्ट में गोल करता मेस्सी जानता है,
कितनी मिलती है मुझे खुशी तुम्हें मुस्कुराता देखकर,
यह तो चेकमेट करता हर आनन्द जनता है…

या कि कृष्णा जानता है,
या ये दिल जानता है,
क्या है तुम्हारे होने का मतलब,
ये तो बस मेरा मन जानता है…

-©सन्नी कुमार

शुक्रिया अठरह तेरा

शुक्रिया अठरह तेरा

शुक्रिया अठरह तेरा,
हर रंग के लिए..

फरवरी के प्यार,
मई की मार के लिए,
सीखाया तुमने जब खुद को बेचना,
उस जून की रोटी के लिए,
धो चुका जो कड़वी यादें,
उस जुलाई के लिए,
शुक्रिया अठरह तेरा,
हर सांस के लिए….

है खिले कई फूल जिसमें,
उस बाग के लिए,
हो गए जो अजनबी अपने,
उन सब सपनों के लिए,
दे रहे जो साथ मेरा,
उन यारों के लिए,
शुक्रिया अठरह तेरा,
हर रंग के लिए…

थी तलब जिस भाव की,
उस अगस्त एहसास के लिए,
पहचाना जिसने मेरा हुनर,
उस सितम्बर के लिए,
जीतना सिखलाया जिसने,
उस अक्टूबर के लिए,
शुक्रिया अठरह तेरा,
हर प्यार के लिए…

हो चुका मैं पार जिनसे,
उन सब बाधाओं के लिए,
नए विचारों का जब हुआ समागम,
उस नवम्बर के लिए,
हर बार जो सिखाती है जिदंगी,
उस दिसम्बर के लिए,
शुक्रिया अठरह तेरा,
हर प्यार के लिए….

थी तलब जिस भाव की,
उस इक़रार के लिए,
गया सराहा जब भी मैं,
हर उस दुलार के लिए,
हूँ खिला जिस प्यार से,
उस परिवार के लिए,
शुक्रिया अठरह तेरा,
हर उपहार के लिए…
©सन्नी कुमार

राष्ट्रीय किसान दिवस | National Farmer’s Day

बेशक आप टेक्नोक्रैट है, एजुकेशनलिस्ट है, मैनेजमेंट वाले है, एंटरप्रेन्योर है या छात्र है पर हम और आप है क्योंकि ‘कोई किसान’ है। अतः आप सबको भी राष्ट्रीय किसान दिवस (National Farmers Day) की शुभकामनाएं। आज पूर्व प्रधानमंत्री और किसान रहे चौधरी चरण सिंह जी की जयंती है जिसे पूरा फेश राष्ट्रीय किसान दिवस के रूप में मना रहा है।
Happy #Farmer’s_Day

चुनावी नारों तक ही सिमटा रह जाता है,
क्यूं हक़ किसान का..
बहस-बातें खूब होती है
कर्ज माफी का ऐलान भी होता है,
फिर भी नहीं बदलता,
क्यूं तस्वीर किसान का..?

वो जिसके मेहनत से सबका पेट भरता है,
वही अन्नदाता क्यों अक्सर खाली पेट सोता है?

उसकी हर फसल, हर मेहनत का,
क्यों हश्र एक होता है,
बाढ में, सुखाड़ में,
हर मौसम की मार में,
क्यों वो अकेले,
उम्मीदें बांधे सिसकता है,
और जब फसल हो बढ़िया,
क्यों बाज़ार कौड़ियों के भाव उससे खरीदता है?

सरकार खूब देती है आश्वासन,
विपक्ष बस शोर मचाता है,
पर ७० सालो से देश के ‘हल्कू’ को,
क्यों उसके मेहनत का मोल नहीं मिलता है?

खेती छोड़ चुका युवा,
उनको ये घाटे का सौदा लगता है,
गलती उनकी भी नहीं कि उनको,
किताबों मे खेती सौदा है, मौसमी जुआ है,
यही तो पढाया जाता है,
और फिर खेती का साहस युवा करे भी कैसे,
कि उसको विदर्भ के किसानों का हाल जो दहलाता है।

70 सालों से, देश के हर नारों में,
चर्चा किसानों का होता हर चौराहों पर,
संसद हो, सड़क हो, या कोई सम्मेलन
सिर्फ बातें ही होती है,
वायदे ही होते है,
पर किसान के समर्थन में क्यों कोई नीति नहीं बनता?

हर रोज नया नारा आता है,
किसानों के नाम से करने कोई तमाशा आता है,
जिसको गेंहू और जौ का फर्क भी न मालूम,
वो भी किसानों की काया पलटने का स्वांग रचाता है,
भाषण होती है, बड़े-बड़े लेख लिखे जाते है,
फिर भी क्यों, न तकदीर बदलती है,
न तस्वीर किसान का?
-सन्नी कुमार ‘अद्विक’ (किसान पुत्र)
https://sunnymca.wordpress.com/2017/07/16/kisan/

मौसम है स्नेह के तेल चढ़ा लेना

गर सुख गया हो दीये सा मन,
मौसम है स्नेह के तेल चढ़ा लेना,
हो मन में कहीं गर लोभ-क्रोध का अंधेरा,
मौका है प्रेम के दिये जला लेना।

घर को, मन को, गर कर चुके हो साफ,
पड़ोस-पड़ोसियों से कचड़ा-क्लेश भी हटा लेना,
कब तक रखोगे रामायण में राम,
आज दिन है खुद में भगवान बसा लेना।

गर सुख गया हो दिये सा मन,
मौसम है स्नेह के तेल चढ़ा लेना..

गर पर्याप्त हो ढ़कने को तन,
किसी और की लाज बचा लेना,
है आज रात जो चाँद को छुट्टी,
उसके भरोसे जो है, उनको दीये दिला देना..

रहेगा न आज कोई कोना अंधेरा,
आप बस अपना दायरा बढ़ा लेना,
राम मिलेंगे आपसे झूम गले,
आप भरत के भाव बसा लेना..

गर सुख गया हो दिये सा मन,
मौसम है स्नेह के तेल चढ़ा लेना..
©सन्नी कुमार ‘अद्विक’

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हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है

हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है,
वो आकर अपनी मुस्तैदियों के चर्चे चलाते है,
आभार करूं या उपहास, उत्साही राहगीरों का,
जो पथप्रदर्शक को ही ‘चले कैसे’ सीखाते है।

‘काम के चर्चे को’ काम समझने वाले,
अक्सर बत्तखों से बेहतर मुर्गियों को बताते है,
आज हर ओर है छाया, कलियुग का घटा घनघोर,
जहाँ मक्कार, मासूमों पे मितव्ययिता की वृष्टि कराते है।

जिन नक्कारों के क़िस्से छिप गए है धूलों से,
उनको अब आँधियों का है डर नहीं, तभी औरों को सफलता के सूत्र बाँटते है,
बड़ी गहरी है मन में क्षोभ, पर कहो किससे कहूँ अद्विक,
वो मैं जिसका होके बैठा हूँ, वही सब मुझको गैर समझते है।

यूं तो हम भी कोई हरिश्चंद्र न है, न हो सकते,
पर जो मुझसे भी है घाघ, आजकल सत्संग के तम्बू लगाते है।
मेरे कविता में जब भी शब्द, जलते है पीड़ा में,
ताज़्जुब है कि सुनकर भी आह नहीं, सबके ‘वाह-वाह’ निकलते है।

हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है,
वो आकर अपनी मुस्तैदियों के चर्चे चलाते है,
आभार करूं या उपहास, उत्साही राहगीरों का,
जो पथप्रदर्शक को ही ‘चले कैसे’ सीखाते है।
© सन्नी कुमार

आपके सही सलाह ही मुझसे मेरा बेहतर निकलवा सकते है तो प्रार्थना है खुले मन से अपनी प्रतिक्रिया दे। आपका स्नेहाकांक्षी 🙏

आज फुर्सत में हूँ

आज फुर्सत में हूँ,
फुर्सत के ही साथ में हूँ,
बहुत दिन से मिली नहीं थी,
थी मुझे बहुत जरूरत उसकी,
पर दिनों से है की दिखी नहीं थी..

आज भी शायद नज़रे चुरा कर,
कहीं और ही जा रही थी,
पर तलब और तबियत के सख्त पहरों से,
आज बच के निकल न सकी थी..

और अब जब साथ में है,
तो है थोड़ी सहमी, थोड़ी शरमाई,
उसका कहना है कि वो भी इंतेजार में थी,
पर मैंने ही न पुकारा,
कि वो तो कबसे आस में थी।

कि वो तो आती थी, मुझसे रोज ही मिलने,
मेरे खाने के बाद, तो कभी सोने से पहले,
पर अक्सर मैं ही मशगूल होता था,
काम के करारनामों में उलझा होता था..

वो भी चाहती थी मुझसे रोज ही मिलना,
मुझसे सच कहना, मेरी कविताओं को सुनना,
पर उस आरामपसंद को मिलने न दिया जाता था,
की तब उलझा होता था मैं, और काम पहरे पे होता था..

उसका कहना है कि आज भी वो कोई नज़रे चुरा कर नहीं जा रही थी,
अरे मिलना वो भी चाहती थी, पर जताना नहीं चाहती थी,
बहुत कुछ हिसाब थे उसके पास, जो कबसे वो देना चाहती थी,
लाई थी कई किस्से, कई ख्वाब भेंट करना चाहती थी,
पर मेरी व्यस्तताओं से डर, दूर हो जाया करती थी,
और आज जब न काम पहरे पे था, न व्यस्तता उसको दिखी,
तभी उसका मिलना सम्भव हुआ,
क्या खोया, क्या पाया, है जाना कहाँ,
आज फुर्सत में फुर्सत से चर्चा हुआ…
©सन्नी कुमार

कविता मेरे हर शिष्य के नाम

यह कविता मेरे हर शिष्य के नाम, मेरे भाव, मेरे शब्द आप तक पहुंचे तो सूचित करें, अपने विचार रखें। धन्यवाद!

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ,
है तुम सबसे मेरा एक ही स्वार्थ,
तुम्हारे सफलता का मैं प्रार्थी हूँ..

कोई तुमसे मांग नहीं,
तुम स्वयं को समझो चाहता हूँ,
हो कदम तुम्हारे कल कीर्ति के सीढ़ी,
सो तुम्हें चलना आज सीखाता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न तुमसे सुख-समझौते का अधिकारी हूँ,
है जो थोड़ी अनुभव और ज्ञान की पूंजी,
वह तुम सब संग बांटना चाहता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
मैं वास्तविकता का साक्षी हूँ,
कल को होगे तुम नीति-नियम रचयिता,
सो तुम्हें आज सही-गलत का भान कराता हूँ..

हो कुरुक्षेत्र पुनः यह दु:स्वप्न नहीं,
न कृष्णतुल्य एक कण भी हूँ,
पर यह जीवन भी है महान संघर्ष,
कि इसमें विजयी रहो मैं चाहता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ..
है तुमने जो भी मुकाम चुना,
उस यात्रा में मैं एक सारथी हूँ,
पा लो तुम सब अपनी मंजिल,
मैं यही कामना करता हूँ…

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ..
©सन्नी कुमार
#Happy_Teachers_Day
#Teachers_Day_Poem_in_Hindi
#Teacher_on_Teachers_Day

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सारे बोल-बच्चन तो सच से है घबराते

सारी कथाएं, सारे प्रवचन, सत्य की महिमा सुनाते,
हर किताब, हर लेख, सत्य की ही विजय बताते,
पर एक सत्य यह भी है इस दो-गली दुनिया की,
कि जब जब मैंने सत्य कहा मेरे अपने तक हम से है कट जाते…

सत्य बिना श्रृंगार की वह सुंदरी है जिसका सौंदर्य नहीं सब बूझ पाते,
सत्य वह ग्लूकोज़ ड्रिप है जो अधीर, असहायों की जान बचाते,
पर एक सत्य यह भी है इस सेल्फी-की-मारी दुनिया की,
कि सत्य-साधारण पर सब झूठ का मेकअप है खूब चढ़ाते..

सत्य तो सीधा है, सरल है, पर उन पुराने सिक्कों सा है,
जिनकी महत्ता बस क़ाबिल जौहरी लगाते,
बाकि बकैतों के लत की मारी दुनिया में,
सारे बोल-बच्चन तो सच से है घबराते….
©सन्नी कुमार

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