मुहब्बत को ख़ुदा मान आया हूँ

अब जब ईमान उसके इश्क़ पे ले आया हूँ,
उसी के ख्यालों से, खूबसूरत दुनिया कर पाया हूँ,
हर नेकी, हर ज़कात की ख़्वाहिश,
अब जो उससे मिलकर ही आई है,
तो क्या कल दिखेगी मुझको भी मेरी चाँद,
क्या कल मिलेगी मुझको भी मेरी ईदी,
कि महीनों मैं भी उसकी तड़प में न खा पाया हूँ..

क्या मिलेंगे मुझसे भी सब गले, मान ईमान वाले,
कि मैं काफ़िर जो अब, मुहब्बत को ख़ुदा मान आया हूँ…
-सन्नी कुमार ‘अद्विक’

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Khuda ka jannat ho gaya…

तुमसे मिलके दिल ये मेरा,
खुदा का जन्नत है हो गया,
जीने लगी हो तुम जो मुझमें,
मेरा मन वृंदावन है हो गया,
तुमसे मिलके दिल ये मेरा,
खुदा का जन्नत है हो गया।

रहने लगा हूँ खुश अब सबसे,
हर जीव से नाता हो गया,
करने लगा हूँ दिल खोल के बातें,
तुम्हारे ज़िक्र का आदी जो हो गया,
तुम्हारे इश्क का मुझपे चढ़ा है रंग,
फगुनी तुम्हारा होली मैं हो गया..

तुमसे मिलके मन ये मेरा,
खुदा का जन्नत है हो गया…
-सन्नी कुमार

Hindi Poem on Anniversary

To my beautiful wife on our Anniversary..

आज हमारा इश्क़ थोड़ा
और सयाना हो गया,
दिल ने कभी जो ख्वाब न देखे,
वो सब अब हक़ीक़त हो गया…

हर लत से मुझको तौबा ही था,
पर तुम्हारे साथ का आदत हो गया,
जो कभी जीवन मे उतरेगा नहीं,
वो नशा है मुझको हो गया..

तुमसे मिलके दिल ये मेरा,
है खुदा का जन्नत हो गया,
पलते है मुझमें हर ख़्वाहिशें तुमसे,
कि तू मेरा होना है हो गया..

आज हमारा इश्क थोड़ा
और सयाना हो गया..
©सन्नी कुमार

शहर और गाँव

खरौना तिरहुत नहर

कुम्हार के उस घड़े में भले बर्फ नहीं जमता,
पर पानी ठंडी रहती है।
पीपल के छांव तले AC का शोर नहीं पलता,
वहां तो मदमस्तत हवाएं प्रकृति के गीत गाती रहती है।
गाँवों में आज भी वाटर पार्क और स्विमिंग पूल नहीं मिलता,
वहां बचपन नदी-नहर-तालाबों में तैरती रहती है।
आज जब सुविधाओं से लैश है फिर भी बेचैन है हर शहर,
गाँव अपने कष्टों से लड़ता अपनों में मस्त रहता है।
©सन्नी कुमार

मेरे शब्द उसके ख्वाब लिखते है

मेरे शब्द उसके ख्वाब लिखते है
और आँसू उसकी हक़ीक़त।

उसकी तस्वीरें दिल को सुकून देते है,

और उसकी याद दिल को तड़प।

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माफ करना मैं मशीन नहीं,
जो तुमको यूजर मैन्युअल दे दूं,
अगर तलब है तो उतरो आंखों में,
मैं तुमको प्यार का दरिया दे दूं।

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अक्सर हम लोगों का उपयोग करते है और मशीनों को समझते है जबकि जरूरत ठीक इसके विपरीत की है।
-श्री श्री (रविशंकर नहीं)

©सन्नी कुमार

-सन्नी कुमार

मैं माँ को सदा खुश रखूँ

मेरे कोई शब्द इतने मधुर नहीं, कि कोई कविता लिखूं
जिसने मुझे रचा उसके भाव, मैं कैसे रचूं?
वो मेरी उम्मीदों का आसमां है,
उसके दुआओं की बरसात में मैं रोज भिंगु,
उसकी सारी चाहतें, सारे ख्वाब मुझसे है,
कृष्णा देना इतनी हिम्मत मैं माँ को सदा खुश रखूं।
©सन्नी कुमार

(रविवार देख के मदर डे मनानेवालों ये पाश्चातय संस्कृति का ही देन है कि आज वृद्धाश्रम आम हो गया है, निवेदन है कि हर दिन अपनी माँ को अपने परिवार को दे और ये मई के दूसरे रविवार को मनाया जाने वाला दिन पश्चिम को ही मुबारक रहने दो।)

बनवास पे था मेरे घर का बचपन

बनवास पे था मेरे घर का बचपन,
सबको खबर हो वो अब लौट आया है,
चहकने लगी है आज सीढिया छत की,
जो उनसे लिपटने, उनपे रेंगने,
नन्हें कदमों का दौड़ आया है..

सज रही है खिड़की पार की पेड़-पौधे-झाड़ियां,
कि उनको समझने, उनकी बात करने,
नई नज़र लिए मेहमान आया है,
बनवास पे था जो मेरे घर का बचपन,
सबको ख़बर हो वो अब लौट आया है….

©सन्नी कुमार

मिलना जब जरूरी हो

मिलना जब हो जरूरी,
तो अक्सर पल नहीं मिलते,
लिखना जब हो कुछ खास, तो अक्सर शब्द नहीं मिलते,
आज जब चाहता हूं कि मिलके दूँ तुम्हें मुबारकबाद,
समय का खेल है ऐसा
कि अब आप नहीं मिलते।

है यादों में हमारे,
आपका रोज ही आना,
पर अब यादों से इतर,
हम रूबरू नहीं मिलते,
हो आपको खबर ये कि
अब भी बहुत मानते है हम,
जताते दिल के हर जज़्बात,
जो एक बार तुम मिलते।
©सन्नी कुमार

ऐसा कब सम्भव हो पाया है

मुस्कुराता रहा दिन भर,
जो तुम फिर याद आयी थी,
मालूम चला कि तप रहा हूँ बुखार में,
जब हक़ीक़त पास आई थी..

थी तुम एक हसीन ख्वाब,
जो मुझको मुझसे दूर ले गई,
जीवन के कड़वे सच का,
इस मूरख को ज्ञान दे गई।

आज मस्त हूँ अपने बढ़ते सफर में,
फिर ये मौसम, ये गलियां,

और गिनती के अच्छे लोग,
तुम्हारी याद दिलाते है,
पढ़ लेता हूँ अक्सर वो पन्ने,
जो तुम्हारी याद दिलाते है।

तुम हो नहीं आज,
पर तुमसे ज्यादा पाया है,
ख्वाबों से बेहतर हो गई जिंदगी,
तुम्हारे दुआओं में खुद को महफूज़ पाया है,
है हसरत एक आज भी,
की तुमसे मिलूं,
पर अतीत और वर्तमान मिल जाये,
ऐसा कब सम्भव हो पाया है? 😊
© सन्नी कुमार

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