हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है

हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है,
वो आकर अपनी मुस्तैदियों के चर्चे चलाते है,
आभार करूं या उपहास, उत्साही राहगीरों का,
जो पथप्रदर्शक को ही ‘चले कैसे’ सीखाते है।

‘काम के चर्चे को’ काम समझने वाले,
अक्सर बत्तखों से बेहतर मुर्गियों को बताते है,
आज हर ओर है छाया, कलियुग का घटा घनघोर,
जहाँ मक्कार, मासूमों पे मितव्ययिता की वृष्टि कराते है।

जिन नक्कारों के क़िस्से छिप गए है धूलों से,
उनको अब आँधियों का है डर नहीं, तभी औरों को सफलता के सूत्र बाँटते है,
बड़ी गहरी है मन में क्षोभ, पर कहो किससे कहूँ अद्विक,
वो मैं जिसका होके बैठा हूँ, वही सब मुझको गैर समझते है।

यूं तो हम भी कोई हरिश्चंद्र न है, न हो सकते,
पर जो मुझसे भी है घाघ, आजकल सत्संग के तम्बू लगाते है।
मेरे कविता में जब भी शब्द, जलते है पीड़ा में,
ताज़्जुब है कि सुनकर भी आह नहीं, सबके ‘वाह-वाह’ निकलते है।

हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है,
वो आकर अपनी मुस्तैदियों के चर्चे चलाते है,
आभार करूं या उपहास, उत्साही राहगीरों का,
जो पथप्रदर्शक को ही ‘चले कैसे’ सीखाते है।
© सन्नी कुमार

आपके सही सलाह ही मुझसे मेरा बेहतर निकलवा सकते है तो प्रार्थना है खुले मन से अपनी प्रतिक्रिया दे। आपका स्नेहाकांक्षी 🙏

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आज फुर्सत में हूँ

आज फुर्सत में हूँ,
फुर्सत के ही साथ में हूँ,
बहुत दिन से मिली नहीं थी,
थी मुझे बहुत जरूरत उसकी,
पर दिनों से है की दिखी नहीं थी..

आज भी शायद नज़रे चुरा कर,
कहीं और ही जा रही थी,
पर तलब और तबियत के सख्त पहरों से,
आज बच के निकल न सकी थी..

और अब जब साथ में है,
तो है थोड़ी सहमी, थोड़ी शरमाई,
उसका कहना है कि वो भी इंतेजार में थी,
पर मैंने ही न पुकारा,
कि वो तो कबसे आस में थी।

कि वो तो आती थी, मुझसे रोज ही मिलने,
मेरे खाने के बाद, तो कभी सोने से पहले,
पर अक्सर मैं ही मशगूल होता था,
काम के करारनामों में उलझा होता था..

वो भी चाहती थी मुझसे रोज ही मिलना,
मुझसे सच कहना, मेरी कविताओं को सुनना,
पर उस आरामपसंद को मिलने न दिया जाता था,
की तब उलझा होता था मैं, और काम पहरे पे होता था..

उसका कहना है कि आज भी वो कोई नज़रे चुरा कर नहीं जा रही थी,
अरे मिलना वो भी चाहती थी, पर जताना नहीं चाहती थी,
बहुत कुछ हिसाब थे उसके पास, जो कबसे वो देना चाहती थी,
लाई थी कई किस्से, कई ख्वाब भेंट करना चाहती थी,
पर मेरी व्यस्तताओं से डर, दूर हो जाया करती थी,
और आज जब न काम पहरे पे था, न व्यस्तता उसको दिखी,
तभी उसका मिलना सम्भव हुआ,
क्या खोया, क्या पाया, है जाना कहाँ,
आज फुर्सत में फुर्सत से चर्चा हुआ…
©सन्नी कुमार

कविता मेरे हर शिष्य के नाम

यह कविता मेरे हर शिष्य के नाम, मेरे भाव, मेरे शब्द आप तक पहुंचे तो सूचित करें, अपने विचार रखें। धन्यवाद!

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ,
है तुम सबसे मेरा एक ही स्वार्थ,
तुम्हारे सफलता का मैं प्रार्थी हूँ..

कोई तुमसे मांग नहीं,
तुम स्वयं को समझो चाहता हूँ,
हो कदम तुम्हारे कल कीर्ति के सीढ़ी,
सो तुम्हें चलना आज सीखाता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न तुमसे सुख-समझौते का अधिकारी हूँ,
है जो थोड़ी अनुभव और ज्ञान की पूंजी,
वह तुम सब संग बांटना चाहता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
मैं वास्तविकता का साक्षी हूँ,
कल को होगे तुम नीति-नियम रचयिता,
सो तुम्हें आज सही-गलत का भान कराता हूँ..

हो कुरुक्षेत्र पुनः यह दु:स्वप्न नहीं,
न कृष्णतुल्य एक कण भी हूँ,
पर यह जीवन भी है महान संघर्ष,
कि इसमें विजयी रहो मैं चाहता हूँ..

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ..
है तुमने जो भी मुकाम चुना,
उस यात्रा में मैं एक सारथी हूँ,
पा लो तुम सब अपनी मंजिल,
मैं यही कामना करता हूँ…

कोई कल्पित ख्वाब नहीं,
न गुरु सम्मान का अभिलाषी हूँ..
©सन्नी कुमार
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#Teacher_on_Teachers_Day

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सारे बोल-बच्चन तो सच से है घबराते

सारी कथाएं, सारे प्रवचन, सत्य की महिमा सुनाते,
हर किताब, हर लेख, सत्य की ही विजय बताते,
पर एक सत्य यह भी है इस दो-गली दुनिया की,
कि जब जब मैंने सत्य कहा मेरे अपने तक हम से है कट जाते…

सत्य बिना श्रृंगार की वह सुंदरी है जिसका सौंदर्य नहीं सब बूझ पाते,
सत्य वह ग्लूकोज़ ड्रिप है जो अधीर, असहायों की जान बचाते,
पर एक सत्य यह भी है इस सेल्फी-की-मारी दुनिया की,
कि सत्य-साधारण पर सब झूठ का मेकअप है खूब चढ़ाते..

सत्य तो सीधा है, सरल है, पर उन पुराने सिक्कों सा है,
जिनकी महत्ता बस क़ाबिल जौहरी लगाते,
बाकि बकैतों के लत की मारी दुनिया में,
सारे बोल-बच्चन तो सच से है घबराते….
©सन्नी कुमार

वो सावन अब तक नहीं आया

आज अपनी ही तस्वीर देखी तो कमबख्त ये ख़्याल आया,
कि लिखते रहे औरों को इतना डूबकर कि खुद का ख्याल भी नहीं आया,
औरों को लुभाने की चाह में मैं खुद को ही भूला आया,
आज कहते है सभी अपने कि थोड़ा मैं भी मुस्कुरा लूं,
पर कैसे कि वजह लेकर वो सावन अब तक नहीं आया..
©सन्नी कुमार ‘अद्विक’

जन्नत में मुझको दिलचस्पी नहीं है

जन्नत में मुझको दिलचस्पी नहीं है,
पर सुना है वहाँ हूरें 72 मिलती है..
सम्भव है दीदार हो उस पर्दानशीं का वहाँ,
जो मेरे मुहल्ले से रोज गुजरती है..

उसको देखा नहीं पर वो अज़नबी भी नहीं है,
कि उसकी नजरों में मुझे दुनिया तमाम मिलती है..
हसरतों में सिर्फ वो है ऐसा भी नहीं है,
पर इस फेहरिस्त की शुरूआत भी उससे ही होती है..

मुझे बस चेहरों में कोई दिलचस्पी नहीं है,
पर कानों में रोज उसके नेकी के चर्चे मिलते है..
मर जाऊंगा उसके बगैर ऐसा भी नहीं है,
पर जीने को उससे खूबसूरत वजहें रोज मिलती है..

उनके हुस्न का मुझको इल्म भी नहीं है,
पर उनके ज़िक्र से मेरी कविता खूब सजती है,
मेरे भाव का भले उनको अबतक आभास नहीं है,
पर सुना है मेरी ग़ज़ल वो भी खूब पढ़ती है..

जन्नत में मुझको दिलचस्पी नहीं है,
पर सुना है वहाँ हूरें 72 मिलती है..
सम्भव है दीदार हो उस पर्दानशीं का वहाँ,
जो मेरे मुहल्ले से रोज गुजरती है..
©सन्नी कुमार ‘अद्विक’

हे कृष्णा

हे कृष्णा,
मेरी कलम में तुम थोड़े,
बंसी के लय घोलो न..
मुझे पढ़कर सबमें प्रेम बढ़े,
ऐसे किस्से मुझसे गढ़वाओं न..
सुनने को सब मुझे भी ललचे,
कुछ ऐसी मायाजाल बिछाओ न..
मेरी कलम में तुम थोड़े,
बंसी के लय घोलो न..

प्रेम-धर्म की स्थापना को,
हे वसुदेव तुम जब उतरते हो,
तो कभी मेरे शब्दों में भी,
अपने संदेश सुनाओ न..
है रण होता रोज आज भी,
कि आज भी युवा-अर्जुन है भ्रम में,
उसे बताने सही-गलत तुम,
उसके मन-मस्तिष्क में बसों न..
मेरी कलम में तुम थोड़े,
गीता-सत्य को घोलो न.

हर जगह फसाने को,
सकुनी पासा थामे बैठा है,
जहाँ युधिष्ठिर रोज दाव हारते है,
और मोह में अंधे दुर्योधन को श्रेष्ठ बताते है,
दिलाने पांडवों को हक़,
हे कृष्ण शंख बजाओ न..
होती है हमेशा सत्य की जीत,
आज के अर्जुनों को बताओं न..

चाहता हूँ जो कहूँ सबसे,
वही पहले तुम्हें सुनाता हूँ,
हे हरि! सच में, यहां खुद को,
मैं भी अकेला ही खुद को पाता हूँ..
आकांक्षाएं मेरी कुछेक जो है,
उसपे दुर्योधनों का ही सत्ता पाता हूँ,
ताउ धृतराष्ट्र की मर्यादा है,
और राजा से बैर कर द्रोही नहीं बनना चाहता हूँ,
पर फिर यह महान जीवन जो व्यर्थ रहेगा,
ऐसा होते भी नही देखना चाहता हूं..

सो इस भवसागर से हे भगवान,
मुझको भी पार लगाओ न,
गर्व लिखूँ, मैं भी गर्व जीऊँ,
मुझको अपना पार्थ बनाओ न,
क्या सही क्या है गलत,
इसके भान कराओ न,
अपने इस अर्जुन को,
रण में मार्ग दिखाओ न..

हे कृष्णा मेरे कविता में,
अपने बंसी के धुन घोलो न,
लिखूं मैं जब-जब धर्म की रक्षा में,
तब तुम मेरे शब्दों में विराजों न..
मेरे जीवन, मेरे आचरण में भी तुम,
कभी अपनी झलक दिखाओं न..
मैं भी जीउ-लिखूं बस प्रेम-धर्म को,
मुझे भी अपना शिष्य बनाओ न..
©सन्नी कुमार

रश्मि को रश्मि रहने दो

उसकी अच्छी बातें,
उसकी हाथों पर कलेवा,
उसका नाम, उसका प्यार,
सब फ़रेब निकला..
उसके इश्क़ में डूब कर,
मैंने क्या-क्या न किया,
मेरे वसूल, मेरा विश्वास बदला,
हर रिश्ते-नातेदार बदला,
और जिसके साथ कि खातिर मैंने खुद को बदला,
वह इश्क़, वह आशिक़, उसका नाम तक झुठा निकला..

खैर,
तब माँ मेहंदी के गीत संजो रही थी,
बापू रिश्ते नए रोज ढूंढ रहे थे,
भाई तैयारियों में लगा हुआ था,
और मैं उसके प्यार में डूब गई थी..
सोचा समझा लूंगी माँ को,
बापू रोयेंगे तो मैं मना लुंगी,
भाई के डांट को सर झुका मैं सह लुंगी,
जो न माने मैं रिश्ते तोड़, नए प्यार संग मैं रह लूंगी..

तब बड़ा गुमान था उसके इश्क पर,
उसकी प्यार भरी बातें और अधूरे सच पर,
नहीं पता था अब हल्दी मेरी छीन जाएगी,
सिंदूर बिंदी न मिल पाएगी,
मां का दिया नाम, बापू के पहचान बदल जाएंगे,
आस्थाओं की अर्थी सजाकर,
मैं रश्मि, रजिया बेगम जब बन जाऊंगी,
तब पढ़ कलमा उसके नाम की डोली मैं चढ़ पाऊँगी..

पर रुको क्षणिक, जरा विचार करो,
मेरे ‘कुबूल है’ से पहले बस ये जवाब दे दो,
क्या ये इश्क सिर्फ मेरा है,
क्या ये मिलन की ख्वाहिश बस मेरी है,
गर नहीं तो क्या तुम भी संग हवन करोगे,
मेरे इष्ट के प्रसाद क्या तुम भी मेरे संग भोग करोगे?

नहीं करोगे जानती हूं,
न मैं तुमसे ये सब चाहती हूँ,
बस तुम मेरे प्रेम को प्रेम तक रहने दो,
और मुझको ‘मैं’ रहकर ही जीने दो।

इश्क से पहले शर्तें कहाँ थी,
फिर शर्तों का इश्क में होना हराम ही है,
तो मुझको बापू के आन को जीने दो,
अब भी मुझको मेरी गौ माता पूजने दो,
दे दूंगी तुलसी जल तो क्या बुरा घट जाएगा,
चुटकी भर सिंदूर लगा लूं तो कौन प्रलय आ जायेगा?

इश्क जो हमारा कल तक उन्मुक्त रहा,
उसको बुर्के के अंदर न तुम कैद करो,
है इश्क अब भी तुम्हारे अधूरे सच से,
मुझे उस अधूरेपन को ही जी लेने दो,
जानते हो तुम भी ये प्यार है कोई जुर्म नहीं,
तो मुझको मेरी पहचान ही जीने दो,
है इश्क अगर तुमको रश्मि से,
रश्मि को रश्मि रहने दो…
©सन्नी कुमार

अक्सर झूठ सच का लिबास पहने आते है

हक़ीक़त रूठी परी है कबसे,
फिर भी ख्वाब रिझाने आते है,
है सब स्व में ही मगन फिर भी,
वो मेरे है दिखाने आते है..

क्या कहूँ क्या लिखूं तुमसे,
कि तुम्हें तो बस पढ़ने अक्षर आते है,
पढो गर पढ़ सको भावों को,
कि वहीं तुम्हें इंसान बनाते है..

पर्सनालिटी डेवलपमेंट का है ये दौर,
की यही तुम्हें त्वरित नौकरी भी दिलाते है,
पर जीवन में चरित्र निर्माण भी है जरूरी,
कि अक्सर केवल मुखौटे काम नहीं आते है..

वक्त की पहचान सीख लो ऐ सन्नी,
कि अपने भी इसी को देख कर मिलने आते है,
जिंदगी में जरूरी है कि तुम सही समझ रखना,
कि अक्सर झूठ सच का लिबास पहनकर आते है..

©सन्नी कुमार

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