हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है

हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है,
वो आकर अपनी मुस्तैदियों के चर्चे चलाते है,
आभार करूं या उपहास, उत्साही राहगीरों का,
जो पथप्रदर्शक को ही ‘चले कैसे’ सीखाते है।

‘काम के चर्चे को’ काम समझने वाले,
अक्सर बत्तखों से बेहतर मुर्गियों को बताते है,
आज हर ओर है छाया, कलियुग का घटा घनघोर,
जहाँ मक्कार, मासूमों पे मितव्ययिता की वृष्टि कराते है।

जिन नक्कारों के क़िस्से छिप गए है धूलों से,
उनको अब आँधियों का है डर नहीं, तभी औरों को सफलता के सूत्र बाँटते है,
बड़ी गहरी है मन में क्षोभ, पर कहो किससे कहूँ अद्विक,
वो मैं जिसका होके बैठा हूँ, वही सब मुझको गैर समझते है।

यूं तो हम भी कोई हरिश्चंद्र न है, न हो सकते,
पर जो मुझसे भी है घाघ, आजकल सत्संग के तम्बू लगाते है।
मेरे कविता में जब भी शब्द, जलते है पीड़ा में,
ताज़्जुब है कि सुनकर भी आह नहीं, सबके ‘वाह-वाह’ निकलते है।

हमसे देर हमारे जो चौकीदार आते है,
वो आकर अपनी मुस्तैदियों के चर्चे चलाते है,
आभार करूं या उपहास, उत्साही राहगीरों का,
जो पथप्रदर्शक को ही ‘चले कैसे’ सीखाते है।
© सन्नी कुमार

आपके सही सलाह ही मुझसे मेरा बेहतर निकलवा सकते है तो प्रार्थना है खुले मन से अपनी प्रतिक्रिया दे। आपका स्नेहाकांक्षी 🙏

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