अक्सर झूठ सच का लिबास पहने आते है

हक़ीक़त रूठी परी है कबसे,
फिर भी ख्वाब रिझाने आते है,
है सब स्व में ही मगन फिर भी,
वो मेरे है दिखाने आते है..

क्या कहूँ क्या लिखूं तुमसे,
कि तुम्हें तो बस पढ़ने अक्षर आते है,
पढो गर पढ़ सको भावों को,
कि वहीं तुम्हें इंसान बनाते है..

पर्सनालिटी डेवलपमेंट का है ये दौर,
की यही तुम्हें त्वरित नौकरी भी दिलाते है,
पर जीवन में चरित्र निर्माण भी है जरूरी,
कि अक्सर केवल मुखौटे काम नहीं आते है..

वक्त की पहचान सीख लो ऐ सन्नी,
कि अपने भी इसी को देख कर मिलने आते है,
जिंदगी में जरूरी है कि तुम सही समझ रखना,
कि अक्सर झूठ सच का लिबास पहनकर आते है..

©सन्नी कुमार

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8 thoughts on “अक्सर झूठ सच का लिबास पहने आते है

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  1. kyaa baat kyaa baat……
    Sher ko dekhkar anumaan lagaa sakte hain ki
    eske panjon men naakhun honge,
    insaanon ke naakhun nahi dikhte……
    mumkin hai sher ke panjon se bach jaanaa,
    insaanon se panjon se bachpaanaa naamumkin hai.

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