मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों

(१)
न गीताग्रंथ जपता हूँ,
न आयत-ए-क़ुरआन रटता हूँ,
मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों,
नेकी को सजदा करता हूँ।

है किसी को दीन की चिंता,
किसी को धर्म का है ख्याल,
मैं आशिक हूँ मेरे यारों,
दिलों की बात करता हूँ।

न जन्नत की मुझे ख्वाहिश,
न जहन्नुम का डर सताता है,
मैं ख्याली हूँ मेरे यारों,
ख्वाबों से हक़ीक़त सजाता हूँ।

कोई है ढूंढता रब को,
कोई ईश्वर से आस रखता है,
मैं मिलता हूँ जिससे भी,
उसी में रब ढूंढ लेता हूँ।

न गीताग्रंथ जपता हूँ,
न आयत-ए-क़ुरआन रटता हूँ,
मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों,
प्रकृति से प्रेम करता हूँ।

है मेरी भावनाएं जो जिंदा,
तकलीफों को जान लेता हूँ,
वो जो कुछ कह नहीं सकते,
मैं उनकी बात करता हूँ।
©सन्नी कुमार

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17 thoughts on “मैं काफ़िर हूँ मेरे यारों

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  1. waah bahut khub kaha…..
    ना हिन्दू की ना मुसलामानों की होती,
    काश ये धरती इंसानों की होती,
    ये अल्लाह ना होते ईश्वर ना होते,
    धरती पर शायद काफिर ना होते,
    जन्नत,जहन्नुम की बातें ना होती,
    काश ये धरती इंसानों की होती,

      1. AREY NAHI BHAYEE AAPNE ITNA BADHIYA AUR KAHEN TO SHANDAR DHANG SE LIKHA KI ANAAYAAS HI SHABD PANKTI KA RUP LE LIYA…….MAIN BHI AAPKE JAISA HI HUN MAHAN MAT BANA DIJIYE.

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