युवावों का देश, युवाओं के नारे

युवावों का देश, युवाओं के नारे,
सत्ता में गायब है फिर भी बेचारे।
पक्ष जिनको पकौड़ा तलना सीखा रहा,
और विपक्ष पत्थरबाजी जिनसे करा रहा,
नाज करे क्या उस युवादेश पर,
जो मुल्क की बर्बादी के नारे लगा रहा?

सत्ता कहती है- मरता है रोहित मरने दो,
कन्हैया-खालिद को कचड़ा करने दो,
इनको ॐ-सुंदर-सत्या से अनजान रखो,
बस इनकी लाइक-कमेंट की भूख बरकरार रखो।
ये फिर कल पकौड़ा या पत्थर चुन लेंगे,
और तब हम इनको कार्यकर्ता मुफ्त में रख लेंगे।

ये तोते है रट लगाएंगे,
पर तुम तो बस जाल फैलाओ,
जात-धर्म और ऊंच नीच में,
हर बार खुदी ये फस जाएंगे,
बड़ी जल्दी में है इनके चाहत का ट्रिगर,
ये बर्बादी तक इसे चलाएंगे।

कैसे करु मैं नाज इस युवादेश पर,
जो सियासत का बनता चारा है,
दिन रात है रहता रटता किताबें,
ले-देकर नौकरी की आस में जीता है,
सत्ता-सियासत ने जिसको बस वोट है समझा,
क्या वो क्रांति की जुर्रत रखता है?
©सन्नी कुमार

2 thoughts on “युवावों का देश, युवाओं के नारे

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