दहेज का इतिहास

IMG-20180121-WA0003उत्तर वैदिक काल में विवाह के समय पिता अपनी पुत्री को अपनी इच्छा अनुसार उपहार दिया करते थे जो पहले से निश्चित नहीं हुआ करता था, मध्यकाल में इस उपहार ने अपना स्वरूप बदला और फिर यह स्त्रीधन के रुप में जाने जाना लगा। स्त्रीधन का उद्देश्य कन्या को उसके पारिवारिक जरूरतों समेत ऐसी वस्तुओं को देना था जो उसके बुरे वक्त में काम आए, इसमें धन सम्मिलित था और यह राज परिवारों विशेषकर राजपूतों में प्रचलित था और कन्यापक्ष इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ कर देखते थे। मध्यकाल में स्त्रीधन संपन्नो तक सीमित था और पूर्णतः ऐच्छिक था।
आज जिस दहेज की बात करते है उससे ग्रसित थोड़ा-बहुत मै और आप,सब है। आज इच्छा नगण्य और दवाब का दानव इतना बड़ा है कि कन्या के जन्म से ही उसका परिवार शादी की चिंताओ में मरने लगता है। यह दहेज़ रूपी शैतान बेटी का खून कभी उसी के माँ-बाप से(भ्रूण हत्या) तो कभी दहेज़ लोभी पति से करवा देता है।
ऐसे में सरकार ने जो पहल की है वो सराहनीय है, जितने बच्चे व नवयुवक आज इस मानव श्रृंखला में सम्मिलित हुए उनमें सेअगर एक चौथाई भी दहेज़ को खारिज कर दे तो संभवतः आनेवाले दशक में यह शैतान दम तोड़ देगा।
बहरहाल यह शोध का विषय अवश्य है कि दहेज़ शब्द और इसके शैतानी संक्रमण की शुरुआत कब और कहाँ से हुई।
शुभकामनाएँ
साभार
सन्नी कुमार

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3 thoughts on “दहेज का इतिहास

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  1. kal beti ko ham uski subidha ki saari chije dekar use naye ghar men bida karte they …….jo bhi dete they kam maalum padta tha ………sneh aur uska adhikar tha wah…….aaj dahej laldewale ka adhikar ho gaya hai……sahi kaha apne aaj ham sab isse grasit hain…….jiska khamiyajaa stri ke saath saath ham sab bhugat rahe hain….kabhi baap bankar kabhi bhayee…bankar ….magar jaise hi dulha bante hain…….dard ghar ke log bhul jaate hain……nischit iska ant hona chahiye….pahal hamsab ko karna chahiye………badhiya lekh .

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