क्यों न जनता बागी हो जाए?

हाल के दिनों में जो घटनाएं बिहार में फलित हुयी है उनमें मोटा मोटा ये रहा कि सरकार शराब बन्दी को लेकर सरकार काफी शख्त दिखी और इसके लिए उन्हें धन्यवाद, पर क्या शराब ही एकमात्र बिमारी है इस बदहाल बिहार का? नहीं! यहां बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, जनसंख्या और सबसे घातक बीमारी, अपराध रहा है पर दशकों से बिहार की आम जनता न्याय को तरस रही है और उन्हें मिला कुछ नहीं, बल्कि अपराध और अपराधी खुले घूमते है, चाहे शहाबुद्दीन हो, राजबल्लभ, रॉकी यादव् या सैकड़ों छोटे बड़े नाम जिन्होंने आम जन का शोषण किया हो… बिहार की मिट्टी मानों अपराध के लिए और भी उर्वर हो गयी है। यहाँ निवेश के नाम पर कुछ नहीं है, काश यहाँ के करोड़पति नेता ही कुछ बिजनेस शुरू करते और लोगों को रोजगार देते पर नही ये गरीबी को सिर्फ मुद्दा मानते है और ये वही मुद्दा है जो इन नेताओं को गद्दी तक पहुंचाता है सो ये कतई गरीबी को खत्म या कम करने का प्रयास नही करेंगे.
इन्हीं शिकायतों को, मेरी पीड़ा को यहाँ कविता के रूप में पढें, सहमत हो तो शेयर करें।

तुम निर्लज्जों के ओछे कर्मों से,
लज्जित हुए हम पछताते है,
अखबारों के पन्ने हरदिन जब,
तुम्हारे काले कर्मों से भरे पाते है,
क्यों देते है वोट तुम्हें हम,
सोंच सोंच जल जाते है।

कैसे हो तुम जनता के सेवक,
जो जनता का सोशन करते हो,
फटेहाल हर दूसरी जनता,
और तुम मेर्सेडीज में घूमते हो,
करते हो तुम कौन व्यापार,
जो अकेले ही फलते हो,
रोजगार के त्रस्त है जनता,
क्यों उनको भी अवसर नहीं देते हो?

बाँट बाँट कर धर्म-जात में,
तुम अपना हित बस साधते हो,
टोपी-तिलक और ऊंच नीच में,
जनता को भरमाते हो,
और अभिनव भारत के सपने पर,
मौन मोहन बन जाते हो।

लूट-गबन और हत्या से तुम,
कौन सी कीर्ति रचते हो,
शर्म नहीं आती क्या तुमको,
जो दोहरी नीति रखते हो,
जनता को तुम नित नियम सिखाते,
और खुद अपराधियों से साठ-गांठ रखते हो,
जनता को मिले अब न्याय भी कैसे,
तुम जो न्याय को बंधक रखते हो..

कहो क्यों न जनता बागी हो जाए,
और फ़ेंक उखाड़े सिस्टम को,
क्यों न उठा ले शस्त्र खुदी हम,
न्याय, धर्म की रक्षा को,
मिलते है जो अपराध को शह अब,
क्यों न मार भगाये इन नाकारों को,
कब तक सहे आखिर हम जनता,
तुम भ्रष्ट सत्तासुख लोभियों को?

अब जब मिलता न्याय नहीं,
न बनती है हक़ में कानून,
कब तक रखे धैर्य हम जनता,
कब तक रखें हम सब मौन,
क्यों न खुद की किस्मत अब खुद ही लिख लें,
कहो, अब क्यों न हम बागी हो जाए?
-सन्नी कुमार

20161019_150921

Advertisements

4 thoughts on “क्यों न जनता बागी हो जाए?

Feedback Please :)

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s