तू भेद न कर

दिल ने लाख समझाया कि तू भेद न कर,
मानव है मानवता से बैर न कर..
रंग, बोली, धर्म-जात के है भेद बेवजह,
तू जी खुद को औरों से रंज न कर..

पर वो दिल की क्यों सुने कि वो दिमाग जो था,
कहा डपट कर कि रह औकात में तू,
और देशी संविधान से बैर न कर.
नहीं पांचो ऊँगली बराबर तू जीद न कर,
हाँ तू जोड़ लगा सबको अपना मोल बता,
पर है सब एक, ये बेवकूफी न तू हमको बुझा..

-सन्नी कुमार

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