क्यूं मैं काफिर कहाता हूँ..

IMG_3537नहीं हूँ मैं नमाजी,
न ही गिरिजा जाता हूँ,
पर तुम्हारी ही मूरत बनाकर,
हर रोज शीश झुकाता हूँ.
फिर क्यूँ कहते है कुछ ख़ास बंदे,
कि मैं गुनाह करता हूँ?

हूँ मैं मुरख प्रेम-मत में,
जो तुम्हें मिट्टी में बसाता हूँ,
पर मैं मुरख हूँ सनातन,
तुम्हें कण-कण में पाता हूँ.
क्या यही है गुनाह मेरा,
जो मैं काफिर कहाता हूँ?

है मेरी नजरे जो कच्ची,
मुझे हर रंग लुभाता है,
कभी तुमको नीला बताता,
कभी काला मैं पाता हूँ.
कभी लगते तुम रंगों से इतर,
कभी ऊर्जा बताता हूँ..

खुदा है तू, तू है ईश,
मैं तो यही मानता हूँ,
होंगे तुम्हारे सौ और नाम,
मैं तो कृष्णा जानता हूँ.
क्या यही है गुनाह मेरा,
जो मैं काफिर कहाता हूँ?
-सन्नी कुमार

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19 thoughts on “क्यूं मैं काफिर कहाता हूँ..

  1. बहुत खूबसूरत कविता है. ईश्वर को तो हम उस रुप में ही देखते है , जो बचपन से बताया और सिखाया जाता है. यह तो अपने अपने श्रद्धा की बात है.

    • जी बिलकुल. हमारा इश्वर से परिचय, या यूं कहिये की एक विश्वास का डोर हम हमारे घर से, अपने गुरुजनों से पाते है.. पर आज जो मेरा इश्वर तुम्हारा इश्वर और फिर उस इश्वर के लिए मार काट मच रहा वह काफी चिंताजनक है. व्यावसायिक दुनिया में आज इश्वर की भी मार्केटिंग हो रही, और मतान्त्र्ण को लाखों बंट भी रहे, जिन सब को देख कर पीड़ा होती है!
      आपने देखा ही होगा की किस तरह इस्लामिक कट्टरवादियों ने तुर्की, अफगान और बांग्लादेश में ईद के दिन ही काफिरों को कहने का मतलब इस्लाम से अलग बिश्वास रखने वालों को मार डाला..यह पागलपन, यह विचार हमें सभ्य बनने देगा कभी? हिन्दुओं को काफिर कहना, उनके हत्या को जायज बताना यह सब क्या है? क्यूँ है?

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