असहिष्णु भारत और अवार्ड वापसी

image

अवार्ड वापसी का जो खेल चल रहा है उनके किसी भी खिलाडी(साहित्यकार) को मैं मूढ़ पहले से नहीं जानता था पर अब खबर आयी है की सारुख खान भी इस इसमें शामिल हो रहे, अगर वो भी अपने अवार्ड लौटाते है तो वो पहले सख्स होंगे जिनको मैं जानता हूँ। वैसे आप इन लोगों में से कितनों को जानते थे?? अगर नहीं जानते थे तो अब तो जानोगे, क्यों? तो बोलो इन सुख गए स्याहियों को फिर से कुछ कागज जो मिलेंगे तो फायदा किसका??

वैसे ये सारे अवार्ड वापसी मोदी के टाइम पे क्यों? मुजफ्फरनगर दंगा तो कांग्रेस टाइम पे हुआ था न? 1947 में दंगा हुआ चलो तब ये न थे, पर उसके बाद जब इस देश में इमरजेंसी लगी तब? जब सिखों को मारा गया तब? बाबरी के वक़्त? मुम्बई 93 के वक़्त? संसद हमला? ताज पे हमला? असम का  दंगा? पुणे ब्लास्ट? हैदराबाद ब्लास्ट? भागलपुर का दंगा? तब कहाँ थे?? हिंदुस्तान के हिन्दू जिनकी आस्था श्रीराम में है उनके खिलाफ बोलने की इनकी आजादी छीन गयी क्या ये सब इसलिए है? 15 मिनट में हिन्दुओ को मार डालने वाला जो स्टेटमेंट आया तब ये कहाँ थे? इन के लिए गाली है जो कहते है की आज देश असहिष्णु हो गया, जरा ये भी बता दो देश सहिष्णु था कब? दरअसल तुम वही साहित्यकार हो जो राजनेताओं के पैर पकड़ते हो, चापलूसी लिखते हो वरना अब तक मौन न होते। अबे खुल के बोलो की तुम्हारी फटने लगी है क्योंकि मुफ़्त की मलाई बन्द है और अब भौंकने वाले कुत्तों को इंजेक्शन दिया जाने वाला है।

थोडा शांत हो के समझाता हूँ,
अगर आज माहौल बिगड़ रहा है तो आपके अवार्ड लौटा देने से क्या सब कुछ बदल जाएगा? हे, बुद्धिपिशाचों आप समाज को जोड़िये, अपने AC कमड़े से बाहर आइये और कुछ सार्थक उपाय कीजिये, नौटँकी आज का भारत बर्दाश्त नहीं करेगा। आज का भारत वही है जो नेहरू को भी शक से देखता है की क्रांति के दौर में जेल में बन्द एक नेता अपनी बेटी को चिट्ठी कैसे लिख पाता था. अगर समाज असहिष्णु हो रहा तो उस समाज और सरकार को आप सुनिए, और समझिये और कुछ सार्थक कीजिये।

मित्रों जब संकटमोचन मन्दिर पर हमला हुआ था उस वक़्त वाराणसी में तनाव का माहौल था और तब गाँधीवादी समाजसेवक डॉ सुब्बाराव जी के नेतृत्व में देश के विभिन्न हिस्सों से आये हुए युवाओं ने सामाजिक एकता के उद्देश्य से कैंप किया था, वह कैंप मेरी उस तरह की पहली कैंप थी और मैंने उसके सफल असर को बनारस में देखा था। मैं पूछता हूँ अगर आज देश का माहौल बिगड़ रहा है तो क्या अवार्ड लौटा देने से माहौल बदल जाएगा या जरूरत है की बाहर निकल कर एक दूसरे से बात करे, विश्वास जीते। ये साहित्यकार तो रचनात्मक होते है फिर इतना गलत निशाना क्यों? ये अवार्ड वापसी गिरोह कुछ रचनात्मक क्यों नही करती या इनका उद्देश्य कुछ और है?
मुझे तो यही लगता है की ये कलम से राजनीती करने वाले लोग है वरना मेरा हिंदुस्तान पहले से बेहतर हो रहा है। अब रिमोट से चलने वाला चुप प्रधानमन्त्री नही है, जिसने देश को घोटालों की गर्त में डूबा दिया। आज का हिंदुस्तान भले थोड़े गुस्से में है पर सही रास्ते पर है।
-सन्नी कुमार

Advertisements

11 thoughts on “असहिष्णु भारत और अवार्ड वापसी

Add yours

    1. प्रणाम माते। आप सहमत होंगी पता था, वो क्या है की तना जड़ से अलग थोड़े हॉता है 😉

      1. समझ कम नहीं होगी आपकी बल्कि बहुत से लोग पोलोटिक्स को अछूत समझते है और इससे दूर रहते है, कहीं आप उनमे से तो नहीं?
        एक कहावत है भले आप पॉलिटिक्स में रूचि ले न ले पर पॉलिटिक्स आप में रूचि लेता है। मैं इसी को आधार माँ कभी कभी अपनी प्रतिक्रियाएं दे देता हूँ

      2. sahi kaha. politics hame nahi chhodti beta. mujhe gandi politics se nafrat hai. aap sahi prtikriya dete hai. dena bhi chahiye. sabhi door bhagenge to desh gadde mein chala jayega. Ashirwad.

Feedback Please :)

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

Create a free website or blog at WordPress.com.

Up ↑

%d bloggers like this: