आजादी के असली नायक कौन ⇄ काँग्रेस या गुमनाम कर दिये गये सेनानी व शहीद ?

यह लेख मैं परम आदरणीय नेताजी सुभाषचंद्र बोस के रहस्यात्मकता से गायब हो जाने के पश्चात बने जाँच आयोगों की तथाकथित सार्थकता, गंभीरता व सत्यता का विश्लेषण करते हुऐ शुरू करूँगा जिसके अंतर्गत काँग्रेस और इसके पुरोधाओं के असली कुरूप व निकृष्ट चरित्र का यथासंभव किंतु ऐतिहासिक सबूतों सहित तथ्यात्मक पोस्टमार्टम ही किया जाना है। ▼

★ देश आजाद होने के बाद संसद में कई बार माँग उठती है कि कथित विमान-दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए सरकार कोशिश करे। मगर प्रधानमंत्री नेहरूजी इस माँग को प्रायः दस वर्षों तक टालने में सफल रहते हैं। भारत सरकार इस बारे में ताईवान सरकार (फारमोसा का नाम अब ताईवान हो गया है) से भी सम्पर्क नहीं करती।

अन्त में जनप्रतिनिगण जस्टिस राधाविनोद पाल की अध्यक्षता में गैर-सरकारी जाँच आयोग के गठन का निर्णय लेते हैं। तब जाकर नेहरूजी 1956 में भारत सरकार की ओर से जाँच-आयोग के गठन की घोषणा करते हैं।

लोग सोच रहे थे कि जस्टिस राधाविनोद पाल को ही आयोग की अध्यक्षता सौंपी जायेगी। विश्वयुद्ध के बाद जापान के युद्धकालीन प्रधानमंत्री सह युद्धमंत्री जेनरल हिदेकी तोजो पर जो युद्धापराध का मुकदमा चला था, उसकी ज्यूरी (वार क्राईम ट्रिब्यूनल) के एक सदस्य थे- जस्टिस पाल। मुकदमे के दौरान जस्टिस पाल को जापानी गोपनीय दस्तावेजों के अध्ययन का अवसर मिला था, अतः स्वाभाविक रुप से वे उपयुक्त व्यक्ति थे जाँच-आयोग की अध्यक्षता के लिए।
मगर नेहरूजी को आयोग की अध्यक्षता के लिए सबसे योग्य व्यक्ति शाहनवाज खान नजर आते हैं।

शाहनवाज खान- उर्फ, लेफ्टिनेण्ट जेनरल एस.एन. खान। कुछ याद आया?

Source: आजादी के असली नायक कौन ⇄ काँग्रेस या गुमनाम कर दिये गये सेनानी व शहीद ?

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